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नई दिल्ली कांग्रेस पार्टी अगले कुछ महीनों में सांगठिनक बदलावों को अंजाम देने की तैयारी में जुटी है। पार्टी के अंदरखाने इस बात को लेकर घोर उहापोह की स्थिति है कि क्या इस बार के फेरबदल का प्रमुख पहलू पीढ़ीगत बदलाव होने जा रहा है? अगर ऐसा होता है तो सोनिया गांधी की नजर के नीचे सेंट्रल पार्टी यूनिट के पदाधिकारी पहली बार बदले जाएंगे। सोनिया ने अपने बेटे राहुल गांधी को पार्टी का अध्यक्ष पद सौंपने के दो साल बाद हाल ही में 'अंतरिम अध्यक्ष' पद का जिम्मा संभाला है। राहुल ने लोकसभा चुनाव में पार्टी की बुरी हार की जिम्मेदारी लेकर अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। पार्टी के अंदर गहरी पकड़ रखने वाले एक सूत्र ने बताया कि फेरबदल की चर्चा हो रही है और जल्द ही निर्णय लिया जा सकता है। एक वरिष्ठ पार्टी नेता ने कहा, 'फेरबदल बड़ा हो सकता है, लेकिन बहुत बड़ा होने की संभावना नहीं है। फिलहाल कोई निर्णय नहीं हुआ है।' अटकलों का दौर कांग्रेस नेताओं के कानों तक जैसे-जैसे फेरबदल की बात पहुंच रही है, वैसे-वैसे इसके पैमाने को लेकर अटकलें तेज हो रही हैं। चूंकि संगठन में बदलाव लगातार दो लोकसभा चुनावों में जबर्दस्त हार और राहुल गांधी के अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद होने वाले हैं, इसलिए कई नेताओं को लग रहा है कि इस बार बड़े पैमाने पर उठा-पटक होगी। नई पीढ़ी vs पुराने दिग्गज कांग्रेस में 'नई पीढ़ी बनाम पुराने दिग्गज' की बहस राहुल गांधी के अध्यक्ष पद संभालने के बाद से ही चल रही है। अब यह चर्चा फिर से जोर पकड़ रही है कि क्या ऑल इंडिया कांग्रेस कमिटी (एआईसीसी) और राज्यों के संगठनों में नए खून को महत्व दिया जाएगा? राहुल गांधी ने तमाम मिन्नतों के बाद भी अध्यक्ष पद पर बने रहने से इनकार कर दिया तो सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष का पद स्वीकार करना पड़ा। ऐसे में सवाल यह भी उठ रहे हैं कि कांग्रेस को फुलटाइम प्रेजिडेंट कब मिलेगा? घटेगा अध्यक्ष पद का कार्यकाल? इस बात की भी जबर्दस्त चर्चा है कि एआईसीसी संगठन का कार्यकाल छोटा करने के उस फैसले पर भी विचार कर सकती है जो कांग्रेस वर्किंग कमिटी (सीडब्ल्यूसी) ने 2018 में लिया था। ऐसा हुआ तो पार्टी प्रमुख का कार्यकाल पांच साल से घटकर तीन साल का रह जाएगा। हालांकि, सीडब्ल्यूसी का वह फैसला कागजों तक ही सीमित है और इसे कभी लागू नहीं किया जा सका। अध्यक्ष पद पर राहुल की वापसी की अटकलें वैसे तो माना जा रहा है कि सोनिया गांधी अगले वर्ष दिल्ली एवं कुछ राज्यों की विधानसभा चुनावों तक पार्टी के शीर्ष पद पर बनी रहेंगी, लेकिन उसके बाद नए अध्यक्ष का चुनाव कर लिया जाएगा। संकेत यह भी हैं कि राहुल गांधी अध्यक्ष पद पर वापसी कर सकते हैं। गांधी परिवार तो इस पर कुछ भी बोलने से बच रहा है, लेकिन पार्टी के प्रभावी नेताओं ने सार्वजनिक तौर पर इसकी मांग करनी शुरू कर दी है। एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ने कहा, 'हमारे कार्यकर्ताओं का जबर्दस्त दबाव है कि राहुल वापसी करें। इस मुद्दे पर सब एकमत हैं।'
नई दिल्ली, 14 अक्टूबर 2019,बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) प्रमुख मायावती ने सोमवार को नागपुर में कहा कि वह बाबा साहेब की तरह बौद्ध धर्म की दीक्षा लेंगी. नागपुर में एक रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने इसका ऐलान किया. उन्होंने कहा कि सही समय पर इसका फैसला करेंगी. मायावती ने कहा कि बाबा साहब भीमराव अंबेडकर ने अपने देहांत से कुछ वक्त पहले अपना धर्म परिवर्तन कराया था. आप लोग मेरे धर्म परिवर्तन के बारे में भी सोचते होंगे. मैं भी बौद्ध धर्म की अनुयायी बनने के लिए दीक्षा अवश्य लूंगी लेकिन यह तब होगा जब इसका सही समय आ जाए. 'संघ प्रमुख की बात से सहमत नहीं' मायावती ने रैली में यह भी कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत की बात से सहमत नहीं हैं कि भारत एक हिंदू राष्ट्र था. मायावती ने कहा कि बाबा साहेब अंबेडकर ने सेकुलरिज्म के आधार पर संविधान की रचना की थी. मायावती नागपुर में महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में बीएसपी उम्मीदवारों के लिए चुनाव प्रचार कर रही हैं. यहां 21 अक्टूबर को मतदान है और वोटों की गिनती 24 अक्टूबर को होगी. बीजेपी, कांग्रेस पर निशाना मायावती ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की गलत नीतियों के चलते देश की अर्थव्यवस्था में सुस्ती आई है. उन्होंने आरोप लगाया कि सरकारी नौकरियों में दलित और आदिवासियों को प्रमोशन से वंचित करने के लिए कांग्रेस और बीजेपी ने एक दूसरे से साठगांठ की है. मायावती ने कहा कि मौजूदा सरकार ने दलित और आदिवासियों के लिए बने कानून को निष्प्रभावी करने का काम किया है.
प्रतापगढ़ प्रियंका गांधी के सक्रिय होने के बावजूद उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को एक के बाद एक झटकों का सिलसिला जारी है। प्रतापगढ़ में पूर्व सांसद और गांधी परिवार की करीबी मानी जाने वाली रत्ना सिंह ने पार्टी छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया है। खास बात यह है कि यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने खुद उन्हें पार्टी की सदस्यता दिलाई। इसे कांग्रेस के लिए बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है। बता दें कि प्रतापगढ़ विधानसभा सीट पर 21 अक्टूबर को उपचुनाव है। प्रतापगढ़ की पूर्व सांसद और कांग्रेस नेता राजकुमारी रत्ना सिंह ने अपने समर्थकों के साथ मंगलवार को सीएम योगी की उपस्थिति में बीजेपी की सदस्यता ग्रहण की। प्रतापगढ़ के गड़वारा में सीएम योगी एक जनसभा को संबोधित करने पहुंचे थे। चुनावी जनसभा के मंच से ही रत्ना सिंह के बीजेपी में शामिल होने की घोषणा की गई। इस मौके पर उनके पुत्र भुवन्यु सिंह भी मौजूद रहे। सीएम योगी आदित्यनाथ ने प्रतापगढ़ विधानसभा उपचुनाव में सहयोगी अपना दल के प्रत्याशी राजकुमार के समर्थन में यहां चुनावी सभा की। इससे पहले रत्ना सिंह के बीजेपी में शामिल होने का कार्यक्रम लखनऊ में था, लेकिन इस बीच विधानसभा उपचुनाव की सरगर्मी बढ़ने से इस कार्यक्रम में बदलाव किया गया। कांग्रेस के गढ़ में बड़ी सेंधमारी रत्ना सिंह के कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में जाने को पार्टी के गढ़ में बड़ी सेंध माना जा रहा है। अमेठी-सुलतानपुर, प्रतापगढ़ और रायबरेली बेल्ट कांग्रेस का मजबूत गढ़ रही है। लोकसभा चुनाव से लेकर पिछले कुछ महीनों के दौरान अमेठी से संजय सिंह और रायबरेली से दिनेश सिंह के बाद अब प्रतापगढ़ से रत्ना सिंह बीजेपी के पाले में आ गई हैं। ये तीनों ही नेता गांधी परिवार के खासमखास थे। वहीं, रायबरेली सदर सीट से कांग्रेस विधायक अदिति सिंह की भी बीजेपी से करीबी की चर्चा है। 2 अक्टूबर को गांधी जयंती पर विधानसभा में हुई चर्चा में शामिल होने वाली अदिति इकलौती कांग्रेस विधायक थीं। इसके ठीक बाद उनकी सुरक्षा वाई कैटिगरी की कर दी गई थी। गांधी परिवार से रत्ना सिंह का करीबी रिश्ता राजकुमारी रत्ना सिंह पूर्व विदेश मंत्री और काला कांकर राजघराने से ताल्लुक रखने वाले स्वर्गीय राजा दिनेश सिंह की पुत्री हैं। दिनेश सिंह प्रतापगढ़ से चार बार और उनकी पुत्री रत्ना सिंह तीन बार 1996, 1999 और 2009 में सांसद रह चुकी हैं। रत्ना सिंह का परिवार शुरू से ही कांग्रेसी रहा है। इनके परिवार में रामपाल सिंह कांग्रेस के संस्थापक सदस्य थे। पिता राजा दिनेश सिंह कांग्रेस की सरकार में विदेश मंत्री रहे। वह पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के बहुत करीबी थे। इसके चलते नेहरू-गांधी परिवार उनको बहुत महत्व देता था।
नई दिल्ली, 14 अक्टूबर 2019,लंबे इंतजार के बाद कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी चुनाव प्रचार में उतर गए हैं. रविवार को राहुल गांधी ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार अभियान का आगाज किया. राहुल ने महाराष्ट्र के कई इलाकों में ताबड़तोड़ जनसभाएं कीं. इस दौरान राहुल ने मोदी सरकार और बीजेपी को घेरने के लिए अपने भाषणों में राफेल से लेकर नीरव मोदी और गब्बर सिंह टैक्स का जिक्र किया. यानी जिन मुद्दों को राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव में मोदी सरकार के खिलाफ हथियार बनाया, उन्हीं का ज्रिक मौजूदा विधानसभा में भी राहुल ने किया. राहुल गांधी ने प्रचार के पहले ही दिन महाराष्ट्र के लातूर, चांदवली और धारावी में जनसभाएं कीं. राहुल ने अपनी पहली रैली में ही नोटबंदी और बैंक घोटालों का जिक्र किया. राहुल ने कहा, 'मोदी बोलते थे कि नोटबंदी से भला नहीं हुआ तो मुझे फांसी दे देना. मगर नोटबंदी से किसका फायदा हुआ, नीरव मोदी तो भाग गया.' राहुल ने कहा, 'नवंबर 2016 में नोटबंदी और उसके बाद जीएसटी से देश की अर्थव्यवस्था चरमरा गई है. ऑटोमोबाइल से टेक्सटाइल तक और हीरा से लेकर छोटे व्यवसायों तक का बुरा हाल है. सिर्फ महाराष्ट्र में 2,000 से ज्यादा फैक्टरियां बंद हो गई हैं, वहीं नीरव मोदी और मेहुल चोकसी जैसे 'चोर' लूटकर देश से फरार हो गए. कहां गए अच्छे दिन? राहुल गांधी ने कहा, 'आप देश में कहीं भी जाइए, लोग सिर्फ बेरोजगारी, कृषिभूमि संकट और अर्थव्यवस्था की बात कर रहे हैं..,अच्छे दिन का वादा किया गया था, वह कहां गया? नहीं आया न! नोटबंदी के बाद कोई नहीं जानता कितना काला धन बरामद हुआ, मगर गरीब और बहुत से ईमानदार लोग परेशान हुए. किसानों को कुछ नहीं, उद्योगपतियों को राहत राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि किसान लगातार परेशान हैं और उधर सरकार ने बीते कुछ सालों में लगभग 15 बड़े उद्योगपतियों के 5.50 लाख करोड़ के कर्ज माफ कर दिए. राहुल ने कहा कि सरकार ने पिछले महीने टैक्स में छूट देकर बड़े उद्योगपतियों को 1.45 करोड़ रुपये का दिवाली गिफ्ट दिया, लेकिन किसानों को कोई छूट नहीं दी गई. राफेल और चौकीदार चोर है की गूंज राहुल गांधी की सभा में राफेल विमान और चौकीदार चोर है की गूंज भी सुनाई दी. कांदीवली की रैली में जब राहुल गांधी ने राफेल विमान डील में चोरी का आरोप लगाया तो चौकीदार चोर है का नारा भी सुनाई दिया. ये तमाम मुद्दे वो हैं जो राहुल गांधी की तरफ से पांच महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव के दौरान भी जोर-शोर से उठाए गए थे. राहुल गांधी को यकीन था कि इन मुद्दों पर जनता बीजेपी को सबक सिखाएगी और कांग्रेस सत्ता में वापसी करेगी. लेकिन 23 मई को जब लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजे आए पूरी तस्वीर ही बदल गई और जनता ने बीजेपी को और अधिक सीटें जिताकर मोदी सरकार की जबरदस्त वापसी पर मुहर लगा दी. वहीं, दूसरी तरफ कांग्रेस 2014 के नतीजों तक ही सीमित रह गई. यानी लगातार दो लोकसभा चुनावों में देश की जनता ने कांग्रेस को सिरे से नकार दिया और राहुल गांधी द्वारा उठाए तमाम मुद्दे फेल हो गए. अब राहुल गांधी ने फिर उन्हीं मुद्दों को उठाया है. जबकि बीजेपी कश्मीर से धारा 370 हटाने और तीन तलाक पर कानून बनाने जैसे बड़े मुद्दों के सहारे चुनाव में उतर रही है. राहुल गांधी कह रहे हैं कि नोटबंदी, रोजगार और घोटालों जैसे ज्वलंत मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने और चर्चा करने के बजाय, सरकार लोगों को यह दिखाने में व्यस्त है कि भारतीय चंद्रयान रॉकेट को कैसे चंद्रमा पर भेजा गया. साथ ही राहुल का कहना है कि जम्मू एवं कश्मीर में अनुच्छेद 370, पाकिस्तान, चीन, जापान, कोरिया वगैरह पर बात की जा रही है, लेकिन याद रखिए कि ये रॉकेट लाखों भूखों के पेट भरने में मदद नहीं करेगा.
भोपाल मध्य प्रदेश की अपनी ही सरकार पर कांग्रेस महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया के हमले के बाद बीजेपी ने उन्हें पार्टी छोड़ने की सलाह दी है। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सूबे की कमलनाथ सरकार पर निशाना साधते हुए कहा था कि अभी किसानों की कर्जमाफी का वादा पूरा नहीं हो सका है। हमने 2 लाख रुपये तक के कर्ज वाले किसानों को लोन माफी का वादा किया था, लेकिन 50,000 रुपये तक के कर्ज ही माफ किए जा सके हैं। सिंधिया ने कहा था कि हमने अपने वादे पर पूरी तरह से अमल नहीं किया है और वादा पूरा करना चाहिए। इस मामले में अब बीजेपी ने भी दखल देते हुए कहा है कि सिंधिया ने अपने बयान से कमलनाथ को आईना दिखाने का काम किया है। सिंधिया की टिप्पणी को लेकर राज्य विधानसभा में नेता विपक्ष गोपाल भार्गव ने कहा, 'यदि कांग्रेस की सरकार की ओर से वादाखिलाफी से सिंधिया परेशान हैं तो फिर उन्हें पार्टी छोड़ देनी चाहिए। सिंधिया ने सही कहा कि कांग्रेस ने वादा किया था वह सत्ता में आने के 10 दिन के भीतर ही कर्ज माफ कर देगी।' इस बीच कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह और सीएम कमलनाथ के बीच ट्विटर पर आवारा पशुओं को लेकर जारी किए गए बयान पर बीजेपी विधायक रामेश्वर शर्मा ने हमला बोलते हुए कांग्रेस को ही आवारा पार्टी बता दिया। उन्होंने कहा, 'असल में कांग्रेस आवारा पार्टी है।'
ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी एक बार फिर कांग्रेस पार्टी पर हमलावर हो गए। उन्होंने कहा कि कांग्रेस अब कमजोर हो चुकी है, उसका सफाया हो गया है और अब उसे कैल्शियम का इंजेक्शन देकर भी नहीं बचाया जा सकता। ओवसी 21 अक्टूबर को महाराष्ट्र में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले जनसभा को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा, ‘देश के राजनीतिक नक्शे से कांग्रेस का सफाया हो चुका है। अब उसे ‘कैल्शियम का इंजेक्शन’ देकर भी जिंदा नहीं किया जा सकता।’ यहां ओवैसी ने दावा किया कि कांग्रेस के कई टॉप लीडरों ने महाराष्ट्र और हरियाणा के महत्वपूर्ण चुनावों को नजरअंदाज किया है। बता दें कि ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) ने इस साल हुए लोकसभा चुनाव में प्रकाश आंबेडकर की पार्टी भारिपा बहुजन महासंघ और वंचित बहुजन अगाड़ी (VBA) के साथ गठबंधन किया था और एक सीट ही मिली। वहीं 2014 में हुए विधानसभा चुनावों में एआईएमआईएम ने दो सीटें जीतीं।
लखनऊ कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी हाल में यूपी कांग्रेस के कुछ नेताओं के पार्टी लाइन से अलग राह पकड़ने से नाखुश हैं। यही वजह है कि अब वह पार्टी को फिर से एकजुट करने के लिए लखनऊ में ही डेरा जमाने की तैयारी में हैं। बताया जा रहा है कि इसके लिए प्रियंका गांधी लखनऊ में आवास तलाश रही हैं। 2022 के विधानसभा चुनाव के मद्देनजर चुनावी रणनीति बनाने और संगठन मजबूत करने के साथ ही लखनऊ में रहकर प्रियंका राज्य में ज्यादा समय भी बिताना चाहती हैं। पार्टी सूत्रों के मुताबिक प्रियंका गांधी के लिए आवास की तलाश लखनऊ में जोरों पर है। एक विकल्प पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की मामी शीला कौल का लखनऊ में गोखले मार्ग स्थित घर है। 2 अक्टूबर को प्रियंका जब लखनऊ गई थीं तो एयरपोर्ट से सीधे गोखले मार्ग ही गई थीं ताकि घर देख सकें। नए नेताओं पर अब फोकस करेगी कांग्रेस आमतौर पर प्रियंका या गांधी परिवार के दूसरे सदस्य रायबरेली में ठहरते हैं, लेकिन पार्टी नेताओं का कहना है कि लखनऊ में घर होने से प्रियंका और पार्टी, दोनों को सहूलियत होगी। उधर, प्रियंका ने अब निर्देश दिया है कि पार्टी दूसरे दलों के नेताओं को अपने साथ जोड़ने के बजाय नए लोगों को राजनीति में लाने पर फोकस करेगी। इसके पीछे यह सोच बताई गई है कि निहित स्वार्थों के कारण पार्टी में आने वालों का स्वागत करने के बजाय विचारधारा के स्तर पर विस्तार किया जाए। पार्टी लाइन से अलग तो होगी कार्रवाई उधर, पार्टी लाइन से अलग राह पकड़ने वाले नेताओं के खिलाफ प्रियंका ने कड़ी कार्रवाई का निर्देश दिया है। कांग्रेस सूत्रों ने बताया कि प्रियंका के कहने पर अदिति को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है। यूपी सरकार की ओर से 2 अक्टूबर को बुलाए गए विधानसभा के विशेष अधिवेशन में रायबरेली से कांग्रेस विधायक अदिति सिंह के जाने के बाद प्रियंका ने यह निर्देश दिया। कांग्रेस ने अपने विधायकों को इस अधिवेशन से दूर रखा था। अदिति ने जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधानों को निष्क्रिय किए जाने का भी समर्थन किया था। अदिति सिंह पर नहीं किया जा रहा विचार सूत्रों ने बताया कि उन्हें अदिति की बीजेपी से नजदीकी बढ़ने की जानकारी थी और इसी वजह से प्रदेश कांग्रेस कमिटी की नई टीम बनाते समय उनके नाम पर विचार नहीं किया गया था। नई पीसीसी का ऐलान अभी नहीं किया गया है। रमाकांत यादव ने भी छोड़ दी है पार्टी इस बीच, पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले पूर्वी उत्तर प्रदेश कद्दावर नेता रमाकांत यादव ने पार्टी छोड़ दी है। आजमगढ़ में सक्रिय रहे और भदोही से कांग्रेस टिकट पर चुनाव लड़ने वाले रमाकांत यादव ने रविवार को समाजवादी पार्टी में वापसी कर ली। एसपी में उनके जाने की चाहत भांपकर कांग्रेस ने उन्हें पिछले हफ्ते पार्टी से बाहर कर दिया था।
05 अक्टूबर 2019, हरियाणा के बाद गुजरात में भी कांग्रेस को झटका लगा है. गुजरात कांग्रेस के नेता बदरुद्दीन शेख ने कांग्रेस के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया है. बता दें शनिवार को हरियाणा कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अशोक तंवर ने भी पार्टी से इस्तीफा दे दिया. हरियाणा और महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव के लिए 21 अक्टूबर को वोटिंग होनी है. 24 अक्टूबर को नतीजे जारी कर दिए जाएंगे. चुनाव करीब आते ही कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ती दिख रही हैं. अशोक तंवर टिकट बंटवारे को लेकर पार्टी आलाकमान से नाराज चल रहे थे. उन्होंने पांच करोड़ रुपये में टिकट बेचे जाने का भी आरोप लगाया था. शनिवार को तंवर ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. अशोक तंवर ने अपने ट्विटर अकाउंट से इस्तीफा देने की जानकारी दी. वहीं महाराष्ट्र में भी पार्टी के दिग्गज नेता संजय निरुपम कांग्रेस को बगी तेवर दिखा रहे हैं. उन्होंने कहा है कि राहुल गांधी को अपना वनवास खत्म करना चाहिए और एक बार फिर से पार्टी का अध्यक्ष पद संभालना चाहिए. संजय निरुपम ने मिलिंद देवड़ा पर भी निशाना साधा. उन्होंने कहा कि मिलिंद देवड़ा भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और नरेंद्र मोदी के साथ मिलकर काम करना चाहते हैं और इसलिए वह पार्टी की नीतियों के खिलाफ जा रहे हैं.
लखनऊ हरियाणा और मुंबई के बाद यूपी कांग्रेस में भी हलचल तेज हो गई है। गांधी जयंती के मौके पर यूपी विधानसभा के विशेष सत्र में कांग्रेस के बहिष्कार के बावजूद भी विधायक अदिति सिंह ने इसमें शामिल होकर सबको हैरान कर दिया था। इसके एक दिन बाद उन्हें Y+ सुरक्षा मिलते ही उनके पार्टी छोड़ने की चर्चा भी तेज हो गई है। वहीं यूपी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर और यूपी कांग्रेस की वरिष्ठ नेता अनु टंडन के भी पैदल मार्च में भी शामिल न होने से सवाल उठ रहे हैं। बता दें कि जिस दिन यूपी का विशेष विधानसभा सत्र आयोजित किया गया, उसी दिन लखनऊ में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी योगी सरकार के खिलाफ पैदल मार्च कर रही थीं। अदिति सिंह पैदल मार्च से नदारद रहीं और विधानसभा सत्र में शामिल होकर विकास के मुद्दे पर बात कही। यही नहीं उन्होंने योगी सरकार की कुछ योजनाओं की भी तारीफ की। अदिति को मिली वाई श्रेणी की सुरक्षा सत्र के बाद अदिति सिंह ने सीएम योगी आदित्यनाथ से उनके कमरे में भी मुलाकात की, इससे उनके बीजेपी में जाने की चर्चा और तेज हो गई। गुरुवार को अदिति को वाई प्लस सुरक्षा भी मिल गई। यह पहली बार नहीं था जब अदिति ने पार्टी लाइन से अलग जाकर कदम उठाया हो। इससे पहले भी उन्होंने जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 के अधिकतर प्रावधान खत्म किए जाने पर केंद्र सरकार के फैसले का समर्थन किया था। पैदल यात्रा में राज बब्बर भी शामिल नहीं हुए अदिति के अलावा कांग्रेस की पैदल यात्रा से यूपी कांग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर की अनुपस्थिति ने भी लोगों का ध्यान खींचा। सत्ता के गलियारे में भी तरह-तरह की कयासबाजी शुरू होने लगी। हालांकि यूपी कांग्रेस के प्रवक्ता अंशु अवस्थी ने स्पष्ट किया है कि राज बब्बर के 2 अक्टूबर के दिन विदेश में होने की वजह से वह इस यात्रा में शामिल नहीं हो सके। वहीं अनु टंडन भी अपने क्षेत्र के कार्यक्रम में व्यस्त थीं। इस वजह से वह इस पदयात्रा में शामिल नहीं हो सकीं। यूपी कांग्रेस अध्यक्ष पद की लड़ाई तेज इसके पीछे दूसरी वजह यूपी कांग्रेस का अध्यक्ष पद बताया जा रहा है। चर्चा है कि कांग्रेस उत्तर प्रदेश में बड़े बदलाव की दिशा में तैयारी कर रही है और इसके बाबत ही नए प्रदेश अध्यक्ष की तलाश भी शुरू हो गई है। इसके लिए कांग्रेस विधायक अजय कुमार लल्लू और पूर्व सांसद जितिन प्रसाद के नाम सामने आ रहे हैं। खास बात यह है कि यही दोनों नेता कांग्रेस की पैदल यात्रा के दौरान संघर्ष करते नजर आए थे। दोनों ही नेता अध्यक्ष पद के दावेदार माने जा रहे हैं। अजय कुमार लल्लू और जितिन प्रसाद के नाम की चर्चा सोनभद्र नरसंहार के बाद प्रियंका गांधी के दौरे के पीछे कुशीनगर से विधायक अजय कुमार लल्लू की बड़ी भूमिका मानी जाती है। पिछले दिनों अजय कुमार लल्लू का नाम अध्यक्ष पद के लिए बिल्कुल तय माना जा रहा था लेकिन ऐन मौके पर पार्टी के हाई कमान ने फैसले पर रोक लगा दी थी। इस दौरान जितिन प्रसाद का नाम भी सामने आने लगा। उनके नाम का प्रदेश अध्यक्ष पद की दावेदारी में पहले भी चल चुका है। वह पार्टी का ब्राह्मण चेहरा भी माने जाते हैं। निरुपम बोले- ऐसे बर्बाद हो जाएंगी कांग्रेस उधर हरियाणा के बाद मुंबई कांग्रेस में बगावत के सुर तेज हो गए हैं। मुंबई कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष रह चुके संजय निरुपम ने कांग्रेस पर हमला बोलते हुए कहा है कि पार्टी के अंदर सिस्टमैटिक फॉल्ट हो गया है। अगर ऐसे ही चलता रहा तो कांग्रेस तबाह हो जाएगी। बता दें कि मुंबई में टिकट बंटवारे को लेकर संजय निरुपम नाराज चल रहे हैं। उन्होंने चुनाव प्रचार न करने का भी फैसला किया है।
मुंबई/चंडीगढ़ दो राज्यों में विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस बगावत से जूझ रही है। पहले हरियाणा में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर ने टिकटों में खरीद-फरोख्त का आरोप लगाया और अब महाराष्ट्र में संजय निरुपम ने बागी तेवर दिखाते हुए प्रचार न करने का ऐलान किया है। महाराष्ट्र में गुरुवार को जारी कांग्रेस के उम्मीदवारों की लिस्ट के बाद निरुपम ने ट्वीट कर कहा कि शायद पार्टी को अब उनकी सेवाओं की जरूरत नहीं रह गई है। वहीं हरियाणा में कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर ने आरोप लगाया है कि हरियाणा कांग्रेस अब हुड्डा कांग्रेस हो गई है। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस को अच्छे उम्मीदवार तलाशने में परेशानी हो रही है। गुरुवार को कांग्रेस की जारी उम्मीदवारों की लिस्ट से इसका संकेत मिलता है। इसमें पार्टी की ओर से ऐसे उम्मीदवारों को टिकट दिया गया, जो दो दिन पहले तक बीजेपी में जाने को तैयार थे। हालांकि इससे पार्टी काडर को धक्का लगा है। उनका कहना है कि पार्टी को उनकी वफादारी का सम्मान करते हुए मिसाल पेश करनी चाहिए थी। मुंबई कांग्रेस के प्रमुख संजय निरूपम ने भी ट्विटर पर अपनी नाराजगी जाहिर की है। बता दें कि विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस की ओर से नेता विपक्ष रहे राधाकृष्ण विखे पाटिल समेत कई दिग्गज नेता पार्टी छोड़ बीजेपी में शामिल हो चुके हैं। दो उम्मीदवारों को टिकट मिलने से काडर हैरान कांग्रेस ने गुरुवार को जो 20 उम्मीदवारों की लिस्ट जारी की उसमें अकालकोट से सिद्दाराम म्हात्रे और मलाड वेस्ट से असलम शेख के नामों को लेकर हैरानी जताई जा रही है। ये दोनों बीजेपी में शामिल होने के लिए उससे बातचीत कर रहे थे। उन्हें 30 सितंबर को मुंबई में बीजेपी में शामिल होना था, लेकिन बीजेपी के अंदर इन विधायकों को लेकर नाराजगी के चलते ऐसा नहीं हो सका। बीजेपी से मायूसी हाथ लगने के तुरंत बाद इन विधायकों को अपनी पार्टी से टिकट मिलने में समय नहीं लगा, जबकि कांग्रेस में सबको पता था कि दोनों बीजेपी में जाने की कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस के फैसले से पार्टी काडर को लगा धक्का कांग्रेस के इस फैसले को लेकर पार्टी के नेताओं को धक्का लगा है। कुछ नेताओं ने कहा कि पार्टी को एक मिसाल तय करनी चाहिए और वफादारी का सम्मान होना चाहिए। कांग्रेस के एक नेता ने कहा, 'कांग्रेस और बीजेपी में यही अंतर है। क्या बीजेपी किसी ऐसे नेता को टिकट देती, जो दो दिन पहले तक प्रतिद्वंद्वी दल में जाने की कोशिश कर रहे थे। पार्टी को वफादारी का सम्मान करना चाहिए।' 'जब आगे बढ़ने का मौका तो पार्टी के लिए काम क्यों करें' उनका कहना था कि कांग्रेस की मुंबई यूनिट के सामने एक मुश्किल चुनौती है। लोकसभा चुनाव के डेटा से पता चलता है कि कांग्रेस के तीन मौजूदा विधायकों की सीटें ही सुरक्षित हैं, जबकि शहर में 26 विधानसभा सीटें हैं। सुरक्षित सीटों में मुम्बादेबी से अमीन पटेल, धारावी से वर्षा गायकवाड़ और चांदीविली से नसीम खान हैं। कांग्रेस के एक अन्य नेता ने कहा कि पार्टी वर्षों से समान उम्मीदवारों को दोहरा रही है। उनका कहना था, 'जब युवाओं को पार्टी में आगे बढ़ने का मौका नहीं मिलेगा तो वे पार्टी के लिए कार्य क्यों करेंगे।' संजय निरुपम ने प्रचार से किया इनकार मुंबई कांग्रेस के प्रमुख संजय निरुपम ने भी बागी रुख अपना लिया है। उन्होंने गुरुवार को ट्वीट कर कहा, 'ऐसा लगता है कि कांग्रेस पार्टी को अब मेरी सेवाओं की जरूरत नहीं है। मैंने विधानसभा चुनाव के लिए मुंबई में केवल एक नाम की सिफारिश की थी। मैंने सुना है कि उस नाम को भी अस्वीकार कर दिया गया है। मैंने नेतृत्व को पहले बता दिया था कि ऐसी स्थिति होने पर मैं चुनाव प्रचार में हिस्सा नहीं लूंगा। यह मेरा अंतिम फैसला है।' अपने करीबी के लिए टिकट चाहते थे निरुपम सूत्रों ने कहा कि निरुपम मुंबई में वर्सोवा सीट से रईस लश्कारिया के लिए टिकट चाहते थे। हालांकि, पार्टी ने उनकी इस मांग को खारिज कर दिया। निरुपम के करीबी लोगों ने बताया कि उनकी अभी पार्टी छोड़ने की योजना नहीं है, लेकिन वह कांग्रेस उम्मीदवारों के लिए प्रचार नहीं करेंगे। तंवर बोले- हरियाणा कांग्रेस हो गई है हुड्डा कांग्रेस बता दें कि इससे पहले बुधवार को हरियाणा में टिकट बंटवारे को लेकर पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर ने समर्थकों के साथ दिल्ली में प्रदर्शन किया था। तंवर का आरोप है कि कांग्रेस ने पुराने लोगों को नजरअंदाज करके नए शामिल होने वाले लोगों को टिकट दिया जा रहा है। इसके अलावा उन्होंने 5 करोड़ रुपये टिकट बेचने का भी आरोप लगाया है। कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अशोक तंवर ने विधानसभा चुनाव में टिकट बांटने में अपने गुट की अनदेखी से नाराज होकर पार्टी की सभी कमिटियों से इस्तीफा दे दिया है। तंवर का आरोप- युवा पीढ़ी की अनदेखी तंवर ने कहा कि टिकट वितरण में युवा पीढ़ी की पूरी तरह से अनदेखी की गई है। कई-कई बार हारे हुए लोगों को टिकट दिया गया है। जीतने का दम रखने वाले प्रत्याशियों को गुटबाजी की भेंट चढ़ा दिया गया। उन्होंने कहा कि टिकट बंटवारे के बाद लगता है कि हरियाणा कांग्रेस अब हुड्डा कांग्रेस हो गई है। इसलिए उन्होंने कांग्रेस हाईकमान को पत्र लिखकर उनको सभी जिम्मेदारियों से मुक्त करने को कहा है। वह कांग्रेस में केवल साधारण कार्यकर्ता बनकर काम करेंगे।
मुंबई,देश में आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर आज भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक हुई. बैठक में पीएम नरेंद्र मोदी भी मौजूद रहे. सूत्रों के हवाले से खबर है कि महाराष्ट्र में आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर बीजेपी और शिवसेना गठबंधन के बीच सीटों का बंटवारा तय हो चुका है. शिवसेना को 124 सीटें मिल सकती हैं. इस बीच खबर यह भी है कि आदित्य ठाकरे महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में मुंबई की वर्ली सीट से चुनाव लड़ेंगे. आदित्य ठाकरे शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के पुत्र हैं और शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे के पौत्र हैं. वर्तमान में वह शिवसेना की युवा शाखा, युवा सेना के प्रमुख हैं. इधर, भाजपा के शीर्ष नेता लगातार जोर दे रहे हैं कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस राज्य की कमान संभालेंगे लेकिन भाजपा की सहयोगी शिवसेना पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे को इस पद के लिए दावेदार के रूप में पेश करना चाहते हैं. बताया जा रहा है कि शिवसेना कम सीटों पर चुनाव लड़ने को तैयार हो सकती है बशर्ते आदित्य ठाकरे को उप मुख्यमंत्री पद दिया जाए. यह सर्वविदित है कि 2019 लोकसभा चुनाव से पहले भाजपा और शिवसेना में गठबंधन सिर्फ इसलिए देरी से हुआ था, क्योंकि शिवसेना महाराष्ट्र चुनाव में अस्थाई सीट बंटवारे के लिए भाजपा से आश्वासन चाहती थी. बता दें कि 21 अक्टूबर को होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा और शिवसेना ने सीटों के बंटवारे को लेकर समझौते का औपचारिक ऐलान नहीं किया है लेकिन सूत्रों के अनुसार शिवसेना को भाजपा ने 124 सीटों पर मना लिया है ऐसे में यह साफ हो गया है कि शिवसेना अगर 124 सीटों पर विधानसभा में उतरती है तो भारतीय जनता पार्टी प्रदेश की 288 विधानसभा सीटों में से 146 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. वहीं, शेष सीटों पर रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आरपीआई) जैसे गठबंधन के छोटे दल चुनाव लड़ सकते हैं. बता दें कि 288 सदस्यीय महाराष्ट्र विधानसभा में भाजपा के पास 122 सीटें हैं, वहीं शिवसेना के पास 63 सीटें हैं. महाराष्ट्र विधानसभा के लिए चुनाव 21 अक्टूबर को होंगे और नतीजे 24 अक्टूबर को घोषित किए जाएंगे.
मुंबई, 30 सितंबर 2019,महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) ने विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है. पार्टी चीफ राज ठाकरे ने सोमवार को बताया है कि उनकी पार्टी महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव लड़ने जा रही है. सोमवार को मुंबई में पार्टी नेताओं के साथ मीटिंग के बाद राज ठाकरे ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और चुनाव लड़ने की घोषणा की. राज ठाकरे ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा करते हुए कहा कि हम लड़ेंगे और जीतेंगे. हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि मनसे कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेगी. सूत्रों के मुताबिक, मनसे करीब 100 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ सकती है. ये भी बताया जा रहा है कि मनसे जल्द ही प्रत्याशियों की सूची जारी कर सकती है. नामांकन की आखिरी तारीख 4 अक्टूबर है, लिहाजा मनसे की सूची जल्द ही सामने आ सकती है. रविवार को आई थी कांग्रेस की पहली लिस्ट मनसे ने यह ऐलान कांग्रेस की पहली सूची के बाद किया है, जो कि सियासी चर्चाओं के लिहाज से काफी अहम है. दरअसल, दो महीने पहले ही राज ठाकरे ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मुलाकात की थी. दोनों नेताओं की मुलाकात के बाद गठबंधन की संभावनाओं पर भी हर तरफ चर्चा की गई. लेकिन दो हफ्ते पहले जब कांग्रेस की सबसे बड़ी सहयोगी एनसीपी के अध्यक्ष शरद पवार ने 125-125 सीटों पर लड़ने का ऐलान किया तो मनसे से जुड़ी चर्चाओं का रुख बदल गया. दोनों सहयोगी दलों में से फिलहाल कांग्रेस ने ही 51 प्रत्याशियों की एक सूची जारी की है. एनसीपी ने अभी तक अपना कोई भी उम्मीदवार घोषित नहीं किया है. ऐसे में माना जा सकता है कि अब नामांकन की आखिरी तारीख (4 अक्टूबर) से ऐन पहले राज ठाकरे ने विधानसभा चुनाव लड़ने की घोषणा के साथ ही गठबंधन की चर्चाओं पर लगभग विराम लगा दिया है. हालांकि, राज ठाकरे किस फॉर्मूले के साथ चुनाव में उतरेंगे, यह जानकारी अभी नहीं है. बता दें कि राज ठाकरे की पार्टी एमएनएस ने 288 सीटों वाली महाराष्ट्र विधानसभा के लिए 2014 में करीब सवा दो सौ सीटों पर चुनाव लड़ा था. पार्टी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा था और वह महज एक सीट (जुनार) जीत पाई थी.
देहरादून, 29 सितंबर 2019,उत्तराखंड में बीजेपी ने 40 सदस्यों को पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के चलते पार्टी से बाहर कर दिया है. समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक यह खबर सामने आई है. पार्टी ने कार्यकर्ता से लेकर मंत्री पद तक के सदस्यों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है. पार्टी ने नैनीताल, पिथौरागढ़, अल्मोड़ा, बागेश्वर, टिहरी और उत्तरकाशी इकाई के कई सदस्यों को निकाल दिया है. उत्तराखंड बीजेपी द्वारा निकाले गए सदस्यों में खीम सिंह (मंडल महामंत्री, रामगढ़), लाखन नेगी (पूर्व ब्लॉक प्रमुख), जगत मर्तोलिया (जिला मीडिया प्रभारी), हरीश सिंह (पूर्व सैनिक प्रकोष्ठ पदाधिकारी), राजेंद्र सिंह (युवा मोर्चा मंडल अध्यक्ष), कल्पना बोरा (प्रदेश मंत्री, महिला मोर्चा), मोहन सिंह रावत (जिला मंत्री) जैसे नेताओं के नाम मौजूद हैं. इसके अलावा पार्टी ने कई कार्यकर्ताओं को भी निकाला है. निकाले गए कार्यकर्ताओं के नाम भवान सिंह, रवि नयाल, हरेंद्र सिंह दरम्वाल, भुवन चंद्र पांडे, सुशीला देवी, प्रमिला उनियाल, अनोर सिंह, सिद्धार्थ राणा, उर्मिला पुंडीर, सरिता रौतेला, नरेंद्र रावत, नरेंद्र सिंह और ताजवीर खाती हैं.
लखनऊ देश के विभिन्न राज्यों में 21 अक्टूबर को विधानसभा के लिए उपचुनाव होना है। कई राज्यों में आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए इसे सेमीफाइनल के रूप में भी देखा जा रहा है। ऐसे में सभी पार्टियां जोर- शोर से उपचुनाव में बड़ी जीत के लिए जुटी हैं। बीजेपी ने भी अपने पत्ते खोलने शुरू कर दिए हैं। पार्टी ने अलग-अलग राज्यों में 32 उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है। लखनऊ देश के विभिन्न राज्यों में 21 अक्टूबर को विधानसभा के लिए उपचुनाव होना है। कई राज्यों में आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए इसे सेमीफाइनल के रूप में भी देखा जा रहा है। ऐसे में सभी पार्टियां जोर- शोर से उपचुनाव में बड़ी जीत के लिए जुटी हैं। बीजेपी ने भी अपने पत्ते खोलने शुरू कर दिए हैं। पार्टी ने अलग-अलग राज्यों में 32 उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है। बीजेपी की तरफ से जारी इस सूची में असम से 4 उम्मीदवार, बिहार से 1, छत्तीसगढ़ से 1, हिमाचल प्रदेश से 2, केरल से 5, मध्य प्रदेश, मेघायल और ओडिशा से 1-1 उम्मीदवार शामिल हैं। इसके अलावा पंजाब और राजस्थान से भी एक-एक उम्मीदवार हैं। सर्वाधिक 10 उम्मीदवार यूपी से हैं। इसके अलावा दो सिक्किम और एक तेलंगाना से प्रत्याशी का नाम सामने आया है।
DMK ने सीपीआई समेत 3 पार्टियों को 40 करोड़ का चंदा दिया नई दिल्ली, 26 सितंबर 2019, लोकसभा चुनाव में द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) की ओर से कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई), कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया-मार्क्सिस्ट (सीपीएम) और गोनगू नाडु डेमोक्रेटिक पार्टी (केएनडीपी) को चंदे के रूप में करोड़ों रुपये देने का मामला तूल पकड़ता जा रहा है. डीएमके की ओर से चुनाव आयोग को दिए ब्यौरे के मुताबिक, पार्टी ने सीपीआई को 15 करोड़, सीपीएम को 10 करोड़ रुपये चुनाव लड़ने के लिए दिए थे. इसके अलावा डीएमके ने गोनगू नाडु डेमोक्रेटिक पार्टी को 15 करोड़ रुपये चंदे के रूप में दिए थे. चुनाव आयोग को 14 अगस्त को दाखिल किए गए अपने हलफनामे में डीएके ने खुलासा किया है कि उनकी पार्टी ने 3 पार्टियों को कुल 40 करोड़ का चंदा दिया है. इन दोनों पार्टी के नेताओं ने आर्थिक मदद मिलने की बात दबी जुबान में मान ली है. हालांकि, चुनाव आयोग की निगाह में बड़ी पार्टियों का अपनी गठबंधन में सहयोगी छोटी पार्टियों को चुनावी मदद के लिए चंदा देना कोई अजूबा नहीं है. वामपंथी पार्टियों के लिए ये उनके कथित साम्यवादी उसूलों के खिलाफ जरूर है, जिसमें ये पूंजीवाद की मुखालफत करते हुए चुनाव खर्च घटाने की वकालत करते रहे हैं. संसद में ये पार्टियां अपनी सीटों का दो अंकों का आंकड़ा भले ना हासिल कर पाई, लेकिन करोड़ों का चंदा लेने में तो आगे आगे रहीं.aajtak
नई दिल्ली कश्मीर से आर्टिकल-370 और 35-ए हटाए जाने के बाद पूरे देश में पैदा हुए एक नए भावनात्मक माहौल का फायदा बीजेपी आने वाले विधानसभा चुनावों में भी उठाने की तैयारी में है। बीजेपी इस मुद्दे को लेकर जन जागरण अभियान शुरू करने जा रही है, जिसकी शुरुआत 25 सितंबर को दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम से होगी। विधानसभा में विपक्ष के नेता विजेंद्र गुप्ता को इस अभियान का संयोजक बनाया गया है। 15 दिनों तक दिल्ली में चलाया जाएगा अभियान गुप्ता ने शनिवार को प्रदेश कार्यालय में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि ऐतिहासिक भूल का ऐतिहासिक सुधार, इस मूलमंत्र पर आधारित यह जन जागरण अभियान पूरी दिल्ली में अगले 15 दिनों तक चलाया जाएगा, जिसकी शुरुआत और पहली सभा का आयोजन आगामी 25 सितंबर को दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में होगा। लोगों को कश्मीर के हालात के बारे में बताया जाएगा इस सभा को बीजेपी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा सम्बोधित करेंगे। एक राष्ट्र, एक संविधान के आदर्श पर आधारित इस कार्यक्रम में एक प्रदर्शनी और 10 मिनट की विडियो के जरिए लोगों को कश्मीर के ताजा हालात के बारे में बताया जाएगा। 25 सितंबर के कार्यक्रम के बाद दिल्ली के सभी जिलों में इस मुद्दे पर जन जागरण सभाओं का आयोजन किया जाएगा, जिसमें राष्ट्रीय स्तर के नेता दिल्ली की जनता से सीधा संवाद करेंगे। गुप्ता ने कहा कि जनजागरण अभियान के माध्यम से कश्मीर से अनुच्छेद 370 और धारा 35-ए को खत्म किए जाने के पीछे मोदी सरकार की भावना से दिल्ली की जनता को अवगत कराया जाएगा। बीजेपी की ओर से कश्मीर पर पूरे देश में जागरुकता अभियान इसी प्रकार का एक जनसंपर्क अभियान पूरे देश में चल रहा है, जिसकी शुरुआत पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और गृहमंत्री अमित शाह ने जम्मू-कश्मीर के पूर्व राज्यपाल जगमोहन के साथ मिलकर की हे। जन जागरण अभियान के तहत जिला स्तर पर कार्यक्रम आयोजित कर दिल्ली को लोगों को बताया जाएगा कि केंद्र सरकार के इस ऐतिहासिक कदम से कश्मीर के लोगों और पूरे देश को कितना लाभ होने वाला है।
नई दिल्ली, 21 जुलाई 2019, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के राज्यसभा सदस्य डी राजा को पार्टी का महासचिव बनाया गया है. उन्होंने निवर्तमान महासचिव एस सुधाकर रेड्डी का स्थान लिया है. उनके महासचिव बनने की पुष्टि खुद एस सुधाकर रेड्डी ने की है. एस सुधाकर रेड्डी ने बताया कि राज्यसभा सदस्य डी राजा को CPI का महासचिव चुना गया है. शनिवार को ही डी राजा के महासचिव बनने की पुष्टि हो गई थी. राष्ट्रीय परिषद ने बैठक में पहले ही डी राजा को महासचिव बनाए जाने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी. जिसके बाद ऐलान की औपचारिकता भर रह गई थी. बता दें कि हाल ही में हुए 2019 लोकसभा चुनाव में CPI को करारी हार का सामना करना पड़ा था, जिसके बाद पार्टी के महासचिव रेड्डी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था. इस्तीफे की वजह पूछे जाने पर उन्होंने कहा था कि स्वास्थ्य कारणों ने इस्तीफे दे रहा हूं. CPI के एक नेता ने बताया कि 18 से 20 जुलाई तक आयोजित पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी और राष्ट्रीय परिषद की बैठक में लोकसभा चुनाव परिणाम की राज्यवार समीक्षा की गई. इसी दौरान नए महासचिव के चुनाव के मुख्य एजेंडे पर भी बात हुई. उन्होंने पार्टी की कार्यकारिणी द्वारा रेड्डी का इस्तीफा स्वीकार कर लिए जाने की पुष्टि करते हुए बताया कि स्वास्थ्य संबंधी कारणों से उन्हें पार्टी के दायित्वों से सेवानिवृत्ति दी गई है.
नई दिल्ली, 20 जून 2019, राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने गुरुवार को संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित किया. राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में मोदी सरकार 2.0 के एजेंडे को देश के सामने रखा. लेकिन कांग्रेस पार्टी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण को प्रेरित करने वाला नहीं बताया. हालांकि इस बीच कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के मोबाइल फोन पर लगे रहने और बात करने के मुद्दे ने सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी. इस पर अब आनंद शर्मा ने सफाई दी है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी राष्ट्रपति के अभिभाषण के दौरान फोन का इस्तेमाल और बात करते हुए देखा गया था. इस पर आनंद शर्मा ने कहा कि ये सभी गलत आरोप हैं, उन्होंने पूरा भाषण बड़े ही ध्यान से सुना. आनंद शर्मा ने कहा कि अभिभाषण में कुछ हिंदी के शब्द ऐसे थे, जिन्हें राहुल गांधी समझ नहीं पा रहे थे. इसलिए वह लगातार उन शब्दों के बारे में पूछ रहे थे. अभिभाषण के वक्त मैं उनके साथ ही था. यहां वीडियो में देखें आनंद शर्मा की प्रेस कॉन्फ्रेंस गौरतलब है कि गुरुवार को राहुल गांधी को अभिभाषण के दौरान मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हुए देखा गया. जिस पर सोशल मीडिया पर उन्हें काफी ट्रोल किया जा रहा था. कांग्रेस नेता आनंद शर्मा ने कहा कि भाषण में बेरोजगारी के मुद्दे पर कोई भी बात नहीं की गई है. आनंद शर्मा बोले कि देश में बेरोजगारी का आंकड़ा बढ़ रहा है. मोदी सरकार ने पिछले कार्यकाल में जो वादे किए थे उन्हें पूरा नहीं किया गया है. जिनका जिक्र राष्ट्रपति के अभिभाषण में नहीं किया गया है. आपको बता दें कि राष्ट्रपति ने अपने करीब एक घंटे के भाषण में मोदी सरकार के एजेंडे को देश के सामने रखा. इस दौरान उन्होंने विकास, न्यू इंडिया, सरकार के कामकाज पर फोकस किया. राष्ट्रपति ने अपने भाषण में राफेल विमान का भी जिक्र किया था, जिस पर राहुल गांधी ने कहा था कि वह अपनी बात पर अडिग हैं, वह अब भी मानते हैं कि राफेल विमान सौदे में चोरी हुई थी.
नई दिल्ली, 18 जून 2019, लोकसभा चुनाव में करारी पराजय झेलने के बाद लगता है कि कांग्रेस हौसला भी हार गई है. इसी का नतीजा है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी तमाम मान-मनौव्वल के बावजूद अध्यक्ष पद से इस्तीफे को लेकर अडिग हैं. राहुल का विकल्प कांग्रेस अभी तलाश नहीं सकी है, जबकि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की अगुवाई में बीजेपी ने पहले से बड़ी जीत दर्ज कर सत्ता में वापसी की है. शाह के केंद्रीय गृह मंत्री बनने के बाद बीजेपी कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा को बना दिया गया है. इस तरह से बीजेपी के पास अब दो-दो अध्यक्ष हो गए हैं और कांग्रेस के पास एक भी नहीं है. ऐसे में सवाल है कि इतनी लचर तैयारी के साथ बीजेपी का मुकाबला कांग्रेस कैसे करेगी? 6 महीने तक रहेंगे राष्ट्रीय अध्यक्ष दिल्ली में सोमवार को बीजेपी संसदीय बोर्ड की बैठक में जेपी नड्डा को कार्यकारी अध्यक्ष बनाने का फैसला लिया गया. हालांकि अमित शाह ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा नहीं दिया है. ऐसे में माना जा रहा है कि अमित शाह अगले 6 महीने तक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रहेंगे. अमित शाह के साथ मिलकर ही जेपी नड्डा पार्टी का काम काज देखेंगे. विधानसभा चुनाव तक अध्यक्ष बने रहने की मांग दरअसल बीजेपी संसदीय बोर्ड की बैठक में अमित शाह ने कहा कि उनके पास केंद्रीय गृह मंत्रालय की भी जिम्मेदारी है. इसलिए पार्टी अध्यक्ष का पद किसी अन्य व्यक्ति को दिया जाना चाहिए, क्योंकि पार्टी को पर्याप्त समय देने में असमर्थ रहेंगे. इसी के बाद जेपी नड्डा को कार्यकारी अध्यक्ष की कमान दी गई है. हालांकि बोर्ड के सदस्यों ने अमित शाह से तब तक अध्यक्ष बने रहने का आग्रह किया जब तक बीजेपी सदस्यता अभियान और आगामी विधानसभा चुनाव समाप्त नहीं हो जाता. पार्टी नेता बोले- राहुल नहीं तो कोई और नहीं वहीं, लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार की जिम्मेदारी लेते हुए राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया तो पार्टी में हंगामा मच गया. कांग्रेस के तमाम वरिष्ठ नेताओं ने राहुल को पद पर बने रहने और इस्तीफा वापस लेने के लिए कई बार मनाया, लेकिन वह अपने फैसले पर पूरी तरह से कायम है. जबकि पार्टी नेता लगातार यह कह रहे हैं कि राहुल नहीं तो कोई और नहीं. राहुल की जगह कौन, अब तक फैसला नहीं राहुल के इस्तीफा दिए हुए करीब एक महीना होने जा रहा है. कांग्रेस के सीडब्ल्यूसी की कई बैठकें होने के बाद भी राहुल की जगह अध्यक्ष पद के लिए किसी दूसरे नेता की तलाश पूरी नहीं हो सकी है. जबकि कांग्रेस के सीनियर नेताओं की बैठक में पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटनी और केसी वेणुगोपाल को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव रखा गया था जिसको इन दोनों नेताओं ने निजी कारण बताते हुए ठुकरा दिया था. इसके अलावा अध्यक्ष के लिए कई नाम और भी मीडिया में आए थे, लेकिन किसी पर अभी मुहर नहीं लग सकी है. आज नहीं तो कल, राहुल ही अध्यक्ष! इसका नतीजा है कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं के साथ पिछले दिनों हुई अनौपचारिक बैठक के बाद पार्टी के प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा था कि राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष थे, हैं और रहेंगे. हमें इसे लेकर कोई संदेह नहीं है. इसका मतलब साफ है कि आज नहीं तो कल राहुल ही कांग्रेस के अध्यक्ष रहेंगे. फिलहाल कांग्रेस बिना अध्यक्ष के चल रही है.
लखनऊ 'जिस सेना का सेनापति कन्फ्यूज होता है, वह सेना हार ही जाती है महाराज। हमारे सेनापति आखिर तक यह तय नहीं कर पाए कि कार्यकर्ताओं को लड़ाना है या पैराशूट प्रत्याशियों को। यही कन्फ्यूजन पार्टी की इस बुरी हार का कारण बना। पार्टी की मजबूती के लिए अब प्रयोग बंद कीजिए।' शुक्रवार को लोकसभा चुनाव में हार की समीक्षा के दौरान कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने पश्चिमी यूपी के प्रभारी ज्योतिरादित्य सिंधिया के सामने ऐसे ही खरी-खरी सुनाई। ज्‍योतिरादित्‍य के साथ जहां प्रभारी सचिव रोहित चौधरी और प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर मौजूद थे, वहीं पार्टी के कई वरिष्‍ठ नेताओं ने इस बैठक से किनारा कर लिया। हालांकि, राज बब्बर भी पश्चिमी यूपी की फतेहपुर सीट से पार्टी के प्रत्याशी थे और उन्हें भी हार का सामना करना पड़ा। 30 जून तक सभी राज्यों के प्रभारियों को समीक्षा रिपोर्ट एआईसीसी को सौंपनी है। इस बैठक से जो बड़े कांग्रेस नेता गायब रहे, उनमें जितिन प्रसाद, इमरान मसूद, सलमान खुर्शीद और श्री प्रकाश जायसवाल शामिल हैं। कई कांग्रेस नेताओं ने दावा किया कि दिल्‍ली-एनसीआर के नजदीक के प्रत्‍याशियों को दिल्‍ली में एक अन्‍य मीटिंग में हिस्‍सा लेना था, इसलिए वे नहीं आए हैं। इस बैठक में भाग लेने वाले 28 प्रत्‍याशियों में से एक ने कहा, 'अनुपस्थित रहने वाले बड़े नेताओं के साथ पार्टी अलग व्‍यवहार क्‍यों करती है। लखनऊ दिल्‍ली से दूर नहीं है। हम भी दिल्‍ली जा सकते थे।' बैठक के बाद ज्‍योतिरादित्‍य ने ट्वीट कर कहा, 'कार्यकर्ताओं की बात से मैं पूरी तरह सहमत हूं कि यूपी में 2022 विधानसभा चुनाव जीतने के लिए संगठन को मजबूत करना बेहद आवश्यक है।' एक-दूसरे पर फोड़ा हार का ठीकरा दोपहर 11:30 बजे से शुरू हुई बैठक शाम साढ़े पांच बजे तक चली। इस दौरान प्रभारी महासचिव और प्रभारी सचिव ने प्रत्याशियों और पार्टी नेताओं से बात की। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, कई नेताओं ने पार्टी नेतृत्व तक को नहीं बख्शा। अधिकतर प्रत्याशियों ने हार का कारण बताते हुए कहा कि उनके यहां पार्टी का संगठन था ही नहीं। जहां संगठन था, वहां मदद नहीं की गई। जिला और शहर अध्यक्षों का कहना था कि प्रत्याशी ने चुनाव के दौरान संगठन को तवज्जो ही नहीं दी। इसके बाद भी वह पार्टी के नाते प्रचार में लगे रहे। यही अनदेखी हार का कारण बनी। बैठक से निकलकर बरेली के प्रत्याशी रहे प्रवीण सिंह ने मीडिया के सामने कहा कि संगठन कमजोर रहा। मिसरिख से प्रत्याशी रहीं मंजरी राही ने आरोप लगाया कि जो संगठन में हैं, उनकी सोच कांग्रेसी नहीं है। बहराइच की प्रत्याशी सावित्री बाई फुले ने भी हार का कारण संगठन का कमजोर होना बताया। पश्चिमी यूपी में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद खराब कांग्रेस महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया के हिस्से में यूपी की 39 लोकसभा सीटें आती हैं। पश्चिमी यूपी में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद खराब रहा और पार्टी यहां कोई सीट नहीं जीत पाई। हालांकि, कांग्रेस का प्रदर्शन पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी ठीक नहीं रहा। रायबरेली छोड़ कांग्रेस अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी की परंपरागत अमेठी सीट भी हार गई। ज्योतिरादित्य पश्चिमी यूपी की 39 में 14 सीटों की समीक्षा पिछले दिनों दिल्ली में कर चुके हैं। बाकी 25 सीटों की समीक्षा के लिए कांग्रेस नेताओं, प्रत्याशी, जिला और शहर अध्यक्षों के साथ लोकसभा को-ऑर्डिनेटरों को भी लखनऊ बुलाया गया था। इस दौरान धौरहरा से जितिन प्रसाद और सीतापुर से कैसरजहां को छोड़ कर बाकी सभी 23 प्रत्याशी मौजूद रहे।
नई दिल्ली, 14 जून 2019,मनमोहन सिंह का शुक्रवार (14 जून) को राज्यसभा सांसद का कार्यकाल खत्म हो गया. वह असम से लगातार पांचवीं बार राज्यसभा सदस्य बने थे. 15 जून 2013 से छह साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद फिलहाल उनकी संसदीय राजनीतिक पर ब्रेक लग गया है. असम में पर्याप्त विधायक न होने के कारण कांग्रेस इस हैसियत में नहीं रही कि उन्हें फिर से राज्यसभा भेज सके. असम में खाली हुई दो राज्यसभा सीटों पर इसी साल मई में चुनाव हुए थे, जिसमें सत्ताधारी बीजेपी की अगुवाई वाला एनडीए अपने उम्मीदवार जिताने में सफल रहे. इसमें मनमोहन सिंह की भी सीट शामिल रही. असम की दो राज्यसभा सीटों में एक बीजेपी और दूसरी सीट सहयोगी असम गण परिषद (अगप) के खाते में गई. कांग्रेस सूत्र बता रहे हैं कि अभी यह नहीं मान लेना चाहिए कि मनमोहन सिंह का संसदीय करियर खत्म हो गया. आगामी समय में राज्यसभा चुनाव का मौका आने पर पार्टी उन्हें किसी ऐसे राज्य से उच्चसदन में भेज सकती है, जहां पार्टी के विधायकों की संख्या पर्याप्त हो. हालांकि इसके लिए डॉ. मनमोहन सिंह को इंतजार करना पड़ेगा. मनमोहन सिंह का कार्यकाल ऐसे वक्त पर खत्म हुआ है, जबकि तीन दिन बाद ही 17 जून से संसद का बजट सत्र शुरू होने जा रहा है. ऐसे में मनमोहन सिंह संसद में भाषण नहीं दे पाएंगे. कब मिल सकता है मौका मनमोहन सिंह के बयानों को आज भी मीडिया में गंभीरता से लेता है. संसद में भी उनका भाषण पार्टी के लिए महत्वपूर्ण होता है. सूत्र बता रहे हैं कि कांग्रेस उन्हें उच्च सदन में आगे भेजने की तैयारी में है. मगर इसके लिए मनमोहन सिंह को अप्रैल, 2020 तक इंतजार करना पड़ सकता है. जब हरियाणा, महाराष्ट्र, असम, झारखंड, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश से राज्य सभा की करीब 55 सीटें खाली होने वाली है. राजस्थान में पार्टी सत्ता में है. ऐसे में कांग्रेस उन्हें 2020 में राजस्थान या अन्य किसी राज्य से उच्चसदन भेजने की कोशिश करेगी, जहां से जीत पक्की होगी. यह भी कहा जा रहा है कि इससे पहले तमिलनाडु आदि राज्यों में राज्यसभा चुनाव के दौरान अन्य दल भी मनमोहन सिंह के सम्मान में कांग्रेस को एक सीट दे सकते हैं. बता दें कि मनमोहन सिंह पहली बार असम से ही 1991 में चुन कर राज्यसभा पहुंचे थे. इसके बाद लगातार वह 1995, 2001, 2007 में असम से ही उच्च सदन पहुंचते रहे. हालांकि 1999 में दक्षिण दिल्ली से लोकसभा चुनाव में भी वह उतरे थे, मगर बीजेपी नेता विजय कुमार मल्होत्रा से हार गए थे. 2013 में जब कांग्रेस की तरुण गोगोई सरकार थी, तब वह लगातार पांचवी बार राज्यसभा सदस्य बने थे. मनमोहन सिंह और उनकी पत्नी गुरशरण कौर का नाम असम की राजधानी दिसपुर की वोटर लिस्ट में दर्ज है.
नई दिल्ली, 14 जून 2019, दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी के चेयरमैन रोहित मनचंदा ने दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी पीसी चाको पर लिफ्ट से धक्का देने का आरोप लगाते हुए इस्तीफे की मांग की है. रोहित का कहना है कि वो चाको के स्वागत के लिए दिल्ली प्रदेश की दूसरे तल पर लिफ्ट के बाहर खड़े थे, लेकिन बकौल रोहित चाको ने उन्हें धक्के मारकर हटा दिया और कहा कि आप कांग्रेस कार्यालय में नहीं आ सकते. रोहित मनचंदा ने पीसी चाको के तत्काल इस्तीफे की मांग की और चाको की शिकायत शीला दीक्षित से करने की बात कही. रोहित का आरोप है कि चाको के नेतृत्व में दिल्ली में सारे चुनाव कांग्रेस हारी ऐसे में जब राहुल गांधी इस्तीफे की बात करते हैं तो पीसी चाको को भी इस्तीफा दे देना चाहिए. इस बाबत उन्होंने 6 जून को सोशल मीडिया पर एक वीडियो भी बनाया था. हालांकि पीसी चाकू से जब इस बाबत पूछा गया तो उन्होंने इस घटना को ही नकार दिया और कहा कि जिसने आपको बताया है उससे जाकर पूछिए दिल्ली में कांग्रेस की करारी हार गौरतलब है कि दिल्ली में लोकसभा की सातों सीटों पर कांग्रेस पार्टी चुनाव हार गए, हालांकि विधानसभा वार कांग्रेस दूसरे नंबर पर रही. देश में लोकसभा चुनाव हारने के बाद जहां पर राहुल गांधी ने इस्तीफे की पेशकश की, वहीं पर दिल्ली प्रदेश कांग्रेस ऑफिस में रह-रहकर कार्यकर्ताओं का गुस्सा शीर्ष नेतृत्व के लिए वक्त वक्त पर झलकता है.
नई दिल्ली, 13 जून 2019, लोकसभा चुनाव में प्रचंड जीत और सरकार के गठन के बाद भारतीय जनता पार्टी अपने अगले मिशन में जुट गई है. केंद्रीय गृह मंत्री और भारतीय जनता पार्टी (BJP) अध्यक्ष अमित शाह आज पार्टी की राज्य इकाईयों के साथ बैठक कर रहे हैं और वह पार्टी में होने वाले संगठन के चुनाव पर मंथन करेंगे. इस बैठक में सभी राज्यों के प्रमुख, महामंत्री और राज्य प्रभारी शामिल हो रहे हैं. बैठक में इस बात पर भी नज़र रहेगी कि बीजेपी का अगला अध्यक्ष कौन बनेगा. क्योंकि अमित शाह अब सरकार में गृह मंत्री हैं और बीजेपी हमेशा एक व्यक्ति एक पद की नीति पर चलती रही है. सवाल है कि क्या अमित शाह पार्टी अध्यक्ष का पद छोड़ेंगे या फिर दोनों पदों को साथ रखेंगे. साथ ही उत्तर प्रदेश और बिहार के प्रदेश अध्यक्ष को लेकर भी मंथन होना है. क्योंकि यूपी के प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र नाथ पांडेय और बिहार के नित्यानंद राय अब मोदी कैबिनेट का हिस्सा हैं. इसलिए एक व्यक्ति एक पद वाला नियम यहां भी लागू हो सकता है. बता दें कि 2019 के लोकसभा चुनाव की वजह से पिछले साल सितंबर, 2018 में होने वाले पार्टी के चुनाव टाल दिए गए थे. तब पार्टी ने तय किया था कि पद पर रहने वाले सभी लोग चुनाव नतीजों तक अपना काम जारी रखेंगे. इसको लेकर एक प्रस्ताव पास किया गया था. सत्ता में आने के बाद भी बीजेपी अपने विस्तार की ओर कदम बढ़ा रही है. इस बैठक में बीजेपी के सदस्यता अभियान की रूप रेखा तय की जाएगी. सदस्यता अभियान के बाद ही सभी राज्यों में संगठन चुनाव होंगे. इसके लिए अमित शाह ने अलग से 18 जून को महासचिवों की बैठक बुलाई है. जिसमें सभी महासचिवों को सदस्यता अभियान की ज़िम्मेदारी दी जाएगी, साथ ही अगली राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक तारीख और स्थान तय किया जाएगा. बैठक में इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव पर भी मंथन होगा. महाराष्ट्र, झारखंड और हरियाणा में विधानसभा चुनाव होने हैं. सूत्रों की मानें तो चुनाव की वजह से इन राज्यों के संगठन चुनाव भी टाले जा सकते हैं.
नई दिल्ली, 12 जून 2019, लोकसभा चुनाव 2019 में नरेंद्र मोदी की 'सुनामी'' में कांग्रेस को मिली करारी हार ने पार्टी नेताओं को अंदर तक हिलाकर रख दिया है. राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा वापस न लेने पर अड़े रहने की स्थिति में पार्टी के वरिष्ठ नेता एक कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने के मॉडल को अंतिम रूप दे रहे हैं. राहुल के विकल्प के लिए बुधवार को पार्टी के वरिष्ठ नेता एके एंटनी की अध्यक्षता में बैठक हो रही है. इसमें सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया से लेकर प्रियंका गांधी और अशोक गहलोत सहित कई नाम शामिल हैं. जिनमें से किसी एक को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया जा सकता है. दरअसल कांग्रेस में नए कार्यकारी अध्यक्ष की नियुक्ति कर पार्टी राहुल गांधी के कंधों से काम के कुछ बोझ को कम कर सकेगी. इसके अलावा कार्यकारी अध्यक्ष जहां दिन-प्रतिदिन के काम पर फोकस रखेंगे तो वहीं राहुल गांधी पार्टी का कायाकल्प करने की कोशिशों और बड़े लक्ष्य की ओर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं. यही वजह है कि राहुल के नए उत्तराधिकारी के नाम को लेकर पार्टी में लगातार मंथन हो रहा है. सचिन पायलट कांग्रेस को करीबी से देखने वालों के अनुसार कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष के तौर पर सचिन पायलट का नाम सबसे आगे है. पायलट मुखर वक्ता और जमीन से जुड़े हुए नेता के तौर पर जाने जाते हैं. वह 41 साल के हैं और युवाओं को पार्टी से जोड़ने में अहम भूमिका निभा सकते हैं. इसके अलावा उन्हें कांग्रेस के वफादार के तौर पर भी जाना जाता है और पार्टी के दिग्गज नेता रहे स्वर्गीय राजेश पायलट के बेटा हैं. बता दें कि 2013 में कांग्रेस को राजस्थान में मिली करारी हार के बाद पार्टी को दोबारा से खड़ा करने के लिए सचिन पायलट को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर राजस्थान भेजा गया था. पायलट की पांच साल की मेहनत का नतीजा था कि 2018 के विधानसभा चुनाव में उनके चेहरे के सहारे कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की, लेकिन पार्टी आलाकमान ने मुख्यमंत्री पद का ताज अशोक गहलोत के सिर सजा दिया और सचिन पायलट को डिप्टी सीएम बनाया गया. सचिन पायलट को राहुल का करीबी माना जाता है. ऐसे में उनकी कांग्रेस कार्यकारी अध्यक्ष के तौर पर नियुक्ति होती है तो वह पार्टी के कायाकल्प में अहम रोल अदा कर सकते हैं. अशोक गहलोत राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का नाम भी कार्यकारी अध्यक्ष की दौड़ में है. राहुल गांधी के लिए गहलोत उतना ही विश्वासपात्र हैं जितना सोनिया गांधी के लिए अहमद पटेल रहे हैं. कांग्रेस में गहलोत की स्वीकार्यता है. कैप्टन अमरिंदर सिंह, कमलनाथ और अशोक चव्हाण जैसे क्षेत्रीय क्षत्रपों के साथ उनका जबरदस्त तालमेल है. गहलोत को एक हार्डकोर संगठन मैन के रूप में देखा जाता है. एक मुख्यमंत्री और सांसद होने के अलावा, गहलोत ने कई पदों पर कार्य किया है, जिसमें प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष और अखिल भारतीय कांग्रेस के महासचिव से लेकर संगठन महासचिव में अपना योगदान दिया है. गहलोत 2017 में गुजरात विधानसभा चुनाव में प्रभारी थे, जहां बीजेपी को जीतने में कांग्रेस ने नाको चने चबवा दिए थे. इसके अलावा पिछले साल कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस सरकार बनवाने में अहम भूमिका अदा की थी. ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया काम नाम भी है. सिंधिया का बहुत बड़ा राजनीतिक कद नहीं है, ऐसे में गांधी-नेहरू परिवार के लिए उपयुक्त और फिट बैठ सकते हैं. लेकिन लोकसभा चुनाव में उनका जिस तरह से प्रदर्शन रहा है, उसे देखते हुए उनकी राह में मुश्किल हो सकती है. सिंधिया यूपी के प्रभारी थे, जहां पार्टी ने काफी खराब प्रदर्शन किया और खुद भी गुना सीट पर हार गए हैं. इससे भी बड़ी बात यह है कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस के गुटबाजी का एक केंद्र माने जाते हैं. कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया में से कोई हाई कमान के करीब जाता दिखेगा तो दूसरा गुट उसकी राह में रोड़ा अटकाएगा. प्रियंका गांधी वाड्रा कांग्रेस कार्यकारी अध्यक्ष के तौर पर प्रियंका गांधी वाड्रा का नाम रेस में है, गांधी-नेहरू परिवार के लिहाज से यह नाम एकदम सही विकल्प है. ऐसे में कांग्रेस के नेता दूसरे गांधी के हाथों में कमान दिए जाने का स्वागत कर सकते हैं. प्रियंका गांधी में बहुत कुछ है. वह युवा हैं और कार्यकर्ताओं से सीधे जुड़ती हैं और सबसे अच्छी बात यह है कि हाजिर जवाबी हैं लेकिन लोकसभा चुनाव में कोई खास प्रभाव नहीं दिखा सकी हैं. प्रियंका ज्यादातर अपनी मां सोनिया गांधी और भाई राहुल गांधी के संसदीय क्षेत्र में ही सक्रिय रही हैं. ऐसे में सवाल यह है कि क्या वह एक पूर्णकालिक राजनेता बनने की इच्छुक होंगी? प्रियंका गांधी की राह में दूसरी बाधा यह है कि उनके पति रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ आर्थिक अपराध के मामले चल रहे हैं. इन सारे आरोपों को लेकर बीजेपी वाड्रा के बहाने गांधी परिवार को घेरते रही है. ऐसे में क्या प्रियंका गांधी कांग्रेस की कमान संभालेंगी.इसके अलावा कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रियंका को अध्यक्ष बनाए जाने के खिलाफ हैं. कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष के तौर पर इन चार नामों के अलावा भी कई नाम हैं. इनमें जयराम रमेश, अहमद पटेल, गुलाम नबी आजाद और दिग्विजय सिंह शामिल हैं. ऐसे पार्टी एक कार्यकारी अध्यक्ष का चुनाव करने का फैसला करती है तो किसे चुना जाएगा? यह देखा जाना दिलचस्प होगा.
नई दिल्ली बीजेपी को मिली बंपर जीत ने राजनीतिक पंडितों को अपने 'समीकरणों' पर फिर से विचार करने पर मजबूर कर दिया है। बीजेपी ने भी इस जीत के लिए कई नए कदम उठाए। बीजेपी ने इस बार राज्यवार इलाकों पर ध्यान दिया और मजबूत पकड़ बनाई। बीजेपी शुरू से ही इस रणनीति पर काम कर रही थी कि राज्य के स्तर पर अच्छा प्रदर्शन करेंगे तो केंद्र में बड़ी जीत मिल सकती है। पहली बार ऐसा हुआ है कि जब किसी गैर-कांग्रेसी सरकार को इतना बड़ा जनादेश मिला हो। बीजेपी की यह जीत इंदिरा गांधी की 1971 की जीत के लगभग बराबर है। बीजेपी ने 13 राज्यों में खुद के दम पर और तीन राज्यों (यूपी, महाराष्ट्र और बिहार) में सहयोगियों दम पर 50 प्रतिशत से भी ज्यादा वोट हासिल किए हैं। जैसी जीत बीजेपी को मिली है, वैसी जीत अब तक इतिहास में सिर्फ तीन बार देखने को मिली। 1971 में, जब कांग्रेस को 12 राज्यों में 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले और पार्टी 518 में से 352 लोकसभा सीटें जीतने में कामयाब रहीं। 1980 में, इंदिरा कांग्रेस ने 542 में से 353 सीटें हासिल की और 13 राज्यों में 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट हासिल किए थे। इसके बाद 1984 में, जब राजीव गांधी के नेतृत्व में आज तक की सबसे बड़ी जीत हासिल की। इस चुनाव में कांग्रेस 404 सीटों पर विजयी रही थी और 17 राज्यों में उसे 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिले थे। अब स्थिति काफी उलट नजर आ रही है। बीजेपी इस बड़ी जीत के साथ अपने अब तक के राजनीतिक शीर्ष पर है, वहीं कांग्रेस की हालत 1990 की बीजेपी जैसी हो गई है। जिन क्षेत्रीय दलों ने 1990 से 2014 तक काफी दबदबा कायम किया, अब संघर्ष कर रहे हैं क्योंकि उनके पुराने समीकरण अब काम करते नजर नहीं आ रहे हैं। बीजेपी के लिए जादू बीजेपी को 2019 में पूरे देश से समर्थन मिला। ऐसा समर्थन कांग्रेस को 1984 में मिला था, जबकि उस दौरान बीजेपी महज 2 सीट जीत पाई थी। पार्टी को 6 राज्यों में 10% वोट मिला था, जो इस बात का इशारा था कि यदि पार्टी मेहनत करे तो इन राज्यों में होने वाले चुनाव में उसे बढ़त मिल सकती है। 1989 में बीजेपी को पहला बड़ा टर्निंग पॉइंट मिला और पार्टी को देश भर में 85 सीटें मिलीं। राज्यों पर ध्यान देते हुए देश में बड़ा समर्थन हासिल करने का फॉर्म्युला बीजेपी को तभी मिला था। पार्टी ने 1993 में नारा भी दिया था, 'आज चार प्रदेश, कल सारा देश'। उस दौरान बीजेपी को एमपी, यूपी, राजस्थान और हिमाचल में जीत हासिल की थी। क्षेत्रीय अपेक्षाएं इसमें अब कोई संदेह नहीं रह गया है कि एसपी-बीएसपी गठबंधन अब अपने खात्मे पर आ गया है। दोनों पार्टियां वोटरों पर अपनी पकड़ खत्म कर चुकी हैं। महागठबंधन का पहला प्रयोग लालू प्रसाद यादव ने बिहार में किया। 2014 के लोकसभा चुनाव में एनडीए को 39 प्रतिशत वोट मिले, जिसमें बीजेपी को 30 प्रतिशत, एलजेपी 6% और आरएलएसपी को 3% वोट मिले। यूपी को 28 प्रतिशत वोट मिले, जिसमें आरजेडी को 20 प्रतिशत और कांग्रेस को 8 प्रतिशत वोट मिले। उस चुनाव में जेडीयू अकेले मैदान में उतरी थी और 16 प्रतिशत वोट हासिल किए थे। लालू यहां थोड़े आगे निकले और अपने साथ जेडीयू को मिलाकर वोट प्रतिशत के मामले में एनडीए से आगे हो गई। इस फॉर्म्यूले ने 2015 के विधानसभा चुनाव में जबरदस्त काम किया और आरजेडी, जेडीयू, कांग्रेस के महागठबंधन में 243 में से 178 पर जीत दर्ज की है। एनडीए ने 30 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 58 सीटें जीतीं। 2019 के चुनाव ने इन सभी समीकरणों को हिलाकर रख दिया और क्षेत्रीय पार्टियों को अलग हटकर रणनीति पर विचार करने को मजबूर कर दिया। सबसे पुरानी पार्टी के लिए संदेश हालांकि 2019 में कांग्रेस ने 52 सीटें जीतीं हैं, जो 2014 में जीती 44 सीटों से ज्यादा है। माना जा रहा है कि कांग्रेस अपने सबसे बुरे दौर में गुजर रही है। 2014 की तरह 2019 में भी कांग्रेस का वोट शेयर 19.5% के आसपास ही रहा। हालांकि देश की सबसे पुरानी पार्टी होने के बावजूद कांग्रेस देश भर के कई राज्यों में खाता भी नहीं खोल पाई। कांग्रेस को 52 सीटों में से सबसे ज्यादा 31 सीटें केरल, पंजाब और तमिलनाडु से मिली हैं। इन्हीं तीन राज्यों ने कांग्रेस को 50 सीटों का आंकड़ा पार करने में मदद दी। इसके अलावा तेलंगाना में कांग्रेस को 2014 में 2 और 2019 में 3 सीटें मिली हैं, छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को 2 सीटें मिली हैं। 2018 में कांग्रेस ने एमपी, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव जीते थे। कांग्रेस को जीत के बावजूद कांग्रेस और बीजेपी का वोट प्रतिशत लगभग बराबर था। 1989 से 2014 तक कांग्रेस क्षेत्रीय पार्टियों के सहारे राज्यों और केंद्र में सत्ता के करीब रही है।
गुवाहाटी इसे राष्ट्रीय राजनीति में पूर्वोत्तर की दस्तक कहा जा सकता है। देश के इस सुदूर हिस्से की नैशनल पीपल्स पार्टी को राष्ट्रीय दल का दर्जा मिला है। पूर्व लोकसभा स्पीकर पी.ए. संगमा ने इस पार्टी की स्थापना की थी। शुक्रवार को चुनाव आयोग ने पार्टी के मुखिया कोनराड संगमा को राष्ट्रीय दल की मान्यता का प्रमाण पत्र सौंपा। हाल ही में संपन्न हुए लोकसभा और अरुणाचल प्रदेश के विधानसभा चुनावों में शानदार प्रदर्शन के चलते एनपीपी ने राष्ट्रीय दल की मान्यता के लिए जरूरी शर्तों को पूरा किया था। इसके साथ ही नैशनल पीपल्स पार्टी पूर्वोत्तर भारत का ऐसा पहला दल बन गई है, जिसे राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिला है। 2013 में पीए संगमा ने इसका गठन किया था। फिलहाल यह पार्टी मेघालय में सत्ता में है और संगमा के बेटे कोनराड संगमा सीएम हैं। अब तक एनपीपी को मेघालय, नगालैंड और मणिपुर में राज्य स्तरीय दल का दर्जा प्राप्त था। अरुणाचल प्रदेश में 5 सीटें जीतने के बाद उसे वहां भी राज्य स्तरीय दल का दर्जा मिल गया था। इसके साथ ही उसे राष्ट्रीय दल का दर्जा भी मिल गया। असल में किसी पार्टी को राष्ट्रीय दल का दर्जा मिलने के लिए जरूरी होता है कि वह 4 राज्यों में राज्य स्तरीय दल हो। ऐसे में अरुणाचल, मेघालय, मणिपुर और नगालैंड में राज्य स्तरीय दल बनने के साथ ही पार्टी को राष्ट्रीय दल का दर्जा प्रदान कर दिया गया। पार्टी को मिली इस सफलता पर खुशी जताते कोनराड संगमा ने ट्वीट किया। उन्होंने लिखा, 'यह बहुत भावुकता क्षण है कि पीए संगमा द्वारा स्थापित पार्टी को राष्ट्रीय दल का दर्जा मिला है। यह सिर्फ एनपीपी के लिए ही गौरव की बात नहीं है बल्कि समूचे पूर्वोत्तर के लिए एक उपलब्धि है।'
नई दिल्ली, 06 जून 2019,अमित शाह के गृह मंत्री बन जाने के बाद बीजेपी का नया राष्ट्रीय अध्यक्ष कौन होगा, इसपर सभी की नजरे हैं. बीजेपी में लागू एक व्यक्ति- एक पद के सिद्धांत के कारण अमित शाह का अध्यक्ष बने रहना तब तक संभव नहीं है, जब तक कि बीजेपी के संविधान में संशोधन न हो जाए. बीजेपी के सूत्र बता रहे हैं कि अगले महीने तक अध्यक्ष पद पर चुनाव हो जाएगा. हालांकि यह भी कहा जा रहा है कि साल के आखिर में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर शाह पद पर बने भी रह सकते हैं. बीजेपी के संविधान की बात करें तो कम से कम पचास प्रतिशत से अधिक प्रदेश संगठनों के चुनाव के बाद ही राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव हो सकता है. इससे पहले 2016 में हुए संगठन के चुनाव में अमित शाह तीन साल के लिए अध्यक्ष बने थे, बाद में लोकसभा चुनाव के कारण उन्हें एक साल का विस्तार मिला था. अब फिर से चुनाव की बारी है. पार्टी सूत्र बता रहे हैं कि साल के आखिर में तीन प्रमुख राज्यों महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में विधानसभा चुनाव हैं. ऐसे में या तो पार्टी इन चुनावों तक किसी को कार्यकारी अध्यक्ष बना सकती है या फिर अगले कुछ महीनों के भीतर राज्यों में कार्यकारिणी का चुनाव कराकर राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर भी पार्टी सर्वसम्मति से मनोनयन कर सकती है. माना जा रहा है कि अगर पार्टी ने कुछ ही महीनों के बाद होने जा रहे तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर किसी का नाम फिलहाल कार्यकारी अध्यक्ष के तौर पर आगे बढ़ाया तो यह संकेत होगा कि आगे उसे ही पार्टी के पूर्णकालिक अध्यक्ष की कमान दी जाएगी. आखिर 11 करोड़ से अधिक सदस्यों वाली दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी का संगठन कैसे चलता है, कैसे होता है राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव. जानिए बीजेपी के संविधान के हवाले से इन सवालों का जवाब. ऐसे बनते हैं राष्ट्रीय अध्यक्ष बीजेपी के संविधान में धारा 19 के तहत राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव की व्यवस्था है. चुनाव एक निर्वाचक मंडल की ओर से होगा. जिसमें राष्ट्रीय परिषद और प्रदेश परिषदों के वर्णित सदस्य होंगे. चुनाव राष्ट्रीय कार्यकारिणी से निर्धारित नियमों के अनुसार होगा. राष्ट्रीय अध्यक्ष वही होगा, जो कम से कम चार अवधियों तक सक्रिय सदस्य रहने के साथ न्यूनतम 15 वर्ष तक पार्टी का प्राथमिक सदस्य रहा हो. निर्वाचक मंडल में से कुल 20 सदस्य राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के चुनाव की योग्यता रखने वाले व्यक्ति के नाम का प्रस्ताव रखेंगे. शर्त है कि यह संयुक्त प्रस्ताव कम से कम पांच प्रदेशों से भी आना जरूरी है. जहा राष्ट्रीय परिषद के चुनाव संपन्न हो चुके हों. कार्यकाल धारा 21 के मुताबिक कोई भी व्यक्ति तीन-तीन वर्ष के दो कार्यकाल तक ही अध्यक्ष रह सकता है. प्रत्येक कार्यकारिणी, परिषद, समिति और उसके पदाधिकारियों तथा सदस्यों के लिए भी तीन वर्ष की अवधि तय की गई है. सदस्यता की शर्तें उम्र 18 वर्ष या अधिक होनी चाहिए. दूसरे राजनीतिक दल से जुड़ाव नहीं होना चाहिए. निर्धारित शुल्क देने के बाद छह साल तक सदस्यता प्रभावी रहेगी.एक से अधिक स्थानों पर कोई सदस्य नहीं बन सकता. सदस्यों से प्राप्त शुल्क का हर तीन साल बाद कई इकाइयों में बंटवारा होता है. कुल शुल्क का राष्ट्रीय इकाई को 10 प्रतिशत, प्रदेश को 15, जिला को 25 और मंडल को 50 प्रतिशत हिस्सा जाता है. कौन होता है सक्रिय सदस्य पार्टी का सक्रिय सदस्य उसे माना जाएगा, जिसे पार्टी का सदस्य बने कम से कम तीन वर्ष का समय हो गया हो. सक्रिय सदस्यों के लिए आवेदन पत्र के साथ सौ रुपये पार्टी कोष में जमा करना जरूरी है. उसे पार्टी के आंदोलनात्मक कार्यक्रमों में भी शामिल होना होगा. मंडल समिति या उससे ऊपर किसी समिति का चुनाव लड़ने या सदस्य बनने का हक सिर्फ सक्रिय सदस्य को ही होगा. बीजेपी का संगठनात्मक ढांचा बीजेपी का पूरा संगठन राष्ट्रीय से लेकर स्थानीय स्तर तक तकरीबन सात भागों में बंटा है. राष्ट्रीय स्तर पर राष्ट्रीय परिषद और राष्ट्रीय कार्यकारिणी, प्रदेश स्तर पर प्रदेश परिषद और प्रदेश कार्यकारिणी होतीं हैं. इसके बाद क्षेत्रीय समितियां, जिला समितियां, मंडल समितियां होती हैं. फिर ग्राम और शहरी केंद्र होते हैं और स्थानीय समितियों का भी गठन होता है. स्थानीय समिति पांच हजार से कम की जनसंख्या पर गठित होती है. क्या है राष्ट्रीय परिषद इसमें पार्टी के संसद सदस्यों में से 10 प्रतिशत सदस्य चुने जाते हैं, जिनकी संख्या दस से कम न हो. यदि संसद सदस्यों की कुल संख्या दस से कम हो तो सभी चुने जाएंगे. परिषद में पार्टी के सभी भूतपूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष, प्रदेशों के अध्यक्ष, लोकसभा, राज्यसभा में पार्टी के नेता, सभी प्रदेशों की विधानसभाओं और विधान परिषदों में पार्टी नेता सदस्य होंगे. इसके अलावा राष्ट्रीय अध्यक्ष की ओर से अधिक से अधिक 40 सदस्य नामांकित किए जा सकते हैं. राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सभी सदस्य भी इसमें शामिल होते हैं. विभिन्न मोर्चो और प्रकोष्ठों के अध्यक्ष और संयोजक भी सदस्य होते हैं. सभी को 100 रुपये का सदस्यता शुल्क देना पड़ता है. राष्ट्रीय कार्यकारिणी राष्ट्रीय कार्यकारिणी में अध्यक्ष तथा अधिक से अधिक 120 सदस्य होंगे. जिनमें कम से कम 40 महिलाएं और 12 अनुसूचित जाति-जनजाति के सदस्य होंगे, जो अध्यक्ष मनोनीत करेंगे. अध्यक्ष की ओर से राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्यों में से अधिकतम 13 उपाध्यक्ष, नौ महामंत्री, एक महामंत्री (संगठन), अधिक से अधिक 15 मंत्री और एक कोषाध्यक्ष मनोनीत किया जाता है. कार्यकारिणी के सदस्य वे व्यक्त होंगे जो कम से कम तीन अवधियों तक सक्रिय सदस्य होंगे. विशेष हालात में राष्ट्रीय अध्यक्ष अधिकतम 15 सदस्यों को इससे छूट दे सकते हैं. राष्ट्रीय अध्यक्ष अपनी कार्यसमिति में कम से कम 25 प्रतिशत नए सदस्यों को स्थान देंगे. राष्ट्रीय कार्यकारिणी में विशेष आमंत्रित सदस्यों की संख्या 30 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी. राष्ट्रीय, प्रादेशिक तथा जिलास्तरो पर पूर्णकालिक कार्यकर्ता को ही महामंत्री(संगठन) के पद पर नियुक्त किया जाएगा. पद मुक्त होने के दो साल बाद ही वह किसी भी चुनाव में भाग लेने के लिए अर्ह होंगे. संसदीय बोर्ड पार्टी की संसदीय गतिविधियों के संचालन और समन्वय के लिए राष्ट्रीय कार्यकारिणी एक संसदीय बोर्ड का गठन करती है. संसदीय बोर्ड ही इससे जुड़े नियम बनाता है. पार्टी अध्यक्ष के अतिरिक्त इसमें दस सदस्य होते है. इसमें से एक सदस्य संसद में पार्टी का नेता होगा. राष्ट्रीय अध्यक्ष बोर्ड के प्रमुख होते हैं.अध्यक्ष पार्टी के महामंत्रियों में से एक को संसदीय बोर्ड का सचिव नियुक्त करता है. संसदीय बोर्ड को मंत्रिमंडल गठन पर मार्गदर्शन करने, विधानमंडल और संसदीय दल की गतिविधियों की निगरानी करने, अनुशासन भंग के मामले मे विचार करने का अधिकार होगा. केंद्रीय चुनाव समिति राष्ट्रीय कार्यकारिणी केंद्रीय चुनाव समिति का गठन करेगी. जिसमें संसदीय बोर्ड के सदस्यों के अलावा समिति के लिए निर्वाचित आठ सदस्य होंगे. महिला मोर्चा की अध्यक्ष पदेन सदस्य होंगी. यह समिति संसद और विधानमंडलो के लिए उम्मीदवारों के चयन को अंतिम रूप देती है. चुनाव अभियानों का भी संचालन करती है. पूर्ण और विशेष अधिवेशन बीजेपी के संविधान के मुताबिक पार्टी का पूर्ण अधिवेशन एक सत्र में एक बार होगा. अध्यक्ष की अध्यक्षता में होने वाले अधिवेशन में राष्ट्रीय, प्रदेश परिषद के सभी सदस्य, संसद सदस्य, विधायक शामिल होंगे. पार्टी का विशेष अधिवेशन तब होगा जब राष्ट्रीय कार्यकारिणी ऐसा निश्चत करे. राष्ट्रीय परिषद के कम से कम एक तिहाई सदस्य अनुरोध करें.. पूर्ण या विशेष अधिवेशन में लिए गए निर्णय पार्टी की सभी इकाइयों और सदस्यों पर लागू होंगे. प्रदेश चुनाव समिति प्रदेश कार्यकारिणी आवश्यक नियम बनाकर प्रदेश चुनाव समिति का गठन करेगी. जिसमें सदस्यों की अधिकतम 15 संख्या होगी. यह समिति प्रदेश से संसद और विधानमंडल उम्मीदवारों के नाम केंद्रीय चुनाव समिति को प्रस्तावित करेगी. स्थानीय सहकारी समितियों के भी उम्मीदवारों का चयन करेगी. कैसे होता है संविधान संशोधन संविधान में संशोधन, परिवर्तन सिर्फ पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की ओर से ही किया जा सकता है. हालांकि राष्ट्रीय कार्यकारिणी को भी संशोधन करने का अधिकार है, जिसे पार्टी की राष्ट्रीय परिषद के आगामी सम्मेलन में पुष्टि के लिए रखा जाएगा. यह संशोधन राष्ट्रीय परिषद से पुष्टि के पर्व भी राष्ट्रीय कार्यकारिणी द्वारा निर्धारित तिथि से लागू किया जा सकता है. बीजेपी में तीन श्रेणियों के प्रदेश बीजेपी ने संगठन के लिहाज से प्रदेशों को तीन श्रेणियों में बांटा है. तीन या उससे कम लोकसभा सीटों वाले प्रदेश को श्रेणी 1 में रखा गया है. इसी तरह चार से 20 लोकसभा सीट वाले प्रदेश श्रेणी 2 और 21 से अधिक लोकसभा सीट वाले प्रदेश श्रेणी 3 में हैं.
नई दिल्ली, 05 जून 2019,बिहार में जारी राजनीतिक हलचल के बीच पटना के चौक चौराहों पर पुरानी चर्चा एक बार फिर जिंदा हो उठी है कि क्या बीजेपी और जेडीयू के बीच एक बार फिर से सियासी तलाक होने वाला है? क्या अक्टूबर-नवंबर 2020 में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव से पहले नीतीश और बीजेपी की राहें जुदा होने वाली हैं? 30 मई से लेकर अब तक रोजाना कुछ न कुछ ऐसी घटनाएं हुई हैं, जिससे नीतीश कुमार और बीजेपी के बीच की दूरी बढ़ती ही दिख रही है. इस घटनाक्रम में नीतीश को आरजेडी की ओर से बार-बार किया जा रहा इशारा शामिल है. सोमवार यानी कि 3 जून को आरजेडी के सीनियर नेता रघुवंश प्रसाद सिंह आगे आए और नीतीश को महागठबंधन में शामिल होने का न्यौता दिया. पूर्व केंद्रीय मंत्री और आरजेडी के उपाध्यक्ष रघुवंश प्रसाद सिंह ने कहा बिहार में हालात अब ऐसे बन गए हैं कि सबको एकजुट होना होगा और नीतीश को भी वापस हमारे महागठबंधन में आ जाना चाहिए. आरजेडी के उदार चेहरों में शामिल रघुवंश प्रसाद ने कहा कि अगर बीजेपी को हटाना है तो सभी गैर भाजपा दल साथ आएं, उन्होंने कहा कि सभी का मतलब निश्चित रूप से नीतीश भी हैं. पत्रकारों ने लगे हाथ रघुवंश प्रसाद को तेजस्वी यादव की वो बात याद दिलाई, जहां तेजस्वी अक्सर कहते थे कि नीतीश कुमार के लिए महागठबंधन के सारे रास्ते बंद हैं. इसके जवाब में उन्होंने कहा कि राजनीति में कोई दोस्त या दुश्मन नहीं होता है. रघुवंश प्रसाद ने कहा कि तेजस्वी ने क्या स्टाम्प पेपर पर लिखकर दिया था कि नीतीश कुमार नहीं आ सकते? रघुवंश को आरजेडी का उदार चेहरा माना जाता है. ऐसा भी कहा जा रहा है कि पार्टी ने जानबूझकर उन्हें आगे किया है. ताकि नीतीश को वापस लाया जा सके. जेडीयू के नेता और नीतीश कुमार रघुवंश प्रसाद के इस ऑफर पर चर्चा ही कर रहे थे कि कुछ घंटे-बीतते-बीतते बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री और लालू यादव की पत्नी राबड़ी देवी का एक बड़ा बयान आया. राबड़ी ने नीतीश कुमार को स्पष्ट ऑफर दिया और कहा कि अगर वो महागठबंधन में आते हैं तो उन्हें कोई परेशानी नहीं होगी. राबड़ी के बाद आरजेडी के वरिष्ठ नेता शिवानंद तिवारी भी नीतीश के लिए एक ऑफर लेकर आए. उन्होंने नीतीश का गुणगान किया और कह कि भगवान ने नीतीश कुमार को सेकुलर चेहरा बनने का एक और मौका दिया है. एक मौका पहले महागठबंधन में मिला था जिसे उन्होंने एनडीए में फिर जाकर गंवा दिया. नीतीश कुमार को जहां आरजेडी से बार-बार पुचकार मिल रही है वहीं बीजेपी से उनकी दूरी बढ़ती ही जा रही है. अपने सांसदों को मोदी कैबिनेट में ताजपोशी कराने के लिए 30 मई को दिल्ली पहुंचे नीतीश कुमार खाली हाथ लौटे. लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी 17 में से 16 सीटें जीती थीं. नीतीश कुमार ने इसका जवाब 2 जून को दिया जब उन्होंने बिहार मंत्रिमंडल का विस्तार किया. नीतीश के मंत्रिमंडल में 8 नए मंत्री शामिल हुए लेकिन बीजेपी के एक भी विधायक को जगह नहीं मिली. नीतीश और बीजेपी के बीच रिश्तों में तो खटास चल रही रही थी, तभी बिहार में इफ्तार का सीजन आ गया. बीजेपी और जेडीयू दोनों ने अपनी अपनी इफ्तार पार्टियां दी, लेकिन न तो नीतीश बीजेपी के इफ्तार पार्टी में गए और न ही नीतीश के इफ्तार में सुशील मोदी आए. हां, नीतीश कुमार केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान की इफ्तार पार्टी में जरूर पहुंचे थे. इस पार्टी में बिहार के डिप्टी सीएम सुशील मोदी भी पहुंचे. इस इफ्तार पार्टी की एक तस्वीर बीजेपी और जेडीयू के रिश्तों को और भी कड़वा कर गई. अपने विवादित बयानों के लिए चर्चा में रहने वाले गिरिराज सिंह ने इस तस्वीर पर टिप्पणी करते हुए कहा कि कितनी खूबसूरत तस्वीर होती जब इतनी ही चाहत से नवरात्रि पर फलाहार का आयोजन करते और सुंदर सुदंर फोटो आते? अपने कर्म-धर्म में हम पिछड़ क्यों जाते और दिखावा में आगे रहते हैं. गिरिराज सिंह की इस टिप्पणी ने आग में घी का काम किया. उनकी इस टिप्पणी पर जेडीयू के नेता सिरे से उबल पड़े. खुद नीतीश ने कहा कि वो खबरों में बने रहने के लिए ऐसा करते हैं. जेडीयू प्रवक्ता संजय कुमार सिंह ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसा बयान कोई मानसिक तौर पर बीमार व्यक्ति ही दे सकता है. आरजेडी द्वारा नीतीश को लुभाने की ये कवायद अभी लंबी चलने वाली है. बीजेपी बिहार में बैकफुट पर है. अमित शाह ने गिरिराज को फटकार लगाई है और कहा है कि ऐसे बयानों से परहेज करें. आंकड़ों के हिसाब से देखें तो नीतीश कुमार भले ही बीजेपी के लिए जरूरी नहीं हो, लेकिन वे एनडीए के खेमे के ऐसे सेकुलर चेहरे हैं जिसे बीजेपी की सख्त जरूरत रहती है. वहीं आरजेडी के लिए नीतीश कुमार वो नेता हैं जो पार्टी को एक बार फिर बिहार की सत्ता में साझीदार बना सकते हैं.
नई दिल्ली/लखनऊ लोकसभा चुनाव में दावों के उलट करारी हार झेलने वाले समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन के टूटने की चर्चाएं हैं। मायावती की ओर से कार्यकर्ताओं को 11 विधानसभा उपचुनावों में अकेले लड़ने की तैयारी के निर्देश के बाद यह कयास लग रहे हैं। इसके साथ ही राजनीतिक विश्लेषकों में यह चर्चा भी चल रही है कि यदि गठबंधन में दोनों दलों का यह हाल हुआ है तो फिर माया का अकेले लड़ने का फैसला कितना फायदेमंद हो सकता है। माया ने दिए गठबंधन तोड़ने के संकेत: बीएसपी वर्कर्स को 11 विधानसभा उपचुनावों में अकेले लड़ने की तैयारी करने का मायावती ने निर्देश दिया है। इससे स्पष्ट है कि वह भविष्य में गठबंधन के साथ चुनाव नहीं लड़ना चाहती हैं। यह इसलिए भी कहा जा रहा है क्योंकि आमतौर पर बीएसपी उपचुनाव में नहीं उतरती है और उसने अकेले लड़ने का फैसला लिया है तो साफ है कि वह अकेले जाना चाहती हैं। सियासी राह अकेले चल पाएगा हाथी?: इस बात का जवाब शायद में है। लोकसभा चुनाव खत्म हो चुके हैं और यूपी में एसपी-बीएसपी और आरएलडी के महागठबंधन को उम्मीदों के मुताबिक सीटें नहीं मिल सकी हैं। तीनों दलों ने सूबे की 78 सीटों पर चुनाव लड़ा और महज 15 पर ही जीत मिल सकी। एसपी के खाते में महज 5 सीटें ही गईं, जबकि बीएसपी को 10 सीटें मिली हैं। राष्ट्रीय लोकदल का एक बार फिर से 2014 की ही तरह सूपड़ा साफ हो गया है। हालांकि बीएसपी को 2014 के मुकाबले 10 सीटों पर सफलता मिली है, लेकिन यह उसकी उम्मीदों से कम है। मायावती को कम से कम 20 सीटों पर जीत की उम्मीद थी। मायावती को लगता है कि इन 10 सीटों पर जीत की वजह उनके परंपरागत वोटरों का बीएसपी के साथ बने रहना है, जबकि एसपी के समर्थक वर्ग ने गठबंधन के प्रत्याशियों को वोट नहीं डाला। बीएसपी को 19.3% वोट मिले, जबकि एसपी को 17.93% वोट मिले थे। बीएसपी का बड़ा है दायरा: समाजवादी पार्टी और अजित सिंह के राष्ट्रीय लोकदल के मुकाबले बीएसपी का दायरा खासा बड़ा है। बीएसपी का वोट बैंक उत्तर प्रदेश के अलावा पंजाब में भी है, जहां बड़ा दलित वोट बैंक है। इसके अलावा मध्य प्रदेश में भी बीएसपी का आधार है, जहां उसने इस बार के विधानसभा चुनावों में दो सीटें हासिल की थीं। ऐसे में बीएसपी अब अपने दम पर अपने दायरे को बढ़ाने और मजबूत करने पर फोकस कर सकती है। क्या गठबंधन तोड़ देंगी माया: पिछले साल दलितों के उत्पीड़न को मुद्दा बनाते हुए मायावती ने विरोध में राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया था। फिलहाल वह राज्यसभा और लोकसभा में से किसी भी सदन की सदस्य नहीं हैं। 2020 में यदि वह एक बार फिर राज्यसभा जाना चाहती हैं तो उन्हें एसपी और आरएलडी के समर्थन के अलावा कांग्रेस से भी सपोर्ट की जरूरत होगी। ऐसी स्थिति में देखना होगा कि वह क्या फैसला लेती हैं।
अमेठी, 03 जून 2019, अमेठी सीट से स्मृति ईरानी के हाथों राहुल गांधी की हार के बाद कांग्रेस और सपा-बसपा के बीच तल्खी बढ़ती जा रही है. कांग्रेस के अपने आंतरिक समीक्षा रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेठी में राहुल गांधी के चुनाव में सपा और बीएसपी ने अपेक्षित सहयोग नहीं किया. उल्टे सपा-बसपा के लोग बीजेपी को मदद करते नजर आए. सूत्रों के मुताबिक, ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी के दो सचिव केएल शर्मा और जुबेर खान हार की वजह जानने के लिए अमेठी पहुंचे थे. इन दोनों ने अपनी आंतरिक रिपोर्ट में खुलासा किया है सपा और बसपा का न तो सहयोग मिला और ना ही उनका वोट ट्रांसफर हो पाया. उल्टे सपा के कई नेता या तो स्मृति ईरानी के साथ दिखे या फिर चुपचाप घर बैठ गए. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है सपा में पूर्व मंत्री गायत्री प्रजापति के बेटे अनिल प्रजापति स्मृति ईरानी का प्रचार करते देखे गए, जबकि रिपोर्ट में गौरीगंज के समाजवादी पार्टी के विधायक पर भी राहुल को मदद नहीं करने का आरोप लगाया है. इन कारणों में यह भी बताया गया है कि कांग्रेस के चुनाव प्रचार में न तो सपा और बसपा के नेता दिखे, न उन्होंने कहीं साझा प्रचार किया, ना ही कहीं मंच पर दिखाई दिए. स्थानीय नेताओं के मुताबिक, यह मामला सिर्फ असहयोग का नहीं रहा बल्कि सपा और बसपा के वोट बीजेपी को चले गए. इस खुलास के बाद भी कांग्रेस खुलकर यह बोलना नहीं चाहती क्योंकि वह यह नहीं जताना चाहती कि राहुल गांधी सपा और बसपा के समर्थन के बगैर जीत नहीं सकते. बहरहाल राहुल गांधी की हार के बाद कांग्रेस के नेता मायूस हैं और गुस्से में भी हैं. लेकिन फिलहाल चुप हैं. कौन हैं केएल शर्मा और जुबेर खान केएल शर्मा एआईसीसी में सचिव है और रायबरेली में सोनिया गांधी के कार्यालय प्रतिनिधि के तौर पर काम देखते हैं. जबकि जुबेर खान राजस्थान के अलवर से विधायक रहे हैं. इन्हीं दोनों ने तीन दिनों तक अमेठी में बैठकर हार के कारणों की समीक्षा की है.
नई दिल्ली लोकसभा चुनाव में 303 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत से दोबारा केंद्र की सत्ता पर काबिज होने वाली बीजेपी के लिए यह आंकड़ा उत्साह बढ़ाने वाला है। पार्टी को 90 ‘अल्पसंख्यक बहुल' जिलों में 50 प्रतिशत से अधिक सीटें हासिल हुई हैं। इसके जरिए उसने अल्पसंख्यक विरोधी पार्टी बताने वाले विपक्ष के दावों को एक तरह से खारिज किया है। इन अल्पसंख्यक बहुल जिलों की पहचान 2008 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने की थी। अल्पसंख्यक समुदाय की आबादी अधिक होने के साथ ही इन जिलों में सामाजिक-आर्थिक एवं मूलभूत सुविधाओं के संकेतक राष्ट्रीय औसत से कम हैं। ऐसे 79 निर्वाचन क्षेत्रों में बीजेपी ने अधिकतम 41 सीटें जीती जो 2014 के मुकाबले सात सीट ज्यादा थी। कांग्रेस के हिस्से आई सीटें लगभग आधी हो गईं और 2014 में जहां 12 सीटें थीं, वहीं अब महज छह रह गईं। एक विश्लेषक ने दावा किया कि मुस्लिमों ने इस बार किसी एक पार्टी या एक उम्मीदवार के पक्ष में सामूहिक रूप से मतदान नहीं किया। वहीं दूसरी तरफ 27 मुस्लिम उम्मीदवारों ने हाल में संपन्न चुनावों में जीत हासिल की। हालांकि बीजेपी की ओर से उतारे गए छह में से केवल एक मुस्लिम उम्मीदवार को ही जीत मिली। जीतने वाले मुस्लिम सांसदों में तृणमूल कांग्रेस के पांच, कांग्रेस के चार, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, नेशनल कॉन्फ्रेंस एवं इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के तीन-तीन, एआईएमआईएम के दो, एलजेपी, एनसीपी, सीपीएम एवं एआईयूडीएफ के एक-एक सदस्य शामिल हैं। बंगाल के अल्पसंख्यक बहुल जिलों में बड़ी सफलता विपक्षी दल अल्पसंख्यकों के लिए कुछ खास नहीं करने और उन पर हमलों को बढ़ावा एवं सहयोग देने का आरोप बीजेपी पर लगाते रहे हैं। देश के 130 करोड़ लोगों में लगभग 14.2 प्रतिशत मुस्लिम हैं। अल्पसंख्यक बहुल जिलों में बीजेपी को सबसे अधिक लाभ पश्चिम बंगाल में मिला जहां 18 ऐसी सीटें हैं। उत्तर दिनाजपुर जिले के रायगंज में मुस्लिमों की आबादी 49 प्रतिशत है, जहां बीजेपी के देबश्री चौधरी को जीत मिली। 50 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले जिलों में भी जीत मालदा में मालदा उत्तर सीट पर पार्टी के खगेन मुर्मु ने तृणमूल की मौसम नूर को 84,288 मतों के अंतर से हराया। यहां 50 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है। कूचबिहार सीट पर बीजेपी के नीसिथ प्रमाणिक ने अपने करीबी प्रतिद्वंद्वी से बेहतर प्रदर्शन किया। इसके अलावा जलपाईगुड़ी, उत्तर दिनाजपुर जिले के बालुरघाट, बांकुरा में बिष्णुपुर लोकसभा सीट, हुगली सीट, वर्द्धमान-दुर्गापुर सीट पर बीजेपी प्रत्याशियों ने जीत हासिल की।
नई दिल्ली, 28 मई 2019,लोकसभा चुनाव 2019 में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में बीजेपी ने प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापसी की है. नरेंद्र मोदी की ताजपोशी की तैयारी शुरू हो चुकी है. इसके साथ ही राजनीतिक कयास लगाए जाने लगे हैं कि मोदी सरकार की नई कैबिनेट में किन पुराने चेहरों का कद बढ़ेगा और किन नेताओं की इस बार छुट्टी होगी. इस फेहरिश्त में 6 नाम ऐसे हैं, जिनके पिछले काम को देखकर लगता है कि इस बार उनका प्रमोशन होना लाजमी है. पीयूष गोयल मोदी सरकार की नई कैबिनेट में केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल का कद बढ़ सकता है. 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार बनी तो पीयूष गोयल को कोयला-पावर एंड न्यू रिन्यूएबल एनर्जी का राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) की जिम्मेदारी मिली थी. देश में लगातार हो रही ट्रेन दुर्घटना के चलते सुरेश प्रभु के हाथों से रेल मंत्रालय की जिम्मेदारी लेकर पीयूष गोयल को सौंपी गई थी. यही नहीं अरुण जेटली अपने इलाज के लिए विदेश में थे तो वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी भी पीयूष गोयल के कंधों पर थी, जिसके चलते उन्होंने इस साल का केंद्रीय बजट भी पेश किया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के पीयूष गोयल काफी भरोसेमंद और करीबी माने जाते हैं. ऐसे में माना जा रहा है कि मोदी सरकार की नई कैबिनेट में पीयूष गोयल का प्रमोशन हो सकता है. जनरल वी. के. सिंह जनरल वीके सिंह दूसरी बार गाजियाबाद सीट से जीतकर संसद पहुंचने में सफल रहे. सेना के जनरल के पद से रिटायर होने के बाद वीके सिंह ने 2014 के चुनाव से ऐन पहले बीजेपी ज्वाइन किया और रिकॉर्ड मतों से जीतकर संसद पहुंचे और मोदी सरकार में विदेश राज्य मंत्री बनाए गए थे. राज्यमंत्री रहते हुए वीके सिंह ने बेहतर काम किए थे, इनमें यमन में आईएस आतंकियों के चंगुल में फंसे सैकड़ों भारतीयों को सही सलामत वापस लाने का मामला हो या फिर इराक में आतंकियों के हाथ मारे गए 39 भारतीयों के अवशेष को उनके परिवार तक पहुंचाने का काम हो. ऐसे में माना जा रहा है कि इस बार मोदी सरकार की नई कैबिनेट में वीके सिंह का कद बढ़ सकता है. धर्मेंद्र प्रधान बीजेपी के दिग्गज नेताओं में धर्मेंद्र प्रधान का नाम आता है. 2014 में बनी मोदी सरकार में धर्मेंद्र प्रधान पेट्रोलियम मंत्रालय का राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) की जिम्मेदारी दी गई थी. उज्जवला योजना के तहत देश के गरीब परिवारों को मुफ्त में गैस कनेक्शन दिए गए. इस योजना के तहत 7 करोड़ लोगों को मुफ्त में गैस कनेक्शन दिए गए. इस योजना का बीजेपी को जबरदस्त फायदा मिला और मोदी सरकार की वापसी में इस योजना की अहम भूमिका मानी जा रही है. इसके अलावा ओडिशा में पार्टी का ग्राफ बढ़ाने में अहम भूमिका रही है. ऐसे में मोदी सरकार की नई कैबिनेट में धर्मेंद्र प्रधान का कद बढ़ाया जा सकता है. राज्यवर्धन सिंह राठौर राज्यवर्धन सिंह राठौर 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी का दामन थामा और चुनाव जीतकर संसद पहुंचे और मोदी सरकार में केंद्रीय खेल राज्यमंत्री बने. इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा. स्मृति ईरानी से सूचना प्रसारण मंत्रालय की जिम्मेदारी वापस लेकर राज्यवर्धन सिंह राठौर को स्वतंत्र प्रभार के रूप में सौंपी गई थी. राठौर दूसरी बार चुनाव जीतने में कामयाब रहे हैं, ऐसे में मोदी सरकार में अहम जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है. बाबुल सुप्रियो पश्चिम बंगाल के आसनसोल सीट से दूसरी बार चुनाव जीतने वाले बाबुल सुप्रियो का कद इस बार बढ़ सकता है. बंगाल में बीजेपी जिस तरह से 42 में से 18 सीटें जीतने में कामयाब रही है. ऐसे में सुप्रियो का कद बढ़ना लाजमी है, क्योंकि डेढ़ साल के बाद ही बंगाल में विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में पार्टी राज्य में ममता से सत्ता छीनने के लिए हरसंभव कोशिश कर रही है. हालांकि बाबुल सुप्रियो 2014 में मोदी सरकार में राज्यमंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. जयंत सिन्हा जयंत सिन्हा हजारीबाग सीट से दूसरी बार चुनाव जीतने में कामयाब रहे हैं. जयंत को राजनीति उनके पिता यशवंत सिन्हा से विरासत में मिली है. 2014 में पहली बार जयंत सिन्हा संसद पहुंचे तो उन्हें केंद्र की मोदी सरकार में राज्य वित्त मंत्री का दर्जा मिला. इसके बाद जब कैबिनेट में फेर-बदल हुआ तो उन्हें राज्य नागरिक उड्यन मंत्रायल का पद दिया गया. हालांकि उनके पिता यशवंत सिन्हा मोदी सरकार के खिलाफ अभियान चलाते रहे, लेकिन जयंत ने बीजेपी का दामन नहीं छोड़ा. माना जा रहा है कि इस बार मोदी कैबिनेट में उनका प्रमोशन हो सकता है.
लखनऊ राष्ट्रीय पार्टी की पहचान बचाने के लिए बहुजन समाज पार्टी (बसपा ) ने पूरे देश में चुनाव लड़ा। लेकिन इस बार बसपा को राष्ट्रीय स्तर की पार्टी के तौर पर तगड़ा झटका लगा। यूपी को छोड़कर ज्यादातर राज्यों में बसपा की गिनी चुनी सीटों के सिवा कहीं भी जमानत तक नहीं बची। यही नहीं कई राज्यों में बसपा को मिले वोटों से ज्यादा उस सीट पर 'नोटा' की संख्या रही। हालांकि पंजाब और मध्य प्रदेश की कुछ सीटों पर बसपा ने अच्छा प्रदर्शन भी किया। बसपा प्रमुख मायावती ने दक्षिण भारत समेत सभी राज्यों में जमकर प्रचार किया था। राजस्थान और मध्य प्रदेश में बसपा ने कांग्रेस सरकार को समर्थन दे रखा है। ऐसे में सत्ताधारी पार्टी होने के नाते अनुमान लगाया जाता है कि अच्छे कामों के चलते चुनावों में उसका प्रदर्शन बेहतर होगा। लेकिन यहां पर कांग्रेस से लेकर बसपा के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ। बसपा ने राजस्थान में 20 सीटों पर चुनाव लड़ा और सभी पर जमानत गंवा दी। यही नहीं इन 20 में से 10 सीटें तो ऐसी हैं, जहां पर बसपा से ज्यादा लोगों ने नोटा को वोट दिया। इसी तरह मध्य प्रदेश में भी बसपा ने कांग्रेस को समर्थन दिया हुआ है लेकिन यहां पर भी पार्टी के ज्यादातर उम्मीदवार अपनी जमानत गंवा बैठे। जम्मू कश्मीर में बसपा ने जम्मू और ऊधमपुर लोकसभा सीट से प्रत्याशी उतारा था। पार्टी की दोनों जगह जमानत जब्त हो गई। जम्मू में जहां बसपा प्रत्याशी को 14 हजार, वहीं ऊधमपुर लोकसभा सीट पर 16 हजार वोट मिले। बिहार में भी सभी सीटों पर पार्टी की जमानत जब्त हो गई। हिमाचल प्रदेश की चारों लोकसभा सीटों में मंडी सीट को छोड़कर सभी जगह बसपा से ज्यादा नोटा को वोट मिला। कर्नाटक और तमिलनाडु समेत केरल में भी पार्टी की जमानत जब्त हो गई। पंजाब की तीन सीटों पर बेहतर प्रदर्शन बसपा को सबसे बड़ी सफलता उत्तर प्रदेश में ही मिली। हालांकि यूपी के बाद पार्टी ने पंजाब की तीन सीटों पर बेहतर लड़ाई लड़ी। बसपा संस्थापक कांशीराम के गृह राज्य पंजाब के आनदंपुर साहिब में पार्टी ने डेढ़ लाख वोट पाए और कुल पड़े मत का तकरीबन 14 फीसदी वोट यहां पर बसपा को मिला। इसी तरह से बसपा ने होशियारपुर में भी सवा लाख से ज्यादा वोट पाकर तकरीबन 13 फीसदी वोटों में सेंधमारी की। पार्टी को सबसे ज्यादा फायदा पंजाब की जलांधर लोकसभा सीट पर रहा। यहां पार्टी बीस फीसदी वोटों के साथ तीसरे नंबर पर रही और दो लाख से ज्यादा वोट पाए। महाराष्ट्र में जिन सीटों पर बसपा ने चुनाव लड़ा वहां पर भी जमानत जब्त हो गई जबकि मुंबई शहर की सात में से छह सीटों पर चुनाव लड़ने वाली बसपा की जमानत तो जब्त ही हुई बल्कि नोटा से भी कम वोट मिले।
नई दिल्‍ली लोकसभा चुनाव 2014 की तुलना में इस साल हुए लोकसभा चुनावों में बीजेपी की लोकसभा सीटें 282 से बढ़कर 303 हो गई हैं। दिलचस्‍प बात यह है कि बढ़ी हुई इन 21 सीटों में से लगभग आधी (10) सुरक्षित सीटें (एससी/एसटी) हैं। इससे पता चलता है कि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का जनाधार दलितों और आदिवासियों के बीच बढ़ा है। सुरक्षित सीटों के विश्‍लेषण से पता चलता है कि इन चुनावों में बीजेपी ने 131 सुरक्षित सीटों में से 77 पर जीत हासिल की है, 2014 में यह आंकड़ा 67 था। यह इस लिहाज से अहम है क्‍योंकि ये नतीजे उस आम धारणा के विपरीत हैं जिसके अनुसार माना जाता है कि बीजेपी और दलितों व आदिवासियों के बीच बनती नहीं है। असलियत यह है कि इस बार एससी और एसटी सीटों पर बीजेपी के उम्‍मीदवारों की संख्‍या बढ़ी है वहीं कांग्रेस ने इन क्षेत्रों में अपनी तीन सीटें खोई हैं। कांग्रेस का जनाधार घटा हालांकि पिछले लोकसभा चुनावों की तुलना में कांग्रेस की सीटों में मामूली सुधार हुआ है, वे 44 से 52 हुई हैं लेकिन उसे इस बार महज 9 सुरक्षित सीटों पर कामयाबी मिली, जबकि 2014 में वह 12 ऐसी सीटों पर विजयी हुई थी। बीएसपी को भी हुआ नुकसान 2014 के चुनावों से पहले उत्‍तर प्रदेश की 17 एससी सीटों में से अधिकतर मायावती की अगुआई वाली बीएसपी के खाते में जाती थीं। लेकिन उन्‍हें इस बार महज 2 सीटें मिली हैं। दलित विचारधारा आधारित यह पार्टी दूसरे प्रदेशों की सुरक्षित सीटों पर तो अपना खाता तक नहीं खोल पाई। जहां तक कुल 84 एससी सीटों की बात है, इस बार बीजेपी को पिछली बार की 40 सीटों की तुलना में 46 सीटें मिली हैं। इनमें यूपी से (14), पश्चिम बंगाल से (5), कर्नाटक से (5), मध्‍य प्रदेश से (4) और राजस्‍थान से (4) सीटें मिली हैं। बीजेपी की सीटों में हुई बढ़त इसी तरह बीजेपी की अनुसूचित जनजाति या एसटी सीटों में भी 2014 की तुलना में बढ़ोतरी हुई है। इस साल उसे पिछले चुनावों की 27 सीटों के मुकाबले 31 सीटें हासिल हुई हैं। बीजेपी के बाद दूसरा नंबर कांग्रेस का है लेकिन उसकी सीटें बीजेपी की तुलना में काफी कम हैं। कुछ राज्‍यों में बीजेपी ने सभी सुरक्षित सीटें अपने नाम कर ली हैं। इनमें मध्‍य प्रदेश, कर्नाटक, राजस्‍थान और गुजरात शामिल हैं। वाईएसआर कांग्रेस ने भी आंध्र प्रदेश में सभी 4 एससी सीट और इकलौती एसटी सीट पर विजय दर्ज की। देश में 84 सीटें एससी और 47 एसटी के लिए रिजर्व देश के 27 राज्‍यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एससी/एसटी की जनसंख्‍या के आधार पर इनके लिए सीटें रिजर्व या सुरक्षित होती हैं। इन सीटों पर केवल रिजर्व कैटिगरी के ही उम्‍मीदवार चुनाव लड़ सकते हैं, जबकि वोट देने का अधिकार सभी वर्ग के मतदाताओं को होता है। हालांकि, एससी/एसटी कैंडिडेट देश में किसी भी सीट से चुनाव लड़ सकते हैं। 2008 के परिसीमन आयोग के मुताबिक इस समय देश में 412 सीटें सामान्‍य, 84 एससी और 47 एसटी के लिए रिजर्व हैं।
नई दिल्ली, 25 मई 2019,लोकसभा चुनाव 2019 को कई चीजों के लिए याद किया जाएगा. चाहे बात बयानबाजी की हो या एक दूसरे पर हमले के लिए नारेबाजी का प्रयोग करना. इस दौरान कुछ चीजें ऐसी भी थीं जो कैमरे की निगाहों से दूर रहीं, लेकिन नतीजों पर उसका सबसे ज्यादा असर हुआ. आइए एक बार उन सभी मुद्दों पर नजर दौड़ाते हैं. 'मोदी है तो मुमकिन है' यह नारा यूं ही सफल नहीं हुआ बल्कि इसके पीछे की मेहनत और रणनीति कुछ ऐसी रही जिसने उत्तर प्रदेश में बीजेपी को अभेद्य बना दिया. कार्यकर्ताओं के साथ ही प्रयोग कैसे साबित हुआ गेम चेंजर! बीजेपी ने चुपचाप अपने कार्यकर्ताओं को एक काम दिया था और वो काम था मतदान के दिन सुबह 10 बजे के पहले पूरे परिवार का वोट डलवा देना. यह बीजेपी के अपने उस 'ए' ग्रेड के बूथ प्रबंधन का जिम्मा था जहां बीजेपी हमेशा जीतती रही है. इसके तहत बीजेपी ने अपने बूथों पर भारी मतदान की रणनीति बनाई थी और वह उसमें सफल रही. कैसे कार्यकर्ताओं ने जलपान के पहले परिवार के मतदान को बनाया मूल मंत्र प्रदेश के 1 लाख 37 हजार बूथ, जहां बीजेपी का संगठन है उसमें साठ हजार बूथ बीजेपी के ए ग्रेड के बूथ हैं. जहां बीजेपी ने 'जलपान से पहले कार्यकर्ता परिवार का मतदान' का अभियान सफल बनाया. बीजेपी का दूसरा बड़ा कार्यक्रम प्रधानमंत्री मोदी के योजनाओं से लाभान्वित परिवारों तक पहुंचने का था. प्रत्येक बीजेपी के कार्यकर्ता को 5 लाभार्थियों तक पहुंचने का टारगेट दिया गया था, जिसे बढ़ाकर बीजेपी ने 20 किया और अपने चुनाव प्रचार के पहले बीजेपी ने यह टारगेट पूरा कर लिया यानी बीजेपी का हर कार्यकर्ता किसी न किसी लाभार्थी के घर पहुंचा और मोदी की योजनाओं के नाम पर सीधे वोट मांगे. बीजेपी के संगठन महामंत्री सुनील बंसल जिन्हें उत्तर प्रदेश में बीजेपी संगठन का चाणक्य कहा जाता है उन्होंने बीजेपी के एक करोड़ से ज्यादा कार्यकर्ताओं से संवाद किया और फीडबैक लिया और यही रणनीति बीजेपी को यूपी में 50 फीसदी से ज्यादा वोट दिलाने सफल रही. जब उत्तर प्रदेश में महागठबंधन बन रहा था तभी अमित शाह ने 51 फीसदी वोट का टारगेट तय किया था जिसे पूरा करना आसान नहीं था क्योंकि बीजेपी को 2014 में 43 फीसदी से ज्यादा वोट मिले थे. इस बार 7 फीसदी वोट बढ़ाना किसी सपने के सच होने जैसा है. कैसे धराशाई हुआ महागठबंधन? यूपी बीजेपी के संगठन महामंत्री सुनील बंसल ने आज तक को बताया कि 53 सीटों पर बीजेपी का जीतना तय था 27 सीटों पर कड़ा मुकाबला था और ऐसी सीटों पर ही हमारे प्रबंधन, कार्यकर्ताओं के जोश और उत्साह ने बहुत मदद पहुंचाई. प्रधानमंत्री की योजनाएं और अमित शाह के प्रबंधन कुशलता जमीन पर उतरी और जमीन पर बने माहौल ने हमारे चुनाव प्रचार को धार दिया जिसकी वजह से महागठबंधन ऊपर तो भारी दिखता रहा लेकिन नीचे से उसकी जमीन खिसकती रही.
नई दिल्ली, 23 मई 2019,लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजों की तस्वीर अब लगभग साफ हो गई है. एक बार फिर नरेंद्र मोदी प्रचंड बहुमत के साथ देश के प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं. मोदी नाम की सुनामी इतनी तेज है कि देश के कई हिस्सों में भारतीय जनता पार्टी ने क्लीन स्वीप कर दिया है. चोट भले ही कांग्रेस को पहुंची है, लेकिन इस सुनामी में सबसे ज्यादा दर्द क्षत्रपों को हुआ है. क्योंकि बीजेपी ने इस बार वहां वार किया है, जहां टीएमसी, बीजेडी, एनसीपी, सपा, बसपा मजबूत थे और मोदी नाम की आंधी ने इनके किले को ढेर कर दिया है. पहली बार दीदी के घर में घुसपैठ अमित शाह ने वादा किया था कि इस बार बीजेपी बंगाल में 23+ सीटें लाएगी. अभी तक जो रुझान/नतीजे सामने आए हैं, वो इसी की गवाही दे रहे हैं. दोपहर 12 बजे तक बंगाल की कुल 42 सीटों में से भाजपा 17 पर बढ़त बनाए हुए है और टीएमसी 24 सीटों पर आगे है. 2014 में ममता बनर्जी की पार्टी 35+ सीटों पर कब्जा जमाए हुई थी. ना सिर्फ सीटें बल्कि वोट शेयर के मामले में भी बीजेपी ने बड़ी बढ़त बनाई है. बंगाल में टीएमसी और बीजेपी के बीच आरपार की लड़ाई हुई, हिंसा भी हुई. टीएमसी की सरकार की ओर से बीजेपी के कई नेताओं के हेलिकॉप्टर को भी रोक दिया. नवीन बाबू के गढ़ में मोदी की सेंध ओडिशा में एकछत्र राज चलाने वाले नवीन पटनायक की पार्टी बीजेडी इस बार मोदी की आंधी में साफ हो गई. 21 सीटों वाले राज्य में बीजेपी दूसरी बड़ी पार्टी बनकर उभरी है और सात सीटों पर आगे चल रही है. बीजेडी 14 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है. ओडिशा में बीजेडी का एकछत्र राज माना जाता है, लेकिन विधानसभा में तो उनका जादू चला लेकिन लोकसभा में बीजेपी ने अपनी ताकत बढ़ाई. दो लड़कों के बाद बुआ-बबुआ की उखाड़ी जड़ें उत्तर प्रदेश में नरेंद्र मोदी का सामना करने के लिए बड़ी उम्मीदों के साथ मायावती और अखिलेश यादव साथ आए थे. 25 साल की दुश्मनी भुलाई, एक साथ कई सभाएं की, प्रधानमंत्री बनने का सपना देखा लेकिन सबकुछ धरा का धरा रह गया. ना जाति का जोर चला, ना ही किसी और तरह की कोशिश काम आई. बीजेपी के काम आया तो सिर्फ नरेंद्र मोदी का नाम. यूपी में बीजेपी 55 सीटों पर आगे चल रही है, तो वहीं महागठबंधन सिर्फ 24 सीटों पर ही जीत हासिल करने की कगार पर है. यानी चुनाव से पहले जो दावे किए जा रहे थे, वो पूरी तरह फेल रहे. हालांकि, बीजेपी को थोड़ा नुकसान तो हुआ है वह 73 के नंबर से 55 पर आ गई है. लेकिन जो गठबंधन दावा कर रहा था, वैसा बड़ी चोट नहीं लग पाई. नहीं काम आया शरद पवार का दांव विपक्षी नेताओं में शरद पवार ही ऐसे कद के नेता थे, जो अपने दांव पेच से मोदी को टक्कर दे सकते थे. लेकिन महाराष्ट्र में एनसीपी-कांग्रेस की जोड़ी को मुंह की खानी पड़ी. कुल 48 सीटों वाले राज्य में बीजेपी-शिवसेना की जोड़ी 44 सीटें जीतती हुई दिखाई दे रही है. यानी जिन शरद पवार को प्रधानमंत्री पद की रेस में माना जाता था वो अपने ही किले को बचाने में नाकाम रहे हैं. केजरीवाल का और भी बुरा हाल आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल लोकसभा चुनाव से पहले दावे कर रहे थे कि वह 7 सीटों पर जीतने वाले हैं. उन्होंने कांग्रेस के साथ गठबंधन की बात कही थी, लेकिन वो नहीं हो सका. सात सीटों पर अभी तक जो रुझान आए हैं, उनमें ‘आप’ तीसरे नंबर पर दिख रही है. एक तरफ से अरविंद केजरीवाल, दिल्ली-पंजाब-हरियाणा-गोवा में गठबंधन की बात कर रहे थे और जब नतीजे सामने आए तो सारे अरमान धुल गए. बिहार में बहार है! बिहार की सबसे बड़ी पार्टी राजद यानी लालू यादव की पार्टी का मोदी की सुनामी में कुछ पता ही नहीं चला. चुनाव से पहले राजद ने एनडीए के ही कुछ दलों को तोड़ और कांग्रेस को साथ लाकर, महागठबंधन बनाया. पांच पार्टियों वाला ये गठबंधन, 40 में से सिर्फ 2 सीट पर लटकता दिखाई दे रहा है. जो तेजस्वी यादव लगातार लालू यादव के नाम पर वोट मांग रहे थे, लेकिन पूरा खेल ही पलट गया. एक तरफ से पहले ही उनकी पार्टी में रार चल रही थी, उनके भाई तेज प्रताप यादव लगातार धमकियां दे रहे थे. लेकिन लोकसभा चुनाव के नतीजों की बिजली अब उनपर कहर बनकर टूटी है
नई दिल्ली, 23 मई 2019, लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजों के लिए कुल 542 सीटों पर मतगणना चल रही है. बीजेपी की अगुवाई वाली NDA को 336 सीटों पर बढ़त मिलती दिख रही है, तो यूपीए 100 सीटों तक सिमटी दिख रही है. कांग्रेस की अगुवाई वाले यूपीए से ज्यादा अन्य दलों को सीटें मिलती दिख रही हैं. अन्य दलों के उम्मीदवार 106 सीटों पर आगे चल रहे हैं. भले ही ये अभी रुझान हैं, मगर यह तय हो चुका है कि बीजेपी अपने दम पर बहुमत से सरकार बनाने जा रही है. इस लोकसभा चुनाव में मोदी पहले से भी ज्यादा मजबूत नेता बनकर उभरे हैं. ऐसे में लोकसभा चुनाव के इन रुझानों से कई बड़े संकेत और संदेश निकल रहे हैं. जानिए क्या हैं ये संदेश. 1- लोकसभा चुनाव के नतीजों के बाद नरेंद्र मोदी पहले से अधिक मजबूत प्रधानमंत्री बनकर उभरेंगे. नेहरू और इंदिरा के बाद मोदी तीसरे ऐसे नेता हैं जो पूर्ण बहुमत के साथ दोबारा वापसी कर रहे हैं. 2- ...मोदी हैं तो मुमकिन है, अबकी बार, फिर मोदी सरकार, बीजेपी तीन सौ के पार, आएगा तो मोदी ही, मैं भी चौकीदार,....लोकसभा चुनाव की कैंपेनिंग के दौरान उछाले गए ये सभी नारे सच साबित हो रहे हैं. लोगों ने इन नारों में यकीन दिखाया. 3- इस लोकसभा चुनाव में अमित शाह सबसे बड़ी कहानी बनकर उभरे हैं. उनके बूथ प्रबंधन ने सबको हैरान करके रख दिया है. 'मेरा बूथ सबसे मजबूत' महज एक स्लोगन भर नहीं रहा, बल्कि राजनीति के विद्यार्थियों के लिए यह एक अध्ययन का विषय हो गया है. 4- कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को आत्ममंथन कर खुद को नए सिरे से तैयार करने की जरूरत पड़ेगी. राजनीति की जमीन पर उनकी लव-पॉलिटिक्स कहीं नहीं ठहरी. 5- यूपी में बुआ-बबुआ महागठबंधन की बहुत अधिक चर्चा रही, फिर भी यह फेल साबित होता दिख रहा है. हालांकि इस गठबंधन के फेल होने की अटकलें पहले से लग रहीं थी. लोकसभा चुनाव के रुझान देखें तो सपा-बसपा और रालोद का महागठबंधन 30 का आंकड़ा भी पार करता नहीं दिख रहा है. 6- कांग्रेस महासचिव के तौर पर राजनीति में उतरने वालीं प्रियंका गांधी का उत्तर प्रदेश में जादू नहीं चला. उन्हें अब अगली बार के लिए खुद को तैयार करने की जरूरत है. जबकि प्रियंका गांधी को चुनाव में ट्रंप कार्ड माना जा रहा था. 7- दिल्ली के रुझान बता रहे हैं कि बीजेपी 7- 0 के साथ क्लीन स्वीप करने जा रही है. चुनाव से पहले तमाम कोशिशों के बावजूद आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन भी नहीं हो सका, सभी सातों सीटें बीजेपी को जा रहीं हैं. 8- पश्चिम बंगाल में 'ममता बनाम मोदी' की प्रतिष्ठापरक लड़ाई में बीजेपी ने दबदबा कायम किया है. बीजेपी इस राज्य में दमदार प्रर्दशन कर सबको हैरान कर दिया है. 9- बिहार में लालू यादव के वारिस तेजस्वी यादव में संभावनाएं देखी जा रहीं थीं, नीतीश-मोदी की जोड़ी के आगे राजद, कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों का गठबंधन पूरी तरह फेल साबित हुआ है. दिलचस्प बात है कि लालू की बेटी मीसा भारती पाटलिपुत्र सीट से आगे चल रहीं हैं. 10- मोदी लहर एक बार फिर तमिलनाडु में चेन्नई के समुद्र तट को नहीं छू पाई. तमिलनाडु में बीजेपी इस बार अच्छे प्रदर्शन का सपना संजोई थी, मगर पूरे देश में लहर क्या सुनामी होने के बावजूद तमिलनाडु में असर नहीं दिखा. यहां सत्ताधारी एआईएडीएमके पर डीएमके भारी पड़ी दिख रही. 11- लोकसभा चुनाव में बीजेपी के हिंदुत्व कार्ड के आगे विपक्ष के आरोप असरहीन दिखा. भगवाधारी प्रत्याशियों का दबदबा देखने को मिला. साध्वी निरंजन ज्योति, साक्षी महराज भी चुनाव मैदान में दबदबा कायम करते दिखे. 12- सेंसेक्स में उछाल जारी है. पहली बार सेंसेक्स 40 हजार अंकों के पार गया है. बाजार और उद्योग ने भी रुझान को सकारात्मक लेते हुए स्थिरता के संकेत दिए हैं.
नई दिल्‍ली 2019 के लोकसभा खत्म हो चुके हैं. काउंटिंग 23 मई को होगी और उसी दिन नतीजे आएंगे. इससे पहले एग्जिट पोल्स ने सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी (BJP) को कमबैक के संकेत दिए हैं. जिससे के बाद दूसरे राजनीतिक दल ईवीएम को लेकर फिर मुखर हो गए हैं. बिहार, हरियाणा और यूपी में ईवीएम से छेड़छाड़, ईवीएम बदलने जैसी घटनाओं की खबरें भी आ रही हैं. पर क्या ऐसा हो सकता है? क्या चुनाव आयोग वोटिंग के बाद ईवीएम के रखरखाव में वाकई में लापरवाही होती है? वोट पड़ने और काउंटिंग के बीच कहां-कहां जाती है EVM एक ईवीएम तीन यूनिट से मिलकर बनती है. पहली कंट्रोल यूनिट, दूसरी बैलट यूनिट और तीसरी VVPAT. कंट्रोल और बैलट यूनिट 5 मीटर लंबी केबल से जुड़ी होती हैं. कंट्रोल यूनिट बूथ में मतदान अधिकारी के पास रखी होती है जबकि बैलेटिंग यूनिट वोटिंग मशीन के अंदर होती है जिसका इस्तेमाल वोटर करता है. इसी के पास होती है VVPAT यूनिट. ईवीएम में छेड़छाड़ को लेकर पहले भी कई सवाल उठ चुके हैं जिसमें चुनाव आयोग ने साफ किया है कि टेंपरिंग संभव नहीं है. फिर राजनीतिक दल इस चीज को मानने को तैयार नहीं. चुनावी मौसम में ईवीएम का रोना फिर शुरू हो जाता है. लेकिन चुनाव आयोग की मानें तो ईवीएम पूरी तरह से चिप से बनी होती है और इसे किसी भी तरीके से टेंपर नहीं किया जा सकता है. Close बदन दबाने के बाद काम नहीं करती EVM एक बूथ में चुनाव होने के बाद मतदान अधिकारी ईवीएम की 'Close' बटन दबा देता है. 'Close' बटन दबाने के बाद ईवीएम पूरी तरह से बंद हो जाती है और इसके बाद कोई बटन काम नहीं करती है. यह बटन दबाते ही ईवीएम की स्क्रीन पर पोलिंग क्लोज टाइमिंग और पड़ने वाले टोटल वोट काउंट हो जाते हैं. इसके बाद पीठासीन अधिकारी तीनों यूनिट को अलग कर देते हैं. पार्टियों के प्रत्याशियों के सामने सील होती है ईवीएम हालिया लोकसभा चुनाव में पीठासीन अधिकारी रहे संतोष कुमार सक्सेना बताते हैं कि, वोटिंग के बाद मशीन को कैरिंग बैग में डाल दिया जाता है. प्रेक्षक अधिकारी, जिला निर्वाचन अधिकारी, एसपी, सहायक रिटर्निंग ऑफिसर, अनुविभागीय अधिकारी, पार्टियों के प्रतिनिधियों के सामने ईवीएम को सील किया जाता है. तीनों मशीनों पर पोलिंग बूथ का एड्रेस और पीठासीन अधिकारी के दस्तखत होते हैं. इस दौरान हर पार्टी के 2-2 एजेंट मौजूद होते हैं. इसमें एक मुख्य एजेंट और दूसरा रिलीवर होता है. किसी भी पोलिंग बूथ पर एक पीठासीन अधिकारी और तीन मतदान अधिकारी होते हैं. सघन सुरक्षा घेरे में होती है ईवीएम मध्यप्रदेश के कटनी जिले के कलेक्टर और जिला निर्वाचन अधिकारी डॉ. पंकज जैन ने बताया कि वोटिंग के बाद चुनाव आयोग के दिशानिर्देश का पालन कर ईवीएम को सघन सुरक्षा घेरे में स्ट्रांग रूम तय लाया जाता है. बूथ से लेकर स्ट्रांग रूम तक पहुंचने में ईवीएम की सुरक्षा में पैरामिलिट्री फोर्स, पीएसी के जवान और लोकल पुलिस होती है. इनके साथ कार्यपालिक मजिस्ट्रेट और चुनाव अधिकारी भी होते हैं. स्ट्रांग रूम से पहले ईवीएम एकत्रित करने के लिए विधान सभा के अनुसार सेंटर बनाए जाते हैं. जहां पर चुनाव अधिकारी अपने-अपने बूथ की ईवीएम जमा करते हैं.' परींदा भी नहीं मार सकता पर ईवीएम सुरक्षा को लेकर उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले एडीएम प्रशासन डॉ. राकेश कुमार पटेल का कहना है कि, 'ईवीएम में किसी तरीके से छेड़छाड़ संभव नहीं है. ईवीएम को सघन सुरक्षा में पोलिंग बूथ से स्ट्रांग रूम तक लाया जाता है. स्ट्रांग रूम में ऑब्जर्वर, अभ्यर्थियों और राजनीतिक प्रतिनिधियों के साथ रिटर्निंग ऑफिसर और सहायक रिटर्निंग ऑफिसर की मौजूदगी में मशीनों सील कर दिया जाता है. जिस कमरे में ईवीएम रखी जाती है. उसके दरवाजे पर डबल लॉक लगाने के बाद एक 6 इंच की दीवार भी बनाई जाती है. इस पूरी प्रक्रिया के दौरान वीडियोग्राफी भी की जाती है. अगर कोई ताला तोड़कर उस कमरे में घुसने की कोशिश भी करेगा तो सबसे पहले दीवार को तोड़ना पड़ेगा. दीवार टूटने से पता चल जाएगा कि किसी ने स्ट्रांग रूम में घुसने की कोशिश की है. इतना ही नहीं स्ट्रांग रूम के आसपास इतनी कड़ी सुरक्षा होती है कि कोई परिंदा भी पर नहीं मार सकता है, इंसान तो दूर की बात है.' तीन लेयर में जवान चौथी में सीसीटीवी एडीएम पटेल के अनुसार स्ट्रांग रूम के बाहर तीन लेयर की सुरक्षा होती है. पहले लेयर में पैरामिलिट्री फोर्स, पीएसी के जवान और फिर राज्य पुलिस के जवान तैनात होतै हैं. ये जवान 24 घंटे अलग-अलग शिफ्ट में ड्यूटी देते हैं. स्ट्रांग रूम के एरिया को एक तरह छावनी बना दिया जाता है. जवान यहां तंबू लगाकर रहते हैं और ड्यूटी देते हैं. इतना ही नहीं प्रत्याशी को किसी भी प्रकार की कोई शंका न हो ऐसे में उनके प्रतिनिधियों के रहने के लिए भी तंबू-टेंट की व्यवस्था जिला निर्वाचन आयोग की ओर से की जाती है. इसके अलावा स्ट्रांग रूम के बाहर सीवीटीवी कैमरे लगाए जाते हैं जिनकी मॉनिटरिंग के लिए अलग से रूम में गार्ड्स तैनात रहते हैं. पावर बैकअप की भी व्यवस्था होती है.' कैसे अलॉट होती हैं ईवीएम वोटिंग के एकदिन पहले पीठासीन अधिकारियों को EVM अलॉट होती हैं. इसके लिए बाकायदा पूरी एक प्रक्रिया है. किस बूथ के लिए कौन-सी कंट्रोल यूनिट, बैलट यूनिट (EVM) और कौन-सी VVPAT जारी होगी. उसकी पूरी डिटेल सूची तैयार की जाती है. यह सूची चुनाव अधिकारी, प्रत्याशी को पहले ही दे दी जाती है. साथ ही चुनाव आयोग से हर बूथ के लिए एक्सट्रा ईवीएम भी अलॉट होती हैं ताकि किसी भी प्रकार की गड़बड़ी में इन्हें बदला जा सके. इन मशीनों की डिटेल भी बाकायदा उस लिस्ट में होती है
लखनऊ लोकसभा चुनाव के लिए सभी चरणों का मतदान समाप्त हो चुका है और सीटों के लिहाज से सबसे अहम स्थान रखने वाले उत्तर प्रदेश में वोटिंग का ट्रेंड इस बार भी 2014 के पिछले लोकसभा चुनावों के जैसा ही रहा। यहां पश्चिमी यूपी में इस बार भी मतदान प्रतिशत पूर्वांचल से अधिक रहा। यूपी की राजनीति के दो प्रमुख गढ़ माने जाने वाले पश्चिमी यूपी और पूर्वी यूपी में वोटर्स ने बूथों तक पहुंचने के लिए 2014 की तरह ही ट्रेंड दिखाया। प्रदेश में हर गुजरते चरण के बाद मतदान प्रतिशत कम होता गया। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में पहले 3 चरण के मतदान में 60 प्रतिशत से अधिक मतदान हुआ। चौथे चरण से वोटिंग ग्राफ घटता चला गया और सातवें चरण में कुछ ऊपर चढ़ा। पहले चरण में 64 प्रतिशत मतदान हर चरण के अनुसार बात करें तो पहले चरण में 64 प्रतिशत मतदान, दूसरे चरण में 62 प्रतिशत, तीसरे में 61 प्रतिशत, चौथे में 59 प्रतिशत, पांचवें चरण में 58 प्रतिशत और छठें चरण में 54 फीसदी मतदान देखने को मिला। सातवें और अंतिम चरण में पूर्वांचल की 13 सीटों पर मतदान हुआ, जिसमें वाराणसी और गोरखपुर जैसी वीआईपी सीटें शामिल हैं। अंतिम चरण में मतदान 57 फीसदी हुआ। 2014 में हुए आम चुनावों के आंकड़ों पर नजर डालने पर भी यही ट्रेंड नजर आता है। पिछले चुनाव में पहले चरण में 66 प्रतिशत मतदान, दूसरे चरण में 62 प्रतिशत, तीसरे में 61 प्रतिशत, चौथे में 58 प्रतिशत, पांचवें चरण में 57 प्रतिशत, छठे चरण में 54.5 प्रतिशत, सातवें चरण में 54.9 प्रतिशत मतदान हुआ था। इसके अलावा 2017 में उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा चुनावों में भी वोटिंग का यही ट्रेंड देखने को मिला था। राज्य के चुनावों में भी पश्चिम से पूरब की तरफ बढ़ने पर मतदान प्रतिशत में कमी देखने को मिली थी।
मुंबई राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) प्रमुख शरद पवार और उनके भतीजे अजित पवार को इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) पर अलग-अलग राय है। शरद पवार को लगता है कि वोटिंग मशीन के साथ छेड़छाड़ की जा सकती है, लेकिन अजित पवार का कहना है कि ईवीएम मशीन में अगर छेड़छाड़ किया जा सकता था तो भाजपा पांच राज्यों में चुनाव नहीं हारती। गौरतलब है कि पिछले महीने शरद पवार ने कई विरोधी दलों को लेकर मुंबई में ही प्रेंस कॉन्फ्रेंस की जिसमें पवार, चंद्रबाबू नायडू समेत अन्य दलों के नेताओं ने ईवीएम पर संदेह व्यक्त किया था। बुधवार को शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने अपने चाचा के बयान के विपरीत बयान दिया है। अजित पवार ने कहा, ''कई लोगों को ईवीएम पर संदेह है। उन्हें लगता है कि इसके साथ छेड़छाड़ की जा सकती है, जो लोकतंत्र के लिए हानिकारक है। मुझे ऐसा नहीं लगता है, लेकिन ये लोग ऐसा कहते रहते हैं। अगर ऐसा होता, तो वे (बीजेपी) 5 राज्यों में चुनाव नहीं हारते।' यह पहली बार नहीं हुआ है कि जब उन्होंने ईवीएम का बचाव किया है। पिछले साल 30 अक्टूबर को नागपुर में मीडियाकर्मियों से बात करते हुए, अजित पवार ने कहा था कि उन्हें व्यक्तिगत रूप से इन मशीनों पर पूरा भरोसा है। पिछले साल नवंबर और दिसंबर में राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम में विधानसभा चुनाव हुए थे। भाजपा ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सत्ता गंवा दी थी और अन्य दो राज्यों में भी अपनी छाप छोड़ने में असफल रही।
नई दिल्ली, 16 मई 2019, पश्चिम बंगाल में अमित शाह के रोड शो पर हमले और चुनावी हिंसा को लेकर शिवसेना ने सूबे की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) सुप्रीमो ममता बनर्जी पर जबरदस्त प्रहार किया है. पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा के लिए ममता बनर्जी को जिम्मेदार ठहराते हुए शिवसेना ने उनको कड़ी नसीहत भी दी है. केंद्र और महाराष्ट्र सरकार में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) में बीजेपी की सहयोगी शिवसेना ने ममता बनर्जी को घेरते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल में हिंसा के लिए आखिरकार कौन जिम्मेदार है? शिवसेना ने अपने मुखपत्र सामना के संपादकीय में लिखा कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सरकार ने भरतीय जनता पार्टी के नेताओं के हेलिकॉप्टर को उतरने से रोका, तो संघर्ष शुरू हो गया. शिवसेना ने पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो के दौरान हुई हिंसा की भी निंदा की. इसके बाद अमित शाह को अपना रोड शो बीच में ही रोकना पड़ा था. शिवसेना ने सामना के संपादकीय में लिखा कि ममता बनर्जी जल्दी गुस्सा हो जाती हैं, लेकिन एक राजनेता को दिमाग ठंडा और जुबानी मीठी रखनी चाहिए. शिवसेना ने कोलकाता में रोड शो के दौरान अमित शाह पर हुए हमले की भी कड़ी निंदा की गई. शिवसेना ने सामना में कहा कि ममता बनर्जी की सरकार लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई थी. लिहाजा उनकी जीत या हार का फैसला भी लोकतांत्रिक तरीके से होना चाहिए. वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के लिए बाधा पैदा करके चुनाव नहीं जीतेंगी. शिवसेना ने सामना के संपादकीय में लिखा कि अमित शाह को इजाजत नहीं देने के फैसले का बचाव करते हुए ममता बनर्जी ने दलील दी थी कि अमित शाह भगवान नहीं हैं, जो उनको रोका नहीं जा सकता है. इस पर तंज कसते शिवसेना ने कहा कि अमित शाह भगवान नहीं हैं, लेकिन ममता बनर्जी भी साध्वी नहीं हैं. बंगाल ने वाम मोर्चे के शासन में हिंसा देखने को मिली थी और अब वैसी ही हिंसा ममता बनर्जी सरकार में देखने को मिल रही है. इसके चलते सूबे में कानून और व्यवस्था तहस नहस हो गई है. शिवसेना का मानना है कि पश्चिम बंगाल सीमावर्ती राज्य होने के चलते बेहद संवेदनशील है. यहां पर हिंसा और अशांति बेहद चिंताजनक है. शिवसेना ने हिंदू और मुसलमानों के बीच पैदा हुए तनाव और बांग्लादेशी घुसपैठियों को लेकर भी ममता सरकार पर जमकर बरसी. पार्टी ने सामना के संपादकीय में कहा कि पश्चिम बंगाल में हिंदू और मुस्लिमों के बीच तनाव है. तृणमूल कांग्रेस सरकार ने ही बांग्लादेशी घुसपैठियों को वोट देने का अधिकार दिया. ममता बनर्जी 'जय श्री राम' के नारे का विरोध कर रही हैं और कह रही हैं कि हम 'जय हिंद' और 'वंदे मातरम्' कहेंगे. शिवसेना ने सवाल किया कि क्या पश्चिम बंगाल के मुसलमान वंदे मातरम कहेंगे? शिवसेना ने कहा कि पश्चिम बंगाल में हुई हिंसा के चलते ममता बनर्जी की छवि को भी नुकसान पहुंचा है. आपको बता दें कि शिवसेना अपने मुखपत्र सामना के जरिए हमेशा राजनीतिक दलों को निशाने पर लेती रहती है. शिवसेना महाराष्ट्र और केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के साथ मिलकर सरकार चला रही है, हालांकि कई बार वह बीजेपी को भी निशाने पर ले चुकी है. शिवसेना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को भी कई बार कठघरे में खड़ा कर चुकी है.
कोलकाता भले ही पूरे देश में लोकसभा चुनाव कमोबेश शांतिपूर्ण ही निपटने की ओर हैं, लेकिन भद्रलोक कहे जाने वाले पश्चिम बंगाल में आखिरी दौर की वोटिंग की वोटिंग से पहले हिंसा का तांडव देखने को मिल रहा है। मंगलवार को बीजेपी चीफ अमित शाह के रोड शो के दौरान फैली हिंसा के बाद चुनाव आयोग ने प्रचार के टाइम को ही लगभग एक दिन कम करते हुए गुरुवार रात 10 बजे तक सीमित करने का फैसला लिया, जबकि कैंपेन शुक्रवार शाम 5 बजे तक चलना था। इस बीच गुरुवार को भी दोनों दलों के बीच घमासान चरम पर है। एक तरफ पीएम मोदी ने ममता को दमदम में शाम को होने वाली अपनी रैली को रोकने की चुनौती दी है तो दीदी ने कहा कि उन्हें विद्यासागर की मूर्ति को लेकर झूठ बोलने पर उठक-बैठक करनी चाहिए। आखिरी राउंड में कम सीटों के लिए बड़ी जंग लोकसभा चुनाव के आखिरी राउंड में 59 सीटों पर वोटिंग होनी है, जिनमें से 9 सीटें पश्चिम बंगाल की हैं। भले ही सीटों की संख्या कम है, लेकिन यहां वोटों के लिए प्रतिस्पर्धा बेहद कड़ी है। वजह यह है कि इन सीटों पर परंपरागत रूप से टीएमसी मजबूत रही है और इस बार उसे बीजेपी से कड़ी चुनौती मिल रही है। इसके चलते दोनों दलों के बीच जुबानी जंग कई जगहों पर हिंसक झड़पों तक में तब्दील होती दिखी है। मंगलवार को हुई हिंसा के बाद चुनाव आयोग ने बुधवार को प्रचार का समय कम किए जाने की घोषणा करते हुए कहा कि सूबे में भय और नफरत का वातावरण है। वोटिंग वाले इलाकों में भय का माहौल है। लास्ट राउंड में दमदम, बारासात, बसीरहाट, जयनगर, मथुरापुर, डायमंड हार्बर, जाधवपुर, कोलकाता साउथ, कोलकाता नॉर्थ सीटों पर मतदान होगा। तृणमूल कांग्रेस के लिए बड़ी लड़ाई आखिरी चरण में जिन 9 सीटों पर मतदान होना, वे सभी तृणमूल कांग्रेस का गढ़ मानी जाती हैं। टीएमसी ने 2014 में इन सभी सीटों पर विजय हासिल की थी। इनमें से भी जाधवपुर और साउथ कोलकाता सीट तो ममता बनर्जी का गढ़ मानी जाती हैं। उन्होंने अपनी राजनीति की शुरुआत यहीं से की थी। बनर्जी ने 1984 में जाधवपुर लोकसभा सीट से सीपीएम के दिग्गज नेता और पूर्व लोकसभा स्पीकर सोमनाथ चटर्जी को मात दी थी। यह उनकी अब तक की सबसे चर्चित चुनावी जीत थी। इसके बाद उन्होंने साउथ लोकसभा सीट से चुनाव लड़ना शुरू किया और वहां से लगातार 6 बार सांसद रहीं। डायमंड हार्बर सीट भी खासी चर्चा में है क्योंकि यहां से ममता बनर्जी के भतीजे चुनावी समर में हैं। बीजेपी के लिए बंगाल में बड़ा अवसर 2014 के आम चुनाव में बीजेपी इन 9 लोकसभा सीटों में से 2 पर दूसरे नंबर पर रही थी। कोलकाता नॉर्थ और कोलकाता साउथ लोकसभा सीट पर बीजेपी की बढ़त सीधे तौर पर तृणमूल कांग्रेस के लिए नुकसान है। साउथ कोलकाता सीट की ही बात करें तो तृणमूल कांग्रेस को यहां वोट शेयर में 20.24% का नुकसान उठाना पड़ा था, जबकि बीजेपी को 21.33 फीसदी के इजाफे के साथ 25.28 पर्सेंट वोट मिले थे। इसी तरह उत्तर कोलकाता लोकसभा सीट पर भी तृणमूल का वोट शेयर घटकर 35.94 प्रतिशत पर आ गया, जबकि बीजेपी को 25.88% वोट मिले थे। दमदम सीट पर बीजेपी ने कब्जा जमाया था, इसके अलावा बांग्लादेश सीमा से लगी बसीरहाट सीट पर अधिक मुस्लिम जनसंख्या, गोतस्करी और अवैध घुसपैठ के मुद्दे बीजेपी को मदद कर सकते हैं। रैलियां जितनी बड़ी, टकराव उतना ज्यादा? पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के गढ़ माने जाने वाले इलाकों में बीजेपी ने अपने दिग्गज नेताओं को चुनाव कैंपेन में उतारा है। पीएम नरेंद्र मोदी दमदम, बसीरहाट, मथुरापुर और डायमंड हार्बर सीट पर रैलियां कर रहे हैं। दूसरी तरफ बीजेपी चीफ अमित शाह बारासात, जयनगर और कोलकाता नॉर्थ सीट पर कैंपेन के लिए उतरे हैं। इस तरह बीजेपी की टॉप लीडरशिप बंगाल की लगभग सभी सीटों को कवर कर रही है। पीएम मोदी ने यहां हर चरण में औसतन दो रैलियां की है। इसके अलावा यूपी के चीफ मिनिस्टर योगी आदित्यनाथ और स्मृति इरानी भी क्रमश: 3 और 5 रैलियां करने वाले हैं। बीजेपी की ओर से कैंपेन को हाई प्रोफाइल बनाने की वजह से टीएमसी भी यहां प्रचार को लेकर तीखे तेवरों में है और स्थिति हिंसा में तब्दील हो जा रही है।
नई दिल्ली, 14 मई 2019,उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव अब सातवें और आखिरी चरण में है. इस चरण में यूपी की 13 लोकसभा सीटें है, जहां 19 मई को मतदान होंगे. ये सभी सीटें पूर्वांचल इलाके की हैं और इनकी जिम्मेदारी कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के कंधों पर है. लेकिन प्रियंका गांधी पूर्वांचल को छोड़कर मध्य प्रदेश पंजाब में पार्टी को जिताने के लिए पसीना बहा रही हैं. ऐसे में सवाल उठने लगा है कि पूर्वांचल में कांग्रेस इस अत्मविश्वास से लबरेज है कि वो चुनावी जंग फतह कर रही है या फिर पूरी तरह से उसने आत्मसमर्पण कर दिया है. आखिरी चरण में उत्तर प्रदेश की महाराजगंज, गोरखपुर, कुशीनगर, देवरिया, बांसगांव, घोसी, सलेमपुर, बलिया, गाजीपुर, चन्दौली, वाराणसी, मिर्जापुर और रॉबर्ट्सगंज सीट पर 19 मई को मतदान होने हैं. इन सीटों पर चुनाव प्रचार का अंतिम दिन शुक्रवार यानी 17 मई को है. इस तरह चुनाव प्रचार के लिए महज तीन दिन का समय बाकी है. ऐसे में प्रियंका गांधी अगर चुनावी कैम्पेन में पूर्वांचल में उतरती है तो अगले तीन दिनों में 13 सीटें कैसे कवर कर पाएंगी? पूर्वांचल की जिन 13 सीटों पर चुनाव हैं, 2014 में ये सभी सीटें बीजेपी जीतने में कामयाब रही थी. इस बार के लोकसभा चुनाव में सपा-बसपा गठबंधन ने बड़ी मजबूती के साथ चुनावी मैदान में उतरी है. सपा प्रमुख अखिलेश और बसपा अध्यक्ष मायावती लगातार पूर्वांचल में संयुक्त जनसभाएं कर रहे हैं. यही नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सीएम योगी आदित्यनाथ भी इन सीटों पर चुनाव प्रचार तेज कर दिए हैं. पिछले दो दिन से पीएम इन इलाके की सीटों पर प्रचार कर रहे हैं. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और महासचिव प्रियंका गांधी अभी तक यूपी के आखिरी चरण की सीटों पर चुनावी प्रचार में अभी तक नहीं उतरे हैं. जबकि कांग्रेस कई सीटों पर मजबूती के साथ चुनाव लड़ रही है. प्रियंका गांधी पूर्वी उत्तर प्रदेश की प्रभारी हैं और इन सीटों को जिताने की जिम्मेदारी उन्हीं के कंधों पर है. इसके बावजूद चुनाव प्रचार में नजर न आना सवाल खड़ा कर रहा है. जबकि प्रियंका गांधी ने राजनीति में एंट्री की थी तो माना जा रहा था कि प्रियंका गांधी पूर्वांचल में पार्टी को जिताने के लिए पूरी ताकत झोंक देंगी. प्रियंका गांधी पूर्वांचल में अपने उम्मीदवारों को छोड़कर सोमवार को मध्य प्रदेश के उज्जैन, रतलाम और इंदौर में रोड शो और जनसभाएं करके कांग्रेस उम्मीदवार को जिताने के लिए पसीना बहा रही है. इतना ही नहीं मंगलवार को प्रियंका गांधी पंजाब में प्रचार के लिए उतरी हैं. हालांकि माना जा रहा है कि प्रियंका गांधी बुधवार को वाराणसी और गुरुवार को मिर्जापुर में कार्यक्रम प्रस्तावित हैं. गौरतलब है कि कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने उत्तर प्रदेश में अपने चुनावी अभियान की शुरूआत प्रयागराज से काशी के लिए किया था. इस दौरान उन्होंने पूर्वांचल की कई सीटों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष तौर पर फोकस किया था. प्रियंका इस दौरे के बाद वाराणसी अभी तक नहीं गई हैं.
लखनऊ यूपी में लोकसभा चुनाव अब सातवें और आखिरी चरण की ओर बढ़ चुका है। इस चरण की 13 सीटें यूपी से लेकर दिल्ली तक पक्ष-विपक्ष का सिक्का तय करने में अहम भूमिका निभाएंगी। एसपी-बीएसपी को इस चरण में बीजेपी की चुनौती से पहले बागियों से जूझना पड़ रहा है। कुछ पाला बदलकर दूसरे दलों से उम्मीदवार हैं तो कुछ उदासीन पड़े हुए हैं। यह वह चरण हैं जहां गठबंधन को जीत के लिए कोर वोटरों से आगे भी हिस्सेदारी बढ़ानी पड़ेगी। मोदी लहर में हुए पिछले लोकसभा चुनाव को छोड़ दिया जाए तो इस चरण का अधिकतर सीटों पर एसपी-बीएसपी अलग-अलग अपना झंडा गाड़ती रही हैं। धुर जातीय गणित पर लड़ी जाने वाली इन सीटों पर दोनों ही पार्टियों के साथ आने से उनके रणनीतिकारों की जीत की उम्मीद और बढ़ गई है। लेकिन, समस्या अपने ही है। नजीर के तौर पर देवरिया सीट पर कांग्रेस के उम्मीदवार नियाज अहमद ही गठबंधन के लिए चुनौती बने हुए हैं। नियाज पिछली बार यहां बीएसपी से उम्मीदवार थे। घोसी सीट पर कांग्रेस के उम्मीदवार बालकृष्ण चौहान भी बीएसपी से गए हैं। चंदौली में गठबंधन का खेल बिगाड़ रहीं कांग्रेस उम्मीदवार शिवकन्या कुशवाहा मायावती के खास रहे बाबू सिंह कुशवाहा की पत्नी हैं। पिछली बार वह गाजीपुर से एसपी की उम्मीदवार थीं। रार्बट्सगंज से बीजेपी उम्मीदवार पकौड़ी लाल पिछली बार एसपी के उम्मीदवार थे। बिना मैदान में उतरे भी बढ़ा रहे मुसीबत गठबंधन के लिए उनकी ही पार्टी के कई चेहरे बिना चुनाव लड़े भी मुसीबत बन रहे हैं। चंदौली से आखिरी वक्त तक एसपी से एक बड़े सवर्ण चेहरे को टिकट मिलने की चर्चा थी। लेकिन, बाजी लगी दूसरे के हाथ। सूत्रों का कहना है कि चंदौली ही नहीं गाजीपुर तक उनकी उदासीनता एसपी को नुकसान कर सकती है। अखिलेश के धुर विरोधियों में शुमार अफजाल अंसारी की बीएसपी से गाजीपुर में उम्मीदवारी को लेकर भी एसपी में असमंजस की स्थिति है। इसे दूर करने के लिए अखिलेश को खुद गाजीपुर रैली करनी पड़ी। बलिया सीट जो समाजवादियों का गढ़ रही है, वहां भी एसपी के उम्मीदवार चयन को लेकर सवाल खड़े हुए हैं। महराजगंज से अपनी बहन तनुश्री त्रिपाठी के लिए एसपी से टिकट मांगने वाले निर्दलीय विधायक अमन मणि त्रिपाठी इस समय कांग्रेस की रैलियों में दिख रहे हैं। उपचुनाव में गोरखपुर में बीजेपी की जीत का सिलसिला तोड़ने वाले प्रवीण निषाद बीजेपीई हो चुके हैं। केवल अंकगणित से नहीं चलेगा काम! सीधी लड़ाई में एक-एक वोट के हिसाब वाले चुनाव में आखिरी चरण में महज अंकगणित के भरोसे रहना गठबंधन के लिए मुश्किलें खड़ी करेगा। इस चरण की 13 सीटों में 8 सीटों पर बीजेपी को 2014 में एसपी-बीएसपी के कुल वोटों से अधिक वोट मिले थे। इसमें मीरजापुर, कुशीनगर, गोरखपुर, देवरिया, महाराजगंज, सलेमपुर, बांसगांव, रार्बट्सगंज और वाराणसी शामिल है। बलिया और घोसी सीट पर भी बीजेपी व एसपी-बीएसपी के कुल वोटों में मामूली ही अंतर था। हालांकि, उपचुनाव में गोरखपुर सीट जीतकर गठबंधन अंकगणित की ताकत दिखा चुका है। लेकिन, आम चुनाव में फैक्टर, मुद्दे और माहौल अलग हैं। इसलिए, यहां जीत के लिए यादव, दलित, मुस्लिम से आगे भी वोटरों को जोड़ने पर ही बात बनेगी।
संगरूर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सोमवार को पंजाब में आम आदमी पार्टी (AAP) के प्रचार अभियान की शुरुआत की। केजरीवाल के चुनाव प्रचार के पहले ही दिन स्थानीय प्रदर्शनकारियों ने उन्हें काले झंडे दिखाए। केजरीवाल संगरूर से आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार भगवंत मान के लिए प्रचार करने के लिए यहां पहुंचे थे। राज्य को मादक पदार्थों के नाम पर बदनाम करने के लिए प्रदर्शनकारियों ने केजरीवाल के खिलाफ नारे लगाए और उन्हें वापस जाने को कहा। केजरीवाल के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले गुरिंदर सिंह ने कहा,‘पिछले लोकसभा चुनाव में केजरीवाल ने पंजाब को यह कहकर बदनाम किया था कि यह ‘मादक पदार्थों का स्वर्ग है’ और ‘यहां के युवा नशे के आदी हैं’। बाद में, उन्होंने पूर्व मंत्री बिक्रम सिंह मजीठिया से उनके खिलाफ मादक पदार्थों के कारोबार में संलिप्त होने के आरोप लगाने को लेकर बिना शर्त माफी मांगी थी।' शुक्रवार तक पंजाब में ही रहेंगे केजरीवाल उसने कहा, 'मजीठिया से माफी मांगने के बजाए उन्हें पंजाब के लोगों से बार-बार और लगातार झूठ बोलने के लिए माफी मांगनी चाहिए थी।' मजीठिया शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर बादल के बहनोई हैं और पिछली राज्य सरकार में कैबिनेट मंत्री थे। आम आदमी पार्टी के संगठन पदाधिकारियों के अनुसार अरविंद केजरीवाल शुक्रवार तक पंजाब में चुनाव प्रचार करेंगे। लोकसभा चुनाव के सातवें और अंतिम चरण में 19 मई को राज्य के सभी निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान होना है।
नई दिल्ली, 12 मई 2019,छठे चरण का मतदान खत्म होते ही यूपी कांग्रेस को झटका लगा है. यूपी के भदोही की कांग्रेस जिलाध्यक्ष नीलम मिश्रा ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है. नीलम मिश्रा ने प्रियंका गांधी पर अपमानित करने का भी आरोप लगाया है. नीलम मिश्रा ने कहा 'लोकसभा टिकट बाहरी और बीजेपी से आए रमाकांत यादव को दिया गया. यह हमारे लिए बहुत बड़ा आघात था. मैंने मीटिंग में प्रियंका गांधी से इस बारे में बातचीत की, लेकिन वह नाराज हो गईं और मुझे अमानित किया.' भदोही में छठे चरण में वोटिंग हुई. यहां से कांग्रेस ने रमाकांत यादव को अपना उम्मीदवार बनाया है. बीजेपी की तरफ से रमेश बिंद और बीएसपी ने रंगनाश मिश्रा को भदोही से टिकट दिया है. रमाकांत यादव को चुनाव आयोग का नोटिस भी मिल चुका है. चुनाव आयोग ने अपने आपराधिक रिकॉर्ड के बारे में जनता को बताने के लिए कहा था, जिसके लिए उम्मीदवारों को छोटे या बड़े अखबारों में इसे प्रकाशित करवाना था, लेकिन कांग्रेस उम्मीदवार रमाकांत यादव ने इसकी अनदेखी की थी. मामले को गंभीरता से लेते हुए जिला निर्वाचन आयोग ने यादव को नोटिस भेजा था.
नई दिल्ली, 13 मई 2019,लोकसभा चुनाव में छह दौर का मतदान पूरा हो गया है. रविवार को सात राज्यों की 59 सीटों पर मतदान हुआ. राजधानी दिल्ली की सभी सात लोकसभा सीटों पर भी इस दौर में ही मतदान कराया गया, जहां वोटिंग प्रतिशत 2014 के मुकाबले काफी कम रहा. पिछले चुनाव में दिल्ली के 65.1 फीसदी मतदाताओं ने अपने वोट का इस्तेमाल किया था, जबकि इस बार यह घटकर 60 फीसदी रह गया है. चुनावी विश्लेषण में यह माना जाता है कि ज्यादा वोटिंग सत्ता के विरोध का प्रतीक होती है. तो ऐसे में दिल्ली की कम वोटिंग के क्या मायने हैं ये समझना भी काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि अब तक जो परंपरा रही है, उसके तहत दिल्ली की लोकसभा सीटें जिस पार्टी को मिलती हैं, उसी पार्टी को केंद्र में सरकार बनाने का मौका मिलता रहा है. हालांकि, दिल्ली में 60 प्रतिशत वोटिंग भले ही 2014 से कम है, लेकिन उससे पहले हुए लोकसभा चुनावों की वोटिंग का ट्रेंड देखा जाए तो आंकड़े थोड़ा हैरान करने वाले हैं. 1977 से लेकर 2009 तक ऐसे तीन ही मौके आए हैं जब दिल्ली में वोटिंग प्रतिशत 60 पार कर पाया हो. साल 1977 में यहां सबसे ज्यादा 71.3 फीसदी वोटिंग हुई थी. इसके बाद 1980 में 64.9 और 1984 में 64.5 फीसदी वोटिंग हुई. यह चुनाव इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुआ था. लेकिन 1989 से लेकर 2009 तक हुए सात लोकसभा चुनावों में एक बार भी वोटिंग प्रतिशत 60 का आंकड़ा नहीं छू पाया. कई बार तो यह 50 फीसदी भी नहीं पहुंच सका. अब तक यह रहा वोटिंग प्रतिशत 1989- 54.3% 1991- 48.5% 1996- 50.6% 1998- 51.3% 1999- 43.5% 2004- 47.1% 2009- 51.9% इसके बाद दिल्ली में अन्ना आंदोलन हुआ. केंद्र की कांग्रेस सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगे. लोकपाल आंदोलन के बीच कांग्रेस के खिलाफ लोगों में गुस्सा नजर आया. जिसका नतीजा ये हुआ कि 2014 में दिल्ली की जनता ने 65 फीसदी मतदान किया और सातों सीटों पर भारतीय जनता पार्टी को जीत दिलाई. हालांकि, दिल्ली से जुड़ा एक दिलचस्प आंकड़ा ये भी है कि कम वोटिंग प्रतिशत में भी यहां की जनता एक चुनाव में किसी एक पार्टी को ही प्रमुखता से चुनती रही है. मसलन, 2009 में सभी सात सीटें कांग्रेस को मिलीं, 2004 में कांग्रेस को 6 सीटें मिलीं, 1999 में बीजेपी को सातों सीट मिलीं, 1998 में बीजेपी को 6 सीटें मिलीं. इससे पहले भी कभी ऐसे चुनाव नतीजे नहीं आए, जिसमें कांग्रेस या बीजेपी दोनों में आधी-आधी सीटें बंट गई हों. यहां तक कि 1989 में तो बीजेपी महज 26 फीसदी पाकर भी चार सीट जीत गई और कांग्रेस 43 फीसदी वोटर लेकर भी 2 सीटों पर ही जीत सकी. जबकि एक सीट जनता दल को मिली थी. पीएम नरेंद्र मोदी भले ही 2014 में सत्ता विरोधी लहर की बात करते हुए 2019 में सत्ता समर्थन लहर का दावा कर रहे हों, लेकिन आकंड़ों पर गौर किया जाए तो दिल्ली के मतदाता कम वोट करके भी किसी एक पार्टी को ही बहुमत देते रहे हैं. aajtak
नई दिल्ली रविवार को लोकसभा चुनाव के 59 सीटों पर वोटिंग समाप्त होने के साथ ही अबतक 543 सीटों में से 89% पर यानी 484 सीटों पर प्रत्याशियों की किस्मत ईवीएम में कैद हो गई है। पश्चिम बंगाल को छोड़ दें तो वोटिंग आमतौर शांतिपूर्ण ही रही। उत्तर प्रदेश और दिल्ली में कुछ जगहों ईवीएम में खराबी की शिकायतें जरूर आईं। हालांकि अगर अभी तक हुए 6 चरणों की वोटिंग प्रतिशत की बात करें तो यह फेज दर फेज घटी ही है। पहले फेज में सबसे ज्यादा वोट पड़े तो छठे फेज में सबसे कम। इसबार भी बंगाल में सबसे ज्यादा वोट पड़े हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या 2019 में 2014 में हुए 66.4% वोटिंग का रेकॉर्ड टूट पाएगा? छठे चरण में 63.49% वोटिंग हुई है। हालांकि चुनाव आयोग ने कहा है कि वोटिंग प्रतिशत बढ़ भी सकता है। पश्चिम बंगाल में रेकॉर्ड 80.35% से वोटिंग हुई है। दिल्ली में करीब 60% मत पड़े जो 2014 में 65% की तुलना में कम है। यूपी के 14 लोकसभा क्षेत्रों में 54.74% जबकि बिहार की 8 सीटों पर 59.29% वोटिंग हुई। हरियाणा के सभी 10 सीटों पर एक ही चरण में वोटिंग हुई और कुल 68.34% मत पड़े। झारखंड में 4 लोकसभा सीट में 64.50% और मध्य प्रदेश की 8 सीटों पर 64.76% वोटिंग हुई। 17वीं लोकसभा के लिए हो रहे चुनाव में हर चरण की वोटिंग के मतदान प्रतिशत घटता गया है। लोकसभा चुनाव का पहला चरण 11 अप्रैल को शुरू हुआ था। तो क्या वोटरों का उत्साह पिछले चुनाव की तुलना में घट रहा है? विशेषज्ञों का भी अनुमान था कि इस साल चुनाव में सबसे ज्यादा वोटिंग प्रतिशत देखने को मिल सकता है। अगर वोटिंग टर्नआउट की बात करें तो आंध्र प्रदेश, असम, गुजरात, कर्नाटक में 1962 के बाद सबसे ज्यादा वोटिंग हुई है। देश के सबसे बड़े बैंक एसबीआई की स्टडी के अनुसार छत्तीसगढ़ में 15 साल में सबसे ज्यादा और महाराष्ट्र में 30 साल में सबसे ज्यादा वोटिंग हुई है। सातवें और अंतिम चरण में वोटिंग प्रतिशत से यह पता चलेगा कि क्या 2019 में 2014 के वोट पर्सेंट का रेकॉर्ड टूटेगा या नहीं?
भोपाल भीषण गर्मी और तेज धूप के बाद भी देश का दिल कहे जाने वाले मध्‍य प्रदेश में रविवार को 80 लाख वोटर घरों से निकले और वोट देकर लोकतंत्र के महापर्व लोकसभा चुनाव में हिस्‍सा लिया। वर्ष 2014 लोकसभा चुनाव के मुकाबले इस बार पोलिंग का आंकड़ा करीब 8 प्रतिशत बढ़कर करीब 65 फीसदी हो गया। सबसे ज्‍यादा 74 फीसदी वोटिंग राजगढ़ में हुई वहीं साध्‍वी प्रज्ञा ठाकुर और दिग्विजय सिंह के कारण हॉट सीट बनी भोपाल में अब तक के सारे रेकॉर्ड टूट गए और यहां पर 65.7 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। भोपाल लोकसभा सीट पर बीजेपी की फायर ब्रैंड नेता साध्‍वी प्रज्ञा ठाकुर और कांग्रेस के वरिष्‍ठ नेता दिग्विजय सिंह के बीच चुनावी जंग ने भीषण गर्मी में भोपाल का राजनीतिक तापमान डबल कर दिया। हालत यह हो गई कि इस बार मोदी लहर से भी 8 फीसदी ज्‍यादा लोगों ने वोट दिया। मतदान के इस बढ़े से माना जा रहा है कि दोनों नेताओं के बीच कांटे की टक्‍कर होने के आसार हैं। मोदी-राहुल गांधी ने नहीं किया प्रचार भोपाल में मतदान की यह हालत तब है जब न तो पीएम मोदी ने और न ही कांग्रेस अध्‍यक्ष राहुल गांधी ने भोपाल में चुनाव प्रचार किया है। दिग्‍गी और साध्‍वी के बीच इस चुनावी जंग के परिणाम पर अब पूरे देश की नजरें टिकी हुई हैं। चुनाव प्रचार के दौरान दिग्विजय सिंह ने भोपाल के विकास पर जोर दिया उधर, साध्‍वी ने भी बाद के दिनों में भोपाल को बेहतर बनाने का आपना खाका पेश किया। विकास के मुद्दे से इतर पूरे प्रचार के दौरान हिंदुत्‍व का मुद्दा छाया रहा। प्रज्ञा ठाकुर ने इस चुनाव 'धर्म युद्ध' करार दिया और कहा कि उन्‍हें 'बाबरी मस्जिद को गिराने में सहयोग करने पर गर्व है।' वहीं दिग्विजय सिंह ने चुनाव प्रचार के दौरान कई मंदिरों का दौरा किया और कंप्‍यूटर बाबा के नेतृत्‍व में सैकड़ों साधुओं ने 'हठ योग' किया। इसके जरिए दिग्विजय ने प्रज्ञा ठाकुर के हिंदुत्‍व के दांव को कुंद करने की कोशिश की। साध्‍वी बनाम दिग्‍गी की जंग का असर मतदान पर साध्‍वी बनाम दिग्‍गी की इस जंग का असर मतदान पर भी साफ नजर आया। मतदान केंद्रों पर रविवार को सुबह सात बजे से ही लंबी-लंबी लाइनें देखी गईं। दोपहर एक बजे तक 35 प्रतिशत लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग कर लिया था जबकि उस समय तापमान 40.7 डिग्री सेल्सियस था। भोपाल मध्‍य और भोपाल उत्‍तर में मतदान थोड़ा धीमा रहा लेकिन बाद में इसमें तेजी आई। बेरासिया और सेहोर विधानसभा सीटों पर क्रमश: 77 और 76 फीसदी मतदान हुआ। हालांकि भोपाल में मतदान के बाद भगवा ब्रिगेड को एक बुरी खबर भी मिली। बीजेपी का गढ़ कहे जाने वाले गोविंदपुरा इलाके में मात्र 59.8% फीसदी मतदान हुआ। विधानसभा चुनाव में भोपाल दक्षिण-पश्चिम और भोपाल मध्‍य में कांग्रेस को जीत मिली थी और यहां पर क्रमश: 59.4% और 59.3% फीसदी मतदान हुआ। माना जा रहा है कि भोपाल में इतनी ज्‍यादा वोटिंग होने के पीछे वजह यह रही कि दोनों ही पक्षों ने अपनी पूरी ताकत लगा दी और मतदाताओं को वोटिंग केंद्रों तक लेकर आए। ग्रामीण और उपनगरीय इलाके में जमकर मतदान राजनी‍तिक विश्‍लेषक आरएस तिवारी के मुताबिक इस बार के चुनाव में चुनाव आयोग ने भी काफी प्रयास किया जिसका असर मतदान के प्रतिशत पर साफ नजर आया। बता दें कि वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में भोपाल में 44.69 प्रतिशत और वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में 57.79 प्रतिशत मतदान हुआ था। रविवार को भोपाल के ग्रामीण और उपनगरीय इलाके में जमकर मतदान हुआ।
आजमगढ़/फूलपुर उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 53 पर वोटिंग हो चुकी है और रविवार को हो रहे छठे चरण में प्रदेश की 14 सीटों पर मतदान जारी है, जिसमें से 13 पर 2014 के चुनाव में बीजेपी ने झंडा लहराया था। एकमात्र सीट आजमगढ़ की थी, जो समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव के कब्जे में आई थी। इस बार आजमगढ़ की सीट से मुलायम की विरासत को बचाने के लिए उनके बेटे और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव चुनाव मैदान में उतरे हैं। आजमगढ़ में समाजवादी पार्टी- बहुजन समाज पार्टी गठबंधन के प्रत्याशी के तौर पर अखिलेश चुनाव लड़ रहे हैं। उनके सामने बीजेपी के प्रत्याशी और भोजपुरी फिल्मों के ऐक्टर दिनेश लाल यादव 'निरहुआ' ताल ठोक रहे हैं। अखिलेश पूर्वांचल के इस बेल्ट में अपनी पोजिशन मजबूत करने की कोशिश में लगे हुए हैं। कांग्रेस ने इस सीट से कोई प्रत्याशी नहीं उतारा है। वहीं फूलपुर सीट पर भी भारतीय जनता पार्टी की प्रतिष्ठा दांव पर लगी हुई है। उपचुनाव में यह सीट गंवाने के बाद इस बार बीजेपी ने कुर्मी बहुल इस सीट पर केशरी देवी पटेल पर दांव खेला है। कांग्रेस ने भी यहां पर पंकज पटेल को टिकट देकर कुर्मी कार्ड खेला है। वहीं बीएसपी के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ रही समाजवादी पार्टी ने पंधारी यादव को मैदान में उतारा है। बात अगर संतकबीरनगर लोकसभा सीट की करें तो यहां मुकाबला त्रिकोणीय है। सांसद और विधायक के बीच मारपीट की घटना से सुर्खियों में आई इस सीट पर बीजेपी ने शरद त्रिपाठी का टिकट काटकर प्रवीण निषाद को कैंडिडेट बनाया है। निषाद पार्टी के संस्थापक संजय निषाद के बेटे प्रवीण ने गोरखपुर उपचुनाव में समाजवादी पार्टी के टिकट पर जीत दर्ज की थी। इस बार वह पाला बदलकर चुनाव लड़ रहे हैं। उनका मुकाबला गठबंधन की तरफ से बीएसपी के प्रत्याशी भीष्म शंकर उर्फ कुशल तिवारी तथा कांग्रेस के भालचंद्र यादव से है।
नई दिल्ली लोकसभा चुनाव का सफर दिल्ली तक पहुंच गया है। रविवार को 7 राज्यों की 59 सीटों में से दिल्ली की सात सीटों पर भी वोटिंग होगी। 2014 के लोकसभा चुनाव और 2015 के विधानसभा चुनाव ने दिल्ली के राजनीतिक समीकरण को कांग्रेस के खिलाफ कर दिया और अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी का उदय हुआ। लेकिन 2019 के चुनाव में कांग्रेस राजधानी में अपनी खोई जमीन को फिर से पाने के लिए पूरी जोर लगा रही है। 2015 में एकतरफा जीत हासिल करते हुए दिल्ली में सरकार बनाने वाली AAP धीरे-धीरे अपनी चमक खो रही है, जबकि बीजेपी को ऐंटी-पार्टी वोटों के AAP और कांग्रेस में संभावित बंटवारे में फायदा दिख रहा है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल के बीच आखिरी वक्त तक गठबंधन को लेकर बातचीत चली लेकिन आखिरकार कोशिश नाकाम हो गई और कांग्रेस ने अपने दिग्गजों को चुनाव मैदान में उतार दिया। कांग्रेस की तरफ से खुद पूर्व मुख्यमंत्री और दिल्ली कांग्रेस प्रमुख शीला दीक्षित, अजय माकन, महाबल मिश्रा और जेपी अग्रवाल मैदान में हैं। आम आदमी पार्टी ने भी राघव चड्ढा और आतिशी जैसे अपने लोकप्रिय चेहरों को चुनाव मैदा में उतारा जिन्हें राजधानी के सरकारी स्कूलों की सूरत 'बदलने' का श्रेय दिया जाता है। इनके अलावा दिलीप पांडे को भी AAP ने मैदान में उतारा है। 2014 में दिल्ली की सभी 7 सीटों पर जीत दर्ज करने वाली बीजेपी ने हर्ष वर्धन और मनोज तिवारी समेत अपने 5 मौजूदा सांसदों पर दांव खेला है। पार्टी को उम्मीद है कि मोदी की लोकप्रियता और बालाकोट एयर स्ट्राइक के बाद पैदा हुई राष्ट्रवाद की लहर उसके पक्ष में काम करेगी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर दिल्ली में हुई सीलिंग पार्टी की चिंता बढ़ा रही है। AAP- कांग्रेस वोट शेयर बीजेपी ने दिल्ली में पिछली बार 46 प्रतिशत वोटों पर कब्जा किया था, जबकि AAP को 33 प्रतिशत और कांग्रेस को 15 प्रतिशत वोट मिले थे। हालांकि, 2015 में आम आदमी पार्टी ने 54 प्रतिशत वोटों पर कब्जा किया था। प्रेक्षकों का कहना है कि केजरीवाल की पार्टी और कांग्रेस का वोटर बेस एक ही है, जिनमें मुस्लिम, अनधिकृत कॉलोनियों के रहने वाले और मिडल क्लास का फ्लोटिंग सेक्शन शामिल है। कांग्रेस ने जहां वोटरों से अपील की है कि वे केजरीवाल पर भरोसा नहीं करें बल्कि शीला दीक्षित के विकास मॉडल में विश्वास जताएं, वहीं आम आदमी पार्टी कांग्रेस पर बीजेपी के साथ हाथ मिलाने का आरोप लगा रही है। हालांकि, लग रहा है कि कांग्रेस अपनी खोई जमीन में से कुछ को वापस पा रही है। नॉर्थ ईस्ट दिल्ली के बाबरपुर के रहने वाले एक राशन दुकानदार मुस्तफा कहते हैं, 'मैंने AAP को वोट दिया था क्योंकि केजरीवाल ने बहुत सारी बातों का वादा किया था, लेकिन हमारे इलाके में पिछली बार अगर कोई विकास का काम हुआ तो वह शीला दीक्षित के दौर में हुआ था।' विकास पर बहस दिल्ली में कांग्रेस के उम्मीदवारों ने अपने प्रचार में मुख्य तौर पर शीला दीक्षित के 15 सालों के कार्यकाल में हुए विकास को जोर-शोर से उठाया। दूसरी तरफ, आम आदमी पार्टी सरकारी स्कूलों में सुधार और मोहल्ला क्लीनिक, बिजली-पानी के सस्ते होने का श्रेय ले रही है। साउथ दिल्ली की एक अनधिकृत कॉलोनी दक्षिणपुरी की लता देवी कहती हैं, 'हमारा बिजली-पानी का बिल काफी कम हो गया है और उन्होंने हमारे स्कूलों को बेहतर बनाया है। इससे कोई इनकार नहीं कर सकता कि AAP ने काम किया है।' हालांकि, साउथ दिल्ली के ही फ्रेंड्स कॉलोनी के बिजनसमैन सुनील कपूर की राय इससे जुदा है। वह कहते हैं, 'मौजूदा सरकार ने प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए कुछ नहीं किया। हर जाड़ों में स्मॉग एक मुद्दा बन जाता है और जैसे ही जाड़ा खत्म होता है, लोग इसे भूल जाते हैं।' सीलिंग एक बड़ा मुद्दा नोटबंदी और जीएसटी के लागू होने पर व्यापारी समुदाय पर असर पड़ा था। लेकिन अब यह इतना बड़ा मुद्दा नहीं है कि बीजेपी को इससे नुकसान हो। हालांकि, सीलिंग एक बड़ा मुद्दा जरूर है। कोर्ट के आदेश पर लाजपत नगर, करोल बाग और साउथ एक्सटेंशन जैसे पॉप्युलर ट्रेडिंग हबों में कई दुकानों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों की सीलिंग हुई। इसे लेकर बीजेपी को व्यापारी वर्ग की नाराजगी का सामना करना पड़ सकता है। लाजपत नगर में कपड़ों के कारोबारी सागर कपूर कहते हैं, 'छोटे और मध्यम श्रेणी के कारोबारी सबसे ज्यादा प्रभावित हुए क्योंकि दुकान ही उनकी आजीविका का साधन था। उनमें बहुत असंतोष है।' बीजेपी को परंपरागत रूप से ट्रेडर और बिजनस कम्यूनिटी का समर्थन मिलता रहा है, लेकिन सीलिंग के मुद्दे पर पार्टी बैकफुट पर नजर आती दिख रही है। कांग्रेस के अजय माकन को नई दिल्ली में बीजेपी की मौजूदा सांसद मीनाक्षी लेखी पर बढ़त दिख रही है जो ऐंटी-इन्कंबेंसी के साथ-साथ 'पहुंच से बाहर' रहने वाली नेता की अपनी छवि से जूझ रही हैं।
लखनऊ बीजेपी का गढ़ समझे जाने वाले पूर्वी उत्‍तर प्रदेश की 27 लोकसभा सीटों पर अगले दो चरणों में 12 और 19 मई को मतदान होना है। इन 27 सीटों पर समाजवादी पार्टी के अध्‍यक्ष अखिलेश यादव के लिए सबसे बड़ा इम्तिहान है। अखिलेश अपने ओबीसी वोटों को मायावती की पार्टी बीएसपी के पक्ष में दिलवा पाएंगे या नहीं, यह यक्ष प्रश्‍न बना हुआ है। मायावती ने 27 में से 17 सीटों पर अपने उम्‍मीदवार खड़े किए हैं और इनमें से ज्‍यादातर सीटों पर मुकाबला बीजेपी बनाम महागठबंधन होने जा रहा है। विश्‍लेषकों के मुताबिक इन दोनों चरणों में अखिलेश यादव को न केवल अपने लोगों को बीएसपी को वोट करने के लिए उत्‍साहित करना होगा बल्कि दशकों पुरानी दलित और ओबीसी शत्रुता को खत्‍म कराना होगा। इन 17 सीटों पर बीएसपी के प्रत्‍याशियों की जीत इस बात पर निर्भर करेगी कि अखिलेश यादव अपने परंपरागत वोटों को कितना ट्रांसफर करा पाते हैं। ग्रामीण सीटों पर बीएसपी, शहरी पर एसपी अंतिम दो चरणों की 27 सीटों में से ग्रामीण सीटों पर बीएसपी लड़ रही है, वहीं शहरी सीटों पर एसपी ने अपने प्रत्‍याशी उतारे हैं। अखिलेश यादव अपनी जाति के लोगों का वोट बीएसपी को दिलाने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। जातिगत भावनाओं को मजबूत करने के लिए अखिलेश यादव बार-बार लोगों को यह याद दिला रहे हैं कि विधानसभा चुनाव में हार के बाद किस तरह से उनके सीएम आवास से हटने पर यूपी के सीएम योगी आदित्‍यनाथ ने पूरे घर को पवित्र करने के लिए गंगाजल से धुलवाया था। अखिलेश यह भी याद दिला रहे हैं कि योगी ने कहा था कि अगर संविधान नहीं होता तो वह भैंस चरा रहे होते। इस बीच चुनावी नारों और प्रतिकों के बीच एसपी चीफ ने अपने वॉर रूम में गतिविधि को बढ़ा दिया है। वह हर संसदीय क्षेत्र की प्रतिदिन की रिपोर्ट पर नजर रख रहे हैं। अखिलेश ने एक बड़ा सा कार्यालय बनाया है जो उन्‍हें बताता है कि किस जिले में प्रत्‍याशी को अतिरिक्‍त लोगों और अन्‍य संसाधनों की जरूरत है। अखिलेश ने विज्ञापन देने से परहेज किया एसपी अध्‍यक्ष ने टीवी और समाचार पत्रों में इस बार गठबंधन के लिए विज्ञापन देने से परहेज किया है और वह अपने समर्थकों तक सीधी पहुंच के लिए सोशल मीडिया का सहारा ले रहे हैं। यही नहीं जो लोग गठबंधन को जीत दिलाने में हीलाहवाली दिखा रहे हैं, उन्‍हें चेतावनी दी गई है कि यह उनका अंतिम चुनाव होगा। खलीलाबाद में अखिलेश ने रैली की और वहां कांग्रेस प्रत्‍याशी भालचंद्र यादव का समर्थन कर रहे पार्टी के नेताओं को अपने मंच से ही चेतावनी दी। मायावती के अनुरोध पर अखिलेश ने भदोही में जनसभा की जहां से बीएसपी के उम्‍मीदवार रंगनाथ मिश्रा चुनाव लड़ रहे हैं। यहां पर कांग्रेस ने आजमगढ़ के चर्चित यादव नेता रमाकांत को टिकट दिया है। अखिलेश जानते हैं कि बीएसपी चीफ ने जो गठबंधन के लिए किया है, उसका बदला उन्‍हें चुकाना होगा। माया ने अपनी पुरानी दुश्‍मनी को भुलाकर अपना पूरा जोर एसपी को दलित वोटों के ट्रांसफर पर लगा दिया है। यही नहीं कई साल बाद पहली बार मायावती ने मुलायम सिंह के लिए प्रचार किया और उनकी तारीफ की थी।
चंडीगढ़ हरियाणा की 10 लोकसभा सीटों पर रविवार को छठे चरण में मतदान होगा। इस चुनावी राज्‍य में इन दिनों तीन मुद्दे सबसे ज्‍यादा गरम हैं। ये हैं-मोदी, जाट और नौकरियां। बुधवार को सैनिकों की बहुलता वाले राज्‍य हरियाणा के फतेहाबाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की सुरक्षा के मुद्दे पर विपक्ष को घेरा और कहा कि देश अपनी सुरक्षा को मजबूत किए बिना कैसे वर्ल्‍ड पावर बन पाएगा। उन्‍होंने कहा कि कांग्रेस या महागठबंधन के नेता देश की रक्षा के मुद्दे पर बात करने से बच रहे हैं। हरियाणा के बारे में कहा जाता है कि यहां पर 36 बिरादरी शांतिपूर्ण तरीके से एकसाथ रहती हैं लेकिन जाटों के हिंसक प्रदर्शन के बाद यहां स्थिति अब बदल गई है। चुनाव से पहले एक नया शब्‍द गढ़ा गया है 35+1 (35 अगल-अलग समुदाय+ जाट समुदाय)। हरियाणा की कुल आबादी का 27 फीसदी हिस्‍सा जाट हैं। जाट राज्‍य की राजनीति में बेहद प्रभावशाली हैं। हालांकि हाल ही में जाटों और गैर जाटों में हालिया दरार ने सामाजिक ताने-बाने और राजनीतिक परिदृश्‍य को पूरी तरह से बदल दिया है। इस बार के संसदीय चुनाव हरियाणा के लिए महत्‍वपूर्ण हैं क्‍योंकि इससे यह पता चलेगा कि इस साल अक्‍टूबर में होने वाले हरियाणा चुनाव में कौन जीत सकता है। आइए जानते हैं कि क्‍या हैं इस राज्‍य के प्रमुख मुद्दे.... सोशल इंजिनियरिंग हरियाणा की राजनीति में जाट वोटों के लिए परंपरागत तौर पर कांग्रेस और आईएनएलडी के बीच लड़ाई रही है। हालांकि वर्ष 2014 में यह परिदृश्‍य बदल गया जब बीजेपी ने एक नई सोशल इंजिनियरिंग को बढ़ावा दिया और गैर-जाट पंजाबी वोटों पर अपना ध्‍यान केंद्रित किया। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में 10 में से सात सीट जीतकर बीजेपी ने बहुत चालाकी से जाट नेताओं के सामने पंजाबी उम्‍मीदवारों को टिकट दिया। बीजेपी ने 90 में से 47 सीटों पर जीत हासिल की। इस बढ़त का लाभ उठाने के लिए बीजेपी ने मनोहर लाल खट्टर को मुख्‍यमंत्री बनाया जो पंजाबी हैं। जाट आंदोलन के बाद वर्ष 2019 में भी बीजेपी अपने राजनीतिक प्रयोग पर कायम है और उसने दिग्‍गज जाट नेताओं के सामने पंजाबी ब्राह्मण उम्‍मीदवारों को टिकट दिया है। रोहतक के मदीना के रहने वाले प्रताप दहिया कहते हैं, 'जाट जाट को वोट देते हैं। मेरा पूरा गांव दीपेंदर सिंह हुड्डा को वोट देगा।' यही भावना रोहतक में भी है जो जाट आंदोलन का गढ़ रहा था। उधर, जींद के मोअना गांव के ग्राम पंचायत सदस्‍य बलबीर कहते हैं, 'उन्‍होंने (जाट) 36 बिरदारी में चल रही शांति को खत्‍म कर दिया। प्रदर्शनकारियों ने सैनी जैसी जातियों की दुकानों को लूट लिया। यह हुड्डा की शह पर किया गया।' हालांकि हुड्डा इन आरोपों को खारिज करते हैं। दीपेंदर कहते हैं, 'यह जातियों के बीच बंटवारा बीजेपी ने पैदा क‍िया है। कांग्रेस इस विभाजनकारी राजनीति को मात देगी।' वोटों में जमकर बंटवारा आबादी के लिहाज से काफी अधिक जाटों को सभी दल लुभाने में लगे हुए हैं। इस कड़ी में जननायक जनता पार्टी भी जुड़ गई है जो चौटाला परिवार में कलह के बाद आईएनएलडी से टूटकर बनी है। जेजेपी के दुष्‍यंत चौटाला ने आम आदमी पार्टी के साथ गठजोड़ करके मैदान में हैं और आईएनएलडी को नुकसान पहुंचा सकते हैं। आप हरियाणा में भले ही एक बड़ी राजनीतिक ताकत न हो लेकिन पिछले चुनाव में उसे हर सीट पर 30 से 40 हजार वोट मिले थे। इसके अलावा मायावती भी राज्‍य की राजनीति में एक ताकत हैं। बीजेपी जहां पंजाबी वोट बैंक पर अपना ध्‍यान दे रही है वहीं कुरुक्षेत्र के विद्रोही सांसद राजकुमार सैनी की लोक सुरक्षा पार्टी भगवा पार्टी के लिए संकट पैदा करने में लगी है। मोदी के राष्‍ट्रवाद की लहर पूरे हरियाणा में एक मुद्दा हर जगह है, वह है राष्‍ट्रवाद का। रोहतक संसदीय क्षेत्र के सिसार खास गांव में प्रवेश करते ही दो शहीद जवानों की मूर्तियां लगी हुई हैं। इस मूर्ति के पास बैठे पीलू कहते हैं, 'कोई और फैक्‍टर नहीं बस भारत है। यदि भारत नहीं होगा तो कल नहीं होगा। केवल शेर मोदी ही पाकिस्‍तान का मुकाबला कर सकते हैं।' राज्‍य में मोदी की लोकप्रियकता है और ऐसी धारणा है कि केवल वही देश की रक्षा कर सकते हैं और राज्‍य में विकास ला सकते हैं। पीएम मोदी ने आज फतेहाबाद में अपनी रैली में राष्‍ट्रवाद की इसी भावना को साधने की कोशिश की। उन्‍होंने कहा, '7 दशक तक देश में नैशनल वॉर मेमोरियल भी नहीं बना। अपने परिवार के तो आपने हर गली में स्मारक खड़े कर दिए लेकिन देश के मरने वालों के लिए नहीं। जो काम आपने 70 साल में नहीं किया वो हमने 5 साल में किया है। हम आए हमने वादा किया था कि वन रैंक वन पेंशन के लिए जब हमने लागू किया तो अब तक 35 हजार करोड़ रुपया सेना के परिवारों को पहुंचाया।' नौकरियों पर चुनावी जंग कांग्रेस भले ही न्‍यूनतम आय की गारंटी वाली 'न्‍याय योजना' पर दांव लगा सकती है लेकिन राज्‍य की बीजेपी सरकार ने सरकारी नौकरियां देने को अपनी बड़ी उपलब्धि बता रही है। मोअना गांव के चंद्रम कहते हैं, 'इस सरकार ने हमारे लड़कों को नौकरी दी है। इस साल मेरिट लिस्‍ट में हमारे गांव के चार बच्‍चों के नाम थे। कांग्रेस या अन्‍य दलों ने युवाओं के लिए क्‍या किया?' उधर, बीजेपी ने आरोप लगाया है कि कांग्रेस नेता हुड्डा ने सभी नौकरियां अपने क्षेत्र सोनीपत और रोहतक के लोगों को ही दी।
नई दिल्ली, 07 मई 2019,लोकसभा चुनाव 2019 के पांच चरण की वोटिंग के बाद छठे चरण की सीटों पर राजनीतिक दलों ने चुनाव प्रचार तेज कर दिया है. छठे चरण में देश के सात राज्यों की 59 सीटों पर 12 मई को वोट डाले जाएंगे. इनमें राजधानी की दिल्ली से लेकर उत्तर प्रदेश, हरियाणा और मध्य प्रदेश सहित पश्चिम बंगाल की सीटों पर चुनाव होने हैं. इस चरण में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव से लेकर केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी, कांग्रेस के ज्योतिरादित्य सिंधिया और एमपी के पूर्व सीएम दिग्विजय सिंह, साध्वी प्रज्ञै तक प्रतिष्ठा दांव पर है. उत्तर प्रदेश (14)- सुल्तानपुर, प्रतापगढ़, फूलपुर, इलाहाबाद, अम्बेडकर नगर, श्रावस्ती, डुमरियागंज, बस्ती, संत कबीर नगर, लालगंज, आजमगढ़, जौनपुर, मछलीशहर और भदोही सीट है. इन 14 सीटों पर कुल 174 प्रत्याशी मैदान में है. 2014 में 12 सीटें बीजेपी, एक सीट अपना दल और एक सीट सपा को मिली थी. मध्य प्रदेश (8) - मुरैना, भिंड, गुना, विदिशा, राजगढ़, सागर, ग्वालियर और भोपाल सीटे हैं. 2014 में इन आठ में से बीजेपी सात सीटें जीतने में कामयाब रही थी. जबकि कांग्रेस को एक सीट मिली थी. बिहार (8)- वाल्मीकि नगर, पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण, शिवहर, वैशाली, गोपालगंज, सिवान और महराजगंज सीट है. इन सभी आठों सीटों को बीजेपी जीतने में कामयाब रही थी. हरियाणा (10)- अंबाला, कुरुक्षेत्र, सिरसा, हिसार, करनाल, सोनीपत, रोहतक, भिवानी-महेंद्रगढ़, गुड़गांव और फरीदाबाद सीट है. 2014 में इन 10 सीटों में से बीजेपी 7, इनेलो 2 और कांग्रेस महज एक सीट ही जीत सकी थी. झारखंड (4)- गिरीडीह, धनबाद, जमशेदपुर और सिंहभूम सीट है. 2014 में बीजेपी इन चार सीटें जीतने में कामयाब रही थी. दिल्ली (7)- चांदनी चौक, नई दिल्ली, उत्तर पूर्वी दिल्ली, पूर्वी दिल्ली, उत्तर पश्चिम दिल्ली, पश्चिम दिल्ली और दक्षिण दिल्ली सीट हैं. इन सभी सातों सीटों को 2014 में बीजेपी जीतने में कामयाब रही थी. पश्चिम बंगाल (8)- तामलुक, कांति, घाटल, झारग्राम, मेदिनीपुर, पूर्णिया, बांकुरा और विष्णुपुर सीट है. 2014 में इन सभी आठ सीटों को टीएमसी जीतने में कामयाब रही थी.
लखनऊ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यूपी में इस बार 74 से अधिक सीटें जीतने का दावा किया। महागठबंधन की संभावनाओं को नकारते हुए उन्होंने कहा कि इस साल मोदी लहर पिछली बार से भी अधिक तेज है। इकनॉमिक टाइम्स के अमन शर्मा के साथ बातचीत में यूपी के सीएम ने इन चुनावों में अमेठी और आजमगढ़ सीट जीतने का भी दावा किया। आचार संहिता उल्लंघन मामले में चुनाव आयोग के बैन पर यूपी के सीएम ने कहा कि कोई मुझे मंदिर जाने से नहीं रोक सकता, मैं प्रचार नहीं कर रहा होत हूं उस वक्त भी मंदिर जाता हूं। पांचवें फेज के साथ 53 लोकसभा सीटों पर चुनाव संपन्न हो गए हैं। उत्तर प्रदेश में बीजेपी अकेले ही 74 से अधिक सीटें जीत रही है। अभी तक जिन 53 सीटों पर चुनाव हुए हैं उनमें से 47-50 सीटें हम जीत रहे हैं। इस बार हम अमेठी और आजमगढ़ से भी चुनाव जीत रहे हैं। अमेठी से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के खिलाफ स्मृति उम्मीदवार हैं और आजमगढ़ से यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव के खिलाफ भोजपुरी स्टार निरहुआ उम्मीदवार हैं। क्या इसका मतलब यह है कि 2014 में जो मोदी लहर थी वह अभी तक बरकरार है? मोदी लहर पिछली बार से ज्यादा तेज है इस बार। 2014 में मोदी लहर के नाम पर लोगों के दिमाग में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर थी और गुजरात में किए उनके अच्छे काम थे। उस वक्त के हालात क्या थे? उत्तर प्रदेश में लोगों को 2 घंटे बिजली तक नहीं मिलती थी। अभी पूरे भारत में प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में विकास कार्य हुए हैं। आप पूरे उत्तर प्रदेश में देख लीजिए न तो केंद्र सरकार और न ही राज्य सरकार के खिलाफ कोई ऐंटी इनकम्बेंसी का माहौल है। राहुल गांधी और मायावती का नाम भी विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री पद के लिए चल रहा है... ये दोनों लोग प्रधानमंत्री बनने की रेस में कहीं नहीं हैं। लोगों को पता है कि पीएम मोदी अपने लिए कुछ नहीं करते हैं । वह जो कुछ भी करते हैं देश के लिए ही करते हैं। एसपी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव इस बार ज्यादा प्रचार नहीं कर रहे हैं? मुलायम सिंह यादव इस गठबंधन का समर्थन कैसे कर सकते हैं? उन्होंने कहा है कि कभी वह टिकट बांटा करते थे और अब उन्हें अपने लिए टिकट मांगना पड़ रहा है। एक दफा उत्तर प्रदेश से उनकी पार्टी ने 37 सीटें जीती थीं और इस बार उनकी अपनी ही पार्टी 37 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। 1993 में जब एसपी-बीएसपी गठबंधन ने चुनाव लड़ा था तो एसपी ने दो तिहाई सीटों पर और बीएसपी ने एक तिहाई सीटों पर चुनाव लड़ा था। इस बार बीएसपी 38 और एसपी 37 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। एसपी के संस्थापक यह सब कैसे स्वीकार कर सकते हैं? इस बार नया फैक्टर प्रियंका गांधी है... उन्होंने 2014 और 2017 में भी यहां चुनाव प्रचार किया था। दोनों ही बार वह फेल हो गईं और इस बार भी वह और बुरी तरह से फेल होनेवाली हैं। पहले उन्होंने ऐसा दावा किया था कि वह वाराणसी से चुनाव लड़ेंगी, लेकिन बाद में पीछे हट गईं। सिर्फ यही बात नहीं है, मुझे बहुत अधिक पीड़ा हुई यह देखकर कि प्रियंका वाड्रा जिनके खुद के बच्चे हैं, वह दूसरे बच्चों को अपनी फ्रस्टेशन में अपशब्द बोलना सिखा रही हैं। प्रियंका गांधी ने कहा है कि कांग्रेस जिन सीटों पर नहीं जीत रही है वहां बीजेपी के लिए मुश्किल खड़े करेगी? एक पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव का यह कहना कि बीजेपी के वोट काटने के लिए पार्टी चुनाव लड़ रही है, उनकी अपनी पार्टी के लिए ही बहुत शर्मनाक है। चुनाव आयोग आपको आचार संहिता उल्लंघन के आरोप में एक के बाद दूसरा नोटिस भेज रहा है? हमने हर नोटिस का जवाब दिया है। लेकिन आयोग ने आपको 3 दिन के लिए चुनाव प्रचार से भी रोका था? क्या आप मुझे मंदिर जाने से रोक पाए? मैं अभी भी मंदिर जाता हूं। मैं वह सारे काम कर रहा हूं जो मुझे करने चाहिए। मेरी आस्था को कोई कैसे रोक सकता है। कोई भी इसे नहीं रोक सकता। यह मेरा संवैधानिक अधिकार है। उत्तर प्रदेश में इस तरह की भी भावना कुछ लोगों के बीच है कि अल्पसंख्यक समुदाय के मन में योगी को लेकर संशय है? पिछले 2 साल में प्रदेश में कोई दंगा नहीं हुआ है। सभी त्योहार होली, दिवाली, ईद, क्रिसमस शांतिपूर्ण तरीके से मनाए गए हैं। सबसे बड़ा आयोजन कुंभ का था जो अच्छी तरह से निपट गया। बीजेपी को इस बार इतना भरोसा क्यों है कि अमेठी और आजमगढ़ में भी उनकी जीत होनेवाली है? बीजेपी की सरकार ने वहां लोगों को विकास के साथ एक नई पहचान दी है। एसपी के शासनकाल में आजमगढ़ की ऐसी पहचान बनाई गई थी कि वहां के लड़कों को किराए पर कोई कमरा भी नहीं देता था, जॉब तो भूल जाइए। हमने आजमगढ़ को लेकर लोगों की राय बदली है। पिछले 4 दशक से अमेठी पर एक ही परिवार का कब्जा है, लेकिन वहां कोई विकास कार्य नहीं हुआ है। स्मृति इरानी की अमेठी में सक्रियता लगातार बनी हुई है। पिछले 5 साल में स्मृति जितनी बार अमेठी गई हैं राहुल गांधी 15 साल में नहीं गए। अमेठी में उन्होंने कई विकासकारी योजनाएं शुरू की हैं।
नई दिल्ली, कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने कहा है कि मौजूदा लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के अपने दम पर बहुमत हासिल करने की संभावना नहीं है, लेकिन उन्होंने पूरे भरोसे के साथ कहा कि कांग्रेस की अगुवाई वाला संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) एकजुट है. साथ ही कहा कि गठबंधन अगली सरकार बनाने की स्थिति में हो सकता है. समाचार एजेंसी आईएएनएस से बातचीत में सिब्बल ने कहा कि अगर कांग्रेस लोकसभा में बहुमत के 272 के आंकड़े को लेकर आश्वस्त होती तो वह निश्चित रूप से राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करती, क्योंकि वह पार्टी में 'निर्विवाद नेता' हैं. हालांकि, जाने-माने वकील व पूर्व केंद्रीय मंत्री सिब्बल से जब यह सवाल पूछा गया कि अगर संप्रग को बहुमत मिलता है तो कौन प्रधानमंत्री होगा? इस पर वो टाल-मटोल करते रहें. उन्होंने कहा कि नतीजे आने के बाद गठबंधन द्वारा घोषणा की जाएगी. जब उनसे पूछा गया कि कांग्रेस राहुल गांधी को अपना प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित करने से हिचक क्यों रही है, तब उन्होंने कहा कि अगर कांग्रेस को 272 सीटें मिलतीं तो कोई हिचकिचाहट नहीं होती. सिब्बल से कहा गया कि कांग्रेस अभी भी राहुल गांधी को अपने प्रधानमंत्री उम्मीदवार के तौर पर आगे बढ़ा सकती और कह सकती है कि अगर पार्टी को बहुमत मिलता है तो वह प्रधानमंत्री होंगे. इस पर उन्होंने कहा, 'निसंदेह अगर हमें बहुमत मिलता है तो इसमें कोई संदेह नहीं है, लेकिन इसे कहने का कोई सवाल नहीं है. हम जानते हैं कि हमें बहुमत नहीं मिलेगा. हम जानते हैं कि हमें 272 सीटें नहीं हासिल होंगी, हम यह भी जानते हैं कि भाजपा को भी 160 से ज्यादा सीटें नहीं मिलेंगी.' जब उनसे कहा गया कि वह एक बड़ा बयान दे रहे हैं तो उन्होंने जवाब दिया, 'क्यों नहीं, बिल्कुल, हमें बहुमत नहीं मिलेगा, कोई संभावना नहीं है.' सिब्बल से फिर से पूछा गया कि क्या वह कहना चाहते हैं कि कांग्रेस को बहुमत नहीं मिलेगा? इस पर उन्होंने कहा, 'हमें अपने दम पर 272 सीटें नहीं मिलेंगी. बहुमत मिलने की बात कहना मेरे लिए मूर्खता होगी और भाजपा को 160 से कम सीटें मिलेंगी.' इसके साथ ही उन्होंने कहा कि कांग्रेस की अगुवाई वाले संप्रग को चुनाव में बढ़त हासिल होगी और यह सरकार बना सकता है. हालांकि, इसे 'महागठबंधन' से भी लड़ना है. 'महागठबंधन' उत्तर प्रदेश में कुछ विपक्षी पार्टियों का गठबंधन है. यह पूछे जाने पर कि अगर कांग्रेस की अगुवाई वाला संप्रग बहुमत हासिल करता है तो प्रधानमंत्री कौन हो सकता है? सिब्बल ने कहा कि यह गठबंधन द्वारा तय किया जाएगा. यह सब 23 मई को परिणामों की घोषणा के बाद होगा. यह पूछे जाने पर कि राहुल गांधी के अलावा कोई दूसरा हो सकता प्रधानमंत्री है? उन्होंने कहा, 'मुझे नहीं पता, गठबंधन तय करेगा. इस विषय पर गठबंधन के साझेदार फैसला करेंगे. जहां तक कांग्रेस पार्टी का सवाल है तो राहुल गांधी कांग्रेस में निर्विवाद नेता हैं.' महागठबंधन की क्षमता के संदर्भ में सवाल करने पर सिब्बल ने कहा कि इसे कांग्रेस ने नहीं बनाया है. सिब्बल ने कहा, 'हमारा गठबंधन एकजुट है. हमारी पार्टी के साथ गठबंधन है. हमारे सभी गठबंधन 2014 से पहले के हैं और बरकरार हैं, चाहे यह राकांपा हो या द्रमुक. हमने दो और को जोड़ा है. इसमें कर्नाटक में जेडीएस व पश्चिम बंगाल में माकपा है.' यह जिक्र करने पर कि समाजवादी पार्टी ने अलग होकर बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन कर लिया. सपा पहले कांग्रेस के साथ थी. इस पर सिब्बल ने कहा, 'यह हमारी गलती नहीं है, हमारे गठबंधन साझेदार एकजुट हैं हमने उनमें से किसी को नहीं छोड़ा है, बल्कि हमने अपने गठबंधन साझेदारों को जोड़ा है.' उन्होंने कहा, 'लेकिन (बसपा प्रमुख) मायावती ने लगातार इसका विरोध किया. उन्होंने आपस में सीटें बांट लीं और कहा कि हमने दो सीटें कांग्रेस के लिए छोड़ दी हैं. फिर ऐसे गठबंधन कैसे हो सकता है.
नई दिल्ली, 06 मई 2019, रायबरेली संसदीय सीट देश के चंद हाईप्रोफाइल सीटों में से एक मानी जाती है. कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष और यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी रायबरेली सीट से पांचवीं बार चुनावी चुनौती पेश कर रही हैं. अगर सोनिया इस बार भी चुनावी जंग फतह करने में कामयाब रहती हैं तो उनके नाम एक रिकॉर्ड दर्ज हो जाएगा. रायबरेली के सियासी इतिहास में पहली बार होगा जब कोई नेता पांचवीं बार यहां से जीतकर संसद पहुंचेगा. अब देखना होगा कि बीजेपी सोनिया के विजयी रथ को इस बार रोक पाने में कामयाब हो पाती है या नहीं. 19वें लोकसभा चुनाव के तहत रायबरेली लोकसभा सीट पर चुनाव के पांचवें चरण के तहत आज सोमवार (6 मई) को वोट डाले जा रहे हैं. वोटिंग को लेकर सुरक्षा व्यवस्था के भारी इंतजाम किए गए हैं. पोलिंग बूथों की सुरक्षा बढ़ा दी गई है. रायबरेली लोकसभा सीट पर 15 उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं. कांग्रेस की सोनिया गांधी को बीजेपी के दिनेश प्रताप सिंह से कड़ी चुनौती मिल सकती है. सपा-बसपा गठबंधन ने यहां से अपना उम्मीदवार नहीं उतारा है. जबकि प्रगतिशील समाजवादी पार्टी ने राम सिंह यादव मैदान में हैं. 6 उम्मीदवार बतौर निर्दलीय अपनी चुनौती पेश कर रहे हैं. वहीं सोमवार को इस संसदीय सीट से बीजेपी उम्मीदवार दिनेश प्रताप सिंह ने कहा कि पीएम मोदी ने मुझे चुनाव लड़ने के लिए चुना ये मेरे लिए गर्व की बात हैं. मैं रायबरेली का मिनी मोदी हूं. मैं ये चुनाव ज़मीनी नेता के तौर पर चुनाव लड़ रहा हूं. दिनेश प्रताप सिंह ने आगे ये भी कहा कि मैं पहले कांग्रेस में था, ये मेरी गलती थी. कांग्रेस में सम्मान नहीं किया जाता था. मैंने अभी केएल शर्मा के पांव छुए, ये हमारे संस्कार हैं. लेकिन प्रियंका गांधी और राहुल गांधी ने कभी पांव नहीं छुए. राहुल गांधी जब अध्यक्ष बने थे, उन्होंने अपनी मां सोनिया गांधी के पांव नहीं छुए थे. आगे उन्होंने कहा कि मैं कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बीएसपी में रहा हूं इसलिए इन सबका चिट्ठा जानता हूं. 23 मई को पता चल जाएगा कि मैं बलि का बकरा नहीं हूं. दिनेश प्रताप सिंह के मुताबिक, रायबरेली की जनता बहुत समझदार हैं. सोनिया गांधी लाखों वोट चुनाव से चुनाव हार रही हैं इसका पता 23 मई को चल जाएगा. सोनिया गांधी के नाम रिकॉर्ड रायबरेली लोकसभा सीट पर अब तक हुए चुनाव में कोई भी उम्मीदवार चार बार से अधिक चुनाव जीतकर लोकसभा नहीं पहुंचा है. जबकि फिरोज गांधी से लेकर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी यहां से चुनाव लड़ चुकी हैं. इस सीट पर अभी तक सबसे ज्यादा चार बार जीतने का रिकॉर्ड कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी के नाम है. सोनिया गांधी ने जब सियासत में कदम रखा तो पहली बार उन्होंने अपने पति राजीव गांधी की संसदीय सीट अमेठी को अपनी कर्मभूमि बनाया और 1999 में यहीं से चुनकर पहली बार संसद पहुंचीं. 2004 में राहुल गांधी ने राजनीति में एंट्री के बाद सोनिया गांधी ने बेटे के लिए अमेठी छोड़कर अपनी सास और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की संसदीय सीट रायबेरली को अपनाया और यहीं की होकर रह गईं. सोनिया गांधी ने रायबेरली सीट से पहला चुनाव 2004 में लड़ा और करीब ढाई लाख मतों के अंतर से चुनाव में जीत दर्ज की. लेकिन उन्हें कार्यकाल में लाभ के पद के आरोप के चलते लोकसभा सदस्यता से इस्तीफा देना पड़ा था. 2006 में उपचुनाव हुआ और सोनिया गांधी करीब 4 लाख 17 हजार मतों से जीत दर्ज की. 2009 में वह एक बार फिर चुनावी मैदान में उतरीं और उन्होंने पौने चार लाख मतों से जीत हासिल की. इसके बाद चौथी बार 2014 के लोकसभा चुनाव में उतरीं और करीब साढ़े तीन लाख वोटों से जीत हासिल की. सोनिया के बाद इंदिरा गांधी सोनिया गांधी के बाद सबसे ज्यादा बार जीतने का रिकॉर्ड इंदिरा गांधी के नाम है. वह चार बार चुनावी मैदान में उतरीं और तीन बार जीत दर्ज करने में कामयाब रही थीं. इंदिरा गांधी ने पहला चुनाव 1967 में लड़ा और जीतकर संसद पहुंचीं. इसके बाद दूसरी बार 1971 में भी जीत दर्ज की और तीसरी बार वह 1977 में मैदान में उतरीं तो उन्हें राजनारायण के हाथों हार का मुंह देखना पड़ा. इसके बाद 1980 में इंदिरा गांधी ने रायबरेली और मेडक सीट से पर्चा भरा और दोनों जगह से जीतने में कामयाब रहीं, लेकिन उन्होंने रायबरेली से इस्तीफा दे दिया. रायबरेली सीट से दो-दो बार जीतने का रिकॉर्ड फिरोज गांधी, बैजनाथ कुरील, अरुण नेहरू, शीला कौल और अशोक सिंह के नाम हैं. 1999 में कैप्टन सतीश शर्मा यहां से सांसद बने. मोदी लहर में भी इस सीट पर बीजेपी का कमल नहीं खिल सका है. दिलचस्प बात ये है कि सपा और बसपा इस सीट पर अभी तक खाता नहीं खोल सकी हैं.
लखनऊ कहते हैं कि नई दिल्‍ली का रास्‍ता उत्‍तर प्रदेश होकर जाता है और देश की राजनीति के इस केंद्र पर कब्‍जे के लिए सत्‍ताधारी बीजेपी को वर्ष 2014 की अपेक्षा ज्‍यादा पुख्‍ता रणनीति के साथ मैदान में उतरना पड़ा है। पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए 80 में से 71 सीटों पर कब्‍जा किया था लेकिन इस बार उसे एसपी-बीएसपी गठबंधन से कड़ी टक्‍कर मिल रही है। आइए जानते हैं कि वर्ष 2019 में जीत के लिए क्‍या है बीजेपी की रणनीति... राजनीतिक विश्‍लेषकों का मानना है कि 'उत्‍तर प्रदेश बीजेपी की नाक है।' सीटों के लिहाज से देश के सबसे बड़े राज्‍य में बीजेपी ने जोरदार प्रदर्शन करके पूरे देश को चौका दिया था। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने यूपी में 80 में से 71 सीटों पर जीत हासिल करके नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने का रास्‍ता साफ कर दिया था। बीजेपी के अलावा उसकी सहयोगी अपना दल को भी दो सीटें मिली थीं। इस तरह यूपी में एनडीए को 73 सीटें मिली थीं। 2019 में स्थिति 2014 की अपेक्षा काफी अलग वर्ष 2019 में स्थिति पिछले चुनाव की अपेक्षा काफी अलग है। दशकों तक एक-दूसरे की धुर विरोधी रही एसपी और बीएसपी एकसाथ आ गई हैं और उन्‍होंने आरएलडी के साथ गठबंधन बनाया है। इस महागठबंधन ने अब यूपी में बीजेपी के लिए करो या मरो की स्थिति पैदा कर दी है। इस महाचुनौती से निपटने के लिए बीजेपी ने अपनी 5 सदस्‍यीय टीम को मोर्चे पर लगा दिया है जो चुपचाप और पूरी रणनीति के साथ काम कर रही है ताकि भगवा पार्टी यूपी में अपना स्‍थान बनाए रखने में सफल हो जाए। बीजेपी की इस चुनावी टीम को भरोसा है कि 'उत्‍तर प्रदेश में पार्टी पूरे देश को सुखद आश्‍चर्य में डाल देगी।' बीजेपी के चुनावी रणनीतिकारों में शामिल संघ के एक वरिष्‍ठ नेता ने जोर देकर कहा, 'बीजेपी एक यथार्थवादी पार्टी है। हम जानते हैं कि वर्ष 2014 की तरह पार्टी शानदार प्रदर्शन नहीं करने जा रही है लेकिन वर्ष 2019 में भी हमारा चुनाव परिणाम ऐसा नहीं होगा जिसे कोई हल्‍के में ले सके।' बीजेपी ने बनाई 5 सदस्‍यीय टीम बीजेपी की इस पांच सदस्‍यीय टीम में सुनील बंसल (मोदी की तरह पूर्णकालिक प्रचारक रहे), बीजेपी के दलित नेता और राष्‍ट्रीय उपाध्‍यक्ष दुष्‍यंत गौतम, मध्‍य प्रदेश के नेता डॉक्‍टर नरोत्‍तम मिश्रा, गुजरात के गोरधन झड़फिया और यूपी के सीएम योगी आदित्‍यनाथ शामिल हैं। यह टीम रणनीति बनाती है और इसकी रिपोर्ट सीधे पार्टी के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष अमित शाह को भेजती है। टीम में शामिल एक सदस्‍य कहते हैं, 'यूपी में इस बार हमारे लिए सब आसान नहीं है। दिसंबर से जिस तरीके से हमने काम किया है, हमें विश्‍वास है कि यहां पर हम अच्‍छा परिणाम देने में सफल रहेंगे।' आरएसएस के नजदीकी एक और टीम मेंबर ने कहा, 'हमारी नियुक्ति के साथ ही हमारी चुनावी रणनीति शुरू हो गई थी। हम जानते हैं कि अमितभाई ने हमें चुना है और किसलिए चुना है।' गोरधन झड़फिया के नेतृत्‍व में इन सदस्‍यों को यूपी की जातिगत राजनीति को ध्‍यान में रखकर चुना गया है। यूपी में हार्दिक पटेल फैक्‍टर को खत्‍म करने के लिए पाटीदार नेता गोरधन झड़फिया को चुना गया। सारे दलित मायावती के पाले में न चले जाएं इसके लिए राजस्‍थान के बीजेपी नेता दुष्‍यंत गौतम को लाया गया। हिंदू वोटों को साधने का जिम्‍मा योगी के पास अपर कास्‍ट को साधने के लिए डॉक्‍टर नरोत्‍तम मिश्रा को चुना गया। इन दिनों यूपी में 'छोटे मोदी' कहे जा रहे सुनील बंशल को टीम का मेंबर बनाया गया। ये चारों लोग जहां बीजेपी के गैरपरंपरागत वोट बैंक को अपने साथ लाने के लिए रणनीति बना रहे हैं वहीं योगी आदित्‍यनाथ हिंदू वोट बैंक को पार्टी के साथ लाने पर काम कर रहे हैं। चुनाव में जीत सुनिश्चित करने के लिए आरएसएस ने भी अपनी पूरी ताकत लगा दी है। बीजेपी ने राज्‍य की 80 सीटों को जोन में बांट दिया है। राष्‍ट्रवाद, हिंदुत्व, किसानों की बदहाली, जल संकट, जाति और बेरोजगारी, ये छह मुद्दे निर्धारित किए गए हैं। इसके बाद इन मुद्दों को हर सीट के साथ जोड़कर उसे नक्‍शे पर निशान लगाया गया है। स्‍वयंसेवकों और कार्यकर्ताओं को इस बात के लिए ट्रेनिंग दी गई है कि वे इन मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाएं। बीजेपी पेशेवर शोधकर्ताओं की मदद से हरेक सीट का सर्वे किया है। 28 सीटों पर फोकस कर रही है बीजेपी उदाहरण के लिए जिन जिलों में पानी का संकट है वहां पर हिंदुत्‍व प्रमुख मुद्दा नहीं है। जिन सीटों पर गठबंधन मजबूत है वहां पर जातियों का ध्‍यान रखा गया है। हर जगह मोदी और बेहतर कानून व्‍यवस्‍था मुद्दा है। हालांकि यह कहानी का केवल आधा हिस्‍सा है। जिन सीटों पर महागठबंधन और कांग्रेस टक्‍कर में हैं, वहां पर बीजेपी को बढ़त की उम्‍मीद है। बीजेपी ने ऐसी 18 सीटों की पहचान की है। अमेठी और रायबरेली में बीजेपी कड़ी टक्‍कर दे रही है लेकिन उसने मैनपुरी, फिरोजाबाद, आजमगढ़, कन्‍नौज, मुजफ्फरनगर और बागपत में बहुत ज्‍यादा जोर नहीं लगाने का फैसला किया है। बीजेपी उन 28 सीटों पर फोकस कर रही है जहां कांग्रेस ने बीजेपी के परंपरागत वोटबैंक जैसे अपर कास्‍ट, कुर्मी, कोइरी, लोध और शाक्‍य को टिकट दिया है। इन जातियों ने पिछले चुनाव में बीजेपी को वोट दिया था। इसके अलावा केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा आरएसएस के 200 कार्यकर्ताओं की टीम का नेतृत्‍व कर रहे हैं जो बाजी पलटने के लिए काम कर रही है। रोचक बात यह है कि बीजेपी के चुनाव प्रचार अभियान से राम मंदिर का मुद्दा गायब है।
भोपाल, 04 मई 2019,भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की फायर ब्रांड नेता उमा भारती ने एक जनसभा के दौरान कांग्रेस और गांधी परिवार पर जमकर हमला बोला. उमा भारती ने इस दौरान कांग्रेस को 'अंग्रेजों की जूठन' तक कह दिया. उन्होंने यह बात भोपाल में बीजेपी प्रत्याशी साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के समर्थन में आयोजित चुनावी सभा के दौरान कही. उमा भारती ने मंच से कहा कि कैसे सर्जिकल स्ट्राइक के जरिए भारत ने एक हजार साल से झेले जा रहे अपमान का जवाब दिया है. उन्होंने कहा, 'भारत को पहले मुगलों ने लूटा और फिर उसके बाद अंग्रेजों ने, जब अंग्रेज चले गए तो अपनी जूठन यहां कांग्रेस के रूप में छोड़ गए'. उन्होंने कहा, 'मोदी ने हमें हिंदुस्तानी होने का गर्व दिया है'. उमा ने 'गांधी' सरनेम लगाने पर भी कांग्रेस नेताओं की खिंचाई की. उमा भारती ने कहा है कि नेहरू गांधी के परिवार में नेहरू असली है, लेकिन ये गांधी सरनेम फर्जी रूप से लगाते हैं क्योंकि इन्होंने गांधी की शहादत के बाद गांधी लगाया है. इनका परिवार नकली गांधीवादी है और असली गांधी उमा भारती जैसे लोग हैं. साध्वी प्रज्ञा की आपबीती सुनाई उमा भारती के निशाने पर कांग्रेस तो रही ही लेकिन इसके साथ ही उन्होंने साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की आपबीती भी वहां मौजूद लोगों को सुनाई. उमा भारती ने आरोप लगाते हुए कहा कि 'जेल में प्रज्ञा को क्या पिलाया जाता था मैं ये अपने मुंह से नहीं कह सकती. अस्पताल में साध्वी ने कहा था कि मेरे गुरु से कहना कि मैंने संन्यासी जीवन का एक भी नियम नहीं तोड़ा है' उमा भारती ने तत्कालीन यूपीए सरकार पर भी आरोप लगाया और कहा है कि उस समय कसाब को बिसलेरी का पानी पिलाया जाता था लेकिन प्यास लगने पर प्रज्ञा को क्या पिलाया गया था मैं ये अपने मुंह से नहीं कहूंगी. उमा भारती ने कहा, 'साध्वी के साथ जो कुछ हुआ अगर कोई और लड़की होती तो टूट जाती. साध्वी ने सब सहा और जो बात साध्वी के मुंह से निकलवा कर लोग एजेंडा बनाना चाहते थे लेकिन साध्वी ने ऐसा ना कर बीजेपी पर बहुत बड़ा अहसान किया. और अब उन्हें भोपाल से टिकट देकर बीजेपी ने अपना कर्ज उतारा है'.
कोलकाता इस समय अगर आप पश्चिम बंगाल आएं तो यहां लगभग हर जगह बीजेपी का भगवा झंडा लहराते जरूर पाएंगे। यह अहम इसलिए भी है कि अधिक दिन नहीं बीते जब सूबे में बहुत मुश्किल से ऐसा देखने को मिलता था। लगभग हर लोकसभा क्षेत्र में अब बीजेपी का लहराता झंडा खुद ही काफी कुछ कह जाता है, तब जबकि इस प्रदेश में मोदी लहर के बावजूद 2014 में बीजेपी सिर्फ 2 सीट जीत पाने में सफल रही थी। लोकसभा चुनावों के बीच पश्चिम बंगाल में निश्चित रूप से सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के झंडे अधिक दिखते हैं लेकिन सूबे में लंबे समय तक सत्तारूढ़ लेफ्ट और केंद्र में मुख्य विपक्ष कांग्रेस के मुकाबले बीजेपी यहां कहीं अधिक मजबूत दिख रही है। यह साफ संकेत है कि इस बार बीजेपी इस लड़ाई में पूरी ताकत से मैदान में है और सत्तारूढ़ टीएमसी को अच्छी टक्कर दे रही है। बीजेपी नेतृत्व दावा कर रहा है कि उनका मकसद लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में 42 लोकसभा क्षेत्रों में कम से कम 20 पर जीत सुनिश्चित करना है। सूबे में चुनावी माहौल में लेफ्ट और कांग्रेस की सुस्ती को भुनाने के साथ ही बीजेपी तृणमूल के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर का भी फायदा उठाना चाहती है। स्थानीय स्तर पर मजबूत नेता की कमी पश्चिम बंगाल में इस बार चुनाव में बीजेपी मजबूत स्थिति में जरूर दिख रही है लेकिन उसके सामने भी एक दिक्कत है। दिक्कत यह है कि राज्य के स्तर पर पार्टी के पास कोई जमीनी और लोकप्रिय प्रत्याशी या नेता नहीं है। यहां तक कि यहां पार्टी के लिए चुनाव प्रबंधन देख रही टीम भी यहां के लोकसभा क्षेत्रों और पार्टी प्रत्याशियों से अभी पूरी तरह परिचित नहीं दिखती है। हालांकि अंतिम समय में बीजेपी ने यहां चुनावी मैदान में फतह के लिए आरएसएस के वरिष्ठ नेता सुनील देवधर को पूरी जिम्मेदारी सौंप दी है। यह वही देवधर हैं, जिन्होंने त्रिपुरा में बीजेपी को सत्ता में लाने में अहम भूमिका निभाई थी। पूरी ताकत झोंक रही है बीजेपी पश्चिम बंगाल में स्थिति यह है कि सत्तारूढ़ तृणमूल के भी कई नेता यह मान रहे हैं कि भगवा पार्टी सूबे में दूसरे नंबर पर रहेगी। हालांकि एक स्थिति यह भी है कि लेफ्ट के लंबे शासनकाल के समय कांग्रेस के पास भी इस राज्य में अच्छा-खासा जनाधार रहा है। पर, लेफ्ट की दीवार गिराकर ममता बनर्जी यहां सत्ता में आईं और अब बीजेपी इस लोकसभा चुनाव के साथ आगे विधानसभा चुनाव को लेकर पूरी ताकत झोंकने में जुटी दिख रही है। 10 सीटों पर बीजेपी- तृणमूल में टक्कर पश्चिम बंगाल में 10 सीटों पर बीजेपी और तृणमूल के बीच सीधी टक्कर बताई जा रही है। हालांकि उत्तर और मध्य बंगाल में चतुष्कोणीय मुकाबले की संभावना है। हालांकि यहां बीजेपी सत्ता विरोधी लहर का फायदा लेने की तरफ देख रही है। वहीं दक्षिण बंगाल को तृणमूल का गढ़ माना जाता है, वहां लड़ाई सीधे तृणमूल बनाम बीजेपी है। विधानसभा के लिए भी जमीन तैयार कर रही बीजेपी 2014 में बीजेपी यहां 42 में सिर्फ दो सीट दार्जिलिंग और आसनसोल को जीतने में कामयाब रही थी। हालांकि 2011 के चुनाव के मुकाबले बीजेपी का वोट प्रतिशत जरूर 4 फीसदी से बढ़कर 17 फीसदी तक पहुंच गया था। फिलहाल बीजेपी का ध्यान उन सूबों में विस्तार पर है, जहां वह अन्य पार्टियों के मुकाबले नई है। यही वजह है कि पश्चिम बंगाल के साथ-साथ बीजेपी ओडिशा पर भी काफी फोकस कर रही है। पश्चिम बंगाल में बीजेपी लोकसभा के साथ ही आने वाले विधानसभा चुनाव के लिए भी जमीन तैयार कर रही है।
लखनऊ लोकसभा चुनाव के लिए नामांकन के अंतिम दिन वाराणसी से मोदी के खिलाफ प्रत्याशी बदलकर एसपी ने लोगों को बड़ा सरप्राइज दिया। मगर अंतिम समय में वाराणसी समेत चार सीटों पर एसपी ने जिस तरह से प्रत्याशी बदले या फिर अंतिम दिन नए प्रत्याशी घोषित किए, समाजवादी पार्टी का यह सरप्राइज फैक्टर गले की फांस बन सकता है। 7वें चरण में जिन 13 लोकसभा सीटों पर चुनाव होना है, उनमें 8 लोकसभा सीटों पर एसपी और 5 लोकसभा सीटों पर बीएसपी चुनाव लड़ रही है। एसपी के हिस्से की जो 8 सीटें हैं, उनमें से दो सीटें ऐसी हैं, जिस पर समाजवादी पार्टी ने अंतिम दौर में अपना उम्मीदवार बदल दिया और दो सीटें ऐसी हैं, जिस पर एसपी अंतिम दिन के एक दिन पहले तक प्रत्याशी घोषित नहीं कर पाई। वहीं, दूसरी ओर अंतिम चरण की 13 सीटों में से जिन पांच सीटों पर बीएसपी चुनाव लड़ रही है, वहां पहले ही प्रत्याशी घोषित किया जा चुका है। वाराणसी में अंतिम दिन बदला प्रत्याशी वाराणसी में पीएम नरेंद्र मोदी के खिलाफ एसपी ने पहले शालिनी यादव को उतारा। जिस दिन शालिनी यादव को टिकट दिया गया, उसी दिन शालिनी से कांग्रेस छोड़कर एसपी का दामन थामा था। मगर 29 अप्रैल को नामांकन के अंतिम दिन समाजवादी पार्टी ने बीएसएफ के बर्खास्त तेज बहादुर यादव को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया। बुधवार को तेज बहादुर यादव का पर्चा खारिज हो गया। अब फिर से शालिनी यादव महागठबंधन की उम्मीदवार हैं। मगर इस दो दिनों के घटनाक्रम ने पार्टी में स्थानीय स्तर पर चल रहे गतिरोध को भी उजागर कर दिया है। मिर्जापुर में भी बदला प्रत्याशी सिर्फ वाराणसी ही नहीं, मिर्जापुर में भी एसपी ने पहले राजेन्द्र एस बिंद को प्रत्याशी घोषित किया, लेकिन नामांकन के कुछ दिनों पहले ही बीजेपी छोड़कर एसपी में शामिल हुए रामचरित्र निषाद को पार्टी ने मिर्जापुर से अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया। इस तरह चंदौली लोकसभा सीट पर भी एसपी ने स्थानीय नेताओं पर भरोसा जताने की बजाय जनवादी पार्टी (सोशलिस्ट) के प्रमुख डॉ. संजय चौहान को प्रत्याशी बनाया है। पहले इस सीट पर समाजवादी पार्टी के एक बड़े नेता को टिकट दिए जाने की चर्चा थी। महराजगंज और बलिया में अंतिम दिन घोषित किए प्रत्याशी महराजगंज और बलिया लोकसभा सीट पर 7वें चरण में मतदान होना है। दोनों सीटों पर नामांकन की आखिरी तारीख 29 अप्रैल थी। दोनों सीटों के लिए समाजवादी पार्टी ने 28 अप्रैल की रात प्रत्याशी घोषित किया। दोनों सीटों को लेकर स्थानीय कार्यकर्ताओं और लोगों के बीच असमंजस की स्थिति रही। अंतिम समय में प्रत्याशी घोषित करने के नुकसान जानकारों के मुताबिक अंतिम समय में प्रत्याशी घोषित करने से किसी भी दल को फायदा कम, नुकसान ज्यादा होता है। दरअसल, अंतिम समय में प्रत्याशी घोषित करने की वजह से प्रत्याशी को अपना प्रचार करने के लिए कम समय मिलता है। ऐसी स्थिति में प्रत्याशी को नुकसान भी हो सकता है, जब विपक्षी पार्टी ने कई दिनों पहले अपना प्रत्याशी घोषित किया हो। 2012 के चुनाव में कई महीने पहले एसपी ने घोषित कर दिए थे प्रत्याशी 2012 के विधानसभा चुनावों में जब समाजवादी पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला था, तब पार्टी ने कई विधानसभा सीटों पर कई महीने पहले प्रत्याशी घोषित कर दिए थे। इसका फायदा पार्टी को मिला। 2012 में एसपी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार पहली बार बनी थी। मगर 2017 में एसपी ने अंतिम समय में प्रत्याशी घोषित किया था। इसका नुकसान पार्टी को विधानसभा चुनावों में उठाना पड़ा था।
लखनऊ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शुक्रवार को कांग्रेस और एसपी-बीएसपी गठबंधन पर जमकर हमला बोला। उन्होंने कहा कि ये लोग सिर्फ दिखाने के लिए अलग हैं, वैसे एक ही हैं। 'बाबर की औलाद' वाले अपने बयान पर चुनाव आयोग का नोटिस मिलने पर उन्होंने कहा कि यह बयान आचार संहिता का उल्लंघन नहीं है, मैंने सिर्फ आपसी बातचीत को रैली में कोट किया था। उन्होंने कहा, 'आपसी बातचीत को कहीं कोट करना आचार संहिता में नहीं आता है। कोई चीज कहीं लिखी है या कहीं बोली गई है, अगर मैं वह भी नहीं बोल सकता तो फिर चुनाव में कोई क्या बोल पाएगा? कोई भजन करने के लिए मंच पर जाता है क्या? अपने विरोधी को घेरने के लिए और उसे उखाड़ फेंकने के लिए मंच पर जाते हैं।' बता दें कि चुनाव आयोग ने यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ को उस बयान के लिए नोटिस जारी किया है, जिसमें उन्होंने समाजवादी पार्टी-बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन कैंडिडेट को 'बाबर की औलाद' कहा था। योगी ने संभल में चुनावी जनसभा करते हुए इस सीट से गठबंधन के उम्मीदवार शफीकुर्रहमान बर्क को लेकर विवादित टिप्पणी की थी। चुनाव आयोग ने योगी को नोटिस जारी कर 24 घंटे के अंदर जवाब देने को कहा है। 'सिर्फ वोट कटवा पार्टियां हैं एसपी-बीएसपी और कांग्रेस' न्यूज़ एजेंसी एएनआई से बातचीत में उन्होंने प्रियंका गांधी के समाजवादी पार्टी का मंच साझा करने पर हमला बोलते हुए कहा, 'ये सिर्फ दिखाने के लिए अलग-अलग हैं, असलियत में एक ही हैं और साथ में चुनाव लड़ रहे हैं। ये अपने दम पर बीजेपी का मुकाबला नहीं कर सकते हैं, इसलिए साथ में चुनाव लड़ रहे हैं।' उन्होंने कहा, 'एसपी-बीएसपी ने अमेठी और रायबरेली में अपना उम्मीदवार नहीं उतारा। ये पार्टियां सिर्फ वोट-कटवा की भूमिका में हैं। ये सिर्फ वोट काटने के लिए चुनाव लड़ रहे हैं, ना कि जीतने के लिए।' 37-38 सीटों पर लड़कर कैसे बनेंगे प्रधानमंत्री' एसपी-बीएसपी गठबंधन पर हमला बोलते हुए उन्होंने कहा, 'प्रधानमंत्री बनने के लिए लोकसभा में कम से कम 272 सीटें चाहिए। सिर्फ बीजेपी के पास यह क्षमता है। जो लोग सिर्फ 37-38 सीटों पर लड़ रहे हैं, ये कैसे प्रधानमंत्री बन पाएंगे?' 'जूते उतारकर मायावती से मिलने जाते हैं अखिलेश' अखिलेश पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा, 'जब वह मायावती के साथ मंच साझा करते हैं, तो उन्हें बैठने के लिए छोटी कुर्सी दी जाती है। मायावती ऊंची कुर्सी पर बैठती हैं। जब वह मायावती से मिलने जाते हैं, तो उनके जूते कमरे के बाहर रखवा लिए जाते हैं। यह तो उनकी स्थिति है।'
नई दिल्ली, 03 मई 2019, बीजेपी से बगावत कर कांग्रेस का दामन थामने वाले शत्रुघ्न सिन्हा बिहार के पटना साहिब सीट से मैदान में हैं और उनकी पत्नी पूनम सिन्हा समाजवादी पार्टी से लखनऊ के रणभूमि में उतरी हैं. शत्रुघ्न के सामने एक तरफ पार्टी धर्म है तो दूसरी तरफ पत्नी धर्म. ऐसे में वो पार्टी से ज्यादा पत्नी धर्म को अहमियत देते नजर आ रहे हैं. यही वजह है कि पहले पूनम सिन्हा के नामांकन में लखनऊ में रोड शो किया और अब कांग्रेस के खिलाफ व सपा के पक्ष में पत्नी के लिए वोट मांगने उतरे हैं. लखनऊ लोकसभा सीट पर राजनाथ के खिलाफ सपा ने हाल ही में बीजेपी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए शत्रुघ्न सिन्हा की पत्नी पूनम सिन्हा मैदान में हैं और कांग्रेस से आचार्य प्रमोद कृष्णम चुनाव लड़ रहे हैं. ऐसे में गुरुवार को शत्रुघ्न सिन्हा ने पूनम सिन्हा के पक्ष में प्रचार करने उतरे और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ मंच साझा कर कांग्रेस के खिलाफ वोट मांगा. इतना ही नहीं उन्होंने अखिलेश यादव और बसपा अध्यक्ष मायावती की जमकर तारीफ की. सपा प्रत्याशी पूनम सिन्हा के लिए शत्रुघ्न सिन्हा के द्वारा प्रचार करना कांग्रेस प्रत्याशी आचार्य प्रमोद कृष्णम को नागवार गुजरा. उन्होंने ट्वीट कर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए कहा, 'शत्रुघ्न सिन्हा की हरकतों से लगता है कि उन्होंने कांग्रेस ज्वाइन तो कर ली है, मगर अभी तक RSS से इस्तीफा नहीं दिया है.' आचार्य प्रमोद कृष्णम ने शत्रुघ्न को सीधे तौर पर संघ के खेमें में खड़ा कर दिया है. दरअसल शत्रुघ्न सिन्हा इससे पहले पूनम सिन्हा के नामांकन में भी शामिल हुए थे. इस दौरान उन्होंने लखनऊ में रोड शो भी किया था. यही नहीं इस दौरान शत्रुघ्न ने कहा था कि प्रधानमंत्री हो तो अखिलेश यादव या मायावती जैसा हो, जिनके अंदर काबिलियत और काम करने की तत्परता है. अखिलेश यादव में बहुत क्षमताएं और युवा शक्ति के प्रतीक हैं. उन्होंने बहुत बढ़िया काम किया है. मैं उन्हें सिर्फ उत्तर प्रदेश के भविष्य नहीं बल्कि कभी-कभी तो देश के भविष्य के रूप में भी देखता हूं और प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में देखता हूं. जबकि कांग्रेस की और से पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताया जा रहा है. राहुल गांधी भी कई बार खुलकर प्रधानमंत्री बनने की इच्छा जाहिर कर चुके हैं. ऐसे शत्रुघ्न का सपा के लिए प्रचार करना और प्रधानमंत्री के लिए अखिलेश को उपयुक्त बताना कांग्रेसियों को नागवार गुजर रहा है. लखनऊ से कांग्रेस के टिकट पर लड़ रहे आचार्य प्रमोद कृष्णम ने शत्रुघ्न सिन्हा के खिलाफ नाराजगी जाहिर करते हुए कहा था, 'शत्रुघ्न सिन्हा अपनी पत्नी के प्रचार के लिए आए हैं, मेरा उनसे कहना है कि वो पार्टी धर्म निभाएं और मेरे लिए भी एक दिन चुनाव प्राचर करें.' हालांकि शत्रुघ्न ने आचार्य प्रमोद कृष्णम की बात को अहमियत नहीं दिया है. यही वजह है कि वो दोबारा से लखनऊ में कांग्रेस के खिलाफ रैली कर सपा के लिए वोट मांग रहे हैं. दिलचस्प बात है कि शत्रुघ्न सिन्हा 2014 के बाद से इसी तरह से बीजेपी में रहते हुए पार्टी को असहज करते रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह पर लगातार सवाल खड़े कर रहे हैं और विपक्ष के नेताओं के साथ सुर में सुर मिला रहे थे. इसी के चलते पार्टी ने उनका टिकट काटकर पटना साहिब से रविशंकर प्रसाद को टिकट दिया. इसी के बाद उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा और पटना साहिब सीट से चुनावी मैदान में हैं और उनकी पत्नी पूनम सिन्हा सपा से लखनऊ की प्रत्याशी हैं. शत्रुघ्न का पत्नी के पक्ष में प्रचार करना कांग्रेस के उम्मीदवार के लिए गले की फांस बन गया है.
वाराणसी वाराणसी के महमूरगंज इलाके के ‘तुलसी उद्यान’ में बीजेपी का केंद्रीय चुनाव कार्यालय है, जहां चुनावी माहौल चरम पर पहुंच गया है। यह कार्यालय लगातार पार्टी के 20,000 कार्यकर्ताओं, नेताओं और रणनीतिकारों के संपर्क में रहता है, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को रेकॉर्ड अंतर से जिताने के लिए रात-दिन एक किए हुए हैं। यहां बीजेपी के संगठनीय ढांचे में 1819 बूथ कमिटी, 226 सेक्टर कमिटी और 17 मंडल यूनिट शामिल हैं। सत्ताधारी पार्टी ने वाराणसी में दूसरे दलों के उलट एक नई यूनिट के साथ नया प्रयोग किया है, जिसे संगठन में ‘संख्या’ या ‘समूह’ नाम दिया गया है। बीजेपी सेंट्रल इलेक्शन ऑफिस के एक सूत्र ने इकनॉमिक टाइम्स को बताया, ‘संख्या में तीन या चार सेक्टर की कमिटियां शामिल हैं। जिन कार्यकर्ताओं को संगठनीय कामकाज का अच्छा अनुभव होता है, उन्हें इस खास इकाई की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है।’ 3 मई को बूथ लेवल पर बूथ कमिटियों की मीटिंग होगी। एक अन्य सूत्र ने बूथ कार्यकर्ताओं के काम के बारे बताया, ‘इस मीटिंग में ‘पन्ना प्रमुख’ के नाम का फैसला किया जाएगा। पार्टी ने ज्यादातर बूथों पर पन्ना प्रमुख चुन लिए हैं। 4 मई को सेक्टर प्रभारी को सभी पन्ना प्रमुखों के नाम बताए जाएंगे और 5 मई के दिन बूथ स्तर पर सभी घरों में वोटर्स स्लिप पहुंचाने का काम शुरू कर दिया जाएगा।’ इन सभी बातों से पता चलता है कि बीजेपी ने पिछले 5 साल के दौरान प्रधानमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र में संगठनीय ढांचे पर कितना काम किया है। सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों पर ज्यादा जोर बीजेपी के एक अन्य नेता ने बताया, ‘अब चुनाव प्रबंधन समिति का काम है कि वह 19 मई को मतदान होने तक सभी कमिटियों को जमीनी स्तर पर सक्रिय रखे।’ बीजेपी संगठन ऐसे वोटरों पर ज्यादा फोकस कर रहा है, जिन्हें एलपीजी कनेक्शन के लिए उज्ज्वला, टॉयलेट बनवाने और बिजली कनेक्शन के लिए सौभाग्य जैसी सरकारी योजनाओं का लाभ मिला है। बीजेपी के एक अन्य सूत्र ने बताया, ‘हमारे कार्यकर्ता उन गांवों में ज्यादा जोर लगा रहे हैं, जहां सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों की अच्छी संख्या है। हमारे सदस्य उन लाभार्थियों से मिलकर पार्टी के लिए वोट करने की गुजारिश कर रहे हैं।’ संगठन में एक पद ‘लाभार्थी प्रमुख’ का भी है, जो केंद्र सरकार की योजनाओं की देखरेख करने वाली टीम की अगुवाई करता है। बीजेपी की रणनीति बिल्कुल साफ है। वह चाहती है कि अगर जातीय समीकरण साथ न दे तो लाभार्थी टीम की मदद से मतदाताओं को अपने पाले में किया जा सके। जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाने का काम बीजेपी की एक अलग टीम भी है, जो लगातार बूथ कमिटियों के सदस्यों के संपर्क में है। बीजेपी सूत्र ने बताया, ‘यह टीम अलग क्षेत्र में काम कर रही है। इसका मुख्य काम जमीनी स्तर के पार्टी कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ाना है। आप बीएचयू का उदाहरण देख सकते हैं, जहां कौशल किशोर मिश्रा और प्रोफेसर बेचन लाल को बूथ कार्यकर्ताओं के साथ मीटिंग करने की जिम्मेदारी दी गई है।’
नई दिल्ली दिल्ली की उत्तर पश्चिम लोकसभा सीट से बीजेपी के टिकट से चुनाव में उतरे गायक हंसराज हंस को आम आदमी पार्टी ने मुस्लिम बताया है। पार्टी के लीडर राजेंद्र पाल गौतम ने एक ट्वीट में कहा है, '2014 की मीडिया खबरों के अनुसार हंसराज हंस ने इस्लाम कबूल किया था और अब नॉर्थ वेस्ट दिल्ली लोकसभा से बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे है। यह संसदीय सीट अनुसूचित जाति के लिए सुरक्षित है और केवल एससी ही इस सीट पर चुनाव लड़ सकता है। गौतम के इस ट्वीट को दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने रीट्वीट करते हुए हंस राज हंस को चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य बताया है। उन्होंने लिखा, 'हंसराज हंस सुरक्षित सीट से चुनाव लड़ने के योग्य नहीं हैं। अंत में वह अयोग्य करार दिए जाएंगे। उत्तर पश्चिम दिल्ली के मतदाताओं को उन पर अपना वोट खर्च नहीं करना चाहिए।' 'आप' लीडर गौतम ने ट्वीट में दावा किया कि हंसराज हंस ने इस्लाम कबूल कर लिया था और एक सुरक्षित सीट से वह चुनाव नहीं लड़ सकते हैं। इसके बाद अरविंद केजरीवाल ने उनके ट्वीट को रीट्वीट करते हुए लिखा, 'हंस राज हंस सुरक्षित सीट से चुनाव के लिए अयोग्य हैं। अंत में उन्हें अयोग्य करार दिया जाएगा।' हालांकि बीजेपी ने आम आदमी पार्टी के आरोपों को आधारहीन करार दिया है। दिल्ली बीजेपी की मीडिया कमिटी के हेड रविंद्र गुप्ता ने कहा, 'लोकसभा चुनाव में हार सामने देखकर उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया है। खबरों में रहने के लिए वे अब हर तरह का प्रॉपेगेंडा कर रहे हैं।'
रायबरेली यूपी में लोकसभा चुनाव अब पांचवें चरण में प्रवेश कर चुका है। इस बीच कांग्रेस महासचिव और पूर्वी यूपी प्रभारी प्रियंका गांधी ने दावा किया है कि यूपी में बीजेपी को बड़ा झटका लगने वाला है। प्रियंका ने इस दौरान यह भी कहा कि उन्होंने कई सीटों पर बीजेपी की हार सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने वोट काटने वाले प्रत्याशी खड़े किए हैं। प्रियंका गांधी ने रायबरेली में मीडिया से बातचीत में कहा, 'बीजेपी को उत्तर प्रदेश में बड़ा झटका लगेगा। वे बुरी तरह हारेंगे। जिन सीटों पर कांग्रेस मजबूत है और हमारे कैंडिडेट कड़ी टक्कर दे रहे हैं, वहां कांग्रेस जीतेगी। जहां हमारे उम्मीदवार थोड़े हल्के हैं वहां हमने ऐसे उम्मीदवार दिए हैं जो बीजेपी का वोट काटें।' बता दें कि प्रियंका गांधी यूपी में कांग्रेस के लिए जोरदार प्रचार अभियान चला रही हैं। अमेठी-रायबरेली में ताकत झोंकने के साथ ही उन्होंने अयोध्या के अलावा झांसी और लखीमपुर समेत कई शहरों में रोड शो और रैलियों को संबोधित किया है। लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस ने प्रियंका को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी थी। इसके बाद से ही वह लगातार यूपी में सक्रिय हैं। मंगलवार को अमेठी लोकसभा सीट की राजनीति में और गरमाहट नजर आएगी। यहां पर यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ और कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी आमने-सामने होंगे। शाम को चाढ़े चार बजे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के लोकसभा क्षेत्र में योगी रैली करेंगे तो शाम पांच बजे प्रियंका का रोड शो है। कांग्रेस के गढ़ वाली अमेठी लोकसभा सीट पर केंद्रीय मंत्री स्मृति इरानी लगातार दूसरी बार चुनाव लड़ रही हैं। सीएम योगी आदित्यनाथ उनके पक्ष में शाम साढ़े चार बजे रैली करेंगे। मुख्यमंत्री जगदीशपुर विधानसभा क्षेत्र के तहत मौर्य की बाग में जनसभा करेंगे। वहीं, दूसरी तरफ प्रियंका गांधी भी दो दिनों के लिए अमेठी पहुंच रही हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को सिर्फ अमेठी और रायबरेली में जीत हासिल हुई थी। इस बार पार्टी अवध क्षेत्र की कई सीटों पर जीत की आस लगाए बैठी है। जिन 14 सीटों पर पांचवें चरण के तहत 6 मई को मतदान है, उनमें से 7 सीटों पर कांग्रेस ने 2009 के चुनाव में जीत हासिल की थी।
वाराणसी , 30 अप्रैल 2019, वाराणसी लोकसभा सीट से समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार तेज बहादुर यादव को चुनाव आयोग ने नोटिस जारी किया है. बीएसएफ से बर्खास्त जवान तेज बहादुर यादव ने पहले निर्दलीय फिर सपा के चुनाव चिन्ह पर नामांकन किया था. इसमें एक में बताया था कि उन्हें भ्रष्टाचार के कारण सेना से बर्खास्त किया गया था लेकिन दूसरे नामांकन में उन्होंने इसकी जानकारी नहीं दी थी. मंगलवार को पर्चों की जांच के बाद जिला निर्वाचन कार्यालय ने तेज बहादुर को नोटिस जारी करते हुए 1 मई तक जवाब देने का समय दिया है. चुनाव आयोग का कहना है कि अगर तेज बहादुर यादव प्रमाण नहीं देते हैं तो उनका नामांकन खारिज कर दिया जाएगा. आयोग की ओर से जारी नोटिस के मुताबिक, तेज बहादुर ने 24 अप्रैल को निर्दल प्रत्याशी के रूप में नामांकन किया था. उस समय उन्होंने अपने शपथ पत्र में बताया था कि 'हां' उन्हें भ्रष्टाचार के कारण नौकरी से बर्खास्त किया गया था, लेकिन 29 अप्रैल को दूसरी बार नामांकन करते समय तेज बहादुर ने इसी कॉलम में 'नहीं' लिखा है, जिसका अर्थ ये है कि उन्हें भ्रष्टाचार की वजह से नौकरी से नहीं निकला गया है. दोनों शपथ पत्रों का संज्ञान लेते हुए जिला निर्वाचन कार्यालय ने तेज बहादुर को नोटिस जारी करते हुए नौकरी से निकाले जाने संबंधित प्रमाण पत्र की मांग की है. यह प्रमाण पत्र तेज बहादुर को 1 मई शाम 5 बजे तक जिला निर्वाचन कार्यालय में जमा करना होगा. बता दें कि 2017 में बीएसएफ जवान तेज बहादुर यादव ने एक वीडियो जारी किया था, जिसमें उन्होंने जवानों को मिलने वाले भोजन की क्वालिटी को लेकर शिकायत की थी. इसके बाद वह चर्चा में आ गए थे. हालांकि उस विवाद के बाद उन्हें बर्खास्त कर दिया गया था. तभी से वह केंद्र सरकार के खिलाफ आवाज उठाते रहे हैं. बीते दिनों ही तेज बहादुर यादव ने ऐलान किया था कि वह भ्रष्टाचार के मुद्दे पर चुनाव लड़ रहे हैं. उन्होंने तब कहा था कि मैंने भ्रष्टाचार का मामला उठाया, लेकिन मुझे बर्खास्त कर दिया गया. मेरा पहला उद्देश्य सुरक्षा बलों को मजबूत करना और भ्रष्टाचार खत्म करना होगा.
भोपाल मध्य प्रदेश की गुना-शिवपुरी सीट से बीएसपी प्रत्याशी लोकेंद्र सिंह राजपूत के दलबदल कर कांग्रेस में जाने के बाद बीएसपी सुप्रीमो मायावती को करारा झटका लगा है। उन्होंने कांग्रेस पर सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कांग्रेस को चेतावनी जारी करते हुए कहा कि वह मध्य प्रदेश में सरकार को समर्थन जारी रखने पर भी पुनर्विचार करेंगी। मायावती ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से ट्वीट कर कहा, 'सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग के मामले में कांग्रेस भी बीजेपी से कम नहीं। एमपी के गुना लोकसभा सीट पर बीएसपी उम्मीदवार को कांग्रेस ने डरा-धमकाकर जबरदस्ती बैठा दिया है लेकिन बीएसपी अपने सिम्बल पर ही लड़कर इसका जवाब देगी।' उन्होंने आगे लिखा कि अब कांग्रेस सरकार को समर्थन जारी रखने पर भी पुनर्विचार किया जाएगा। मध्य प्रदेश में हैं बीएसपी के 2 विधायक बता दें कि मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 114 सीटें मिली थीं, जबकि सरकार बनाने के लिए बहुमत का आंकड़ा 116 है। कांग्रेस को बीएसपी के 2 विधायक, समाजवादी पार्टी के 1 विधायक और 4 निर्दलीय विधायकों ने समर्थन दिया था जिसके बाद मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी थी। 'बीजेपी को हमारा गठबंधन ही हरा सकता है' उन्होंने कांग्रेस पर आगे निशाना साधते हुए कहा, 'यूपी में कांग्रेसी नेताओं का यह प्रचार कि बीजेपी भले ही जीत जाए लेकिन बीएसपी-एसपी गठबंधन को नहीं जीतना चाहिए, यह कांग्रेस पार्टी के जातिवादी, संकीर्ण व दोगले चरित्र को दर्शाता है। इसलिए लोगों का यह मानना सही है कि बीजेपी को केवल हमारा गठबंधन ही हरा सकता है। लोग सावधान रहें।' बता दें कि मध्य प्रदेश की गुना-शिवपुरी सीट से बीएसपी प्रत्याशी लोकेंद्र सिंह राजपूत सोमवार को कांग्रेस में शामिल हो गए। इस दौरान इस सीट से चार बार चुनाव जीत चुके ज्योतिरादित्य सिंधिया भी मौजूद रहे। सिंधिया इस बार भी गुना-शिवपुरी सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। उनका मुकाबला बीजेपी के केपी यादव से है। गुना से पांचवीं बार चुनाव लड़ रहे हैं सिंधिया सियासी पंडित भी कांग्रेस के इस दांव के बाद से मायावती और कांग्रेस के बीच खटास बढ़ने की आशंका जता रहे थे और अब मायावती के ट्वीट से यह साफ हो गया है। मायावती पहले से ही मध्य प्रदेश में गठबंधन को लेकर कांग्रेस के रवैये से नाराज हैं। वह सोशल मीडिया के अलावा अपनी रैलियों में भी कांग्रेस पर निशाना साधती आई हैं। एमपी की गुना-शिवपुरी सीट पर 12 मई को मतदान है। ज्योतिरादित्य सिंधिया यहां से पांचवीं बार चुनाव लड़ रहे हैं। वह यह सीट सिंधिया परिवार का गढ़ मानी जाती है। उनका मुकाबला बीजेपी उम्मीदवार केपी यादव से है जो कभी सिंधिया के ही करीबी हुआ करते थे।
नई दिल्ली, 29 अप्रैल 2019,त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब की पत्नी के बारे में सोशल मीडिया पर झूठी पोस्ट करने के लिए एक हवलदार को गिरफ्तार कर उसे नौकरी से निलंबित कर दिया गया है. पुलिस ने जानकारी दी है कि हवलदार ने मुख्यमंत्री की पत्नी नीति देब के बारे में लिखा कि उन्होंने अदालत में अपने पति के खिलाफ तलाक की अर्जी दे दी है, जिस पर बिप्लब कुमार देब की पत्नी ने हैरानी जताते हुए कहा कि वह अपने वैवाहिक जीवन के बारे में सोशल मीडिया पर फर्जी पोस्ट देख कर हैरान हैं. इस घटना पर पुलिस अधिकारी ने जानकारी दी है कि हवलदार जमाल हुसैन को सोशल मीडिया पर फर्जी जानकरी साझा करने के लिए गिरफ्तार किया गया. बाद में उसे निलंबित कर दिया गया है. बता दें कि हवलदार हुसैन विधानसभा में विपक्षी माकपा नेता इस्लामुद्दीन का अंगरक्षक है. त्रिपुरा पुलिस ने शुक्रवार को सोशल मीडिया यूजर अनुपम पॉल के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया. दरअसल पॉल ने ही मुख्यमंत्री की पत्नी द्वारा उनके खिलाफ दिल्ली अदालत में तलाक की अर्जी लगाने वाली झूठी खबर फैलाई थी. उप महानिरीक्षक (डीआईजी) अरिंदम नाथ ने आईएएनएस को बताया कि पुलिस पॉल की तलाश में जुटी है और जांच कर रही है. बता दें कि पॉल इससे पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सोशल मीडिया विंग में काम करता था. इससे पहले भी उस पर ऐसे कई मुद्दों को लेकर झूठी खबरें फैलाने के आरोप लग चुके हैं. पश्चिम बंगाल से रविवार को चुनाव प्रचार करने के बाद बिप्लब देब वापस लौटे. उन्होंने मीडिया को बताया कि इस मामले में पांच लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है और कहा कि फेक न्यूज फैलाने वालों को बख्शा नहीं जाएगा. देब की पत्नी नीति देब ने भी इस खबर को झूठा करार देते हुए कहा कि वह अपने वैवाहिक जीवन के बारे में फर्जी सोशल मीडिया पोस्ट देख कर हैरान और स्तब्ध हैं. उन्होंने कहा कि इस तरह के झूठे अभियान किसी व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा और हैसियत को बिगाड़ देते हैं. कोई भी, विशेष रूप से महिलाएं, इस तरह के संगीन सोशल मीडिया अभियानों का लक्ष्य नहीं होनी चाहिएं. उन्होंने बताया कि कुछ हफ्ते पहले भी एक राज्य की समाज कल्याण और सामाजिक शिक्षा मंत्री संताना चकमा, जो एक युवा आदिवासी महिला हैं उनके खिलाफ भी इसी तरह का फर्जी सोशल मीडिया अभियान शुरू किया गया था.
नई दिल्ली सुप्रीम कोर्ट पीएम नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के खिलाफ उस याचिका पर सुनवाई के लिए राजी हो गया है, जिसमें मोदी और अमित शाह के खिलाफ आचार संहिता के उल्लंघन के मामले को लेकर कार्रवाई की मांग की गई है। यह याचिका कांग्रेस की महिला विंग की अध्यक्ष और सांसद सुष्मिता देव ने दायर की थी। उनकी मांग है कि सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग को बीजेपी अध्यक्ष और पीएम के खिलाफ कार्रवाई का आदेश दे। कांग्रेस नेता और सीनियर वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने कोर्ट से मांग की कि इस मामले की सुनवाई जल्द से जल्द होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट मंगलवार को इस पर सुनवाई करेगा। सुष्मिता देव ने अपनी याचिका में कहा कि पीएम मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह द्वारा कई बार चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन करने के सबूत कांग्रेस पार्टी दे चुकी है। देवा का कहना है कि दोनों ही नेताओं ने भड़काऊ भाषण दिए और अपने भाषणों में देश की सेना के नाम पर वोट मांगे। जबकि चुनाव आयोग ने इस पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया है। देव का आरोप है कि कांग्रेस ने चुनाव आयोग से इसकी शिकायत भी की कि 23 अप्रैल को अहमदाबाद में वोट डालने के बाद बीजेपी ने रैली की, जो आचार संहिता के खिलाफ है, लेकिन चुनाव आयोग ने अब तक कोई कार्रवाई नहीं की है।
नई दिल्ली बीजेपी सांसद मीनाक्षी लेखी की तरफ से दायर अवमानना याचिका के सिलसिले में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में नया हलफनामा दाखिल किया है। नए हलफनामे में भी कांग्रेस अध्यक्ष ने अपने 'चौकीदार चोर है' बयान पर खेद ही जताया है, माफी नहीं मांगी है। नए हलफनामे में राहुल गांधी ने कहा है कि राजनीतिक लड़ाई में कोर्ट को घसीटने का उनका कोई इरादा नहीं है। उन्होंने मीनाक्षी लेखी पर अवमानना याचिका के जरिए राजनीति करने का आरोप लगाया है। मामले में मंगलवार को सुनवाई होनी है। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुआई वाली बेंच के सामने पेश हुए राहुल गांधी के वकील सुनील फर्नांडीज ने कहा कि उन्हें अवमानना नोटिस का जवाब देने की इजाजत दी जाए। सीजेआई रंजन गोगोई, जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस संजीव खन्ना की बेंच ने राहुल गांधी के वकील को काउंटर ऐफिडेविट दाखिल करने की इजाजत दे दी। सुप्रीम कोर्ट ने 23 अप्रैल को राहुल गांधी को आपराधिक अवमानना नोटिस जारी किया। बयान पर राहुल ने पहले भी कोर्ट में जताया था खेद बीजेपी सांसद मीनाक्षी लेखी की तरफ से दायर अवमानना याचिका पर राहुल गांधी ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा देकर अपने बयान पर खेद जताया था। उन्होंने राफेल मामले में 'चौकीदार चोर है' का बयान सुप्रीम कोर्ट के मुंह में डालने पर हलफनामा दायर कर खेद जताया था और कहा था कि यह बयान चुनावी सभा में चुनाव प्रचार के दौरान आवेश में आकर मुंह से निकल गया था। उन्होंने जो बयान दिया था वह आम धारणा के आधार पर दिया था। इस मामले में 23 अप्रैल को हुई पिछली सुनवाई पर राहुल गांधी की तरफ से पेश हुए वकील ने मामले को खत्म करने की अपील की थी, जिसे कोर्ट ने ठुकराते हुए राहुल गांधी को नोटिस भेजकर बयान पर जवाब मांगा था। कांग्रेस अध्यक्ष ने आज उसी नोटिस का जवाब दिया है। क्या है मामला राफेल डील में कथित भ्रष्टाचार को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमलावर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा था कि अब तो सुप्रीम कोर्ट ने भी मान लिया है कि चौकीदार चोर है। दरअसल 10 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए राफेल मामले में रिव्यू पिटिशन पर नए दस्तावेजों के आधार पर सुनवाई का फैसला किया था। इसी के बाद राहुल गांधी ने कहा था कि अब तो सुप्रीम कोर्ट ने भी मान लिया है कि चौकीदार चोर है। राहुल गांधी के इस बयान को लेकर बीजेपी सांसद मीनाक्षी लेखी ने सुप्रीम कोर्ट में उनके खिलाफ अवमानना की याचिका दायर की है। याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने राहुल से स्पष्टीकरण मांगा था, जिसके बाद उन्होंने अपने बयान पर खेद जताते हुए कहा था कि चुनावी सरगर्मी और जोश में उन्होंने यह बयान दिया था और भविष्य में कोर्ट के हवाले से ऐसी कोई भी बात नहीं कहने की बात कही, जिसे कोर्ट ने न कहा हो।
रुदासपुर बॉलिवुड के 'हीमैन' धर्मेंद्र के बेटे और चर्चित अभिनेता सनी देओल आज पंजाब की गुरदासपुर लोकसभा सीट से अपना नामांकन करेंगे। अपने बेटे सनी देओल के नामांकन से ठीक पहले धर्मेंद ने मतदाताओं से भावुक अपील की। उन्‍होंने कहा कि हम भारत को अपनी मां मानते हैं और इस मां के लिए आपका सहयोग मांगते हैं। धर्मेंद ने राजनीति के गिरते स्‍तर पर भी दुख जताया। धर्मेंद्र ने ट्वीट कर कहा, 'राजनीति इतनी घिन्नौनी हो चुकी है दोस्तों ... यहां A ...Z बन जाता है ....Z .... A हो जाता है....हम इसकी A B C नहीं जानते .....हां... भारत हमारी मां है ....मां के लिए हमआप का सहयोग मांगते हैं......हमारा साथ दो .....जीत यह आप की होगी ....मेरे पंजाब के भाई-बहनों की होगी ...भारत मां के एक खूबसूरत अंग गुरदासपुर की होगी।' एक अन्‍य ट्वीट में धर्मेंद्र ने लिखा, 'राजनीति मुकद्दर में थी, हम चले आए। अब बहुत सारे मेरे भाई-बहन भली बुरी बातें कहेंगे। उन सबकी बातें सिर माथे पर। एक बात मैं दावे के साथ कह देना चाहता हूं कि जो काम बीकानेर में 50 में नहीं हो सके थे, वे मैंने पांच साल में करवा लिए थे।' बता दें कि गुरदासपुर में बॉलिवुड ऐक्टर विनोद खन्ना की मौत के बाद बीजेपी ने सनी देओल को मैदान में उतारकर मौजूदा चुनाव को काफी रोचक बना दिया है। कांग्रेस ने यहां से जाट नेता सुनील जाखड़ को टिकट दी है, जो पिछले उपचुनाव में यहां से जीते थे। माना जा रहा है पुलवामा के बाद बालाकोट में एयर स्ट्राइक के बाद बीजेपी ने राष्ट्रवाद और देशभक्ति के माहौल को देखते हुए उसी भाव को आगे बढ़ाने के लिए सनी देओल जैसे ऐक्टर को गुरदासपुर से उतारा है। बता दें कि बॉर्डर और गदर जैसी फिल्मों के जरिए उनकी इमेज राष्ट्रवाद के भाव को आगे बढ़ाती दिखती है। सनी के बाहरी होने का मुद्दा उठाएगी कांग्रेस सनी की इमेज कांग्रेस के लिए चुनौती बन रही है। कांग्रेस ने उसकी काट की तैयारी शुरू कर दी है। सूत्रों के मुताबिक, एक ओर कांग्रेस जहां सनी देओल के बाहरी होने का मुद्दा उठाने की तैयारी में है, वहीं दूसरी ओर उसने देओल के बॉलिवुड इमेज की काट करना भी शुरू कर दिया है। सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह ने हाल ही में सनी देओल के फिल्मी फौजी इमेज पर चोट करते हुए कहा था कि सनी देओल फिल्मी फौजी हैं, जबकि मैं तो असली फौजी हूं। यह चुनावी रण हैं, जहां फिल्मी इमेज काम नहीं करती।
आसनसोल लोकसभा चुनाव के चौथे चरण में 9 राज्यों की 72 सीटों पर आज वोट डाले जा रहे हैं। वहीं पिछले चरणों की तरह इस बार भी पश्चिम बंगाल छिटपुट हिंसा से अछूता नहीं रहा। बंगाल के आसनसोल में केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो की कार पर कुछ लोगों ने हमला कर दिया, जिससे उनकी गाड़ी का शीशा टूट गया। हालांकि इस हमले में उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचा है। यहां सुप्रियों के सामने टीएमसी की मुनमुन सेन मैदान में हैं। सुप्रियो ने टीएमसी पर हिंसा करने का आरोप लगाया है। इसके अलावा आसनसोल के जेमुआ में एक पोलिंग बूथ पर लोगों ने वोट डालने से इसलिए इनकार कर दिया, क्योंकि वहां सुरक्षा व्सवस्था नहीं थी। कुछ बूथों पर टीएमसी कार्यकर्ताओं और सुरक्षा बलों के बीच झड़प की भी खबरें हैं। बाबुल सुप्रियो की कार पर हमला बीजेपी की ओर से आसनसोल से सांसद प्रत्याशी बाबुल सुप्रियो की कार पर पोलिंग बूथ के बाहर कुछ लोगों ने हमला कर दिया। इस हमले में उनकी गाड़ी का शीशा टूट गया। हालांकि सुप्रियो को किसी भी नुकसान की जानकारी नहीं मिली है। बाबुल सुप्रियो ने सीएम ममता बनर्जी का जिक्र कर टीएमसी कार्यकर्ताओं पर उन पर हमला करने का आरोप लगाया है। सुप्रियो ने कहा, 'चुनाव में गड़बड़ी की बड़ी साजिश रची जा रही है।' बाबुल सुप्रियो को टक्कर दे रही हैं मुनमुन सेन आसनसोल से बीजेपी ने बाबुल सुप्रियो को प्रत्याशी बनाया है, वहीं उनका मुकाबला तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की मुनमुन सेन से हैं। दोनों के बीच कड़ी टक्कर देखने को मिल रही है। साल 2014 में मुनमुन सेन ने बंगाल की बांकुरा लोकसभा सीट से चुनाव लड़ आठ बार के सांसद सीपीआई के बासुदेव आचार्य को हराया था। चुनाव आयोग से शिकायत करेगी बीजेपी लगातार चारों चरणों में हो रही हिंसा की शिकायत बीजेपी चुनाव आयोग से करेगी। मुख्तार अब्बास नकवी के नेतृत्व में बीजेपी का प्रतिनिधि मंडल चुनाव आयोग से मिलेगा। इस प्रतिनिधि मंडल में बीजेपी के विजय गोयल और अनिल बलूनी भी होंगे। वाेटिंग का बहिष्कार आसनसोल में जेमुआ पोलिंग बूथ संख्या 222 और 226 पर ग्रामीणों ने केंद्रीय सुरक्षाबलों की गैरमौजूदगी के चलते वोटिंग का बहिष्कार कर दिया है। आसनसोल के बूथ नंबर 199 में टीएमसी कार्यकर्ताओं और सुरक्षाबलों के बीच टकराव हो गया। एक टीएमसी पोलिंग एजेंट ने बताया, 'बूथ में बीजेपी का कोई पोलिंग एजेंट मौजूद नहीं है। गौरतलब है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के प्रत्याशी रहे बाबुल सुप्रियो ने टीएमसी के डोला सेन को शिकस्त दी थी। उस दौरान बाबुल सुप्रियो को 4 लाख 19 हजार 983 वोट मिले थे जबकि डोला सेन क 3 लाख 49 हजार 503 मतों से संतोष करना पड़ा था।
कोलकाता पश्चिम बंगाल में आज 8 लोकसभा सीटों पर मतदान हो रहा है। मध्य बंगाल में आनेवाली इन 8 लोकसभा सीटों के बाद कोलकाता और दक्षिण की कई हाई प्रोफाइल सीटों पर वोटिंग होगी। 2016 के विधानसभा चुनावों के बाद प्रदेश के बदलते समीकरणों के लिहाज से ये 8 सीटें महत्वपूर्ण हैं। प्रदेश के कई बड़े नेताओं के लिए यहां अपनी सीट बचाने की चुनौती है। कांग्रेस उम्मीदवार और 4 बार से सांसद अधीर चौधरी इस बार बहरामपुर सीट से मुश्किल चुनौती का सामना कर रहे हैं। प्रदेश की सत्ता पर काबिज तृणमूल कांग्रेस के चौधरी को कड़ी टक्कर मिल रही है। बीजेपी के लिए भी ये 8 सीट महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी बंगाल में अपनी जमीन बनाने के लिए पुरजोर कोशिश में जुटी है। बीजेपी सांसद और केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो पर अपनी सीट बचाने का दबाव है। तृणमूल के कद्दावर नेता पार्टी के बीरभूम क्षेत्र के अध्यक्ष अनुब्रत मंडल बोलापुर और बीरभूम में उम्मीदवारों की जीत के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं। बंगाल में सभी पार्टियों की जीत के लिए बेकरारी दिख रही राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिहाज से बंगाल में बीजेपी और टीएमसी दोनों ही बड़ी जीत दर्ज करने के लिए हर संभव कोशिश कर रही हैं। टीएमसी सुप्रीमो प्रदेश में में 42 में से 42 सीट जीतने का दावा कर चुकी हैं। ममता केंद्र की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाने के लिए बेकरार हैं और वह 42 सीटों पर जीत का दावा भी कर चुकी हैं। बीजेपी भी बंगाल में अपनी जमीन मजबूत करने के लिए लगातार कोशिश कर रही है और प्रदेश में 23 सीटें जीतने का दावा कर चुकी है। बीजेपी के रणनीतिकारों के हवाले से कहा जा रहा है कि उत्तर प्रदेश में महागठबंधन के कारण सीटों के नुकसान की भरपाई बीजेपी बंगाल से करना चाहती हैं। बीजेपी और टीएमसी के बीच जीत के लिए लड़ाई इतनी टक्कर की है प्रदेश के कई हिस्सों में हिंसक झड़प की भी खबरें आ चुकी हैं। ममता और बीजेपी अपनी रणनीति पर कर रहे काम ममता बनर्जी अपनी जीत के लिए विपक्ष के वोटों में बंटवारे की संभावना के कारण कर रही हैं। टीएमसी को उम्मीद है कि बीजेपी, सीपीएम और कांग्रेस में वोट बंटने के कारण टीएमसी को फायदा होगा। हालांकि, बीजेपी का फॉर्म्युला इससे अलग है। प्रदेश में ऐंटी-इनकम्बेंसी के माहौल को अपने पक्ष में कर वोटों में तब्दील करने की रणनीति बीजेपी की है। आम तौर पर यह फैक्टर विधानसभा चुनावों में ही नजर आता है। बीजेपी ने प्रदेश में प्रचार के लिए जोरदार अंदाज में पीएम नरेंद्र मोदी की आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई और ममता बनर्जी के तुष्टिकरण की राजनीति के मुद्दे को उठाया है। बीजेपी को पिछले चुनावों में बढ़े वोट शेयर के कारण उम्मीद बीजेपी को प्रदेश में अपने बढ़े हुए वोट शेयर के कारण काफी उम्मीदें हैं। जिन 8 सीटों पर आज मतदान हो रहे हैं उनमें से 6 सीटों पर बीजेपी का वोट शेयर 12 से 17 फीसदी तक रहा है। हालांकि, इसके बदौलत त्रिकोणीय मुकाबले में बीजेपी को सीटों के लिहाज से बड़ा फायदा नहीं हुआ। 2014 के चुनावों में लेफ्ट पार्टी के वोट बढ़े नहीं बल्कि एक बड़ा धड़ा लेफ्ट के वोट का बीजेपी को चला गया। लेफ्ट पार्टियों को जहां 12.5 फीसदी वोट शेयर का नुकसान हुआ तो बीजेपी के वोट शेयर में 12% तक की वृद्धि दर्ज की गई। बीजेपी और तृणमूल दोनों को वोटों के पोलराइज होने की उम्मीद है। भगवा पार्टी की उम्मीद लेफ्ट से छिटके हुए वोटों पर टिकी है। हालांकि, इसके बाद भी ममता बनर्जी के लिए पहली बार ऐसी आशंका है कि उनकी पार्टी के वोट शेयर में कमी आ सकती है। हालांकि, इन सब आशंकाओं का एक पक्ष यह भी है कि मतदान के दिन कुछ हिस्सों में हिंसा भी हो सकती है। हिंसा की इसी आशंका को देखते हुए बंगाल के 98% पोलिंग बूथों पर सेंट्रल फोर्स तैनात की गई है।
नई दिल्ली, 28 अप्रैल 2019, पूर्वी दिल्ली की AAP कैंडिडेट आतिशी ने विवादित बयान दिया है. दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान आतिशी ने कहा कि देश के 2 सबसे बड़े गुंडों को हराना जरूरी है और हराकर इन्हें गुजरात भेजा जाना चाहिए. हालांकि आतिशी ने इस दौरान किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन बीजेपी का जिक्र जरूर किया. आतिशी को आम आदमी पार्टी ने काफी पहले ही पूर्वी दिल्ली से अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया है. आतिशी लंबे समय से इलाके में प्रचार कर रही है. पूर्वी दिल्ली सीट पर आतिशी का मुकाबला बीजेपी उम्मीदवार और क्रिकेटर गौतम गंभीर से है, जबकि कांग्रेस की ओर अरविंदर सिंह लवली मैदान में हैं. रविवार को AAP दफ्तर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान आतिशी ने कहा, "देश के 2 सबसे बड़े गुंडों को हराना बेहद जरूरी है, लोगों से अपील करती हूं कि देशभर में ऐसे उम्मीदवार को वोट देना चाहिए जो अपनी सीट पर बीजेपी को हराकर, दोनों गुंडों को दिल्ली से गुजरात भेज सकें." आतिशी इससे पहले भी अपने प्रचार अभियान में गुंडा शब्द का इस्तेमाल कर चुकी हैं. हाल ही में ओखला विधानसभा के तिकोना पार्क में प्रचार करने पहुंची आतिशी ने कहा था कि उत्तरप्रदेश में मोदी को हराने के लिए SP-BSP गठबंधन के उम्मीदवार को वोट दीजिए. आतिशी ने आगे कहा कि उनके जानकार ने बताया है कि उनके इलाके का SP-BSP उम्मीदवार गुंडा है, फिर भी उन्होंने मतदाताओं से कहा था कि अभी आंख बंद करके आप गठबंधन को वोट डाल आओ." हालांकि रविवार को जब आतिशी से प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूछा गया कि क्या वो अपने बयान पर कायम हैं, तो जवाब देने की बजाय आतिशी चलती बनीं. बता दें कि दिल्ली में 12 मई को लोकसभा चुनाव के लिए मतदान है. यहां इस वक्त जोर-शोर से प्रचार चल रहा है. क्रिकेटर गौतम गंभीर के बीजेपी के टिकट पर उतरने से ये चुनाव क्षेत्र हॉट सीट में बदल गया है. आतिशी ने बीजेपी कैंडिडेट पर दो वोटरआईडी कार्ड रखने का आरोप लगाया है और चुनाव आयोग से उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग की है.
नई दिल्ली, दिल्ली की राजनीति में एक से ज्यादा वोटर कार्ड होने का मामला गर्मा गया है. पूर्वी दिल्ली संसदीय सीट से भारतीय जनता पार्टी(बीजेपी) के उम्मीदवार गौतम गंभीर के पास दो वोटर कार्ड होने के आरोप के बाद बीजेपी ने आम आदमी पार्टी (AAP) पर पलटवार करते हुए कहा कि AAP प्रमुख और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की पत्नी के पास भी तीन वोटर आईडी कार्ड हैं. दिल्ली बीजेपी के प्रवक्ता हरीश खुराना ने शनिवार को मीडिया के सामने AAP पर दोहरा रवैया रखने का आरोप लगाते हुए कहा कि एक तरफ AAP गौतम गंभीर के दो वोटर आइडी कार्ड के मुद्दे को लेकर विवाद खड़ा कर रही है तो दूसरी ओर खुद दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की पत्नी सुनीता केजरीवाल के पास तीन वोटर आईडी कार्ड हैं. इस दौरान बीजेपी प्रवक्ता ने सबूत के तौर पर सुनीता केजरीवाल के तीनों वोटर आईडी कार्ड की कॉपी भी मीडिया के सामने पेश की दरअसल एक दिन पहले ही पूर्वी दिल्ली लोकसभा क्षेत्र से AAP की उम्मीदवार आतिशी ने आरोप लगाया था कि गौतम गंभीर के पास 2 वोटर आईडी कार्ड हैं. जबकि, चुनाव आयोग को दी जानकारी में उन्होंने केवल एक वोटर आईडी कार्ड का ही जिक्र किया है. चुनाव आयोग को शिकायत के अलावा आम आदमी पार्टी ने इस मामले को दिल्ली की एक जिला अदालत में भी याचिका के तौर पर लगाया है. इन आरोपों के बाद बीजेपी के दिल्ली के प्रदेश प्रवक्ता हरीश खुराना ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की पत्नी सुनीता केजरीवाल के तीन वोटर आईडी कार्ड में से एक दिल्ली का है, दूसरा गाज़ियाबाद का है जबकि तीसरा पश्चिम बंगाल का है.
नई दिल्ली, 26 अप्रैल 2019, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 25 अप्रैल को वाराणसी पहुंचे, तो राहुल गांधी भी इस दिन राजस्थान के दौरे पर थे. वहां पर राहुल गांधी ने चुनावी रैलियां भी की थी. इस बीच कुछ तस्वीरों के जरिए दावा किया जा रहा है कि राहुल गांधी की इस जनसभा में भी अच्छी खासी भीड़ मौजूद थी. तस्वीरों में मैदान में भारी भरकम भीड़ देखी जा सकती है. कहा जा रहा है कि ये तस्वीरें जालोर में हुई राहुल गांधी की चुनावी सभा की हैं. इंडिया टुडे एंटी फेक न्यूज वॉर रूम ने पड़ताल में पाया कि वायरल हो रही तस्वीरें साल 2013 में हरियाणा में हुई भूपेंद्र सिंह हुड्डा की रैली की हैं. पोस्ट का आर्काइव्ड वर्जन यहांदेखा जा सकता है. फेसबुक पेज 'I.T & Social Media Cell Congress' ने चार तस्वीरें शेयर करते हुए कैप्शन में लिखा, 'कांग्रेस अध्यक्ष #राहुल_गांधी जी आज जालोर (राज.) के पावन धरा पर पधारने पर लाखों की भीड़ ने उनका किया जोर-शोर से स्वागत किया. पूरे देश में ‘न्याय’ की गूंज सुनाई पड़ रही है और राजस्थान की जनता तय कर चुकी है कि कांग्रेस के हाथ में ही देश और प्रदेश का भविष्य सुरक्षित है.' खबर लिखे जाने तक इस पोस्ट को दो हजार से ज्यादा बार तक शेयर किया जा चुका था. फेसबुक यूजर 'Jitendra Singh Kalyanpura' और 'Dr-Shadab Shaikh' ने भी इन तस्वीरों को जालोर की बताते हुए शेयर किया है. लोकसभा चुनाव के चौथे चरण से पहले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी राजस्थान के अजमेर, जालोर और कोटा में चुनाव प्रचार के लिए गए थे. AFWA ने पड़ताल में पाया: वायरल हो रही इन चार तस्वीरों में से पहली दो तस्वीरों में भारी जन सैलाब दिखाई देता है. इन तस्वीरों को रिवर्स सर्च करने पर पता चला कि ये 10 नवंबर 2013 को हरियाणा के सोनीपत में हुई भूपेंद्र सिंह हुड्डा की रैली की हैं. हुड्डा उस समय हरियाणा के मुख्यमंत्री थे और उन्होंने यहां हरियाणा शक्ति रैली को संबोधित किया था. ये तस्वीरें पिछले साल राजस्थान विधानसभा चुनाव के समय भी वायरल हुई थीं, उस समय Boomlive ने इसका सच बताया था. वायरल हो रही तस्वीरों में से तीसरी तस्वीर में राहुल गांधी स्टेज पर हाथ जोड़कर जनता का अभिवादन करते नजर आते हैं. वहीं चौथी तस्वीर में राहुल गांधी, राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और राजस्थान के उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के साथ नजर आ रहे हैं. यह दोनों ही तस्वीरें जालोर रैली की हैं. इस जनसभा की कुछ तस्वीरें गहलोत ने अपने ट्विटर अकाउंटर पर साझा की हैं. इनमें से एक तस्वीर में सबसे बाईं तरफ खड़ा व्यक्ति वायरल तस्वीर में भी दिख रहा है. वहीं स्टेज की सजावट भी दोनों तस्वीरों में मेल खा रही हैं. चौथी तस्वीर में 'शिव स्टूडिया जालोर' का वॉटरमार्क नजर आता है. अशोक गहलोत ने जो तस्वीरें ट्विटर पर शेयर की थीं, उन तस्वीरों पर भी यह वॉटरमार्क था. इंडिया टुडे एंटी फेक न्यूज वॉर रूम ने शिव स्टूडियो के मालिक किशोर कुमार से संपर्क किया, जिन्होंने यह पुष्टि की कि यह तस्वीर जालोर की ही है और उन्होंने गुरुवार को ही इस तस्वीर को क्लिक किया था. पड़ताल में साफ हुआ कि वायरल हो रही चार तस्वीरों में से भीड़ की दो तस्वीरे भूपेंद्र सिंह हुड्डा की साल 2013 में हुई सोनीपत रैली की हैं, जबकि स्टेज की दो तस्वीरें राहुल गांधी की गुरुवार को हुई जालोर विशाल जनसभा की ही हैं.
नई दिल्ली लोकसभा चुनाव के चौथे चरण के लिए शनिवार को चुनाव प्रचार समाप्त हो जाएगा। इसके साथ ही लोकसभा की 372 सीटों पर चुनाव प्रचार की प्रक्रिया समाप्त हो जाएगी। फिर बाकी के 169 सीटों पर सभी दलों का पूरा फोकस रह जाएगा। अब दलों की प्रचार रणनीति भी बदलती दिखेगी। दरअसल, अंतिम तीन चरण के चुनाव मूल रूप से हिंदी पट्टी में ही होंगे, ऐसे में अब कम इलाके कवर करने होंगे। कांग्रेस और बीजेपी ने दूसरे राज्यों के सभी नेताओं की अब इन राज्यों में ड्यूटी लगा दी है। बीजेपी की हुई थी बंपर जीत अंतिम तीन चरणों में जहां चुनाव हैं वहां 2014 में बीजेपी ने अप्रत्यशित रूप से बहुत बढ़ी जीत हासिल की थी। जैसे राजस्थान, दिल्ली, झारखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, हिमाचल प्रदेश की लगभग सभी सीटें बीजेपी ने जीती थीं। अंतिम तीन चरणों में पश्चिम बंगाल और पंजाब छोड़कर बाकी सभी राज्य में बीजेपी को इन्हीं किलों को बचाने की चुनौती है। ये है कांग्रेस की रणनीति सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस ने इन तीन चरणों के लिए खास योजना बनाई है। इनमें ऐसी सीटों को चिह्नित किया है जहां कांग्रेस बीजेपी को हरा सकती है और पूरा ध्यान उन्हीं सीटों पर फोकस करेगी। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार पार्टी की रणनीति होगी कि सभी सीटों पर उर्जा लगाने के बजाय संसाधनों का अधिकतम इस्तेमाल उन सीटों पर होगा जहां कुछ बेहतर परिणाम आए। सूत्रों के अनुसार इन चरणों में अब प्रियंका गांधी का रोड शो भी अधिक होगा। राहुल गांधी के रैली की भी संख्या बढ़ेगी। इसके अलावा पार्टी के सामने नवजोत सिंह सिद्धू के रैलियों की भी डिमांड काफी है। BJP ने बनाया प्लान इसके साथ ही बीजेपी भी अंतिम के तीन चरणों में पीएम नरेंद्र मोदी की रैलियों की संख्या बढ़ाने के मूड में है। सूत्रों के अनुसार हर दिन चार से पांच रैलियां पीएम मोदी करेंगे। पार्टी ने उन राज्यों के नेताओं को भी कैंप करने को कहा है जहां चुनाव हो चुके हैं। जानकारों का मानना है कि अंतिम के तीन चरण ही 23 मई को निकलने वाले परिणाम को प्रभावित करेंगे।
अहमदाबाद गुजरात में 17वीं लोकसभा के लिए 23 अप्रैल को हुए मतदान ने पिछले 52 साल का रेकॉर्ड तोड़ दिया। इस बार 64.11 प्रतिशत वोटिंग हुई, जबकि इससे पहले 1967 में हुए आम चुनावों में 63.77 प्रतिशत वोटिंग हुई थी। यहां तक कि 2014 की 'नरेंद्र मोदी' लहर में भी 63.6 प्रतिशत मतदान हुआ था। चुनाव आयोग ने बुधवार को आंकड़े जारी करके बताया कि 23 अप्रैल को 4.51 करोड़ वोटरों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। हालांकि, जानकारों ने कहा है कि बंपर मतदान से यह नतीजा निकालना जल्‍दबाजी होगा कि इसका फायदा बीजेपी या कांग्रेस को होने वाला है। इन चुनावों में दक्षिण गुजरात के वलसाड में सबसे ज्‍यादा 75.21 प्रतिशत मतदान हुआ, जबकि सौराष्‍ट्र के अमरेली में सबसे कम 55.75 प्रतिशत वोटिंग हुई। यह इलाका पानी की समस्‍या और किसान असंतोष से जूझ रहा है। दूसरा सबसे अधिक मतदान बारदोली में 73.57 प्रतिशत हुआ, इसके बाद छोटा नागपुर (73.44%) और भरूच (73.21%) का नंबर है। वलसाड समेत यह इलाका आदिवासी बहुल है। जानकार क्‍या कहते हैं हमारे सहयोगी मिरर से बातचीत में राजनीतिक विश्‍लेषक हेमंत कुमार शाह ने कहा, 'रेकॉर्ड वोटिंग से कोई अर्थ नहीं निकलता। यह अंदाजा लगाना गलता होगा कि अधिक वोटिंग का लाभ बीजेपी को मिलेगा। अगर ग्रामीण इलाकों में शहरी क्षेत्रों से अधिक वोटिंग होती है तो आमतौर पर इससे कांग्रेस को लाभ होगा। इस बार आदिवासी इलाकों में बहुत अधिक वोटिंग हुई है, यह बदलाव का संकेत हो सकता है। इसके बाद भी हम यह नहीं कह सकते कि अमुक राजनीतिक दल को लाभ होगा।' राजनीति विज्ञान के रिटायर्ड प्रफेसर दिनेश शुक्‍ला कहते हैं, 'पारंपरिक रूप से आदिवासी, दलित और मुस्लिम कांग्रेस के समर्पित वोटर रहे हैं। वोटिंग प्रतिशत से पता चल रहा है कि इस बार बीजेपी को सभी 26 सीटें नहीं मिलेंगी क्‍योंकि वोटिंग पैटर्न 2014 की तुलना में बदला है। मुझे लग रहा है कि इस बार कांग्रेस को 8 से 10 सीटें मिलेंगी।' बीजेपी, कांग्रेस कर रहे हैं जीत का दावा वोटिंग समाप्‍त होने के बाद मंगलवार को पत्रकारों से बातचीत में मुख्‍यमंत्री विजय रूपाणी ने कहा इस बार के हुए बंपर मतदान का लाभ बीजेपी को होगा और वह सभी 26 सीटें जीतेगी। वहीं गुजरात प्रदेश कांग्रेस कमिटी के चीफ भारत सिंह सोलंकी ने दावा किया कि इस बार कांग्रेस अच्‍छा प्रदर्शन करेगी। उन्‍होंने कहा, 'गुजरात में जनता बड़ी संख्‍या में जनता बीजेपी को सत्‍ता से बाहर करने के लिए घरों से निकलकर आई थी।' गांधीनगर और अहमदाबाद गांधीनगर से बीजेपी अध्‍यक्ष अमितशाह ने चुनाव लड़ा था और यहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपना वोट डाला था। यहां 2014 के ही समान वोटिंग प्रतिशत 65.57 रहा। अहमदाबाद पूर्व और अहमदाबाद पश्चिम निर्वाचन क्षेत्रों में इस बार वोटिंग में कमी देखी गई। अहमदाबाद पूर्व में 2014 के 61.59 प्रतिशत की जगह 61.32 प्रतिशत मतदान हुआ, जबकि अहमदाबाद में यह 60.37 प्रतिशत रहा, यहां 2014 में 62.93 प्रतिशत वोटिंग हुई थी। महिला शक्ति पिछले लोकसभा चुनावों की तुलना करें तो पाएंगे कि 2019 में 1.49 प्रतिशत अधिक महिलाओं ने वोट किया। सबसे अधिक महिला वोटर (74.55प्रतिशत) वलसाड में रहीं, जबकि सबसे कम पोरबंदर में (51.47प्रतिशत)। 2014 के लोकसभा के चुनावों में भी सबसे कम महिला वोटिंग पोरबंदर (45.91 प्रतिशत) और सबसे अधिक वलसाड (73.02 प्रतिशत) में ही रही थी। दिलचस्‍प तौर पर इस बार पोरबंदर में पिछली बार की तुलना में 5.5 प्रतिशत अधिक महिलाओं ने वोटिंग की। इस बार कुल वोटिंग प्रतिशत 64.59 प्रतिशत में सबसे अधिक महिला वोटिंग (59.84 प्रतिशत) बनासकांठा में हुई। 2014 में यहां महज 51.63 प्रतिशत महिलाओं ने वोट डाला था। इस बार कच्‍छ, मेहसाणा, अहमदाबाद पश्चिम, पोरबंदर, जूनागढ़, वडोदरा, भरूच और बारदोली इन आठ निर्वाचन क्षेत्रों में महिला वोटरों की संख्‍या में कमी आई। सबसे कम वोटिंग 1996 में हुई सबसे कम मतदान 1996 के चुनावों में हुआ था, केवल 35.92 प्रतिशत मतदाताओं ने वोट डाला था। दूसरे नंबर पर कम मतदान वाला चुनाव 1991 का था जब 44.01 मतदाताओं ने वोट डाले थे। विधानसभा क्षेत्रों में मतदान आदिवासी बहुल 5 विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान प्रतिशत 80 प्रतिशत पार कर गया। भरूच विधानसभा क्षेत्र के देदियापाडा और झगादिया में क्रमश: 85.01 प्रतिशत और 82.91 प्रतिशत मतदान हुआ। बारदोली लोकसभा सीट का हिस्‍सा निजार विधानसभा क्षेत्र में 82.9 प्रतिशत वोटिंग हुई। वलसाड लोकसभा सीट के कपराडा और डांग में क्रमश: 81.23 प्रतिशत और 83.16 प्रतिशत मतदान हुआ। देदियापाडा, निजार और कपराडा में सबसे अधिक क्रमश: 84.12%, 81.55% और 81.29% महिला वोटिंग हुई। कच्‍छ लोकसभा सीट के रापर विधानसभा क्षेत्र में सबसे कम 47.37 प्रतिशत वोटिंग हुई। पोरबंदर के कुतियाना ओर भावनगर के गधाडा में क्रमश: 49.56 प्रतिशत और 49.70 प्रतिशत वोटिंग हुई। रापर, कुतियाना और खेड़ा के महुधा में कम महिला मतदान हुआ जो क्रमश: 45.57 प्रतिशत, 43.75 प्रतिशत और 46.87 प्रतिशत रहा।
नई दिल्ली भारतीय राजनीति के बदलते दौर का यह भी एक संकेत ही है कि बीजेपी पहली बार लोकसभा चुनाव में कांग्रेस से ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ रही है। इससे पहले 2014 में बीजेपी ने अपने इतिहास में सबसे ज्यादा लोकसभा सीटें जीती थीं और कांग्रेस पार्टी अब तक का सबसे बुरा प्रदर्शन करते हुए महज 44 सीटों पर ही सिमट गई थी। एक वक्त में उत्तर भारत की ही पार्टी कही जाने वाली बीजेपी के उम्मीदवारों की संख्या बताती है कि वह पूरे देश में विस्तार ले रही है, जबकि कांग्रेस गठबंधन के चक्कर में कम सीटों पर लड़ रही है। इन चुनावों में कांग्रेस ने 423 सीटों पर ही उम्मीदवार उतारे हैं, जबकि बीजेपी 437 सीटों पर चुनावी जंग में सीधे तौर पर मुकाबले में है। हालांकि यूपी में कांग्रेस कुछ और सीटों पर उम्मीदवार उतारने वाली है, लेकिन इसके बाद भी वह बीजेपी से आगे नहीं बढ़ती दिख रही। राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक यह ऐतिहासिक मौका है क्योंकि कांग्रेस को आजादी के बाद से ही हमेशा राष्ट्रीय दल के तौर पर देखा जाता रहा है, जबकि समूचे भारत में बीजेपी की छाप उसके मुकाबले कम रही है। भले ही बीजेपी ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में 1998 और 1999 में केंद्र की सत्ता हासिल की, लेकिन 2014 की जीत ने उसे राष्ट्रीय फलक पर जबरदस्त विस्तार दिया। एक तरफ उसे 282 सीटों पर अपने दम पर जीत मिली, जबकि कांग्रेस सिर्फ 44 सीटों पर सिमट गई और मुख्य विपक्षी दल का दर्जा भी न मिल सका। कांग्रेस ने कहा, गठबंधन के चलते हम कम सीटों पर लड़ रहे हालांकि एक पक्ष यह भी है कि कांग्रेस का बीजेपी के मुकाबले कम सीटों पर लड़ना उसकी कमजोरी से ज्यादा गठबंधन की रणनीति है। उसने तमाम सीटें अपने साझीदारों को दी हैं, जिसके चलते उसकी सीटों की संख्या कम हुई है। कांग्रेस के डेटा ऐनालिटिक्स डिपार्टमेंट के हेड प्रवीन चक्रवर्ती कहते हैं, 'बीजेपी का कांग्रेस से ज्यादा सीटों पर लड़ना इस बात का संकेत है कि वे गठबंधन करने में सफल नहीं हो पा रहे हैं, जबकि कांग्रेस नए साथी जोड़ने में सफल रही है।' 2014 में कांग्रेस ने उतारे थे 464 कैंडिडेट कांग्रेस ने भले ही 2014 में महज 44 सीटों पर जीत हासिल की थी, लेकिन कैंडिडेट उतारने में वह बीजेपी से आगे थी। तब उसने 464 सीटों पर कैंडिडेट्स उतारे थे, जबकि बीजेपी ने 428 सीटों पर सीधे तौर पर चुनावी जंग लड़ी थी। 2009 में बीजेपी ने 433 और कांग्रेस ने 440 सीटों पर चुनाव लड़ा था।

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