हनुमानगढ़


1947 की वह आग, जिसमें लाखों परिवार जल गए, लेकिन टूटे नहीं मदन अरोड़ा, 1947 का भारत विभाजन केवल भूगोल का बंटवारा नहीं था, वह मानव इतिहास की सबसे भयावह त्रासदियों में से एक था. पश्चिमी पंजाब, सिंध, रावलपिंडी, लाहौर, मुल्तान, सियालकोट, पेशावर और उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत में सदियों से बसे पंजाबी खत्री, अरोड़ा, सिख और अन्य हिंदू समुदाय एक ही रात में पराये घोषित कर दिए गए. जिन घरों में पीढ़ियाँ पली-बढ़ी थीं, जिन खेतों में उनके पुरखों का पसीना बहा था, जिन मंदिरों और गुरुद्वारों में उनकी आस्था बसती थी, वे सब अचानक मौत और दंगों के मैदान बन गए. विभाजन की घोषणा के साथ ही योजनाबद्ध हिंसा शुरू हुई. गांवों के गांव जला दिए गए. हजारों महिलाओं का अपहरण हुआ, उनके साथ अमानवीय अत्याचार किए गए. बच्चों तक को नहीं बख्शा गया. ट्रेनें लाशों से भरकर भारत पहुंच रही थीं. सड़कों पर रक्त बह रहा था. लाखों लोग पैदल काफिलों में निकल पड़े, जिन्हें उस समय कटार कहा जाता था. कोई अपने बुजुर्गों को कंधों पर उठाकर ला रहा था, कोई भूख-प्यास से बिलखते बच्चों को लेकर सीमा की ओर भाग रहा था. यह केवल पलायन नहीं था, यह अपनी अस्मिता और अस्तित्व को बचाने की लड़ाई थी. क्या यह मारकाट रोकी जा सकती थी? इतिहासकारों का बड़ा वर्ग मानता है कि यदि विभाजन की प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित और समयबद्ध होती, तो हिंसा का स्तर कम किया जा सकता था. ब्रिटिश सरकार ने सत्ता हस्तांतरण की जल्दबाजी दिखाई.  सीमांकन करने वाले रेडक्लिफ आयोग ने बिना जमीनी तैयारी के सीमाएं तय कर दीं.जल्द से जल्द सत्ता हासिल कर सरकार के मुखिया बनने की चाहत रखने वालों ने इसे तत्काल आँख बंद कर स्वीकार कर लिया. नतीजन केवल चार किमी दूर श्री करतारपुर साहिब और हिन्दू बाहुल्य इलाके पाकिस्तान में चले गए. इसे भी पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया. प्रशासनिक तंत्र बिखर चुका था. पुलिस और सेना सांप्रदायिक आधार पर विभाजित हो रही थीं. सबसे बड़ी विफलता यह रही कि करोड़ों लोगों के संभावित पलायन का अनुमान होते हुए भी उनकी सुरक्षा के लिए पर्याप्त सैन्य व्यवस्था नहीं की गई. जिन क्षेत्रों में हिंसा भड़क रही थी, वहां तत्काल कठोर कार्रवाई नहीं हुई. कई स्थानों पर स्थानीय प्रशासन पूरी तरह से निष्क्रिय या पक्षपाती नजर आया. परिणामस्वरूप भीड़तंत्र हावी हो गया और मानवता शर्मसार होती रही. भारत सरकार ने कैसे बचाई लाखों लोगों की जान? विभाजन के दौरान भारत सरकार, सेना और आर एस एस जैसे स्वयंसेवी संगठनों ने राहत और पुनर्वास के लिए बड़े स्तर पर कार्य किया. सीमावर्ती इलाकों में सैन्य एस्कॉर्ट के साथ विशेष ट्रेनें चलाई गईं. काफिलों को सुरक्षा देने के लिए सेना तैनात की गई. पाकिस्तान में फंसे हिंदू और सिख परिवारों को निकालने के लिए दोनों देशों के बीच समन्वय स्थापित करने के प्रयास किए गए. लेकिन इसके उत्साहजनक परिणाम सामने नहीं आये. दिल्ली का पुराना किला, कुरुक्षेत्र, अमृतसर और पंजाब-हरियाणा के कई हिस्से विशाल राहत शिविरों में बदल दिए गए. लाखों लोगों को भोजन, कपड़े और अस्थायी आश्रय दिया गया. महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए विशेष शिविर बनाए गए. इसके बाद शुरू हुआ पुनर्वास का सबसे कठिन अध्याय. जिन लोगों ने पाकिस्तान में अपनी जमीन और मकान छोड़े थे, उन्हें भारत में वैकल्पिक संपत्ति देने की व्यवस्था की गई. हरियाणा, पंजाब और राजस्थान में कृषि भूमि आवंटित की गई. दिल्ली, फरीदाबाद, निलोखेड़ी और अन्य टाउनशिप बसाकर व्यापार और रोजगार के अवसर दिए गए. छोटे उद्योगों के लिए लोन और प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई. भूमि आवंटन भी आसान नहीं था. सरकार ने स्टैंडर्ड एकड़ और ग्रेडेड कट प्रणाली लागू की. पाकिस्तान में छोड़ी गई जमीन की उपज क्षमता के आधार पर भारत में भूमि दी गई. छोटे किसानों को प्राथमिकता मिली, जबकि बड़े भू-स्वामियों को अनुपातिक कटौती के साथ काफी कम 15 से 20 फीसदी जमीन दी गई ताकि अधिक से अधिक विस्थापित परिवारों को बसाया जा सके. पंजाब, हरियाणा, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ और राजस्थान के नहरी क्षेत्रों में हजारों परिवारों को कृषि भूमि दी गई. बाद में इन्हीं परिवारों ने बंजर क्षेत्रों को उपजाऊ बनाकर देश की कृषि अर्थव्यवस्था को मजबूत किया. अपने ही देश के एक हिस्से से  विस्थापित हुए इन परिवारों ने भी हार नहीं मानी. जिन्होंने सब कुछ खो दिया था, उन्होंने किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया बल्कि शून्य से शुरुआत की. मेहनत, अनुशासन और उद्यमशीलता के बल पर उन्होंने भारत के व्यापार, कृषि, शिक्षा और उद्योग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया. आज उत्तर भारत के अनेक शहरों की आर्थिक रीढ़ वही परिवार हैं जिन्हें कभी रिफ्यूजी कहा गया था. शरणार्थी नहीं, संघर्ष के योद्धा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक  श्री मोहन भागवत ज़ी द्वारा हाल में दिया गया यह बयान कि विभाजन पीड़ितों को शरणार्थी नहीं बल्कि संघर्ष के योद्धा कहा जाना चाहिए, केवल भावनात्मक टिप्पणी नहीं बल्कि ऐतिहासिक पीड़ा की स्वीकृति है. वास्तव में वे किसी विदेशी देश से भारत नहीं आए थे. भारत का विभाजन हुआ और एक रात में वे सीमा के दूसरी ओर चले गए.  गुरु गोबिंद सिंह के इन बंदों खत्री, अरोड़ा, सिखों ने  धर्मांतरण या अपमानजनक जीवन स्वीकार करने के बजाय अपनी आस्था, संस्कृति और मातृभूमि को चुना. उन्होंने अपने परिवार खोए, संपत्ति गंवाई, लेकिन भारत पर विश्वास नहीं छोड़ा. आज प्रश्न यह उठ रहा है कि यदि आपातकाल के दौरान एक दिन जेल में रहने वालों को लोकतंत्र सेनानी का दर्जा देकर पेंशन और सम्मान दिया जा सकता है, तो विभाजन की विभीषिका झेलने वाले लाखों परिवारों को विभाजन संघर्ष योद्धा का राष्ट्रीय सम्मान क्यों नहीं? क्या उन लोगों का बलिदान कम था जिन्होंने अपने सामने परिवार के सदस्यों की हत्या देखी? क्या उन माताओं की पीड़ा कम थी जिन्होंने अपने बच्चों को रास्तों में खो दिया? क्या उन महिलाओं का संघर्ष छोटा था,जिन्होंने अमानवीय अत्याचार सहने के बाद भी जीवन को फिर से खड़ा किया? यह मुद्दा अब फिर क्यों उठ रहा है? विभाजन की पीढ़ी धीरे-धीरे समाप्त हो रही है. उनके साथ उनकी पीड़ा, संघर्ष और इतिहास भी मिटता जा रहा है. लंबे समय तक तथाकथित सेक्युलर राजनीति ने विभाजन की हिंदू-सिख पीड़ा पर खुलकर चर्चा से परहेज किया. इतिहास की पुस्तकों में लाखों विस्थापित परिवारों के दर्द को सीमित शब्दों में समेट दिया गया. अब नई पीढ़ी अपने पूर्वजों के संघर्ष को पहचान दिलाने की मांग कर रही है. विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस मनाए जाने, फिल्मों, दस्तावेजों और सार्वजनिक चर्चाओं के कारण यह विषय फिर राष्ट्रीय विमर्श में आया है. लोग पूछ रहे हैं कि जिन परिवारों ने अपना सर्वस्व खोकर भी भारत को मजबूत बनाया, उन्हें केवल रिफ्यूजी कहकर क्यों सीमित कर दिया गया? यह केवल सम्मान का प्रश्न नहीं है, यह ऐतिहासिक न्याय का प्रश्न है. विभाजन पीड़ितों को संघर्ष योद्धा के रूप में मान्यता देना उन लाखों अनाम लोगों के साहस, त्याग और पुनर्निर्माण की भावना को राष्ट्रीय श्रद्धांजलि होगी, जिन्होंने राख से उठकर भारत के भविष्य को मजबूत किया.
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बॉलीवुड के बीते जमाने के स्टार जीतेंद्र आज 82 साल के हो गए। तकरीबन चार दशक लंबे करियर में जीतेंद्र ने 'तोहफा', 'हिम्मतवाला', 'कारवां', 'परिचय', 'मवाली' समेत कई हिट फिल्मों में काम किया है। अपने अनोखे डांसिंग स्टाइल की वजह से लोग उन्हें जंपिंग जैक बुलाते थे। जीतेंद्र ने करीब 121 हिट फिल्में दीं, लेकिन इसके बावजूद उन्हें कभी बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड नहीं मिला। कभी 8 साल में 60 फिल्मों में काम करने वाले जीतेंद्र तकरीबन 23 साल पहले एक्टिंग छोड़ चुके हैं। 2001 में उन्हें फिल्म ‘कुछ तो है’ में देखा गया था। इसके बाद वो कुछ टीवी सीरियलों और वेब सीरीज में चंद मिनट के लिए ही नजर आए हैं। एक इंटरव्यू में जीतेंद्र ने तो ये तक कहा था कि उन्हें याद ही नहीं है कि वे कभी एक्टर थे। वैसे, एक्टिंग के अलावा जीतेंद्र ने प्रोडक्शन हाउस से भी मोटी कमाई की, लेकिन फिल्में प्रोड्यूस करते हुए जीतेंद्र दो बार दिवालिया भी हो गए थे। जीतेंद्र ने तब भी हार नहीं मानी और आज उनकी संपत्ति 1512 करोड़ रुपए है। जन्मदिन के मौके पर जानते हैं जीतेंद्र की लाइफ के कुछ दिलचस्प किस्से… राजेश खन्ना थे जीतेंद्र के क्लासमेट जीतेंद्र का जन्म 7 अप्रैल 1942 को अमृतसर (पंजाब) में हुआ था। उनका असली नाम रवि कपूर है। जीतेंद्र के पिता अमरनाथ फिल्म इंडस्ट्री में नकली ज्वेलरी सप्लाई करने का काम करते थे, इसलिए पूरी फैमिली अमृतसर से मुंबई आकर बस गई थी। जीतेंद्र की शुरुआती पढ़ाई सेंट सेबेस्टियन गोअन हाई स्कूल, मुंबई में हुई थी। इसी स्कूल में उनके साथ राजेश खन्ना भी पढ़ते थे और दोनों बहुत अच्छे दोस्त थे। जीतेंद्र ने आगे की पढ़ाई मुंबई के सिद्धार्थ कॉलेज से पूरी की। ज्वेलरी सप्लाई करते-करते बने बॉडी डबल जीतेंद्र जब बड़े हुए तो अपने पिता के बिजनेस में हाथ बंटाने लगे। इसी सिलसिले में एक दिन वे फिल्ममेकर वी शांताराम से मिले। फिर अक्सर ज्वेलरी सप्लाई के सिलसिले में जीतेंद्र का शांताराम की फिल्म कंपनी में आना-जाना लगा रहता था। इसी दौरान उनके मन में हीरो बनने की इच्छा जाग गई। उन्होंने वी शांताराम से किसी फिल्म की शूटिंग देखने की इच्छा जताई। शांताराम ने कहा-सिर्फ शूटिंग देखने से काम नहीं चलेगा। काम करोगे? जीतेंद्र ने तुरंत हामी भर दी। फिल्म 'नवरंग' की शूटिंग के दौरान जीतेंद्र को छोटे-मोटे काम मिल जाया करते थे। लेकिन एक दिन ऐसा आया जब जीतेंद्र की किस्मत चमक गई। ये किस्सा उन्होंने खुद 'द कपिल शर्मा शो' के दौरान सुनाया था। जब कपिल शर्मा ने उनसे पूछा था कि क्या आप स्ट्रगल के दिनों में हीरोइन के बॉडी डबल बने थे? इस पर जीतेंद्र ने कहा था, हां, मैं फिल्म 'सेहरा' की शूटिंग के दौरान जूनियर आर्टिस्ट था। मुझे शांताराम जी की चमचागिरी करनी पड़ती थी, मैं उस वक्त कुछ भी करने को तैयार था। तो एक दिन बीकानेर में शूटिंग के वक्त हीरोइन संध्या जी की कोई बॉडी डबल नहीं मिल रही थी। शांताराम जी ने मुझे संध्या जी का बॉडी डबल बना दिया और इस तरह मेरी फिल्मों में एंट्री हुई। पहली फिल्म की फीस थी 100 रु. शुरुआत में जीतेंद्र को काम तो मिला लेकिन छह महीने तक कोई फीस नहीं मिली। उनसे वी. शांताराम ने वादा किया था कि जूनियर आर्टिस्ट के तौर पर उन्हें हर महीने 105 रु. दिए जाएंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। फिर जब वी.शांताराम ने जीतेंद्र को 1964 में फिल्म 'गीत गाया पत्थरों ने' से ब्रेक दिया और तब अपनी पहली फिल्म की फीस के तौर पर जीतेंद्र को 100 रु. मिले। 'गीत गाया पत्थरों ने' से जीतेंद्र को ब्रेक तो मिला, लेकिन फिल्म फ्लॉप रही। ऐसे में जीतेंद्र को फिर छोटे-मोटे रोल करके गुजारा करना पड़ा। हालांकि, उनके मन में अब भी सोलो लीडिंग स्टार बनने की तमन्ना थी। 1967 में रिलीज हुई ‘फर्ज’ जीतेंद्र के करियर की पहली हिट फिल्म साबित हुई, लेकिन बतौर लीड स्टार फिल्म इंडस्ट्री में जमना उनके लिए आसान नहीं था। सोलो लीड हीरो बनाने से पहले डायरेक्टर ने रखी जीतेंद्र के सामने शर्त एक बार फिल्ममेकर सुबोध मुखर्जी ने जीतेंद्र से कहा कि वो उन्हें लेकर एक सोलो हीरो फिल्म बनाना चाहते हैं। जीतेंद्र खुश हो गए, लेकिन तभी सुबोध ने एक शर्त रखी। उन्होंने कहा- मैं फिल्म तभी बनाऊंगा, जब हेमा मालिनी इस फिल्म में काम करेंगी। दरअसल, उस दौर में हेमा मालिनी का स्टारडम किसी मेल सुपरस्टार से कम नहीं था। हेमा जिस फिल्म में होती थीं, उसके सफल होने की गारंटी 100% रहती थी। जीतेंद्र भी ये बात भांप गए कि अगर हेमा उनकी हीरोइन बन जाएं तो उनकी भी नैया पार लग जाएगी और वो भी बतौर हीरो स्थापित हो जाएंगे। मगर ये इतना आसान नहीं था। उस समय हेमा के करियर के फैसले उनकी मां जया चक्रवर्ती लेती थीं। जब जीतेंद्र ने उन्हें फिल्म के बारे में बताया तो उन्होंने मना कर दिया। जीतेंद्र उनके पीछे पड़ गए और कहा-आपकी बेटी अगर मेरे साथ फिल्म कर लेगी तो मेरा करियर बन जाएगा। आखिरकार जया मान गईं। जीतेंद्र ने ये बात सुबोध मुखर्जी को बताई और उन्होंने झट से हेमा को फिल्म में साइन कर लिया। हेमा को साइन करके डायरेक्टर ने जीतेंद्र को किया फिल्म से बाहर आगे मामले में ट्विस्ट तब आया जब सुबोध मुखर्जी ने फिल्म में जीतेंद्र के बजाए शशि कपूर को हीरो के तौर पर साइन कर लिया। ये बात जानकर जीतेंद्र के पैरों तले जमीन खिसक गई, जब उन्होंने सुबोध से इस बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, 'फिल्म के प्रोड्यूसर और फाइनेंसर ने कहा है कि जब हीरोइन हेमा मालिनी है तो हीरो भी बड़ा कास्ट करो, जीतेंद्र को लेने की क्या जरूरत। इसलिए मैंने शशि कपूर के साथ फिल्म अनाउंस कर दी।' जीतेंद्र ने जब सुबोध से कहा कि हेमा मेरी वजह से फिल्म में आई हैं तो उन्होंने दो टूक कह दिया कि हम यहां बिजनेस करने बैठे हैं। जीतेंद्र इस बात से मायूस हो गए लेकिन इसी दौरान एल.वी प्रसाद ने उन्हें फिल्म 'जीने की राह' का ऑफर दिया। ये फिल्म सुपरहिट हो गई और जीतेंद्र चमक गए जबकि हेमा और शशि कपूर स्टारर फिल्म 'अभिनेत्री' बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप साबित हुई। हेमा की मां जीतेंद्र से करवाना चाहती थीं बेटी की शादी जब जीतेंद्र बड़े स्टार बन गए तो हेमा की मां जया चक्रवर्ती को वे अपनी बेटी के लिए परफेक्ट लगे। जया, हेमा की उनसे शादी करवाना चाहती थीं। दरअसल, तब हेमा का अफेयर धर्मेंद्र से चल रहा था और संजीव कुमार भी हेमा से शादी का प्रस्ताव उनके घरवालों के सामने रख चुके थे। हेमा की मां को न संजीव कुमार पसंद थे और न ही धर्मेंद्र। वे नहीं चाहती थीं कि हेमा की इन दोनों में से किसी स्टार से शादी हो जबकि जीतेंद्र उन्हें बेटी के लिए पसंद थे। जया चक्रवर्ती ने बेटी हेमा की शादी जीतेंद्र से फिक्स कर दी थी और चेन्नई में दोनों सात फेरे भी लेने वाले थे। तभी धर्मेंद्र शादी के मंडप में जीतेंद्र की गर्लफ्रेंड शोभा को लेकर पहुंच गए और हेमा से उनकी शादी तुड़वा दी थी। इसके कुछ साल बाद जीतेंद्र ने 1974 में गर्लफ्रेंड शोभा से लव मैरिज कर ली थी। श्रीदेवी के साथ हर फिल्म में काम करना चाहते थे जीतेंद्र 1983 में जीतेंद्र ने फिल्म 'हिम्मतवाला' में श्रीदेवी के साथ पहली बार काम किया था। दोनों की जोड़ी को काफी पसंद किया गया। यही वजह है कि एक दौर ऐसा आया जब जीतेंद्र हर फिल्म में केवल श्रीदेवी के साथ ही काम करना चाहते थे। शक्ति कपूर ने एक इंटरव्यू में कहा था, 'जीतेंद्र को 'हिम्मतवाला' में श्रीदेवी का काम इतना पसंद आया था कि उन्होंने डायरेक्टर राघवेंद्र से कहा कि वे अपनी सभी फिल्मों में उनके अपोजिट केवल श्रीदेवी को बतौर हीरोइन साइन करें।' यही वजह थी कि 'हिम्मतवाला' के बाद राघवेंद्र राव ने जब 'जानी दोस्त' (1983), 'जस्टिस चौधरी' (1983), 'तोहफा' (1984), 'सुहागन' (1986), 'धर्माधिकारी' (1986) और 'दिल लगाके देखो' (1988) फिल्में बनाईं तो उन्होंने इनमें श्रीदेवी को ही लिया। जीतेंद्र को रेखा ने दी थी श्रीदेवी के साथ काम करने की सलाह एक इंटरव्यू में जीतेंद्र ने फिल्म 'हिम्मतवाला' में श्रीदेवी के साथ काम करने के बारे में बात की थी। उन्होंने कहा था, 'श्रीदेवी के साथ काम करने की सलाह मुझे रेखा ने दी थी। एक दिन मैं और रेखा, श्रीदेवी की कोई तेलुगु फिल्म देख रहे थे। रेखा ने मुझसे कहा, 'तुम्हें श्रीदेवी के साथ जरूर काम करना चाहिए। उस वक्त रेखा के पास 'हिम्मतवाला' के लिए डेट्स नहीं थी। वे फिल्म में काम करने से मना कर चुकी थीं। ऐसे में मैंने राघवेंद्र राव को श्रीदेवी को कास्ट करने का सुझाव दिया और वे मान गए। इस तरह 'हिम्मतवाला' में श्रीदेवी की एंट्री हुई। श्रीदेवी का डांस में कोई मुकाबला नहीं था। जब 'हिम्मतवाला' की शूटिंग के दौरान डांस मास्टर हमें स्टेप्स सिखाते थे तो श्रीदेवी केवल दो रिहर्सल में ही स्टेप्स सीख जाती थीं और मैं कई बार प्रैक्टिस करता था लेकिन वे भी मेरे साथ तब तक रिहर्सल करती थीं, जब तक मैं अपना डांस स्टेप परफेक्ट तरीके से न कर लूं।' 8 साल में 60 फिल्मों में काम किया 1975 के आसपास जब जीतेंद्र को बतौर हीरो फिल्में मिलना बंद हो गईं तो उनकी फाइनेंशियल कंडीशन काफी खराब हो गई थी। इसके बाद जीतेंद्र दूसरी बार तब दिवालिया हुए जब उन्होंने फिल्म प्रोड्यूस करने के बारे में सोचा। 1982 में उन्होंने फिल्म 'दीदार-ए-यार' बनाई जो कि फ्लॉप साबित हुई। इससे जीतेंद्र को काफी नुकसान हुआ। खराब आर्थिक स्थिति से उबरने के लिए जीतेंद्र ने 8 साल में 60 फिल्मों में काम किया। जीतेंद्र के इतनी फिल्में करने पर लोग उन्हें इनसिक्योर एक्टर तक कहने लगे थे, लेकिन जीतेंद्र को इसमें कुछ गलत नहीं लगता। उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था, 'मैंने 8 साल में लगातार 60 फिल्में इसलिए कीं, क्योंकि ये सच है कि 1980 के दौर में मैं काफी इनसिक्योर था। मैं गोरेगांव की चॉल से उठा व्यक्ति हूं। मैंने वो समय देखा है, जब मेरे घर में पंखा लगा था तो पूरी चॉल के लोग उसे देखने के लिए आए थे। मैंने बुरा दौर करीब से देखा है, इसलिए मैं पागलों की तरह काम करता था।' मैं जॉबलैस हूं' जीतेंद्र 23 साल से फिल्मों से दूर हैं, लेकिन इसके बावजूद वे 1512 करोड़ रुपए की संपत्ति के मालिक हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अपने प्रोडक्शन हाउस बालाजी टेलीफिल्म्स, ऑल्ट बालाजी और बालाजी मोशन पिक्चर के जरिए उनकी सालाना कमाई 300 करोड़ रु. तक है। जीतेंद्र ने कुछ साल पहले एक इंटरव्यू में कहा था, '20 से ज्यादा साल हो गए, मैं जॉबलैस एक्टर हूं। मैंने अपना एक रुपया नहीं कमाया है। शोभा (पत्नी) और एकता (बेटी) सब काम संभालती हैं। मेरा योगदान केवल इतना है कि मैंने उस पैसे को सही जगह इन्वेस्ट किया है जो कि उन्होंने कमाया है और वो सारे इन्वेस्टमेंट मेरे लिए फायदेमंद साबित हुए हैं।' शराब-सिगरेट को 22 साल से हाथ नहीं लगाया जीतेंद्र ने एक इंटरव्यू में कहा था कि वे पहले खूब सिगरेट और शराब पीते थे, लेकिन 22 साल पहले ये सब छोड़ चुके हैं। जीतेंद्र ने कहा था-जवानी के दिनों में मैंने अपनी हेल्थ के साथ जितने खिलवाड़ करने थे, सब कर चुका। लेकिन जब मैं 60 साल का हुआ तो मैंने ये सब छोड़ दिया। लोग मुझे इस उम्र में भी फिट होने पर कॉम्प्लीमेंट देते हैं तो मैं उन्हें भी ये सब छोड़ने की सलाह देता हूं। आज के दौर में मुझे सलमान खान और ऋतिक रोशन की फिटनेस बहुत अच्छी लगती है।
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राजस्थान


मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना राजस्थान सरकार की एक अहम पहल है, जिसमें 18 साल से कम उम्र के बच्चों को दुर्लभ बीमारियों के इलाज के लिए आर्थिक मदद दी जाती है। इस योजना के तहत 56 दुर्लभ बिमारियों और 50 लाख रुपये तक बच्चों का इलाज मुफ्त कराया जाता है। साथ ही, जरूरी देखभाल के लिए हर महीने 5,000 रुपये की सहायता भी दी जाती है। यह योजना खासकर उन परिवारों के लिए है जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं और महंगे इलाज का खर्च नहीं उठा पाते। सरकार का उद्देश्य ऐसे बच्चों को सही इलाज, देखभाल और जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराना है ताकि उनका जीवन बेहतर हो सके और परिवार पर आर्थिक भार न पड़े। योजना का लाभ लेने के लिए बच्चे की उम्र 0 से 18 वर्ष के बीच होनी चाहिए और वह राजस्थान का मूल निवासी हो या फिर कम से कम तीन साल से राज्य में रह रहा हो। बीमारी की पुष्टि के लिए कम से कम दो सरकारी मान्यता प्राप्त अस्पतालों की रिपोर्ट जरूरी होती है। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना क्या है यह योजना 18 वर्ष से कम उम्र के उन बच्चों के लिए है जो किसी दुर्लभ बीमारी से पीड़ित हैं। ऐसे बच्चों को इलाज के लिए सरकार की ओर से आर्थिक मदद, मुफ्त इलाज और हर महीने सहायता राशि दी जाती है। इलाज सिर्फ उन अस्पतालों में होगा जिन्हें राज्य सरकार और केंद्र सरकार ने तय किया है। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना का उद्देश्य दुर्लभ बीमारी से पीड़ित बच्चों को सही इलाज, देखभाल और जरूरी सुविधाएं समय पर उपलब्ध कराना। परिवार को लगातार आर्थिक सहायता देकर बच्चों का इलाज रुकने न देना। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना की विशेषताएं 18 साल से कम सभी बच्चों के लिए लागू। राजस्थान के निवासी या 3 साल से ज्यादा समय से राज्य में रहने वाले आवेदन कर सकते हैं। 50 लाख रुपये तक मुफ्त इलाज। हर महीने 5,000 रुपये की आर्थिक सहायता। बच्चा अन्य योजनाओं का लाभ भी ले सकता है। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना की पात्रता बच्चा 18 वर्ष से कम उम्र का होना चाहिए। आवेदक राजस्थान का मूल निवासी हो या कम से कम 3 साल से यहां रह रहा हो। बीमारी का सर्टिफिकेशन AIIMS जोधपुर या जेके लोन अस्पताल जयपुर में होगा। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना के अनुदान और आर्थिक सहायता की शर्तें इस योजना के लिए एक विशेष निधि बनाई गई है, जिसमें सरकारी राशि, दान और CSR की राशि रखी जाएगी। बच्चे को 50 लाख रुपये तक का मुफ्त इलाज दिया जाएगा। हर बच्चे को 5,000 रुपये प्रति माह सहायता दी जाएगी। पालनकर्ता बदलने की स्थिति में जिला कलेक्टर 3 महीने के अंदर नया पालनकर्ता तय करेगा। सहायता राशि तभी मिलेगी जब इलाज Centre of Excellence में हुआ हो। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना के जरूरी दस्तावेज बीमारी की रिपोर्ट पालनकर्ता की अंडरटेकिंग बच्चे और पालनकर्ता का आधार कार्ड बैंक खाता विवरण मोबाइल नंबर मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना का आवेदन कैसे होगा पालनकर्ता ई-मित्र या अपनी एसएसओ आईडी से ऑनलाइन आवेदन करेगा। आधार और जनाधार से जानकारी अपने आप पोर्टल पर आ जाएगी। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना की आवेदन के बाद क्या होगा आवेदन अपने जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMHO) के पास जाएगा। सही पाए जाने पर आवेदन AIIMS जोधपुर या JK लोन जयपुर भेज दिया जाएगा। बच्चे को जांच के लिए बुलाने की तारीख और समय SMS से मिलेगा। बीमारी प्रमाणित होने पर ऑनलाइन प्रमाणपत्र जारी होगा। इसके आधार पर पोर्टल खुद ही सहायता मंजूरी का आदेश जारी कर देगा। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना का साल में एक बार वेरीफिकेशन कैसे होगा पालनकर्ता को हर साल नवंबर–दिसंबर में वेरीफिकेशन कराना जरूरी है। यह काम ई-मित्र या ब्लॉक/जिला कार्यालय में होता है। इस स्थिति में वेरीफिकेशन की जरूरत नहीं होगीः अगर नवंबर–दिसंबर में पालनकर्ता ने पेंशन या राशन का बायोमेट्रिक/OTP वेरीफिकेशन कराया हो, तो दोबारा वेरीफिकेशन की जरूरत नहीं है। अगर बच्चा 3 महीने में एक बार AIIMS या JK लोन की OPD या IPD में आया हो और रिपोर्ट पोर्टल पर अपडेट हो गई हो, तब भी अलग वेरीफिकेशन नहीं करना पड़ेगा। अगर पालनकर्ता या बच्चा शारीरिक रूप से असमर्थ है, तो अधिकारी घर आकर वेरीफिकेशन करेंगे। नोटः समय पर वेरीफिकेशन न कराने पर जनवरी से भुगतान रुक जाएगा, लेकिन वेरीफिकेशन होने के बाद पूरा एरियर मिल जाएगा। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना बंद होने की शर्तें दो स्थितियों में सहायता बंद हो जाएगी— बच्चा बीमारी से ठीक हो जाए। बच्चे की मृत्यु हो जाए। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना में पालनकर्ता को बदलना अगर पालनकर्ता की मृत्यु हो जाए या वह बच्चे को छोड़ दे तो जिला कलेक्टर नया पालनकर्ता नियुक्त करेगा। नया पालनकर्ता परिवार में सबसे नजदीकी रिश्तेदार होगा। बच्चे का नाम नए पालनकर्ता के जनाधार में जोड़ना जरूरी है। अगर कोई राशि पहले से मंजूर है और बंटी नहीं है, तो वह नए पालनकर्ता को दे दी जाएगी। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना में पैसा कैसे मिलेगा (स्वीकृति और भुगतान) बीमारी प्रमाणित होने के बाद पोर्टल से ऑटोमेटिक मंजूरी जारी होगी। पैसा दुर्लभ बीमारी कोष से दिया जाएगा। हर महीने एक तय तारीख को DBT के माध्यम से पालनकर्ता के जनाधार लिंक्ड खाते में राशि भेजी जाएगी। ई-बिल, ई-साइन और IFMS सिस्टम पोर्टल से जुड़े रहेंगे। आवेदन, मंजूरी और भुगतान की हर जानकारी एसएमएस से भेजी जाएगी। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना की मॉनिटरिंग योजना की देखरेख और निगरानी राज्य स्तर पर आयुक्त/निदेशक सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के नोडल अधिकारी करेंगे। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना के नियमों में छूट अगर किसी मामले में नियमों में ढील की जरूरत हो, तो इसका अधिकार विभाग के आयुक्त/निदेशक, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग से होंगे। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना के तहत इन बिमारियों को कवर किया जाएगा यह सभी दुर्लभ रोग योजना के तहत कवरेज किए जाते हैं ताकि बच्चों को महंगे इलाज, दवाइयों और जरूरी देखभाल में आर्थिक सहायता मिल सके। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना से जुड़े अन्य सवाल (FAQs) यह योजना किन बच्चों के लिए है? मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना 18 साल से कम उम्र के दुर्लभ बीमारी से पीड़ित बच्चों के लिए। कहां इलाज होगा? मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना के तहत AIIMS जोधपुर या JK लोन जयपुर जैसे केंद्रों में। मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना के तहत मासिक सहायता कितनी है? 5,000 रुपये प्रति माह। क्या आय सीमा है ? नहीं, मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना में कोई आय सीमा नहीं है। पालनकर्ता बदलने पर क्या होगा? मुख्यमंत्री आयुष्मान संबल योजना के तहत जिला कलेक्टर नया पालनकर्ता तय करेगा और सहायता जारी रहेगी।
मुख्यमंत्री श्री भजनलाल शर्मा की केन्द्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री श्री नितिन गडकरी से मुलाकात
भूपाल नोबल्स विश्वविद्यालय का द्वितीय दीक्षांत समारोह आयोजित
राजस्थान: इंग्लिश मीडियम स्कूल बंद होंगे ? संसदीय कार्य मंत्री ने बताया भजनलाल सरकार का प्लान
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मदन अरोड़ा.बिहार ने एक बार फिर भारतीय राजनीति को स्पष्ट संदेश दिया है. मतदाता अब किसी भी नकारात्मक प्रचार, जातीय जहर या हवाई वादों से प्रभावित होने वाला नहीं है. इस चुनाव में न केवल गठबंधन ध्वस्त हुआ, बल्कि वह पूरा आख्यान भी धराशायी हो गया जो महीनों तक ‘वोट चोरी’, ‘नरेंद्र सरेंडर’ और ‘हर परिवार को नौकरी’ के नारों पर टिका था. राहुल–तेजस्वी का नकारात्मक कैंपेन और बंटाधार की राजनीति कहावत है—जहां-जहां पाँव पड़े संतन के, तहां तहां बंटाधार. बिहार में यह कहावत राजनीतिक रूप से इस बार राहुल गांधी और तेजस्वी यादव पर सटीक बैठती दिखी. राहुल गांधी का पीएम मोदी के खिलाफ ‘वोट चोरी’ अभियान और ‘चोरी का पीएम’ जैसी भाषा न केवल मतदाताओं को अखरी, बल्कि इससे गठबंधन की विश्वसनीयता भी तार-तार हो गई. दूसरी ओर तेजस्वी यादव जो ताजपोशी के सपने देख रहे थे—राहुल गांधी के कटु और नकारात्मक प्रचार की वजह से खुद भी डूब गए. प्रधानमंत्री मोदी जिस “ऐतिहासिक प्रचण्ड जीत” का दावा कर रहे थे, बिहार के मतदाताओं ने उस पर भरोसा दिखाते हुए एनडीए को 2010 की तरह एक बार फिर प्रचण्ड बहुमत दे दिया. नीतीश–मोदी की जोड़ी राहुल–तेजस्वी पर भारी पड़ी. तेजस्वी के वादे हुए फेल तेजस्वी यादव ने 10 लाख नौकरियों से लेकर हर परिवार को नौकरी, जनवरी से 30 हजार रुपये और दीदियों के लिए पैकेज जैसे बड़े वादे किए. लेकिन मतदाता समझ गया कि ये वादे ज़मीन से ज्यादा हवा में बने थे. इसके उलट नीतीश–मोदी सरकार द्वारा पहले से चल रहे महिला सशक्तिकरण कार्यक्रमों पर महिलाओं ने भरोसा दिखाया. * लगभग डेढ़ करोड़ ‘दीदियों’ ने तेजस्वी के वादों से प्रभावित होने के बजाय उस स्थिर नीति को प्राथमिकता दी जो उन्हें वर्षों में मिली थी. * महिला–युवा के नए एमवाई गठबंधन का जादू चला, और पारंपरिक मुस्लिम–यादव (एमवाई) समीकरण बिखर गया. एमवाई समीकरण की मौत: मुस्लिम–यादव वोट क्यों खिसके? महागठबंधन की सबसे बड़ी रणनीतिक भूल रही—मुस्लिम डिप्टी सीएम की घोषणा न करना. ओवैसी ने इसे भुनाते हुए खुलकर कहा कि गठबंधन “मुसलमानों को सिर्फ दरी बिछाने वाला” समझता है. यह बयान मुस्लिम वोटों के लिए निर्णायक साबित हुआ. इसी तरह यादवों के भीतर यह नाराज़गी गहराती गई कि सीएम और पार्टी अध्यक्ष पद पर लालू परिवार का एकाधिकार जारी है और यादव समाज केवल परिवारवादी राजनीति का उपकरण बनकर रह गया है. इस असंतोष का फायदा एनडीए को मिला. नक्सलवाद, सुरक्षा और एस आई आर का प्रभाव बिहार के नक्सल प्रभावित इलाकों में पिछले वर्षों में नक्सलवाद लगभग समाप्त हुआ है. नक्सली भय खत्म होने से वामपंथी दलों का प्रभाव टूटा और सुरक्षा को लेकर भाजपा के प्रति भरोसा मजबूत हुआ. उधर एस आई आर(वोटर सूची शुद्धिकरण) का अप्रत्यक्ष प्रभाव भी दिखा— घुसपैठियों के वोट कटने से गठबंधन के कोर वोट बैंक पर चोट पहुंची.इससे मुस्लिम बहुल इलाकों में एनडीए की पैठ मजबूत हुई. साथ ही दिल्ली में मतदान से एक दिन पहले हुए विस्फोट ने हिंदू मतदाताओं में सुरक्षा को लेकर चिंता पैदा की, जिसका सीधा लाभ एनडीए को मिला. मोदी–योगी–शाह की तिकड़ी ने बदला खेल मोदी का राष्ट्रवाद, योगी की सनातनी हुंकार, और अमित शाह की जंगलराज की वापसी न होने देने की चेतावनी ने जमीन पर गहरी पकड़ बनाई. इनकी रैलियों में उमड़ा अभूतपूर्व जनसैलाब पहले ही संकेत दे चुका था कि हवा किस दिशा में बह रही है. गठबंधन की हार का सार महागठबंधन की करारी हार कई बातों का मिला-जुला परिणाम है— 1. वोट चोरी का नकारात्मक अभियान उल्टा पड़ा. 2. मुस्लिम डिप्टी सीएम घोषित न करने की भारी गलती हुई. 3. यादव वोटों का लालू परिवार के खिलाफ फिसलना. 4. ओवैसी द्वारा मुस्लिम मतदाताओं का खिंचाव. 5. एस आई आर से घुसपैठियों के वोट कटना. 6. नक्सलवाद पर सरकार की सफलता. 7. फर्जी वादे बनाम वास्तविक विकास. 8. मोदी–योगी–शाह की आक्रामक और प्रभावी चुनावी रणनीति. बिहार का संदेश: राष्ट्रवाद और विकास ही निर्णायक मुद्दे इस चुनाव ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया कि— * राष्ट्रवाद भारतीय राजनीति में सर्वोच्च मुद्दा है. * सनातन पर चोट या तुष्टिकरण अब स्वीकार नहीं. * मतदाता जातियों में बंटने के प्रयास को अस्वीकार करता है. * घुसपैठिया संरक्षण की राजनीति नहीं चलेगी. * मतदाता जानता है कि किसने जमीन पर काम किया और किसने हवा में सपने बेचे. बिहार का जनादेश यह भी बताता है कि वोट बैंक की राजनीति का आख्यान टूट रहा है. मुसलमानों और यादवों दोनों ने दिखा दिया कि वे किसी भी परिवार या दल के बंधक नहीं हैं. विपक्ष अब क्या करेगा? हार के तुरंत बाद कांग्रेस और समाजवादी पार्टी ने एक बार फिर चुनाव आयोग पर ठीकरा फोड़ना शुरू कर दिया है. “बिहार में वोट चोरी नहीं—डकैती हुई है” जैसे बयान सामने आ रहे हैं. संभावना है कि विपक्ष— * हरियाणा के CM के पुराने बयान * पीएम मोदी का ‘ऐतिहासिक जीत’ वाला वक्तव्य * अमित शाह के 160 सीटों से ज्यादा सीटों के अनुमान को मिलाकर एक नया ‘वोट चोरी’ नैरेटिव खड़ा करने की कोशिश करे. लेकिन इसमें सबसे बड़ा खतरा है—जनादेश का अपमान होगा.खासतौर पर जेन-ज़ी को उकसाकर सड़कों पर उतारने की कोशिश राजनीतिक स्थिति को अस्थिर कर सकती है. बिहार का यह परिणाम केवल एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि भारतीय मतदाता की परिपक्वता और राजनीतिक जागरूकता का प्रमाण है. मतदाता अब स्पष्ट रूप से बता चुका है कि— * वह राष्ट्रवाद को सर्वोपरि रखता है. * बिना आधार वाले आरोपों को नहीं मानता. * हवा हवाई वादों के बजाय परिणाम देखता है. * और, सबसे बढ़कर, वह अब किसी भी प्रकार के दुष्प्रचार से बरगलाने वाला नहीं है. राहुल–तेजस्वी महा गठबंधन का बिखरना इस बात का संकेत है कि परिवारवादी राजनीति, तुष्टिकरण और नकारात्मक प्रचार की राजनीति की उम्र अब समाप्ति पर है. विकास, सुरक्षा और स्थिरता की राजनीति ही भविष्य का रास्ता है और बिहार ने इस राह को एक बार फिर रोशनी दे दी है.यह चुनाव परिणाम अखिलेश यादव और ममता बनर्जी के लिए भी खतरे की घंटी है.
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वॉशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है मुझे यह घोषणा करते हुए खुशी हो रही है कि भारत और पाकिस्तान पूर्ण और तत्काल युद्धविराम पर सहमत हो गए हैं। हालांकि, भारत ने आधिकारिक रूप से इस दावे पर कोई टिप्पणी नहीं की है। पाकिस्तान के उपप्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने समझौते की पुष्टि की है। इससे पहले अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने दोनों देशों से बात की थी इसके बाद से माना जा रहा था कि दोनों देशों में शायद तनाव कम हो। ट्रंप ने क्या बताया? ट्रंप ने सोशल मीडिया हैंडल पर लिखा, " संयुक्त राज्य अमेरिका की मध्यस्थता में एक लंबी रात तक चली बातचीत के बाद, मुझे यह घोषणा करते हुए खुशी हो रही है कि भारत और पाकिस्तान पूर्ण और तत्काल युद्धविराम पर सहमत हो गए हैं। दोनों देशों को सामान्य बुद्धि और महान बुद्धिमत्ता का उपयोग करने के लिए बधाई। इस मामले पर आपका ध्यान देने के लिए धन्यवाद।" अमेरिकी विदेश मंत्री ने बताया कैसे हुई डील पिछले 48 घंटों में, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और मैंने वरिष्ठ भारतीय और पाकिस्तानी अधिकारियों के साथ बातचीत की है। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शहबाज शरीफ, विदेश मंत्री सुब्रह्मण्यम जयशंकर, सेनाध्यक्ष असीम मुनीर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और असीम मलिक शामिल हैं। मुझे यह घोषणा करते हुए प्रसन्नता हो रही है कि भारत और पाकिस्तान की सरकारें तत्काल युद्धविराम पर सहमत हो गई हैं तथा तटस्थ स्थल पर व्यापक मुद्दों पर वार्ता शुरू करने पर सहमत हो गई हैं। हम शांति का मार्ग चुनने में प्रधानमंत्री मोदी और शरीफ की बुद्धिमत्ता, विवेक और कूटनीति की सराहना करते हैं।
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