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कश्मीरी पंडित अपने लिए J-K में मांग रहे सिक्किम के सांघा जैसी विधानसभा, क्या है खास

नई दिल्ली जम्मू- कश्मीर में परिसीमन आयोग की इस महीने की शुरुआत में चर्चा के दौरान कश्मीरी पंडित संगठनों ने एक नया प्रस्ताव रखा है। इस प्रस्ताव के तहत - एक या अधिक निर्वाचन क्षेत्र को केवल जम्मू-कश्मीर के कश्मीरी पंडित प्रवासियों के चुनाव और मतदान के लिए आरक्षित हो। इस प्रस्ताव में एकमात्र ऐसे 'फ्लोटिंग' निर्वाचन क्षेत्र सांघा का हवाला दिया गया है जो सिक्किम में है। यह देश का एकमात्र निर्वाचन क्षेत्र है जिसकी कोई भौगोलिक सीमा नहीं है और जिसके लिए राज्य के भीतर 51 मठों के साथ पंजीकृत बौद्ध भिक्षु ही चुनाव लड़ सकते हैं और मतदान कर सकते हैं। इकोनॉमिक्स टाइम्स के सूत्रों ने इस बात की पुष्टि की है कि भेजे गए प्रस्ताव में आरक्षण के लिए सांघा मॉडल का जिक्र किया गया है। भारतीय जनता पार्टी के एक वरिष्ठ कश्मीर पंडित नेता अश्विनी कुमार चुरंगू ने इकोनॉमिक्स टाइम्स से पुष्टि करते हुए कहा कि आयोग को ऐसा प्रस्ताव दिया गया है। हालांकि भारत में धार्मिक आधार पर किसी भी आरक्षण की अनुमति नहीं है, इसलिए हमने सिक्किम के मामले का हवाला दिया जहां लामा संघों के लिए उनकी विशिष्ट पहचान को बनाए रखने के लिए एक निर्वाचन क्षेत्र अलग रखा गया था। इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई और कोर्ट ने भी इसे बरकरार रखा। हम कश्मीरी पंडित प्रवासियों के लिए एक समान मॉडल का अनुरोध कर रहे हैं क्योंकि यह हम पर भी लागू होता है। परिसीमन आयोग अपने सीमित संदर्भ की शर्तों और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 से बाध्य है, जो केवल एक श्रेणी- अनुसूचित जनजाति के लिए नई आरक्षित सीटें बनाने का प्रावधान करता है। सिक्किम में विधानसभा संख्या 32 सांघा मठ संघों के अनुरोध पर सिक्किम राज्य परिषद के लिए 1958 में बनाया गया था। 1975 के बाद भी सिक्किम के भारत के राज्य बनने के बाद भी इसे अपने विशेष चरित्र के साथ बनाए रखा गया। भारत के संविधान का अनुच्छेद 371 (एफ) सिक्किम के विशेष चरित्र और तत्कालीन राज्य के विभिन्न कानूनों की रक्षा करता है। 1993 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे बरकरार रखा था। शीर्ष अदालत ने माना कि सांघा सांस्कृतिक रूप से पिछले 300 वर्षों से सिक्किम की परिषद के निर्णय लेने का हिस्सा थे और राज्य के चोग्याल राजाओं के समय से थे और इसलिए फैसला सुनाया कि यह आरक्षण था विशुद्ध रूप से धर्म आधारित नहीं है और इसलिए असंवैधानिक नहीं है। चुरंगू और अन्य कश्मीरी पंडित संगठनों ने इसका हवाला दिया है। उन्होंने यह भी प्रस्तावित किया है कि यदि सांघामॉडल को सुगम नहीं बनाया जा सकता है, तो पुडुचेरी के केंद्र शासित प्रदेश के समान एक मॉडल पर विचार किया जाना चाहिए। जहां केंद्र तीन सीटों के लिए सदस्यों को नामित करता है और इस प्रक्रिया को हाल ही में मद्रास उच्च न्यायालय ने भी बरकरार रखा था। हमने अब इसे परिसीमन आयोग से लेकर चुनाव आयोग, पीएमओ और गृह मंत्रालय तक सभी अधिकारियों के साथ उठाया है। कुछ तो करना ही होगा।

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