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विदेश में भारतीय विज्ञान के प्रथम प्रचारक परमहंस योगानंद, पश्चिम को जिन्होंने पढ़ाया योग का पहला पाठ

मानव मन आज जितना सशंकित व भयभीत है उतना कभी नहीं था। विश्वभर में मची उथल-पुथल और संघर्षों से विचलित मनुष्य सोच रहा है कि जिस दुष्चक्र में यह संसार आज फंस गया है, उससे निकलने का कोई उपाय है क्या? विश्व शांति व वैश्विक भाईचारे की संभावना को बल देता कोई उपाय, कोई युक्ति तो होगी। हां, युक्ति अवश्य है और यह है योग। भारत का वह दिव्य विज्ञान, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों के फलस्वरूप, वैश्विक स्वास्थ्य, समरसता और शांति को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 2014 में विश्व पटल पर दस्तक दे चुका है। 21 जून, 2015 से हर वर्ष इस दिन अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाने की शुरुआत हो चुकी है। यदि अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के भारतीय विचार को इतनी सरलता से संयुक्त राष्ट्र संघ ने स्वीकार कर लिया, तो इसका बहुत कुछ श्रेय परमहंस योगानंद को जाता है। वे विदेश में इस दिव्य भारतीय विज्ञान के प्रथम प्रचारक थे और उन्होंने इसे पृथ्वी के हरसंभव छोर पर संस्थापित-स्थापित किया। वास्तव में वे एक ईश्वरीय भविष्यवाणी को सार्थक कर रहे थे, जो आज से करीब 100 वर्ष पूर्व (वर्ष 1920 में), अमर गुरु महावतार बाबाजी ने की थी। यह अत्यंत रोमांचक और रोचक घटना थी। कालजयी आध्यात्मिक कृति ‘आटोबायोग्राफी आफ ए योगी’ (हिंदी रूपांतरण 'योगी कथामृत') के लेखक परमहंस योगानंद का जन्म 5 जनवरी, 1893 को गोरखपुर में हुआ। स्कूली शिक्षा के साथ-साथ उन्होंने अपने गुरु श्री युक्तेश्वर गिरिजी के सान्निध्य में गहन आध्यात्मिक योग का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी लिया। फलस्वरूप उन्होंने 1915 में स्नातक की उपाधि के साथ-साथ ही संन्यासी की उपाधि भी अर्जित की। उन्होंने 1917 में बच्चों की सही शिक्षा हेतु योगदा सत्संग सोसायटी की स्थापना की। वर्ष 1920 के किसी रोज (संभवत: जुलाई के अंत या अगस्त के आरंभ में) रांची में अपने बाल विद्यालय में ध्यानमग्न परमहंस योगानंद को अंतर्दृष्टि में पाश्चात्य चेहरे उनकी ओर आतुर दृष्टि से देखते हुए नजर आए। तब उनके मन में विचार उठा ‘अमेरिका! निश्चय ही यह लोग अमेरिकी हैं।’ इस अंतर्दर्शन के दूसरे दिन ही उन्हें अमेरिका में आयोजित धार्मिक उदारतावादियों के अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में बतौर भारत के प्रतिनिधि भाग लेने के लिए निमंत्रण मिला, जो अमेरिकन यूनिटेरियन एसोसिएशन के तत्वावधान में बोस्टन में होने वाला था। अंतर्दर्शन के कुछ ही घंटों पश्चात योगानंद जी रांची से कोलकाता अपने गुरु व पिता से अनुमति लेने चल दिए। अनुमति लेने के बाद अमेरिका की अनजान भूमि के प्रति आशंकाओं से भरा उनका हृदय ईश्वरीय आश्वासन व आशीर्वाद भी चाहता था। इसी आशा में वह ईश्वरीय उत्तर पाने हेतु यह दृढ़ संकल्प कर प्रार्थना में बैठ गए कि जब तक ईश्वर की आवाज नहीं सुन लूंगा, तब तक प्रार्थना बंद नहीं करूंगा। सुबह से दोपहर हो गई पर कुछ नहीं हुआ। प्रार्थना करते-करते सिर चकराने लगा। ठीक उसी समय किसी ने उनके घर का दरवाजा खटखटाया। दरवाजा खोला तो उन्होंने एक संन्यासी युवक को खड़े पाया। उनके मन में विचार उठा कि यह अवश्य ही बाबाजी होंगे। मधुर आवाज में हिंदी में उत्तर मिला, ‘हां, मैं बाबाजी हूं। परमपिता ने तुम्हारी प्रार्थना सुन ली है। उन्होंने मुझे तुम्हें यह बताने का आदेश दिया है कि अपने गुरु की आज्ञा का पालन करो और अमेरिका चले जाओ। डरो मत, तुम्हारा पूर्ण संरक्षण किया जाएगा। तुम ही वह हो, जिसे मैंने पाश्चात्य जगत में क्रिया योग का प्रसार करने के लिए चुना है। बहुत वर्ष पहले मैं तुम्हारे गुरु युक्तेश्वर से कुंभ मेले में मिला था और तभी मैंने कह दिया था कि मैं तुम्हें उनके पास शिक्षा ग्रहण के लिए भेज दूंगा।’ योगानंद जी के जीवन के बारे में अनेक बातें बताने के बाद बाबा जी ने उन्हें कुछ व्यक्तिगत उपदेश दिए और कई भविष्यवाणियां की। अंत में उन्होंने गंभीरता के साथ कहा, ‘ईश्वर साक्षात्कार की वैज्ञानिक प्रणाली क्रिया-योग का अंतत: सब देशों में प्रसार हो जाएगा और मनुष्य को अनंत परमपिता का व्यक्तिगत इंद्रियातीत अनुभव कराने के द्वारा यह राष्ट्रों के बीच सौहार्द स्थापित कराने में सहायक होगा।’ बाबा जी ने योगानंद जी पर दृष्टिपात से ही उनमें नई शक्ति का संचार कर दिया। आशीर्वाद की मुद्रा में हाथ उठाया और चले गए। बाबाजी के माध्यम से ईश्वरीय आश्वासन व आशीर्वाद पाकर योगानंद जी अमेरिका प्रस्थान की तैयारी में जुट गए। प्रथम विश्व युद्ध के बाद अमेरिका जाने वाले पहले यात्री जहाज ‘द सिटी आफ स्पार्टा’ पर सवार होकर अगस्त, 1920 में भारत से प्रस्थान किया और सात सप्ताह बाद 19 सितंबर, 1920 को अमेरिका के बोस्टन बंदरगाह पर उतरे। वहां 6 अक्टूबर, 1920 को धर्म सम्मेलन में योगानंद जी ने ‘धर्म विज्ञान’ विषय पर पहला व्याख्यान दिया, जिसे वहां लोगों ने हाथोंहाथ लिया। अपने व्याख्यान में उन्होंने कहा था, ‘धर्म सार्वभौमिक है और एक ही है। रीति रिवाज और रूढ़ि- प्रथाओं को सार्वभौमिक नहीं बनाया जा सकता है परंतु धर्म में निहित सामान्य तत्व को सार्वभौमिक बनाया जा सकता है और सबको उसका अनुसरण करने के लिए कहा जा सकता है।’ व्याख्यानों के लिए अनुरोधों की कतार ने योगानंद जी को भारत नहीं लौटने दिया। ‘पश्चिम में योग के जनक’ के रूप में उनकी प्रसिद्धि हुई और 1925 के अंत तक उन्होंने लास एंजिल्स, कैलीफोर्निया में सेल्फ-रियलाइजेशन फेलोशिप के मुख्यालय की स्थापना कर दी। भारत में 1917 में, वह योगदा सत्संग सोसाइटी की नींव पहले ही डाल चुके थे। इस तरह 10 वर्ष के अंतराल में ही 32 वर्षीय युवा योगानंद पूर्व व पश्चिम में दो संस्थाओं को क्रिया योग के प्रचार-प्रसार के लिए स्थापित कर चुके थे।

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