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भाई को खोया, माता-पिता अस्पताल में और खुद 10 दिनों तक रहे वेंटिलेटर पर... रुला देगी इस डॉक्टर की कहानी लेकिन देगी हिम्मत भी

लखनऊ कोरोना वायरस ने पूरे देश को अपनी चपेट में ले लिया है। सैकड़ों लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। चारों तरफ हाहाकार मचा है। उत्तर प्रदेश के लखनऊ में युवा सर्जन डॉ. नीरज कुमार मिश्रा भी ऐसे लोगों में हैं जो कोरोना की चपेट में आए। डॉ. नीरज को छह महीने में कोरोना ने दो बार चपेट में ले लिया। दूसरी बार उन्हें कोरोना हुआ तो यह पहले से ज्यादा गंभीर था। उनकी हालत देखकर उनके साथी डॉक्टर भी हिम्मत हार चुके थे। डॉक्टर नीरज और उनके परिवार के लिए बहुत भारी समय था, क्योंकि सिर्फ नीरज ही नहीं उनके पिता और मां भी कोरोना की चपेट में थे। उनके बड़े भाई ने कोरोना से दम तोड़ दिया। उनके परिवार के लिए 10 दिनों बहुत ही बुरे बीते। नीरज के फेफड़ों में भारी संक्रमण हो गया, वह वेंटिलेटर पर थे। डॉ. नीरज मिश्रा आईसीयू से बाहर आ गए हैं, लेकिन अब भी ऑक्सिजन सपॉर्ट (90 लीटर प्रति मिनट) पर हैं। नीरज के भाई की मौत के बाद वह अकेले उनका अंतिम संस्कार करने पहुंचे थे। भाई का दाह संस्कार होने के बाद वह जब अस्थियां लेकर घाट से आए और बेहोश हो गए। उन्हें अस्पताल लाया गया और हालत बिगड़ती गई। भाई की अस्थियां अभी भी उनकी कार में रखी हैं। सरकार को दिए सुझाव डॉ. नीरज जिस अस्पताल में भर्ती हैं, उसी में उनके माता-पिता भी भर्ती हैं लेकिन वे कोरोना प्रोटोकॉल के चलते एक दूसरे से नहीं मिल सकते हैं। डॉ. नीरज ने सोशल मीडिया पर अपना एक वीडियो जारी किया है। इस वीडियो में उन्होंने बताया कि बतौर डॉक्टर इलाज करना और मरीज को तौर पर इलाज करवाना बहुत अंतर होता है। उन्होंने इस वीडियो के जरिए सरकार को इलाज में कुछ और बातें शामिल करने की गुजारिश की है। मरीजों को इसलिए हो रहा पैनिक डिसऑर्डर डॉक्टर नीरज ने कहा कि लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहने के दौरान उन्होंने पाया कि कोरोना बीमारी में सबसे ज्यादा मरीजों को अकेलापन मार रहा है। मरीजों के पास कोई नहीं होता। उन्हें सिर्फ चारों तरफ मशीनें, उनके आवाजें और कुछ बीमार लोग ही नजर आते हैं। लंबे समय तक वे इन चीजों से घिरे रहते हैं और जिसके कारण उन्हें पैनिक डिसऑर्डर हो जाता है। कई मरीजों की हार्ट बीट इस कारण बढ़ जाती है तो कई आत्महत्या कर रहे हैं। इसलिए मरीजों के दिमाग में आते हैं निगेटिव थॉट्स डॉ. नीरज ने कहा, 'मैं एक साइंस स्टूडेंट रहा हूं लेकिन बीमारी के दौरान मैंने पाया कि कोरोना के इलाज में मानसिक और भावात्मक सपॉर्ट की बहुत जरूरत होती है। मरीज इतना मानसिक रूप से कमजोर हो रहा है कि उसे पैनिक डिसऑर्डर हो रहा है। आप रात-रातभर जागते हो। आत्महत्या करने तक की बातें दिमाग में आती हैं। पांच मिनट के लिए ऐसा लगता है कि सब छोड़छाड़ दें... यह निगेटिव थॉट्स आते हैं। मरीज जो 20-25 दिनों तक बिना किसी से मिले सिर्फ मशीनों को सुनते हैं और निगेटिव थॉट्स ही दिमाग में आते हैं।' 'आध्यात्म से मेनटेन हुए सर्चुरेशन' सर्जन ने कहा, 'मैंने इस दौरान फील किया कि जब भी कोई पॉजिटिव बात हो रही होती है या डायवर्जन होता है तो उस समय सर्चुरेशन मेनटेन हो जाता है।' डॉक्टर ने बताया कि इस दौरान मैंने पाया कि मुझे तीन-चार चीजों ने पॉजिटिविटी दी। एक है आध्यत्मिक जुड़ाव, जब भी कानों में महामृत्युंजय जाप, हनुमान चालीसा वगैरह सुनीं तो एक पॉजिटिविटी आई। इसलिए सरकार को ऐसा कुछ अरेंजमेंट करना चाहिए कि मरीज के धर्म के अनुसार ऐसी पॉजिटिव चीजें उनके कानों में जाएं। 'इलाज में शामिल करें यह टीम और मरीजों को घरवालों से मिलवाएं' डॉक्टर ने कहा, 'साइकलॉजिस्ट, मेंटर केयर और मोटीवेशनल लोगों को जोड़कर एक टीम बनानी चाहिए और उन्हें इस इलाज में शामिल करना चाहिए। मरीज के घरवालों को भले ही पांच मिनट के लिए मिलवाएं लेकिन मिलवाएं जरूर। इस दौरान प्रोटोकॉल का पालन और और मेडिकल टीम प्रभावित न हो इसका ख्याल रखें। मेरा हाथ जोड़कर निवेदन है कि इलाज में इन बातों को शामिल करें।' ताकि मरीज को अकेलापन नहीं होगा।

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