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ताजिकिस्‍तान में भारतीय वायुसेना का एयरबेस, क्‍या भारत करेगा पंजशीर के 'दोस्‍तों' की मदद?

काबुल/नई दिल्‍ली तालिबानी आतंकियों ने पाकिस्‍तानी सेना के साथ खूनी हमला करके नैशनल रेजिस्‍टेंस फ्रंट के विद्रोही नेता अहमद मसूद और अमरुल्‍ला सालेह के गढ़ पंजशीर घाटी के एक बड़े हिस्‍से पर कब्‍जा कर लिया है। तालिबानी कब्‍जे के बाद पंजशीर के ये दोनों ही नेता जहां अज्ञात स्‍थानों पर चले गए हैं, वहीं विद्रोही लड़ाके अब दवा, पानी और भोजन के लिए तरस गए हैं। भारत ने नॉदर्न एलायंस के जमाने में अफगानिस्‍तान के विद्रोहियों की हथियार से लेकर दवाओं तक में मदद की थी। अब तालिबानी-पाकिस्‍तानी नरसंहार के बीच एक बार फिर से पीएम मोदी से पंजशीर के विद्रोहियों की मानवीय मदद की मांग उठ रही है। आइए समझते हैं कि भारत के लिए पंजशीर की मदद करना कितना चुनौतीपूर्ण होगा.... जवाहर लाल नेहरू विश्‍वविद्यालय में प्रफेसर अमिताभ मट्टू ने ट्वीट करके कहा, 'कितनी शर्मनाक बात है। ताजिकिस्‍तान के फरखोर में भारतीय वायुसेना का एयरबेस है जहां से मजार-ए-शरीफ कुछ ही मिनटों में पहुंचा जा सकता है। इसके बाद भी हमने अपने दोस्‍तों को अकेला छोड़ने का विकल्‍प चुना। हथियार तो भूल जाइए हमने (पंजशीर के विद्रोहियों को) को न तो सहायता दी और न ही दवा और न ही उन्‍हें वहां से निकालने में मदद की। अब आशा की एकमात्र किरण प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं जो कदम उठा सकते हैं।' पंजशीर से मात्र एक घंटे की दूरी पर है फरखोर मट्टू ने कहा कि अगर हम अपने दोस्‍तों तक पहुंचने के लिए फरखोर का इस्‍तेमाल नहीं कर सकते हैं तो इस हवाई ठिकाने का क्‍या मतलब है। भारत के दोस्‍त कहे जाने वाले अफगानिस्‍तान के कार्यवाहक राष्‍ट्रपति अमरुल्‍ला सालेह के करीबी कप‍िल कोमिरेड्डी ने भी ट्वीट करके कहा कि भारत का ताजिकिस्‍तान में एयरबेस है। यह पंजशीर से मात्र एक घंटे की दूरी पर है। यह वही जगह है जहां से भारत ने नॉर्दन एलायंस की मदद की थी। भारत के लिए वहां से दवाएं भेजना असंभव नहीं था। उन्‍होंने कहा क‍ि भारत ने प्रयास तक नहीं किया। सोशल मीडिया में उठ रही इन मांगों पर अंतरराष्‍ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ कमर आगा नवभारत टाइम्‍स ऑनलाइन से बातचीत में कहते हैं कि भारत को पंजशीर के लोगों की मानवीय मदद करनी चाहिए। उन्‍होंने कहा कि भारत को अकेले मदद करने की बजाय अपने दोस्‍तों जैसे ईरान, ताजिकिस्‍तान, उज्‍बेकिस्‍तान आदि से बातचीत करके उन्‍हें अपने साथ लाना चाहिए। फिर इन देशों की मदद से पंजशीर के लोगों की मानवीय मदद करनी चाहिए। 'भारत को अकेले मदद के लिए नहीं जाना चाहिए' कमर आगा ने कहा कि भारत सीधे तौर पर अफगानिस्‍तान से नहीं जुड़ा हुआ है। ऐसे में उसे ताजिकिस्‍तान की सहायता से अफगान विद्रोहियों की मदद करनी चाहिए। उन्‍होंने चेताया कि भारत को अकेले मदद के लिए नहीं जाना चाहिए। एक डर यह भी है कि तालिबानी इससे नाराज हो सकते हैं और वे कश्‍मीर में भारत के लिए दिक्‍कत पैदा कर सकते हैं। बता दें कि भारत का ताजिकिस्‍तान के फरखोर में हवाई ठिकाना है जिसे अयानी बेस भी कहा जाता है। यह विदेश में भारत का एकमात्र हवाई ठिकाना है। यही से उसने नॉर्दन एलांयस के नेता अहमद शाह मसूद के लड़ाकुओं की मदद की थी। भारत ने यूनिफॉर्म, छोटे हथियार, मोर्टार गोले, कश्‍मीर में जब्‍त की गई एके-47 राइफल, सर्दियों के कपड़े, खाना और दवाएं भेजी थी। नॉदर्न एलांयस की एक छोटी सी वायुसेना थी जिसे भारत ने फरखोर में मेंटेन किया था। इसमें हेलीकॉप्‍टर और मिग विमान शामिल थे। भारत ने अहमद शाह मसूद को दो एमआई-8 हेलीकॉप्‍टर दिए थे। भारत अभी अयानी बेस पर एक हॉस्पिटल चला रहा है। अब इतने साल बाद एक बार फिर से पंजशीर के शेर कहे जाने वाले अहमद शाह मसूद के बेटे अहमद मसूद तालिबान से लोहा ले रहे हैं और भारत से मदद की उम्‍मीद की जा रही है। बताया जाता है कि इस बेस पर अभी भारतीय सेना के जवान तैनात हैं। अभी अफगानिस्‍तान से लोगों के निकाले जाने में यह एयरबेस वरदान बन गया था। काबुल एयरपोर्ट पर भारी भीड़ के कारण भारतीयों को लेने गए C-17 एयरक्राफ्ट को अपना रास्ता बदलना पड़ा और यह पहुंचा ताजिकिस्तान के गिस्सार सैन्य एयरोड्रोम पर जो भारत का इकलौता सैन्य बेस है। कई साल का 'सीक्रेट' रिश्ता गिस्सार सैन्य एयरोड्रोम या Ayni एयरबेस देश की राजधानी दुशांबे के पास एक गांव में स्थित है। फाइनैंशल एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक इसके विकास में भारत ने 7 करोड़ डॉलर खर्च किए थे। इस पर 3200 मीटर का आधुनिक रनवे, एयर ट्रैफिक कंट्रोल, नैविगेशन उकरण और मजबूत एयर डिफेंस सिस्टम बनाया गया है। हालांकि, इसे लेकर दोनों देशों की सरकारों ने सार्वजनिक तौर पर बहुत ज्यादा चर्चा नहीं की है। इसके साथ भारत के जुड़ने को लेकर भी चुप्पी ही साधी जाती रही है। जब अफगानिस्तान संकट के दौरान भारती वायुसेना ने इसका इस्तेमाल किया तो यह रोशनी में आया। भारत ने लगाए हैं करोड़ों डॉलर द प्रिंट की रिपोर्ट के मुताबिक 2001-2002 में भारतीय विदेश मंत्रालय और सुरक्षा एजेंसियों ने Ayni में इस सैन्य बेस के विकास का प्रस्ताव रखा और पूर्व रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नैंडिस ने इसका समर्थन किया। भारतीय वायुसेना ने एयर कॉमडोर नसीम अख्तर से एयरबेस पर काम करने को कहा। भारत सरकार ने इसके लिए बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन (BRO) की टीम की मदद भी ली। भारतीय टीम न हैंगर, ओवरहॉलिंग और रीफ्यूलिंग क्षमता पर भी काम किया। रिपोर्ट के मुताबिक एयरचीफ मार्शल धनोआ को साल 2005 में इस बेस का फर्स्ट बेस कमांडर नियुक्त किया गया। पहली बार नरेंद्र मोदी सरकार में फाइटर प्लेन्स की पहली बार अंतरराष्ट्रीय तैनाती की गई। पाकिस्तान को शिकस्त पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से ताजिकिस्तान सिर्फ 20 किमी दूर है। यूरेशियन टाइम्स की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि पाकिस्तान की निगाहें ताजिकिस्तान में भारत की सैन्य तैनाती पर जमी रही हैं। अफगानिस्तान हो या ईरान, पाकिस्तान भारत की मौजूदगी को अपने लिए खतरा समझता है। भारत के लिए भी यह बेस इसलिए और अहम हो जाता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सियाचिन ग्लेशियर में भारत को पाकिस्तानी सैनिकों के ऊपर बढ़त मिल सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है, ‘भारतीय वायुसेना के फाइटर ताजिकिस्तान से पेशावर को निशाना बना सकते हैं जिससे पाकिस्तान के संसाधन खतरे में आ जाएंगे। युद्ध की स्थिति में पाकिस्तान को पूर्व से पश्चिम में जाना पड़ेगा जिससे भारत के साथ उसका सुरक्षातंत्र कमजोर पड़ जाएगा।’

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