1947 की वह आग, जिसमें लाखों परिवार जल गए, लेकिन टूटे नहीं
मदन अरोड़ा, 1947 का भारत विभाजन केवल भूगोल का बंटवारा नहीं था, वह मानव इतिहास की सबसे भयावह त्रासदियों में से एक था. पश्चिमी पंजाब, सिंध, रावलपिंडी, लाहौर, मुल्तान, सियालकोट, पेशावर और उत्तर-पश्चिमी सीमांत प्रांत में सदियों से बसे पंजाबी खत्री, अरोड़ा, सिख और अन्य हिंदू समुदाय एक ही रात में पराये घोषित कर दिए गए. जिन घरों में पीढ़ियाँ पली-बढ़ी थीं, जिन खेतों में उनके पुरखों का पसीना बहा था, जिन मंदिरों और गुरुद्वारों में उनकी आस्था बसती थी, वे सब अचानक मौत और दंगों के मैदान बन गए.
विभाजन की घोषणा के साथ ही योजनाबद्ध हिंसा शुरू हुई. गांवों के गांव जला दिए गए. हजारों महिलाओं का अपहरण हुआ, उनके साथ अमानवीय अत्याचार किए गए. बच्चों तक को नहीं बख्शा गया. ट्रेनें लाशों से भरकर भारत पहुंच रही थीं. सड़कों पर रक्त बह रहा था. लाखों लोग पैदल काफिलों में निकल पड़े, जिन्हें उस समय कटार कहा जाता था. कोई अपने बुजुर्गों को कंधों पर उठाकर ला रहा था, कोई भूख-प्यास से बिलखते बच्चों को लेकर सीमा की ओर भाग रहा था. यह केवल पलायन नहीं था, यह अपनी अस्मिता और अस्तित्व को बचाने की लड़ाई थी.
क्या यह मारकाट रोकी जा सकती थी?
इतिहासकारों का बड़ा वर्ग मानता है कि यदि विभाजन की प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित और समयबद्ध होती, तो हिंसा का स्तर कम किया जा सकता था. ब्रिटिश सरकार ने सत्ता हस्तांतरण की जल्दबाजी दिखाई. सीमांकन करने वाले रेडक्लिफ आयोग ने बिना जमीनी तैयारी के सीमाएं तय कर दीं.जल्द से जल्द सत्ता हासिल कर सरकार के मुखिया बनने की चाहत रखने वालों ने इसे तत्काल आँख बंद कर स्वीकार कर लिया. नतीजन केवल चार किमी दूर श्री करतारपुर साहिब और हिन्दू बाहुल्य इलाके पाकिस्तान में चले गए. इसे भी पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया. प्रशासनिक तंत्र बिखर चुका था. पुलिस और सेना सांप्रदायिक आधार पर विभाजित हो रही थीं.
सबसे बड़ी विफलता यह रही कि करोड़ों लोगों के संभावित पलायन का अनुमान होते हुए भी उनकी सुरक्षा के लिए पर्याप्त सैन्य व्यवस्था नहीं की गई. जिन क्षेत्रों में हिंसा भड़क रही थी, वहां तत्काल कठोर कार्रवाई नहीं हुई. कई स्थानों पर स्थानीय प्रशासन पूरी तरह से निष्क्रिय या पक्षपाती नजर आया. परिणामस्वरूप भीड़तंत्र हावी हो गया और मानवता शर्मसार होती रही.
भारत सरकार ने कैसे बचाई लाखों लोगों की जान?
विभाजन के दौरान भारत सरकार, सेना और आर एस एस जैसे स्वयंसेवी संगठनों ने राहत और पुनर्वास के लिए बड़े स्तर पर कार्य किया. सीमावर्ती इलाकों में सैन्य एस्कॉर्ट के साथ विशेष ट्रेनें चलाई गईं. काफिलों को सुरक्षा देने के लिए सेना तैनात की गई. पाकिस्तान में फंसे हिंदू और सिख परिवारों को निकालने के लिए दोनों देशों के बीच समन्वय स्थापित करने के प्रयास किए गए. लेकिन इसके उत्साहजनक परिणाम सामने नहीं आये.
दिल्ली का पुराना किला, कुरुक्षेत्र, अमृतसर और पंजाब-हरियाणा के कई हिस्से विशाल राहत शिविरों में बदल दिए गए. लाखों लोगों को भोजन, कपड़े और अस्थायी आश्रय दिया गया. महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए विशेष शिविर बनाए गए.
इसके बाद शुरू हुआ पुनर्वास का सबसे कठिन अध्याय. जिन लोगों ने पाकिस्तान में अपनी जमीन और मकान छोड़े थे, उन्हें भारत में वैकल्पिक संपत्ति देने की व्यवस्था की गई. हरियाणा, पंजाब और राजस्थान में कृषि भूमि आवंटित की गई. दिल्ली, फरीदाबाद, निलोखेड़ी और अन्य टाउनशिप बसाकर व्यापार और रोजगार के अवसर दिए गए. छोटे उद्योगों के लिए लोन और प्रशिक्षण की व्यवस्था की गई.
भूमि आवंटन भी आसान नहीं था. सरकार ने स्टैंडर्ड एकड़ और ग्रेडेड कट प्रणाली लागू की. पाकिस्तान में छोड़ी गई जमीन की उपज क्षमता के आधार पर भारत में भूमि दी गई. छोटे किसानों को प्राथमिकता मिली, जबकि बड़े भू-स्वामियों को अनुपातिक कटौती के साथ काफी कम 15 से 20 फीसदी जमीन दी गई ताकि अधिक से अधिक विस्थापित परिवारों को बसाया जा सके. पंजाब, हरियाणा, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ और राजस्थान के नहरी क्षेत्रों में हजारों परिवारों को कृषि भूमि दी गई. बाद में इन्हीं परिवारों ने बंजर क्षेत्रों को उपजाऊ बनाकर देश की कृषि अर्थव्यवस्था को मजबूत किया.
अपने ही देश के एक हिस्से से विस्थापित हुए इन परिवारों ने भी हार नहीं मानी. जिन्होंने सब कुछ खो दिया था, उन्होंने किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया बल्कि शून्य से शुरुआत की. मेहनत, अनुशासन और उद्यमशीलता के बल पर उन्होंने भारत के व्यापार, कृषि, शिक्षा और उद्योग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया. आज उत्तर भारत के अनेक शहरों की आर्थिक रीढ़ वही परिवार हैं जिन्हें कभी रिफ्यूजी कहा गया था.
शरणार्थी नहीं, संघर्ष के योद्धा
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत ज़ी द्वारा हाल में दिया गया यह बयान कि विभाजन पीड़ितों को शरणार्थी नहीं बल्कि संघर्ष के योद्धा कहा जाना चाहिए, केवल भावनात्मक टिप्पणी नहीं बल्कि ऐतिहासिक पीड़ा की स्वीकृति है.
वास्तव में वे किसी विदेशी देश से भारत नहीं आए थे. भारत का विभाजन हुआ और एक रात में वे सीमा के दूसरी ओर चले गए. गुरु गोबिंद सिंह के इन बंदों खत्री, अरोड़ा, सिखों ने धर्मांतरण या अपमानजनक जीवन स्वीकार करने के बजाय अपनी आस्था, संस्कृति और मातृभूमि को चुना. उन्होंने अपने परिवार खोए, संपत्ति गंवाई, लेकिन भारत पर विश्वास नहीं छोड़ा.
आज प्रश्न यह उठ रहा है कि यदि आपातकाल के दौरान एक दिन जेल में रहने वालों को लोकतंत्र सेनानी का दर्जा देकर पेंशन और सम्मान दिया जा सकता है, तो विभाजन की विभीषिका झेलने वाले लाखों परिवारों को विभाजन संघर्ष योद्धा का राष्ट्रीय सम्मान क्यों नहीं?
क्या उन लोगों का बलिदान कम था जिन्होंने अपने सामने परिवार के सदस्यों की हत्या देखी? क्या उन माताओं की पीड़ा कम थी जिन्होंने अपने बच्चों को रास्तों में खो दिया? क्या उन महिलाओं का संघर्ष छोटा था,जिन्होंने अमानवीय अत्याचार सहने के बाद भी जीवन को फिर से खड़ा किया?
यह मुद्दा अब फिर क्यों उठ रहा है?
विभाजन की पीढ़ी धीरे-धीरे समाप्त हो रही है. उनके साथ उनकी पीड़ा, संघर्ष और इतिहास भी मिटता जा रहा है. लंबे समय तक तथाकथित सेक्युलर राजनीति ने विभाजन की हिंदू-सिख पीड़ा पर खुलकर चर्चा से परहेज किया. इतिहास की पुस्तकों में लाखों विस्थापित परिवारों के दर्द को सीमित शब्दों में समेट दिया गया.
अब नई पीढ़ी अपने पूर्वजों के संघर्ष को पहचान दिलाने की मांग कर रही है. विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस मनाए जाने, फिल्मों, दस्तावेजों और सार्वजनिक चर्चाओं के कारण यह विषय फिर राष्ट्रीय विमर्श में आया है. लोग पूछ रहे हैं कि जिन परिवारों ने अपना सर्वस्व खोकर भी भारत को मजबूत बनाया, उन्हें केवल रिफ्यूजी कहकर क्यों सीमित कर दिया गया?
यह केवल सम्मान का प्रश्न नहीं है, यह ऐतिहासिक न्याय का प्रश्न है. विभाजन पीड़ितों को संघर्ष योद्धा के रूप में मान्यता देना उन लाखों अनाम लोगों के साहस, त्याग और पुनर्निर्माण की भावना को राष्ट्रीय श्रद्धांजलि होगी, जिन्होंने राख से उठकर भारत के भविष्य को मजबूत किया.