मदन अरोड़ा.लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना नागरिक अधिकार है. लेकिन क्या केवल सरकारें ही जवाबदेह हों ? क्या आंदोलन चलाने वाले, राजनीति करने वाले, युवाओं को सड़कों पर उतारने वाले और क्रांति के नाम पर भीड़ जुटाने वाले लोग जवाबदेही से मुक्त हैं ?
हमारा संविधान केवल अधिकार नहीं देता, कर्तव्य भी सिखाता है. फिर जवाबदेही का दायरा केवल सरकारों और अधिकारियों तक सीमित क्यों रहे ? आंदोलनकारी संगठन, राजनीतिक मंच, अभिजीत दीपके और अरविन्द केजरीवाल सरीखे स्वयंभू क्रांतिकारी और जनता के नाम पर राजनीति करने वाले लोग भी तो जवाबदेह होने चाहिए.
जब आंदोलन के नाम पर रेल और सड़कें जाम होती हैं, लाखों लोग परेशान होते हैं, एंबुलेंस रुकती हैं, मरीज तड़पते हैं, मजदूर काम पर नहीं पहुंच पाते, छात्रों की परीक्षाएं प्रभावित होती हैं. तब उस अव्यवस्था की जिम्मेदारी कौन लेता है ? आंदोलन का नेतृत्व करने वाले अक्सर राजनीतिक लाभ उठा लेते हैं, लेकिन आम जनता की तकलीफ का हिसाब कौन देगा ? इसकी जवाबदेही तय कर उसे सजा देने की बात कौन करेगा !
और जब आंदोलन हिंसा में बदल जाते हैं, सरकारी संपत्तियां जलती हैं, बसें तोड़ी जाती हैं, सार्वजनिक धन नष्ट होता है, तब उसकी भरपाई टैक्स देने वाली जनता क्यों करे ? नुकसान करने वालों से वसूली और आयोजकों की जवाबदेही तय क्यों नहीं होनी चाहिए ?
सबसे बड़ा सवाल फंडिंग का है !
देशव्यापी आंदोलन, बड़े-बड़े मंच, सोशल मीडिया प्रचार, यात्रा, व्यवस्थाएं, प्रचार सामग्री.यह सब बिना भारी धन के संभव नहीं. फिर जनता को यह जानने का अधिकार क्यों नहीं कि पैसा कहां से आ रहा है ? कौन लोग फंड दे रहे हैं ? क्या विदेशी स्रोतों से पैसा आ रहा है ? यदि नहीं, तो पारदर्शिता से पूरा हिसाब सार्वजनिक करने में हिचक क्यों ? इंस्टाग्राम पर दो करोड़ फॉलोवर जुटाना अलग बात है. धरातल पर आंदोलन करना अलग. उसके लिए कौन फंडिंग कर रहा है. इसके पीछे विदेशी ताकतों की लेकर उठते सवाल. इनके जवाब देने की जवाबदेही से कॉकरोच जनता पार्टी के अभिजीत दीपके और उसके साथी भाग नहीं सकते. आखिर ये निकले तो उसी झाडू पार्टी से हैं, जिसके संयोजक अरविन्द केजरीवाल ने जनता से किए तमाम वादों क़ो तोड़ भ्रष्टाचार और ऐशोआराम की जिंदगी के नए आयाम बनाए.
देश पहले भी ऐसे आंदोलनों का परिणाम देख चुका है. भ्रष्टाचार विरोध और जवाबदेही के नाम पर राजनीति शुरू हुई. जनता को ईमानदारी, सादगी और पारदर्शिता के सपने दिखाए गए. शपथपत्र जारी हुए, बड़े-बड़े वादे हुए. छोटी गाड़ी, बिना सुरक्षा, साधारण जीवन, लोकपाल, चंदे का हिसाब. लेकिन सत्ता मिलते ही वादे पीछे छूट गए. जनता ने देखा कि आंदोलन की भाषा और सत्ता का व्यवहार अलग-अलग निकला.यही कारण है कि आज युवाओं को भावनाओं से नहीं, विवेक से सोचना होगा.
जो लोग मंच से क्रांति की बातें करते हैं, क्या वे अपने वादों की कानूनी जवाबदेही लेने को तैयार हैं ? क्या वे घोषणा करेंगे कि यदि उनके दावे झूठे निकले, युवाओं को भ्रमित किया गया, या जनता से किए वादे पूरे नहीं हुए, तो वे सार्वजनिक जीवन छोड़ देंगे ? क्या वे इसके लिए कानून बनाए जाने की मांग भी सरकार से करेंगे?क्या वे अपने आंदोलन और फंडिंग का ऑडिट जनता के सामने रखेंगे?
आज देश का युवा सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार बन चुका है. उसकी बेरोजगारी, गुस्सा, निराशा और सपनों को हर विचारधारा अपने हिसाब से इस्तेमाल करना चाहती है. सोशल मीडिया पर क्रांति का रोमांच पैदा किया जाता है, लेकिन जमीन पर संघर्ष झेलने वाला युवा ही होता है. मंच पर भाषण देने वाले चेहरे अक्सर सुरक्षित रहते हैं. मंच पर आये अभिजीत दीपके गर्मी लगते ही ए सी गाड़ी में जाकर बैठ गए. कॉकरोच जनता पार्टी प्रवक्ता सौरभ दास छाया में बैठ कोल्ड कॉफी पीने लगे और पंखा झूलाने के लिए एक व्यक्ति क़ो भी बुला लिया. पर जो प्रदर्शन में शामिल होने के लिए आये उनका क्या? उनके लिए व्यवस्था की ज़िम्मेदारी की जवाबदेही किसकी बनती है.
युवाओं को यह समझना होगा कि हर आंदोलन जनहित का नहीं होता और हर नारा राष्ट्रहित का नहीं होता. कुछ आंदोलन सच में बदलाव के लिए होते हैं, लेकिन कुछ केवल सत्ता तक पहुंचने की सीढ़ी बन जाते हैं. जैसे अन्ना आंदोलन और अब कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन.
लोकतंत्र में विरोध जरूरी है, लेकिन विरोध के नाम पर अराजकता नहीं. आंदोलन जरूरी हैं, लेकिन पारदर्शिता भी उतनी ही जरूरी है. सरकार जवाबदेह हो, यह आवश्यक है, लेकिन आंदोलनकारी और राजनीतिक संगठन भी जवाबदेह हों, यह उससे कम आवश्यक नहीं.
देश को जागरूक युवाओं की जरूरत है, भावनात्मक भीड़ की नहीं.
क्रांति केवल नारे लगाने, सोशल मीडिया ट्रेंड चलाने और भीड़ जुटाने से नहीं आती. सच्ची क्रांति त्याग, अनुशासन, पारदर्शिता और जवाबदेही मांगती है. जो लोग दो घंटे की असुविधा सहन नहीं कर सकते, वे देश बदलने का दावा तो कर सकते हैं, लेकिन देश निर्माण का संघर्ष नहीं झेल सकते.
आज जरूरत किसी अंध समर्थन की नहीं, बल्कि हर पक्ष से सवाल पूछने की है. सरकार से भी, विपक्ष से भी, आंदोलनकारियों से भी और उन नए राजनीतिक चेहरों से भी जो युवाओं के सपनों को अपना मंच बना रहे हैं.
क्योंकि लोकतंत्र तभी मजबूत होगा, जब जवाबदेही सबकी तय होगी. केवल सत्ता की नहीं.