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देश को असल मायने में सेक्युलर बनाने की दिशा में यूसीसी अहम कड़ी, जानिए- क्‍या रहा है इतिहास

नई दिल्‍ली,भारत संवैधानिक रूप से एक पंथनिरपेक्ष देश है, लेकिन यह आश्चर्य ही है कि यहां कुछ कानून धर्म और समुदाय के आधार पर बंटे हुए हैं। मुस्लिम पर्सनल लॉ और हिंदू कोड बिल इसका ही उदाहरण हैं। कानून के स्तर पर इस विभाजन को खत्म करना समय की जरूरत है। इसका एकमात्र समाधान है समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड (यूसीसी)। यूसीसी एक देश, एक कानून की अवधारणा का ही मूर्तरूप है। विगत शुक्रवार को तलाक के एक मामले में सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने यूसीसी को वक्त की जरूरत बताते हुए इस विषय पर चल रही चर्चा को नई ताकत दी है। कुछ साल पहले तत्काल तीन तलाक के मामले में कानून बनने के बाद से यूसीसी को लेकर उम्मीद बढ़ी है। देश को असल मायने में पंथनिरपेक्ष यानी सेक्युलर बनाने की दिशा में यूसीसी अहम कड़ी है। आश्चर्य की बात है कि खुद को सेक्युलर कहने वाले राजनीतिक दल यूसीसी का पुरजोर विरोध करते हैं और हमेशा से इसकी पैरवी करती रही भाजपा को सांप्रदायिक माना जाता है। असल में यह केवल वोट की राजनीति है, जहां कुछ दल मुस्लिम वर्ग को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करते हैं और उस समुदाय में किसी भी सुधार में उनकी कोई रुचि नहीं है। तत्काल तीन तलाक के मामले में भी ऐसा ही विरोध देखने को मिला था। यूसीसी का विरोध करने वाला कोई पक्ष यह नहीं बताता है कि आखिर देश के हर नागरिक के लिए समान कानून होने से किसी वर्ग विशेष का नुकसान कैसे हो सकता है। सवाल यह भी है कि यहां इस मसले पर बखेड़ा खड़ा करने वाले यह भी नहीं बताते कि अमेरिका या अन्य देशों में जाकर वहां के कानून का पालन करने से जब किसी पंथनिरपेक्षता पर संकट नहीं आता है, तो भारत में सबके लिए समान कानून होना सांप्रदायिक मसला कैसे है? इस दिशा में हुए प्रयासों की पड़ताल आज बड़ा मुद्दा है। पुराना इतिहास अंग्रेजों की व्यवस्था: 1772 में वॉरेन हेस्टिंग्स ने उत्तराधिकार, शादी-विवाह और अन्य धार्मिक मामलों में दिए आदेश में कहा कि मुस्लिमों से संबंधित कुरान के कानून और हिंदुओं के लिए शास्त्र से जुड़े नियम-कानूनों का पालन किया जाए। निष्प्रभावी हुआ फतवा: 1817 में ब्रिटिश जजों ने फतवों की व्यवस्था को निष्प्रभावी कर दिया। एक प्रस्ताव पारित कर उन फतवों की बाध्यकारी प्रकृति को खत्म किया गया। मौजूद नियम-कानून: शादी-तलाक को लेकर विभिन्न धर्मो के लोगों के लिए अब तक कई कानून बनाए जा चुके हैं। इनमें प्रमुख हैं- -द कनवर्ट्स मैरिज डिसोल्युशन एक्ट, 1866 -द इंडियन डिवोर्स एक्ट, 1869 -द इंडियन क्रिश्चियन मैरिज एक्ट, 1872 -द काजी एक्ट, 1880 -द आनंद मैरिज एक्ट, 1909 -द इंडियन सक्सेशन एक्ट, 1925 -द चाइल्ड मैरिज रेस्ट्रेंट एक्ट, 1929 -द पारसी मैरिज एंड डिवोर्स एक्ट, 1936 -द डिसोल्युशन ऑफ मुस्लिम मैरिज एक्ट, 1939 -द स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 -द हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 -द फॉरेन मैरिज एक्ट, 1969 -द मुस्लिम वीमेन (प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स ऑन डिवोर्स) एक्ट, 1986 मुस्लिम पर्सनल लॉ 1937 के शरई कानून के तहत मुस्लिमों के लिए कुछ पर्सनल कानून बनाए गए लेकिन अंग्रेजों ने मुस्लिमों पर इन कानूनों को थोपा नहीं। इसके सेक्शन तीन के अनुसार यह उन्हीं मुस्लिम पर लागू होता था जिन्होंने लिखित में इसके दायरे में आने की बात मानी थी। स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 अलग-अलग धर्मों के लोग इसके तहत अपनी शादी को पंजीकृत करवा सकते हैं। इसमें यह भी प्रावधान है कि किसी अन्य रूप में की गई शादी को भी स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत पंजीकृत किया जा सकता है (अगर यह इस कानून की जरूरतों को पूरा कर रहा हो)। आजाद भारत में पहल आजादी के बाद संविधान सभा के अध्यक्ष और देश के पहले कानून मंत्री डॉ बीआर आंबेडकर ने समान नागरिक संहिता लागू करने की कोशिश की तो इस प्रयास को संविधान सभा में भारी विरोध का सामना करना पड़ा। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उस समय हिंदू कोड बिल तक ही इस सुधारवादी कदम को सीमित रखा। यह बिल हिंदुओं, सिखों, जैनियों और बौद्धों पर लागू होता है। इससे द्विपत्नी और बहुपत्नी प्रथा को समाप्त किया गया। महिलाओं को तलाक और उत्तराधिकार का अधिकार मिला। शादी के लिए जाति को अप्रासंगिक बनाया गया।

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