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नई दिल्ली, 24 जनवरी 2020, न्यूट्रिशन से भरपूर बादाम को सेहत के लिए अच्छा माना जाता है. इसे रोजाना डाइट में शामिल कर आप सेहतमंद रह सकते हैं. अखरोट में प्रोटीन और फैट होता है जो शरीर को कैल्शियम और आयरन देने का काम करता है. कुछ शोधकर्ताओं का दावा है कि अखरोट सेहत से जुड़ी कई बड़ी समस्या को जड़ से खत्म कर सकता है. साल 2019 में पेंसिलवेनिया स्टेट यूनिवर्सिटी में शोधकर्ताओं ने इसे लेकर एक रिसर्च भी किया था. इस रिसर्च में शोधार्थियों सैचुरेटेड फैट की जगह अखरोट का सेवन करने वाले लोगों का स्वास्थ्य ज्यादा बेहतर पाया. शोधकर्ताओं का दावा था कि अखरोट में मौजूद अनसैचुरेटेड फैट ब्लड प्रेशर को संतुलित कर हृदय संबंधी रोगों को शरीर से दूर रखता है. इस रिपोर्ट में खोजकर्ताओं ने ये भी बताया था कि अखरोट में अल्फा लिनोलेनिक एसिड होता है जो ओमेगा-3 फैटी एसिड का ही एक प्रकार है. यह आमतौर पर पौधों में पाया जाता है. असिस्टेंट रिसर्च प्रोफेसर क्रिस्टियाना पीटरसन के नेतृत्व में भी इसे लेकर एक शोध किया गया था. क्रिस्टियाना के शोध में भी अखरोट को सेहत के लिए बेहद फायदेमंद बताया गया था. क्रिस्टियाना पीटरसन ने बताया कि हम देखना चाहते थे कि क्या अखरोट से आंतों में सुधार आने का असर हृदय रोगों पर भी पड़ता है. जर्नल ऑफ न्यूट्रिशन में प्रकाशित एक नई रिपोर्ट में भी अखरोट को हेल्दी डाइट बताया गया है जो कि हृदय और आंतों के लिए काफी अच्छा होता है. रोजाना 60-80 ग्राम अखरोट खाने से आपकी सेहत में सुधार आ सकता है.
आपने अभी तक फूल गोभी और बंद गोभी या पत्ता गोभी का ही स्वाद लिया होगा और इसके हेल्थ बेनिफिट्स के बारे में भी जानते होंगे। लेकिन आज हम आपको एक ऐसी गोभी के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसे डायबीटीज से लेकर कैंसर की रोकथाम और वेट लॉस में कारगर माना जाता है। इस गोभी का नाम है चोकीगोभी, जिन्हें अंग्रेजी भाषा में ब्रूसेल्स स्प्राउट्स के नाम से जाना जाता है। यूंकि यह गोभी ब्रूसेल्स, बेलजियम में काफी पॉप्युलर रही है, इसलिए यह भी उसी नाम से मशहूर है। 1- चोकीगोभी में काफी कम कैलरी होती हैं, लेकिन इसमें विटमिन सी, के और फाइबर पर्याप्त मात्रा में होता है। ये सभी तत्व टिशू को रिपेयर करने, इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाने और आयरन के अब्जॉर्प्शन में मदद करते हैं। 2- चोकीगोभी में पोटैशियम, कैल्शियम प्रचुर मात्रा में होता है, जबकि इसमें सैचरेटेड फैट बिल्कुल भी नहीं होता। इसलिए यह वेट लॉस में कारगर मानी जाती है। चोकीगोभी का ग्लाइसेमिक इंडेक्स काफी कम होता है और फाइबर की मात्रा ज्यादा, इसलिए इस वजन घटाने वालों के लिए एकदम सही ऑप्शन माना जाता है। 3- इसमें डायटरी फाइबर होता है जो ब्लड शुगर को रेग्युलेट करने में मदद करता है और पाचन क्रिया में भी सहायता करता है। इसी खूबी की वजह से इसे टाइप 2 डायबीटीज की रोकथाम में कारगर माना गया है। 4- कुछ स्टडीज में दावा किया गया है कि चोकीगोभी में मौजूद ऐंटी-ऑक्सिडेंट्स कुछ तरह के कैंसर के प्रति इम्युनिटी प्रदान करते हैं। 5- इसके अलावा चोकीगोभी लिवर के रिपेयर में भी मदद करती है। स्किन को खूबसूरत और हेल्दी बनाने में भी यह सहायक है। 6- कोऐग्युलेशन में मदद करता है, जिससे ब्लीडिंग रुक जाती है।
नई दिल्ली, 21 अक्टूबर 2019, एंटीबायोटिक दवाओं के अनियंत्रित इस्तेमाल से उनके खिलाफ बैक्टीरिया और वायरस में प्रतिरोधक क्षमता पैदा हो रही है. ऐसे में आयुर्वेदिक एंटीबायोटिक दवाएं इनका विकल्प साबित हो सकती हैं. अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) भोपाल के अध्ययन में एक आयुर्वेदिक एंटीबायोटिक दवा फीफाट्रोल को एक प्रमुख बैक्टीरिया संक्रमण के खिलाफ प्रभावी पाया गया है. एम्स भोपाल ने अपने शोध में पाया कि फीफाट्रोल स्टैफिलोकोकस प्रजाति के बैक्टीरिया के खिलाफ बेहद शक्तिशाली है. इस प्रजाति के कई बैक्टीरिया सक्रिय हैं जिनमें आरियस, एपिडर्मिस, स्पोफिटिकस के उप प्रकार शामिल हैं. इन तीनों बैक्टिरिया के खिलाफ यह प्रभावी रूप से कारगर पाया गया है. एक अन्य बैक्टीरिया पी रुजिनोसा के विरुध्द भी यह असरदार है. इसके अलावा इकोलाई, निमोनिया, के एरोजेन आदि बैक्टीरिया के प्रति भी इसमें संवेदनशील प्रतिक्रिया देखी गई. शोधकर्ता टीम के प्रमुख और एम्स भोपाल के निदेशक डॉ. समरन सिंह के अनुसार आमतौर पर आयुर्वेदिक दवाएं प्रतिरोधक क्षमता को बढाती हैं लेकिन फीफाट्रोल में बैक्टीरिया के खिलाफ लड़ने की क्षमता देखी गई है. सिंह के अनुसार आरंभिक नतीजे उत्साहजनक हैं. स्टैफिलोकोकस बैक्टीरिया त्वचा, श्वसन तथा पेट संबंधी संक्रमणों के लिए जिम्मेदार हैं. जिन लोगों का प्रतिरोधक तंत्र कमजोर होता है उनमें इसका संक्रमण घातक भी हो सकता है. बता दें कि एमिल फार्मास्यूटिकल्स द्वारा निर्मित फीफाट्रोल 13 जड़ी बूटियों से तैयार एक एंटी माइक्रोबियल सोल्यूशन है जिसमें पांच बूटियों की प्रमुख हिस्सेदारी तथा 8 के अंश मिलाए गए हैं. इनमें सुदर्शन वटी, संजीवनी वटी, गोदांती भस्म, त्रिभुवन कीर्ति रस तथा मृत्युंजय रस हैं. जबकि आठ अन्य औषधीय अंशों में तुलसी, कुटकी, चिरयात्रा, मोथा, गिलोय, दारुहल्दी, करंज और अप्पामार्ग शामिल हैं आयुर्वेद विशेषज्ञ डा. रामनिवास पराशर के अनुसार यह शोध साबित करता है कि आयुर्वेद में एंटीबायोटिक दवाओं का विकल्प मौजूद है जो पूरी तरह से जड़ी-बूटियों पर आधारित है. इसलिए सरकार को इस दिशा में फोकस करना चाहिए.
टोरंटो रिसर्चरों ने एक ऐसी संभावित दवा विकसित की है, जो दिल के दौरे का इलाज करने और हृदयघात से बचाने में कारगर है। इन दोनों ही स्थितियों के लिए फिलहाल कोई उपचार मौजूद नहीं है। एक अध्ययन में पाया गया कि दिल का दौरा पड़ने से हृदय में सूजन बढ़ जाती है और दिल में एक जख्म बन जाता है, जिससे आगे चलकर हृदयघात होने की आशंका बढ़ जाती है। यह एक लाइलाज स्थिति है। इस दवा को विकसित करने वालों में कनाडा के गुलेफ यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता भी शामिल हैं। उनका कहना है कि दवा दिल में जख्म बनने से रोकती है और मरीजों के लिए जीवन भर हृदय संबंधी दवाएं लेने की जरूरत को खत्म करेगी। उन्होंने कहा कि यह दवा सर्कैडीअन रिदम कहे जाने वाले हमारे शरीर के प्राकृतिक समय-चक्र के आधार पर काम करती है। यह अध्ययन ‘नेचर कम्युनिकेशन्स बायोलॉजी’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।
नई दिल्ली, बेदाग खूबसूरत त्वचा का सपना हर कोई देखता है. लेकिन चेहरे की ये खूबसूरती उस समय फीकी पड़ जाती है जब चेहरे पर किसी जगह मस्सा उग आए. चेहरे पर ही नहीं मस्से शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकते हैं. यूं तो मस्से व्यक्ति को किसी तरह की हानि नहीं पहुंचाते, लेकिन यह आपके लुक को प्रभावित कर सकते हैं. ऐसे में आइए जानते हैं आखिर कैसे इन बिन बुलाए मेहमानों से बड़ी आसानी से छुटकारा पाया जा सकता है. केले का छिलका- केला ही नहीं इसके छिलकों के भी बेशुमार फायदे हैं. सेहत बनाने के साथ इसका छिलका आपकी खूबसूरती में भी चार चांद लगा सकता है. केले के छिलके में मस्से को सुखाने की क्षमता होती है. इसके लिए रात को मस्से वाली जगह पर केले के छिलके को रखकर उस पर कपड़ा बांध लें. ऐसा तब तक करें जब तक मस्सा साफ न हो जाए. बेकिंग सोडा- मस्सा हटाने के लिए एक चम्मच बेकिंग सोडा में कुछ बूंदें कैस्टर ऑइल डालकर इस पेस्ट को मस्से पर लगाकर हल्के हाथों से मसाज करें. चेहरे को एक घंटे बाद धो लें. एक महीने में आपको मस्सों की परेशानी से निजात मिल जाएगी. लहसुन- लहसुन में पाए जाने वाले एंटीफंगल और एंटीबैक्टीरियल गुण त्वचा से मस्से हटाने में मदद करते हैं. मस्से हटाने के लिए लहसुन की दो कलियां लेकर उनका पेस्ट बना लें. इस पेस्ट को मस्से पर एक घंटे तक लगाकर रखें. थोड़ी देर बाद त्वचा को पानी से धो लें. दिन में दो बार इस उपाय को करें. नोट- मस्से हटाने के लिए किए गए इन उपायों को करते समय अगर आपको किसी तरह की कोई जलन या परेशानी महसूस हो तो तुरंत उस जगह को साफ कर लें या फिर अपने डॉक्टर से सलाह लें.
नई दिल्ली, 26 सितंबर 2019,अक्सर लोगों को सिर में फंगल इंफेक्‍शन की शिकायत होती है. फंगस पैदा करने वाले बैक्‍टीरिया आमतौर पर मानसून में पैदा होते हैं और बारिश के बाद भी इनका प्रभाव खत्म नहीं होता. इस दौरान लोग डैंड्रफ से भी काफी परेशान रहते हैं. आइए आपको बताते हैं कि किन चीजों का इस्तेमाल कर आप डैंड्रफ और फंगस इंफेक्शन से बच सकते हैं. बेकिंग सोडा- स्कैल्प फंगल इंफेक्शन दूर करने में बेकिंग सोड़ा बड़ा कारगर है. ये फंगल की एक्टिविटी को कम कर राहत दिलाता है. बेकिंग सोडा को पानी में मिक्स कर थोड़ी देर के लिए मसाज करें और बाद में शैम्पू की बजाय सिर को सादे पानी से धो लें. विनेगर- फंगल इंफेक्शन दूर करने के लिए आप एप्पल विनेगर का भी इस्तेमाल कर सकते हैं. विनेगर इन्फेक्शन पैदा करने वाली मुख्य फंगी पर वार करता है. एप्पल विनेगर को पानी पहले पानी में मिला लें और फिर धीरे-धीरे इसे इंफेक्शन वाले हिस्से पर लगाएं. एलोवेरा जेल- एलोवेरा को संजीवनी बूटी कहें तो गलत नहीं होगा. क्या आपको पता है कि सिर में होने वाले इंफेक्शन को दूर करने में एलोवेरा जेल काफी कारगर है. यह आपको जलन, खुजली और रैशेज से राहत भी दिलाएगा. इंफेक्शन होने पर बालों की जड़ों में एलोवेरा जेल 30 मिनट तक लगाकर छोड़ दें. जल्दी ही आपको इस समस्या से मुक्ति मिल जाएगी. टी ट्री ऑयल- टी ट्री ऑयल फंगल इंफेक्शन की समस्या को कुछ समय में ही दूर कर देता है. ट्री टी ऑयल को ऑलिव और बादाम के तेल के साथ मिलाकर इंफेक्शन वाली जगह पर लगाने से आप इंफेक्शन से राहत पा सकेंगे. नीम की पत्तियां- बारिश के मौसम में होने वाला फंगल इंफेक्शन नीम की पत्तियों से भी दूर किया जा सकता है. इसके लिए घर में नीम की पत्तियों का पेस्ट बना लें और उसमें थोडा सा नींबू का रस और थोड़ी हल्दी मिला लें. इस पेस्ट को बालों की जड़ो में 30 मिनट तक लगाकर छोड़ दें. जल्दी ही आपका इंफ्केशन दूर हो जाएगा. दही- अगर आप या आपका कोई परिचित फंगल इंफेक्शन का दंश झेल रहा है तो उसे रोकने के लिए दही खासा मददगार हो सकता है. दही में मौजूद प्रोबायोटिक्स लैक्टिक एसिड बनाता है, जो फंगल इंफेक्शन की रोकथाम में मददगार होता है. हल्दी- एक चम्मच हल्दी आपको कई तरह के त्वचा रोगों से निजात दिला सकती है. यदि आप हल्दी में शहद मिलाकर पेस्ट बनाकर इंफेक्शन वाली जगह पर लगाएं तो जल्दी ही आपको इससे मुक्ति मिल सकती है.
नई दिल्ली, 22 जुलाई 2019, अक्सर पूजा में भगवान गणेश को अर्पित की जाने वाली दूब का लोग सिर्फ धार्मिक महत्व जानते हैं. लेकिन जिन लोगों को इसके औषधीय गुणों की समझ होती है वो दूब का इस्तेमाल सेहत ही नहीं अपनी खूबसूरती को बनाए रखने के लिए भी करते हैं. बहुत कम ही लोग जानते हैं कि हिन्दू संस्कारों में उपयोग करने के अलावा दूब घास यौन रोगों, लीवर रोगों, कब्ज जैसी कई परेशानियों के उपचार में रामबाण माना जाता है. आइए जानते हैं दूब के ऐसे ही कुछ चमत्कारी फायदों के बारे में. आयुर्वेद के अनुसार दूब का स्वाद कसैला-मीठा होता है. इसमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, कैल्शियम, फाइबर, पोटाशियम पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं. इसका सेवन करने से मुंह के छाले ही नहीं कई तरह के पित्त एवं कब्ज विकारों को ठीक करने में भी मदद मिलती है. दूब पेट, यौन, और लीवर संबंधी रोगों के लिए असरदार मानी जाती है. दूब बढ़ाएं प्रतिरोधक क्षमता- दूब घास शरीर में प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का काम करती है. इसमें मौजूद एंटीवायरल और एंटीमाइक्रोबिल गुण बीमारियों से लड़ने की क्षमता में बढ़ोत्तरी करते हैं. अनिद्रा से राहत- दूब का सेवन करने से व्यक्ति को अनिद्रा, थकान, तनाव जैसे रोगों को ठीक करने में फायदा मिलता है. त्‍वचा संबंधी समस्‍या- दूब में मौजूद एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटी-सेप्टिक गुणों की वजह से त्‍वचा संबंधी समस्‍याओं में लाभ मिलता है. इसका सेवन करने से त्‍वचा संबंधी परेशानी जैसे- खुजली, त्वचा पर चकत्‍ते और एक्जिमा जैसी समस्‍याओं से राहत मिलती है. इसके लिए दूब घास को हल्दी के साथ पीसकर उसका पेस्ट बनाकर त्वचा पर लगाने से इन सभी समस्‍याओं से राहत मिलती है. प्यास से मिलेगी राहत- दूब का रस पीने से व्यक्ति को बार-बार प्यास नहीं लगती है. इसके अलावा व्यक्ति को पेशाब खुलकर होता है और खून में मौजूद अनावश्यक गर्मी शांत होकर त्‍वचा संबंधी विकारों से भी व्यक्ति दूर रहता है. एनीमिया दूर करें- आजकल खराब लाइफस्टाइल के चलते हर दूसरा व्यक्ति एनीमिया का शिकार है. ऐसे लोगों के लिए दूब का रस अमृत हो सकता है. दरअसल दूब के रस को हरा रक्त भी कहा जाता है, क्‍योंकि इसे पीने से एनीमिया की समस्‍या दूर होती है. दूब खून को साफ करने के साथ शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं को भी बढ़ाने का काम करती है. इसका सेवन करने से शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर बढ़ता है. आंखों के लिए फायदेमंद- दूब पर सुबह उटकर नंगे पांव चलने से आंखों की ज्योति बढती है. इसके अलावा दूब का ताजा रस सुबह के समय पीने से मानसिक रोगों में अद्भुत लाभ होता है और त्वचा के रोगों से भी मुक्ति मिलती है. मुंह के छाले- दूब की पत्तियों को गर्म पानी में उबालकर हर रोज कुल्ला करने से मुंह के छाले दूर हो जाते हैं
हर दिन सोडा पीने से न सिर्फ आपका वजन बढ़ता है और आप मोटे हो सकते हैं बल्कि आपको कैंसर होने का खतरा भी कई गुना बढ़ जाता है। हाल ही में हुई एक नई स्टडी में इस बात का खुलासा हुआ है। लेकिन सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इस कैटिगरी में सिर्फ सोडा ही नहीं बल्कि फ्रूट जूस भी है। हर दिन सोडा पीने से कैंसर का खतरा 18 प्रतिशत अधिक अगर कोई व्यक्ति हर दिन सिर्फ 100ML सोडा का सेवन करे तो उस व्यक्ति में कई तरह के कैंसर विकसित होने का खतरा 18 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित इस स्टडी की मानें तो हर दिन सोडे का सेवन करने से अकेले ब्रेस्ट ट्यूमर का खतरा 22 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। अनुसंधानकर्ताओं ने पाया कि सिर्फ सोडा ही नहीं बल्कि बिना मिठास वाला फ्रूट जूस भी सेहत के लिए हानिकारक है। हर दिन फ्रूट जूस का सेवन भी कैंसर के खतरे को बढ़ाता है। मिठास वाली ड्रिंक्स और कैंसर के बीच कनेक्शन यह रिसर्च फ्रांस में की गई जहां न्यूट्रिशन और हेल्थ के बीच क्या संबंध है यह जानने की कोशिश की गई और इसी के तहत अनुसंधानकर्ताओं ने इस बात का पता लगाया कि स्वीट ड्रिंक्स यानी वैसे ड्रिंक्स जिनमें मिठास होती है, उनके और कैंसर के बीच कनेक्शन है। इस रिसर्च के नतीजे साफतौर पर बताते हैं कि फ्रूट जूस जिन्हें काफी हेल्दी बताकर दुनियाभर में प्रमोट किया जाता है, दरअसल वह हमारी सेहत के लिए नुकसानदेह है। स्टडी में करीब 1 लाख लोगों को किया गया शामिल इस रिसर्च के लिए अनुसंधानकर्ताओं ने 97 पेय पदार्थ और 12 आर्टिफिशली स्वीटेंड पेय पदार्थों की जांच की जिसमें कार्बोनेटेड ड्रिंक्स, स्पोर्ट्स ड्रिंक्स, सिरप और प्योर फ्रूट जूस शामिल थे। रिसर्च के ऑथर्स ने कहा, रिसर्च का डेटा इस बात का समर्थन करता है कि मौजूदा न्यूट्रिशनल रेकमेंडेशन यही है कि लोगों को हर दिन मिठास वाली ड्रिंक्स के सेवन पर कंट्रोल करना चाहिए जिसमें 100 फीसदी फ्रूट जूस भी शामिल है। साल 2009 से हो रही इस स्टडी में करीब 1 लाख लोगों को शामिल किया गया था।
नई दिल्ली, 09 जुलाई 2019,दिल से जुड़ी बीमारियों के कारण पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा मौतें होती हैं. खतरनाक फैट बढ़ने की वजह से हृदय काम करना बंद कर देता है, जिससे इंसान की मौत हो जाती है. इस फैट को कंट्रोल करने के लिए ज्यादातर लोग कार्डियो करते हैं, जबकि एक रिसर्च में खुलासा हुआ है कि कार्डियो की बजाय वेटलिफ्टिंग ज्यादा बेहतर विकल्प है. दोनों ही एक्सरसाइज हृदय के आस-पास जमा बॉडी फैट को कंट्रोल करने में कारगर हैं. स्टडी में बताया गया है कि हृदय के पास एक ऐसा फैट भी होता है जिसे कार्डियो के जरिए कम करना मुश्किल है. इस फैट को सिर्फ वेटलिफ्टिंग के जरिए 31 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है. हालांकि फैट को कम करने के लिए किस तरह की वेटलिफ्टिंग कर रहे हैं, इस पर ध्यान देना भी जरूरी है. हार्ट फैट को कम करने के लिए सिंगल आर्म डंबल रो बेहतर एक्सरसाइज है. इसके अलावा आप बॉडी वेट पुशअप्स से भी हार्ट फैट को कम कर सकते हैं. इस दौरान आपको घंटों तक कार्डियो करने की भी जरूरत नहीं है. कॉपेनहेगन यूनिवर्सिटी हॉस्पीटल के वैज्ञानिकों ने 32 ऐसे लोगों पर यह रिसर्च किया था जो मोटापे से ग्रस्त होने के बावजूद किसी तरह की एक्सरसाइज नहीं कर रहे थे. बता दें कि पूरी दुनिया में मरने वाले हर तीसरे व्यक्ति की मौत का कारण हृदय रोग ही होता है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक हृदय रोगों की वजह से हर साल करीब 1 करोड़ 80 लाख लोगों की मौत होती है.
नई दिल्ली, 07 जुलाई 2019,बढ़ता वजन आजकल हर दूसरे व्यक्ति के लिए परेशानी का सबब बनता जा रहा है. वजन कम करने के लिए लोग कभी जिम का सहारा लेते हैं तो कभी योग और दवाइयों का. बावजूद इसके कम समय में मनचाहा रिजल्ट नहीं मिल पाता है. ऐसे में अगर आप इस खास कॉफी का सेवन करती हैं तो हो सकता है आप कुछ ही दिनों में अपना वजन कम कर एक परफेक्ट फिगर पा लें. जिम और एक्सरसाइज के बावजूद वजन कम नहीं हो रहा तो कॉफी पीने से भला वजन कम कैसे किया जा सकता है? यही सोच रही हैं न आप? आपको बता दें, जो लोग अपना वजन कम करना चाहते हैं उन्हें अपनी कॉफी में खाना पकाने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला नारियल का तेल मिलाकर पीना चाहिए. ऐसा करने से आपके शरीर की चर्बी पिघलेगी और आपका वजन कम हो जाएगा. कॉफी में नारियल का तेल मिलाने से बॉडी के एक्स्ट्रा फैट तेजी से बर्न होने लगते हैं. इस खास कॉफी को बनाने के लिए आपको कॉफी मग में 2 चम्मच नारियल का तेल डालना है. इसके बाद पहले से तैयार की हुई बिना दूध वाली कॉफी को मग में डालें. ध्यान रखें कि कॉफी गरम होनी चाहिए ताकि तेल और कॉफी अच्छे से मिक्स हो सकें. अगर आप शुगर की मरीज हैं तो बिना चीनी वाली कॉफी का सेवन करें. एक रिसर्च की मानें तो रोजाना ब्लैक कॉफी में नारियल तेल मिलाकर पीने से वजन तेजी से घटने के साथ शरीर में गुड कोलेस्ट्रॉल का लेवल भी बढ़ता है. इतना ही नहीं व्यक्ति की बॉडी के मेटाबॉलिज्म रेट में भी तेजी से सुधार होता है. जिसकी वजह से भी वजन जल्दी कम होता है. aajtak
लंदन आमतौर पर ऐसा माना जाता है कि बैक्टीरिया और वायरस ही बीमारियों की जड़ होते हैं लेकिन अब एक नई रिसर्च में यह बात सामने आयी है कि एक खास तरह के बैक्टीरिया के सेवन से हार्ट को हेल्दी रखा जा सकता है और दिल से जुड़ी बीमारियों का खतरा कम होता है। शोधकर्ताओं की मानें तो अक्करमेंसिया म्यूसिनीफिला नाम का बैक्टीरिया जो मानव आंत में उपस्थित जीवाणु की एक प्रजाति है का अगर पास्चुरीकरण के रूप में उपयोग किया जाए तो यह विभिन्न हृदय रोग जोखिम कारकों से सुरक्षा प्रदान करता है। प्रतिभागियों में पहले से थे दिल की बीमारी के जोखिम कारक पत्रिका ‘नेचर मेडिसिन’ में प्रकाशित इस निष्कर्ष के मुताबिक, लौवेन यूनिवर्सिटी की रिसर्च टीम ने मानव शरीर में प्रभावी बैक्टीरिया पर अध्ययन किया। इसके लिए 42 प्रतिभागियों को नामांकित किया गया और 32 ने इस परीक्षण को पूरा किया। शोधकर्ताओं ने मोटे प्रतिभागियों को अक्करमेंसिया दिया, इन सभी में डायबीटीज टाइप 2 और मेटाबॉलिक सिंड्रोम देखे गए यानी इनमें दिल की बीमारियों से संबंधित जोखिम कारक थे। 3 महीने तक करना था अक्करमेंसिया का सेवन प्रतिभागियों को 2 समूहों में बांट दिया गया- एक जिन्होंने जीवित बैक्टीरिया लिया, दूसरा जिन्होंने पास्चुरीकृत बैक्टीरिया लिया। इन दोनों समूहों के सदस्यों से अपने खान-पान और शारीरिक गतिविधियों में परिवर्तन करने के लिए कहा गया। इन्हें अक्करमेंसिया न्यूट्रीशनल सप्लिमेंट के तौर पर दिया गया। अक्करमेंसिया का सेवन इन प्रतिभागियों को तीन महीने तक लगातार करना था। डायबीटीज, हार्ट डिजीज का खतरा काफी हद तक हुआ कम शोधकर्ताओं ने पाया कि इस सप्लिमेंट को खाना आसान रहा और जीवित और पास्चुरीकृत बैक्टीरिया लेने वाले समूहों में कोई साइड इफेक्ट नहीं देखा गया। पास्चुरीकृत बैक्टीरिया ने प्रतिभागियों में डायबीटीज टाइप 2 और दिल की बीमारियों के खतरे को काफी हद तक कम कर दिया। इससे लिवर के स्वास्थ्य में भी सुधार देखा गया। प्रतिभागियों के शारीरिक वजन में भी गिरावट (सामान्य तौर पर 2.3 किलो) देखी गई और इनके साथ ही साथ कलेस्ट्रोल के स्तर में भी कमी आई।
लखनऊ : पचास की उम्र के बाद पुरुषों को होने वाली प्रोस्टेट की बीमारी से बचाने के लिए सीएसआईआर सीडीआरआई ने न्यूट्रास्यूटिक उत्पाद विकसित किया है। यह उत्पाद औषधीय पौधे के फल से तैयार किया गया है, जो पूरी तरह आयुर्वेदिक और सुरक्षित है। संस्थान के निदेशक प्रफेसर तपस कुमार कुंडू ने बताया कि उत्पाद के लाइसेंसिंग समझौते पर सोमवार को संस्थान के 68 वें स्थापना दिवस के मौके हस्ताक्षर किए गए। जो चेन्नै की लुमेन मार्केटिंग कंपनी के साथ हुआ है। निदेशक प्रफेसर तपस कुमार कुंडू ने बताया कि बिनाइन प्रोस्टेटिक हाइपरप्लाजिया (बीपीएच) या प्रोस्टेट की बीमारी बढ़ती उम्र के पुरुषों में होने वाली सबसे आम बीमारी है, जिसमें प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ जाती है और उन्हें पेशाब करने में परेशानी होती है। आमतौर पर 40 साल की उम्र के बाद इसके प्रारंभिक लक्षण विकसित हो सकते हैं। इन्होंने की खोज: भारतीय पारंपरिक औषधीय पौधे से विकसित इस न्यूट्रास्युटिकल उत्पाद को बनाने में डॉ़ टी नरेंद्र, डॉ़ मोनिका सचदेव, डॉ. रवि भट्टा, डॉ़ एसके रथ और डॉ. पीआर मिश्रा ने अहम भूमिका निभाई है।
लखनऊ पुरुषों में होने वाले कैंसरों में प्रॉस्टेट कैंसर का नाम सबसे प्रमुख है। अखरोट के आकार की प्रॉस्टेट-ग्रन्थि का काम अपने स्रावों द्वारा शुक्राणुओं को आहार व गति प्रदान करना होता है। प्रॉस्टेट कैंसर शुरू में इसी ग्रन्थि तक सीमित रहता है, लेकिन बाद में आसपास व दूर के अंगों में फैल भी सकता है। उम्र बढ़ने के साथ इसकी आशंका बढ़ती है। मोटापे से भी इसका सम्बन्ध पाया गया है और कई बार आनुवंशिकी (जेनेटिक्स) के कारण एक ही परिवार के कई पुरुषों में भी यह हो सकता है। बीमारी के लक्षण - पेशाब की धार का पतला होना - पेशाब करने में असमर्थता - वीर्य में खून आना - शिश्न के स्तम्भन में समस्या - कमर के नीचे के इलाके में या हड्डियों में दर्द बचने के उपाय - ताजे फल और सब्जियों का सेवन - कसरत करना - वजन कंट्रोल में रखना - खाद्य-सप्लिमेंट न लें - लक्षणों का पता चलते ही डॉक्टर से मिलना डिजिटल रेक्टल जांच जरूरी डॉक्टर इस रोग की पुष्टि के लिए कई तरह की जांच करते हैं। उंगली को मलद्वार के रास्ते प्रवेश करके प्रॉस्टेट को महसूस करना (डिजिटल रेक्टल एग्जामिनेशन) इनमें महत्त्वपूर्ण है। फिर प्रॉस्टेट स्पेसिफिक एंटीजन नामक जांच भी खून में कराई जाती है। प्रॉस्टेट की अल्ट्रासोनोग्राफी और बायॉप्सी भी की जाती है। इन सब के बाद पुष्टि होने पर प्रॉस्टेट-कैंसर का उपचार डॉक्टर शुरू करते हैं।
गैस बनना पाचन क्रिया का सामान्य हिस्सा है। हालांकि, कई बार जब गैस आंत में फंस जाती है तो यह मुश्किल खड़ी कर देती है। पेट में ज्यादा गैस बनें तो न सिर्फ आप असहज हो जाते हैं, बल्कि कई बार इससे दर्द भी होता है। इससे भूख कम लगने लगती है और खाना कम खाने के कारण आम कमजोरी महसूस करते हैं। कई बार इसके लिए आपको तुरंत मेडिकल स्टोर की ओर दौड़ना पड़ता है। आपको बता दें कि गैस की परेशानी होने पर हर बार आपको मेडिकल स्टोर भागने की जरूरत नहीं है। आपके घर में ही कई ऐसी चीजें हैं जो आपकी इस समस्या को ठीक कर सकती है। गैस की समस्या में घर में मौजूद इन चीजों के इस्तेमाल से तुरंत आराम मिलता है। अदरक अदरक में पेट की गैस को खत्म करने के गुण होते हैं। गैस की समस्या से परेशान हों तो अदरक का सेवन करें। छाछ छाछ पीने से पेट को तुरंत आराम मिलता है। इसमें अच्छे बैक्टीरिया होते हैं जो पेट की गैस खत्म करके पाचन क्रिया में मदद करता है। ऐलोवेरा जूस त्वचा के लिए ऐलोवेरा के फायदे सभी जानते हैं लेकिन कम ही लोगों को पता है कि यह गैस के इलाज में भी काफी फायदेमंद है। पपीता पपीता में न सिर्फ ऐंटीऑक्सिडेंट्स होते हैं बल्कि इसमें पाचन में मदद करने वाले एंजाइम्स भी होते हैं। यह पेट में ज्यादा गैस बनने से रोकता है। लौंग लौंग भी पेट की समस्या में तुरंत राहत देता है। पुराने जमाने से पेट के दर्द और गैस को ठीक करने के लिए लौंग का इस्तेमाल किया जाता
आजकल घुटनों और कमर में दर्द की समस्या काफी आम हो गई है। इस समस्या से सिर्फ बुजुर्ग ही नहीं बल्कि बच्चे और युवा तक ग्रस्त हैं। अगर समय पर इसका इलाज न किया जाए तो फिर यह खतरनाक रूप ले सकता है। यहां कुछ घरेलू नुस्खे बताए जा रहे हैं जो घुटनों और कमर के दर्द में राहत देंगे: ठंडे पानी की पट्टी और सिकाई ठंडे पानी की पट्टियों से घुटनों औरठंडे पानी की पट्टियों से घुटनों और कमर की सिकाई करें। इससे रक्त कोशिकाएं यानी ब्लड वेसल्स सिकुड़ जाएंगी और प्रभावित हिस्से में ब्लड का फ्लो भी कम हो जाएगा। ऐसे में न सिर्फ दर्द कम होगा बल्कि सूजन भी घट जाएगी। ठंडे पानी की पट्टियों के अलावा सिकाई के लिए बर्फ के टुकडों का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। एक कपड़े में कुछ आइस क्यूब्स लपेटकर दर्द से प्रभावित हिस्से की सिकाई करें। ऐपल साइडर विनिगर घुटनों और कमर के दर्द को कम करने के लिए ऐपल साइडर विनिगर को सबसे अधिक कारगर माना गया है। इसकी वजह है इसका ऐल्कलाइन नेचर। यह बॉडी में मौजूद खतरनाक और विषैले तत्वों और इकट्ठा हुए मिनरल्स को घोल देता है। इसके अलावा यह जोड़ों को लचीलापन देने वाले लुब्रिकेंट्स का पुनर्निर्माण करने में भी मदद करता है। इसलिए रोजाना या तो सोने से पहले 1 कप पानी में एक ढक्कन ऐपल साइडर विनिगर मिलाकर पिएं या फिर उसे सरसों या नारियल के तेल के साथ मिलाकर प्रभावित हिस्से पर लगाएं। अदरक घुटनों और कमर के दर्द में अदरक भी लाभकारी है। अदरक में जिंजरॉल होता है जो जोड़ों के दर्द के अलावा मांसपेशियों में खिंचाव को कम करने में भी मदद करता है। रोजाना अदरक का जूस पीने से दर्द से निजात मिल सकती है। इस जूस में एक नींबू और आधा चम्मच शहद मिलाकर पिएं। घुटनों और कमर के प्रभावित हिस्से की अदरक के तेल से मालिश करने से भी आराम मिलेगा। नींबू आप मानें या न मानें लेकिन जोड़ों के दर्द में नींबू भी कमाल का काम करता है। इसमें एंटी-इंफ्लेमेटरी प्रॉपर्टीज होती हैं जो दर्द के अलावा सूजन भी कम करने में मदद करती हैं। इसके अलावा यह यूरिक ऐसिड को भी रेग्युलेट करने में मदद करता है जोकि जोड़ों के दर्द का मुख्य कारण माना जाता है। इसलिए घुटनों और कमर के दर्द में आप या तो रोजाना नींबू का पानी पी सकते हैं या फिर उसे प्रभावित हिस्से पर भी लगा सकते हैं। इतना ही नहीं, नींबू को रोजाना सलाद और खाने के साथ भी खाएं। इन बातों पर ध्यान दें: - घुटनों और कमर के दर्द में घरेलू इलाज के साथ-साथ डॉक्टरी इलाज करवाना न भूलें। कोई भी तरीका अपनाने से पहले डॉक्टर से सलाह लें। - किसी भी तरह की कठिन एक्सर्साइज से बचें और ज्यादा आराम न करें। ज्यादा आराम करने से मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं जिससे जोड़ों का दर्द गंभीर रूप ले सकता है। इसके अलावा सही लाइफस्टाइल और सही खान-पान भी रखें। -तली-भुनी चीजों के अलावा जंकू फूड से दूरी बनाएं। दूध और दूध से बनी चीजें, बीन्स, साबुत अनाज, मौसमी फल और सब्जियां भरपूर मात्रा में खाएं। -खूब पानी पिएं और तरल पदार्थों का सेवन करें।
बिहार के मुजफ्फरपुर में चमकी बुखार से मरने वालों की संख्या 97 तक पहुंच गई है. बुखार का जिम्मेदार लीची खाना बताया जा रहा है. वैसे आजकल खाने पीने की चीजों में मिलावट होना आम बात हो गई है. ऐसे में एक सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या वाकई चमकी नाम का ये बुखार खाली पेट ज़्यादा लीची खाने से हो रहा है या फिर मिलावटी लीची का सेवन करने से. सब्जी और फलों में मिलावट आपकी सेहत को बड़ा नुकसान पहुंचा सकती है. ऐसे में सेहत के इस दुश्मन से अपने परिवार को बचाने के लिए अपनाएं ये खास उपाय. भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने रोजमर्रा के खाद्य पदार्थों में मिलावट का पता लगाने के लिए एक मैनुअल जारी किया है. डिटेक्ट एडल्ट्रेशन विद रैपिड टेस्ट (डीएआरटी) नाम की इस किताब में कई आसान परीक्षणों द्वारा बताया गया है कि आप कैसे आसानी से खाद्य पदार्थों में मिलावट का पता लगा सकते हैं. लीची- बाजार में लाल लीची की मांग हमेशा बनी रहती है. ऐसे में कुछ लोग हरे रंग की लीची या बासी लीची को अच्छे दामों पर बेचने के लिए उस पर लाल कैमिकल कलर कर देते हैं. डॉक्टर्स की मानें तो ऐसे कैमिकल रंग वाली लीची खाने से ना सिर्फ आपकी सेहत खराब हो सकती है बल्कि आप कैंसर तक के शिकार हो सकते हैं. ऐसे में लीची का सेवन करने से पहले उसे पानी में डालकर देखें. अगर पानी का रंग बदल जाता है तो समझ जाइए लीची मिलावटी है. सेब- फलों में सबसे ज्यादा मिलावट सेब में होती है. बासी खराब सेब को फ्रेश दिखाने के लिए कई बार उस पर वैक्‍स लगा दिया जाता है ताकि वो चमकदार दिखने लगे. ऐसे में खाने से पहले सेब को ऊपर से चाकू से कुरेद कर देख लें. अगर उसमे से कुछ सफेद-सफेद निकले तो समझ जाएं कि यह मिलावटी सेब है. आइसक्रीम- आइसक्रीम का रंग ज्यादा सफेद दिखाने के लिए उसमें वाशिंग पाउडर का इस्तेमाल किया जाता है. आइसक्रीम में मिलावट की पहचान करने के लिए उसमें कुछ बूंद नींबू के रस की डालें. अगर ऐसा करने पर आइसक्रीम में झाग बनने लगे तो समझ जाएं कि इसमें वाशिंग पाउडर मिला हुआ है. इस तरह की मिलावटी आइसक्रीम खाने से पेट संबंधी रोगों के साथ आपके लीवर पर भी बुरा असर पड़ सकता है. नारियल तेल- नारियल तेल में मिलावट की पहचान करने के लिए उसे लगभग 30 मिनट के लिए फ्रिज में रख दें. अगर उसमें किसी तरह की मिलावट की गई है तो नारियल तेल तो जम जाएगा लेकिन मिलावटी पदार्थ ऊपरी सतह में तैरता दिखाई देगा. दूध में मिलावट- दूध में थोड़ा सा पानी मिलाकर उसे अच्छी तरह हिलाकर देख लें. अगर उसमें किसी तरह के डिटर्जेंट पाउडर की मिलावट की गई होगी तो दूध में झाग बन जाएगा.
नई दिल्ली ऑफिस या घर पर बदलते शरीर के तापमान की वजह से बीमार होने वालों के लिए वैज्ञानिकों ने एक खास डिवाइस तैयार किया है। वैज्ञानिकों ने एक खास तरह का बैंड बनाया है, जिसे बांह पर पहनने पर शरीर का तापमान एक जैसा बना रहेगा। यह आर्मबैंड एक 'पर्सनल थर्मोस्टेट' की तरह काम करेगा और शरीर के तापमान पर नजर रखेगा। उन लोगों के लिए यह काफी मददगार होगा, जो बदलते तापमान की वजह से ज्यादा प्रभावित होते हैं या बीमार हो जाते हैं। बैंड आठ घंटे से ज्यादा वक्त तक काम करता है और किसी के शरीर का तापमान 10 डिग्री सेल्सियस तक कम कर सकता है। इसकी खोज करने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि बैंड एक आसान सॉल्यूशन है जो खासकर ऐसी स्थिति में काम करेगा, जब कुछ लोगों की जरूरत के हिसाब से पूरी बिल्डिंग का तापमान एसी की मदद से कम या ज्यादा करना पड़ता है। इस बैंड को पहनने पर हर किसी का तापमान अलग-अलग बना रहेगा और उस एक की वजह से बाकियों को गर्मी या ठंड में नहीं बैठना होगा। आर्मबैंड दरअसल एक थर्मोइलेक्ट्रिक अलॉय मटीरियल की मदद से तैयार किया गया है। यह बैंड बिजली की मदद से हीट कोटिंग शीट में बदलाव करेगा और इससे शरीर का तापमान प्रभावित होगा। यह छोटे बैटरी पैक से कनेक्ट रहेगा, जिससे इसे पावर मिलेगी। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के प्रफेसर चेन ने कहा, 'ऐसा डिवाइस उनके लिए तापमान से जुड़ा कंफर्ट लेकर आएगा, जिन्हें किसी गर्म दिन में भयानक गर्मी या ऑफिस में ज्यादा ठंड का सामना करना पड़ता है।' फिलहाल यह मार्केट में उपलब्ध नहीं है। प्रफेसर ने कहा, 'इस डिवाइस को पहनने वालों को एक जैसा तापमान लगातार महसूस होगा। अलग-अलग मौसम में उन्हें खास इंतजाम नहीं करने होंगे और सबसे अच्छी बात, इसका कोई साइड इफेक्ट शरीर पर नहीं होगा।' बता दें, दुनिया की ऊर्जा का 10 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा बिल्डिंग्स की हीटिंग या कूलिंग के लिए ही खर्च होता है। इसे कम करने के लिए बहुत से विकल्प भी मौजूद नहीं है, ऐसे में स्मार्ट बैंड जैसा डिवाइस बेहतरीन ऑप्शन साबित हो सकता है। इससे जुड़े कई विकल्प तलाशे जा रहे हैं।
वॉशिंगटन कोई व्यक्ति खुदकुशी करने जा रहा है, क्या इस बात का पता पहले से ही लगाया जा सकता है? अमेरिका में हुए एक अध्ययन की मानें तो ऐसा संभव है। स्टडी में कहा गया है कि ब्रेन स्कैन के जरिये यह पता चल सकता है कि किसी व्यक्ति को खुदकुशी के ख्याल आ रहे हैं या नहीं। इस स्टडी से जुड़े वैज्ञानिकों का कहना है कि पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसॉर्डर (PTSD) से पीड़ित व्यक्ति के मन में खुदकुशी के आ रहे विचार से जुड़ा एक रासायन पाया गया है। आम लोगों की तुलना में PTSD से पीड़ित व्यक्ति में खुदकुशी का खतरा अधिक रहता है, लेकिन बेहद खतरे वाले व्यक्ति की पहचान मुश्किल है। अमेरिका के येल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया शोध प्रोसिडिंग्स ऑफ द नैशनल अकैडमी ऑफ साइंसेज में पब्लिश हुआ है। उन्होंने mGluR5 का स्तर जांचने के लिए PET तस्वीरों का इस्तेमाल किया। इस दौरान उन्होंने पाया कि PTSD से पीड़ित लोगों में mGluR5 का स्तर बेहद अधिक है जिससे कोई व्यक्ति एंजायटी और मूड डिसॉर्डर से पीड़ित हो जाता है। PTSD से पीड़ित लोगों के लिए दो तरह का अप्रूव्ड इलाज है, लेकिन यह जांचने में कि ये प्रभावी हैं या नहीं इसमें कई सप्ताह और महीनों लग सकते हैं। येल की असोसिएट प्रफेसर इरिना ईस्टरलिस ने कहा, 'अगर आपके पास ऐसे लोग हैं जो उच्च रक्तचाप से पीड़ित हैं, तो आप तुरंत रक्तचाप कम करना चाहते हैं। लेकिन PTSD में हमारे पास वह विकल्प नहीं है।' उन्होंने कहा कि mGluR5 के स्तर की जांच से उन लोगों की पहचान में मदद मिल सकती है जिनमें खुदकुशी का खतरा सबसे अधिक है और उन्हें तुरंत चिकित्सीय मदद दी जा सकती है। इरिना ने साथ ही कहा कि mGluR5 के स्तर को संतुलित रखकर खुदकुशी के खतरे को कम किया जा सकता है।
नई दिल्ली, 08 मई 2019,आज दुनियाभर में वर्ल्ड थैलेसीमिया डे (Thalassemia Day)मनाया जा रहा है. थैलेसीमिया बच्चों को उनके माता-पिता से मिलने वाला आनुवांशिक रक्त रोग है. इस रोग की पहचान बच्चे में 3 महीने बाद ही हो पाती है. ज्यादातर बच्चों में देखी जाने वाली इस बीमारी की वजह से शरीर में रक्त की कमी होने लगती है और उचित उपचार न मिलने पर बच्चे की मृत्यु तक हो सकती है. आइए जानते हैं आखिर क्या है ये बीमारी और इसके लक्षण और बचाव के तरीके. क्या है यह बीमारी- आमतौर पर हर सामान्य व्यक्ति के शरीर में लाल रक्त कणों की उम्र करीब 120 दिनों की होती है, लेकिन थैलेसीमिया से पीड़ित रोगी के शरीर में लाल रक्त कणों की उम्र घटकर मात्र 20 दिन ही रह जाती है. इसका सीधा असर व्यक्ति के हीमोग्लोबिन पर पड़ता है. जिसके कम होने पर व्यक्ति एनीमिया का शिकार हो जाता है और हर समय किसी न किसी बीमारी से ग्रसित रहने लगता है. थैलेसीमिया के प्रकार- थैलेसीमिया दो तरह का होता है. माइनर थैलेसीमिया या मेजर थैलेसीमिया. किसी महिला या फिर पुरुष के शरीर में मौजूद क्रोमोजोम खराब होने पर बच्चा माइनर थैलेसीमिया का शिकार बनता है. लेकिन अगर महिला और पुरुष दोनों व्यक्तियों के क्रोमोजोम खराब हो जाते हैं तो यह मेजर थैलेसीमिया की स्थिति बनाता है. जिसकी वजह से बच्चे के जन्म लेने के 6 महीने बाद उसके शरीर में खून बनना बंद हो जाता है और उसे बार-बार खून चढ़वाने की जरूरत पड़ने लगती है. थैलेसीमिया की पहचान- थैलेसीमिया असामान्य हीमोग्लोबिन और रेड ब्लड सेल्स के उत्पादन से जुड़ा एक ब्लड डिसऑर्डर है. इस बीमारी में रोगी के शरीर में रेड ब्लड सेल्स कम होने की वजह से वो एनीमिया का शिकार बन जाता है. जिसकी वजह से उसे हर समय कमजोरी,थकावट महसूस करना, पेट में सूजन, डार्क यूरिन, त्वचा का रंग पीला पड़ सकता है. थैलेसीमिया से बचने के लिए घरेलू उपचार- -इस गंभीर रोग से होने वाले बच्चे को बचाने के लिए सबसे पहले शादी से पहले ही लड़के और लड़की की खून की जांच अनिवार्य कर देनी चाहिए. - अगर आपने खून की जांच करवाए बिना ही शादी कर ली है तो गर्भावस्था के 8 से 11 हफ्ते के भीतर ही अपने डीएनए की जांच करवा लेनी चाहिए. - माइनर थैलेसीमिया से पीड़ित व्यक्ति किसी भी सामान्य व्यक्ति की तरफ अपना जीवन जीता है. बिना खून की जांच करवाए कई बार तो उसे पता ही नहीं चलता कि उसके खून में कोई दोष भी है. ऐसे में अगर शादी से पहले ही पति-पत्नी के खून की जांच करवा ली जाए तो काफी हद तक इस आनुवांशिक रोग से होने वाले बच्चे को बचाया जा सकता है. थैलेसीमिया का उपचार- थैलेसीमिया का इलाज, रोग की गंभीरता पर निर्भर करता है. कई बार थैलेसीमिया से ग्रसित बच्चों को एक महीने में 2 से 3 बार खून चढ़ाने की जरूरत पड़ सकती है। -बोन मैरो प्रत्यारोपण से इन रोग का इलाज सफलतापूर्वक संभव है लेकिन बोन मैरो का मिलान एक बेहद मुश्किल प्रक्रिया है. - इसके अलावा रक्ताधान, बोन मैरो प्रत्यारोपण, दवाएं और सप्लीमेंट्स, संभव प्लीहा या पित्ताशय की थैली को हटाने के लिए सर्जरी करके भी इस गंभीर रोग का उपचार किया जा सकता है.aajtak
इस मौसम में मार्केट में आम की भरमार है लेकिन कहीं ऐसा तो नहीं कि आप कैमिकल वाले आम खा रहे हैं क्योंकि मार्केट में आर्टिफिशियली पके आम खूब से बिक रहे हैं. कच्चे आमों को कैल्शियम कार्बाइड की मदद से पकाया जाता है जोकि हेल्थ के लिए हानिकारक होता है. यहां हम बता रहें हैं आम पहचानने के तरीके... - बाजार में मिलने वाले आम के रंग पर न जाएं क्योंकि जरूरी नहीं कि जो पीले हों वो पके आम हों. कुदरती रूप से पके आम हरे और नारंगी रंग के होंगे. - पके हुए आम को डंठल के पास सूंघने पर खास तरह की खुशबू आएगी जबकि कार्बाइड से पकाए गए आम में कोई महक नहीं आएगी. - अगर आम में एल्कोहल, कार्बाइड या किसी अन्य तरह की महक आती है ऐसे आम न खरीदें. यह ज्यादा पके और अंदर से खराब हो सकते हैं. - अच्छे आम पर सामान्य के अलावा कोई दाग नहीं होते. जबकि कैमिकल वाले आम का रंग 2-3 दिन के अंदर काला होने लगता है. - आम खरीदते समय इन्हें दबाकर देखें. पके आम आसानी से दब जाएंगे. - आम खरीदने से पहले इन्हें चखकर देखें चखने से मीठे और स्वादिष्ट लगें तो ही लें. जबकि कार्बाइड से पकाए फल का स्वाद किनारे पर कच्चा और बीच में मीठा होता है. - पके हुए फल का वेट और कलर एक समान होता है. स्वाद में भी पूरा फल एक समान मीठा होता है. यह लंबे समय तक खराब नहीं होते. जबकि कार्बाइड से पकाए फलों का भार समान नहीं होता. - मुमकिन हो तो बाजार से आम खरीदने के बजाय सीधे आम के बगीचे से ही खरीदें और घर में ही घास, कागज, या प्याज के बीच रखकर इन्हें पकाएं. - बाजार से खरीदे हुए आम पहले साफ पानी से धो लें फिर किसी ठंडी जगह पर 1-2 घंटे रख दें. इसके बाद खाने में इस्तेमाल करें. - आम को घोलकर उसके रस को सीधे मुंह से चूसने के बजाय इसके छिलके उतारकर मिक्सर में जूस बनाकर पीयें.
नई दिल्ली, कक्यूर्मा लॉन्गा (हल्दी के पौधे) की जड़ों से निकले करक्यूमिन को पेट का कैंसर रोकने या उससे निपटने में मददगार पाया गया है. फेडरल यूनिवर्सिटी ऑफ साओ पाउलो (यूनिफैस्प) तथा फेडरल यूनिवर्सिटी ऑफ पारा (उफ्पा) के शोधकतार्ओं ने ब्राजील में यह जानकारी दी. करक्यूमिन के अलावा, हिस्टोन गतिविधि को संशोधित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले अन्य यौगिकों में कोलकेल्सीफेरोल, रेस्वेराट्रोल, क्वेरसेटिन, गार्सिनॉल और सोडियम ब्यूटाइरेट (आहार फाइबर के फरमेंटेशन के बाद आंत के बैक्टीरिया द्वारा उत्पादित) प्रमुख थे. वर्ल्ड कैंसर रिसर्च फंड इंटरनेशनल के पेट के कैंसर संबंधी आंकड़ों के अनुसार, विश्व स्तर पर, प्रत्येक वर्ष गैस्ट्रिक कैंसर के अनुमानित 9,52,000 नए मामले सामने आते हैं, जिसमें लगभग 7,23,000 लोगों की जान चली जाती है (यानी 72 प्रतिशत मृत्यु दर). भारत में, पेट के कैंसर के लगभग 62,000 मामलों का प्रतिवर्ष निदान किया जाता है (अनुमानित 80 प्रतिशत मृत्यु दर के साथ). इस बारे में हेल्थ केयर फाउंडेशन के अध्यक्ष पद्मश्री डॉ. के के अग्रवाल ने कहा, "पेट का कैंसर कई वर्षों में धीरे-धीरे विकसित होता है, इसलिए शुरूआत में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं होते हैं. सामान्य लक्षणों में भूख कम होना, वजन में कमी, पेट में दर्द, अपच, मतली, उल्टी (रक्त के साथ या बिना उसके), पेट में सूजन या तरल पदार्थ का निर्माण, और मल में रक्त आना शामिल हैं. इन लक्षणों में से कुछ का इलाज किया जाता है, क्योंकि वे दिखाई देते हैं और गायब हो जाते हैं, जबकि अन्य लक्षण उपचार के बावजूद जारी रहते हैं. रोग की उच्च दर के लिए तनाव, धूम्रपान और अल्कोहल जिम्मेदार हो सकते हैं. धूम्रपान विशेष रूप से इस स्थिति की संभावना को बढ़ाता है." भारत में कई जगहों पर, आहार में फाइबर सामग्री कम रहती है. अधिक मसालेदार और मांसाहारी भोजन के कारण पेट की परत में सूजन हो सकती है, जिसे अगर छोड़ दिया जाए तो कैंसर हो सकता है. डॉ. अग्रवाल ने कहा, "पेट के कैंसर के लिए पर्याप्त फॉलो-अप और पोस्ट-ट्रीटमेंट देखभाल की आवश्यकता होती है, इसलिए नियमित जांच के लिए स्वास्थ्य टीम के संपर्क में रहना महत्वपूर्ण है. पहले कुछ वर्षों के लिए, स्वास्थ्य टीम से हर 3 से 6 महीने में मिलने की सिफारिश की जाती है, उसके बाद सालाना मिला जा सकता है. हालांकि, पेट के कैंसर के निदान के बाद जीवन तनावपूर्ण हो जाता है, परंतु सही उपचार, जीवनशैली में बदलाव और डॉक्टरों व शुभचिंतकों के समर्थन से, मरीज ठीक हो सकता है."
आधुनिक जीवन में अधिकतर लोग डायबिटीज और मोटापे की समस्या से जूझ रहे हैं. मोटापे से छुटकारा पाने के लिए लोग घंटों जिम में पसीना बहाते हैं, स्ट्रिक्ट डाइट फॉलो करते हैं. लेकिन अब आप बिना डाइट और एक्सरसाइज किए भी वजन कम कर सकेंगे. दरअसल, एक नई स्टडी की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि डायबिटीज के मरीजों द्वारा ली जाने वाली दवाई वजन कम करने में अहम भूमिका निभाती है. आइए जानते हैं आखिर ये कौन सी दवाई है और किस तरह वजन कम करती है... स्टडी की रिपोर्ट में बताया गया है कि टाइप-2 डायबिटीज से पीड़ित करोड़ों लोग मेटफोर्मिन (Metformin) दवाई लेते हैं. करीब 30 हजार लोगों पर 15 सालों तक चली स्टडी की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि टाइप-2 डायबिटीज में ली जाने वाली मेटफोर्मिन गोलियां वजन कम करने में भी मददगार साबित होती हैं. स्टडी की रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि वजन कम करने में यह दवाई डाइट और एक्सरसाइज से ज्यादा असरदार साबित होती है. शोधकर्ताओं का मानना है कि आने वाले समय में मेटफोर्मिन (Metformin) दवाई मोटापे से पीड़ित लोगों को वजन कम करने के लिए दी जा सकती है. स्टडी के दौरान मेटफोर्मिन (Metformin) के असर को डाइट और एक्सरसाइज से तुलना कर के देखा गया. इसके लिए लुइसियाना स्टेट यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने मोटापे से पीड़ित करीब 3,234 लोगों पर इसकी जांच की. स्टडी में शामिल कुछ लोगों को प्लेसबो दिया गया. वहीं कुछ लोगों को एक तय डाइट और एक्सरसाइज प्लान फॉलो करने के लिए कहा गया, जबकि कुछ लोगों को दिन में दो बार 850 मिलीग्राम मेटफोर्मिन दिया गया. एक साल के बाद नतीजों में पाया गया कि मेटफोर्मिन लेने वाले 28.5 फीसदी, डाइट और एक्सरसाइज फॉलो करने वाले 62.6 फीसदी और प्लेसबो लेने वाले 13.4 फीसदी लोगों ने करीब 5 फीसदी तक वजन कम किया. हालांकि, स्टडी के पहले साल में डाइट और एक्सरसाइज फॉलो करने वाले लोगों का सबसे अधिक वजन कम हुआ. लेकिन डाइट और एक्सरसाइज की मदद से कम किए हुए वजन को लंबे समय तक नियंत्रण में रखना बहुत मुश्किल था. स्टडी के खत्म होने तक मेटफोर्मिन लेने वालों ने लगभग 6.2 फीसदी वजन कम किया. वहीं, इसकी तुलना में डाइट और एक्सरसाइज फॉलो करने वालों का सिर्फ 3.7 फीसदी तक वजन कम हुआ और प्लेस्बो लेने वालों का 2.8 फीसदी वजन कम हुआ स्टडी के सह-लेखक डॉक्टर किशोर गड्डे ने बताया, 'डाइट और एक्सरसाइज फॉलो करने वाले लोगों का कम हुआ वजन लंबे समय तक कंट्रोल में नहीं रहता है. लंबे समय तक वजन को कंट्रोल में रखने के लिए रोजाना गोलियां लेना, डाइट और एक्सरसाइज करने से ज्यादा आसान है. हालांकि, डॉक्टर किशोर गड्डे का मानना है कि मेटफोर्मिन वजन कम करने मे कितनी असरदार होती है इसकी पुष्टि करने के लिए अभी और रिसर्च करनी बाकी हैं. बता दें, फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) या नेशनल हेल्थ सर्विस (NHS) ने वजन कम करने के लिए मेटफोर्मिन गोलियों को खाने को मंजूरी नहीं दी है. लेकिन कुछ डॉक्टर्स टाइप-2 डायबिटीज की बीमारी और मोटापे से पीड़ित लोगों को मेटफोर्मिन गोलियां लेने की सलाह देते हैं. स्टडी के मुताबिक, डायबिटीज से पीड़ित लोगों में मेटफोर्मिन शरीर में ब्लड ग्लूकोज को कंट्रोल में रखने में मदद करती है. स्टडी की रिपोर्ट में बताया गया है कि इसको लेने से शरीर में इंसुलिन अधिक मात्रा में प्रोड्यूस नहीं होता है. साथ ही इसको लेने से भूख भी कंट्रोल में रहती है, जो वजन कम करने में मदद करती हैं. लेकिन वजन कम करने के लिए मेटफोर्मिन गोलियां कितनी असरदार होती हैं, इसकी अभी ओर जांच होनी बाकी है.
आज के समय में मोबाइल फोन हमारी जरूरत बन गया है। मोबाइल फोन से हमें कई तरह के फायदे होते हैं लेकिन इससे होने वाले नुकसान को भी नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं। मोबाइल फोन से निकलने वाले रेडिएशन हमारे शरीर के लिए घातक होता है। रोज 50 मिनट तक लगातार मोबाइल का इस्तेमाल ब्रेन की सेल्स को नुकसान पहुंचा सकता है। अक्सर देखा जाता है कि खबरें आती रहती हैं कि मोबाइल फोन के रेडिएशन के कारण ब्रेन ट्यूमर या कैंसर जैसी गंभीर बीमारी हो सकती है। वहीं, एक्सपर्ट्स का मानना है कि आज तक यह सिद्ध नहीं हो पाया है कि किसी व्यक्ति को ब्रेन ट्यूमर या कैंसर की बीमारी मोबाइल रेडिएशन के चलते हुई हो। साथ ही एक्सपर्ट्स का यह भी मानना है कि अधिक रेडिएशन छोड़ने वाले फोन का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। इसके अलावा हमें कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए, जो हमें खतरनाक रेडिएशन से बचा सकें। सावधानियां बरतेंः 1. शरीर से रखें दूर मोबाइल फोन- हमको कोशिश करनी चाहिए कि मोबाइल फोन को शरीर से पर्याप्त दूरी पर रखें। मोबाइल फोन का शरीर से कम संपर्क हो इसलिए उसे पैंट या शर्ट में न रखने बजाय बैग में रखना चाहिए। 2. स्पीकर पर करें बात- मोबाइल फोन पर बात करते समय कोशिश करनी चाहिए कि स्पीकर का प्रयोग किया जाए। इसके अलावा आप हैंड्स फ्री का इस्तेमाल करना चाहिए। यदि दोनों तरीकों से बात करना संभव न हो पाए तो मोबाइल फोन को कान से कुछ दूरी रखकर बात करें। 3. लैंडलाइन का करें अधिक इस्तेमाल- अगर हमारी पहुंच में लैंडलाइन है तो मोबाइल का इस्तेमाल न करके उसी से बात करनी चाहिए। आप चाहें घर पर हो या ऑफिस में मोबाइल फोन की अपेक्षा लैंडलाइन का इस्तेमाल करें। 4. प्रयोग न होने पर कर दें ऑफ- अधिकतर लोगों का मोबाइल फोन हमेशा ऑन रहता है। जरूरत न पड़ने पर मोबाइल फोन को ऑफ कर देना चाहिए। अगर देखा जाए तो ऐसा करना कम संभव है। कम से कम रात को सोते समय मोबाइल फोन को ऑफ कर देना चाहिए। 5. मैसेज से करें बात- छोटी-छोटी बातों के लिए फोन करने की जगह मैसेज करना चाहिए। मैसेज से बात करने से मोबाइल फोन से निकलने वाली रेडिएशन से काफी हद तक बचा जा सकता है। 6. चार्जिंग के समय न करें बात- मोबाइल फोन के चार्जिंग होने के दौरान बात नहीं करनी चाहिए। चार्जिंग के समय बात करने से मोबाइल फोन से निकलने वाले रेडिएशन का लेवल 10 गुना तक बढ़ जाता है। 7. सिग्नल और बैटरी कम होने पर न करें प्रयोग- मोबाइल फोन में सिग्नल और बैटरी कम होने बात नहीं करनी चाहिए। इस दौरान मोबाइल फोन में रेडिएशन बढ़ता है।
जीवन में कुछ बड़ा हासिल करने के लिए शरीर के साथ-साथ दिमाग का तंदुरूस्त रहना भी बेहद जरूरी है. शरीर को फिट रखने के लिए हर व्यक्ति को अच्छी डाइट के साथ एक्सरसाइज करना भी बेहद जरूरी है. पर क्या आप वाकई अपने दिमाग को फिट और तेज रखने के लिए ये सब करते हैं. बता दें, दिमाग को तेज रखने के लिए एक खास खुराक की जरूरत होती है, जिसे डाइट में शामिल कर आप अपने दिमाग को तेज बना सकते हैं. आइए जानते हैं क्या हैं वो तरीके और डाइट प्लान. अश्वगंधा- प्राचीन काल से अश्वगंधा का प्रयोग व्यक्ति तनाव को दूर करने के लिए करता आया है. इसकी मदद से स्ट्रेस हार्मोन को कम किया जा सकता है. दिमाग तेज करने के लिए एक टीस्पून अश्वगंधा का पाउडर रात को सोने से 30 मिनट पहले गर्म दूध में डालकर पीएं. अखरोट- अखरोट आपके दिल के साथ आपके दिमाग का भी ध्यान रखता है. इसमें अल्फा इनोलेनिक एसिड के साथ कई अन्य पोषण तत्व मौजूद होते हैं. जो दिमाग तक पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन पहुंचाकर रक्तसंचार बढ़ाने का काम करते हैं. जिसकी वजह से मेमोरी शार्प होती है. हल्दी- हल्दी में कई ऐसे गुण मौजूद होते हैं जो तनाव के असर बेअसर करने का काम करते हैं. हल्दी में मौजूद कर्क्यूमिन व्यक्ति के भीतर फील-गुड हार्मोन तो डोपामाइन और सेरोटोनिन अवसाद संबंधित लक्षणों को कम करने का काम करते हैं. अपने दिमाग को तेज करने के लिए आपको हल्दी का लगभग आधा चम्मच डाइट में जरूर शामिल करना चाहिए. बेरी - ब्लूबेरी हो स्ट्रॉबेरी या ब्लैक बेरी, एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर होने की वजह से दिमाग के लिए बेहद फायदेमंद होता है. यह आपकी एकाग्रता में वृद्ध‍ि करने में भी सहायक है. ऐसी एक्सरसाइज जिसे करने से आपका दिमाग तेजी से काम करने लगेगा- पजल्स गेम- पजल्स गेम खेलने से अल्जाइमर का खतरा कम हो जाता है. न्यूजपेपर क्रॉसवर्ड और सुडोकू गेम से इसकी शुरुआत करनी चाहिए. इन खेलों से आप खुद को चैलेंज देते हैं जिससे दिमाग की अच्छी कसरत हो जाती है. रोजमर्रा के कामों के लिए उल्टे हाथ का प्रयोग करें- दांतों को ब्रश या बालों को कंघी करने जैसे काम अगर हम उल्टे हाथों से करें तो इसका दिमाग पर अच्छा प्रभाव पड़ता है. कुछ काम आंख बंद करके करें- अपने रोज के काम जैसे खाना या जूस बनाना या फिर नहाना आंख बंद कर के करें. हां, इसमें आपको सावधानी जरूर बरतनी होगी. लेकिन यह टास्क पूरी तरह से टच पर निर्भर करता है जिससे आपके दिमाग के कुछ हिस्से एक्टिव हो जाते हैं जो आम तौर पर निष्क्रिय रहते हैं. नई भाषा सीखें- इसमें आपको थोड़ा धीरज रखने की आवश्यकता है. लेकिन आप रोज थोड़ा समय इस पर दे सकते हैं. कोई भी भाषा जिसमें आपकी रूचि हो, सीखना शुरू कर दें. एक स्टडी के मुताबिक, बहुभाषियों की रीजनिंग अच्छी होती है.

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