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राष्ट्रपति पद के लिए आदिवासी महिला द्रौपदी मुर्मू का नाम आगे कर BJP ने क्या-क्या साध लिया?

नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी खासकर मोदी सरकार के कार्यकाल में ऐसा देखा गया है कि फैसले हमेशा आम धारणा या कहिए लीक से हटकर लिए जाते हैं। ताजा उदाहरण राष्ट्रपति पद के लिए एनडीए उम्मीदवार के रूप में द्रौपदी मुर्मू (Draupadi Murmu) के नाम की घोषणा है। सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डिवेलपिंग सोसाइटीज में एसोसिएट प्रोफेसर हिलाल अहमद ने बीजेपी के इस मूव की बारीकियों को समझाने की कोशिश की है। टाइम्स ऑफ इंडिया में लिखे लेख में हिलाल कहते हैं कि ओडिशा की आदिवासी नेता और झारखंड की पूर्व राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू के रूप में एनडीए के राष्ट्रपति उम्मीदवार का ऐलान भाजपा के सोशल बेस- खासतौर से अनुसूचित जनजाति समुदायों में, बढ़ाने का एक सोचा-समझा कदम है। स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि भाजपा आदिवासी वोटरों को आकर्षित करने के लिए मुर्मू को पार्टी की सोच 'सबका साथ सबका विकास' के हिसाब से प्रोजेक्ट करेगी। जेपी नड्डा समेत कई भाजपा नेताओं ने इस बात को स्वीकार किया है कि मुर्मू की आदिवासी पहचान और उनकी आर्थिक पृष्ठभूमि पर पार्टी ने गंभीरता से विचार किया। वजह केवल आदिवासी वोटर तो नहीं हालांकि हिलाल अहमद लिखते हैं कि सीधे तौर पर यह निष्कर्ष निकाल लेना कि मुर्मू की उम्मीदवारी का इस्तेमाल पार्टी आदिवासी वोटरों में अपनी पैठ बनाने में करेगी, यह धारणा दो वजहों से गलत है। राष्ट्रीय स्तर का आंकड़ा समझिए पहला, भाजपा पहले से ही राष्ट्रीय स्तर पर आदिवासी वोटरों की पहली पसंद बनकर उभरी है। लोकनीति-CSDS नैशनल इलेक्शन स्टडी 2019 से पता चलता है कि 44 फीसदी आदिवासियों ने 2019 के लोकसभा चुनाव में भगवा दल को वोट किया था। दूसरी तरफ, कांग्रेस पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर केवल 31 प्रतिशत एसटी वोट ही हासिल कर पाई थी। भाजपा को मिला यह जबर्दस्त आदिवासी सपोर्ट कुछ क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं था। पार्टी ने राज्य स्तर पर भी आदिवासी समुदायों का अच्छा-खासा वोट हासिल किया है। राजनीति में सक्रियता दूसरा, हाल के वर्षों में आदिवासियों के बीच मतदान प्रतिशत में जबर्दस्त वृद्धि देखने को मिली है। लोकनीति-सीएसडीएस 2019 के सर्वे में पता चला था कि उस चुनाव में 72 प्रतिशत आदिवासियों ने मतदान किया था, जो राष्ट्रीय मतदान के औसत (62%) से कहीं ज्यादा है। इसका सीधा-सीधा मतलब यह है कि आदिवासी समुदाय राजनीतिक रूप से अब अलग-थलग नहीं कहा जा सकता। वे भी पूरी सक्रियता से चुनावी राजनीति में हिस्सा ले रहे हैं और उनके राजनीतिक जोश का फायदा बीजेपी को मिलता आ रहा है। तो बीजेपी के फैसले की वजह क्या है? हिलाल अहमद टॉप एक्जीक्यूटिव पोस्ट के लिए मुर्मू की दावेदारी की दो वजह बताते हैं। पहला, भाजपा अब मिडिल क्लास-अपर कास्ट, शहर आधारित हिंदू पार्टी वाली पहचान से आगे निकल चुकी है। उसने पिछले कुछ वर्षों में सच्चे अर्थों में खुद को राष्ट्रीय पार्टी के तौर पर बदला है। पार्टी ने बेहद प्रभावी ढंग से सभी सामाजिक समूहों और समुदायों के बीच अपने जनाधार को बढ़ाया है। कई स्टडी में बताया गया है कि बीजेपी ने भारतीय समाज में हाशिये पर पहुंचे वर्गों जैसे अति दलितों, लोअर ओबीसी और सबसे ज्यादा पिछड़े आदिवासियों को आगे बढ़ाने की दिशा में गंभीर प्रयास किए हैं। ये समूह गौरव और गरिमा के लिए हिंदुत्व की विचारधारा के साथ हो गए हैं। सोशल इंजीनियरिंग ने पार्टी को दो तरह से फायदा पहुंचाया है। इसने भाजपा के लिए खुद को समाज के कमजोर और वंचित तबके के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत करने में मदद की। इसके साथ ही उसे वैचारिक स्तर पर बढ़त मिली- जैसे मुस्लिम समूहों के साथ-साथ अन्य राजनीतिक विरोधियों की आलोचना करने के लिए हिंदू एकता का आह्वान किया जा सकता है। मुर्मू का नामांकन हिंदुत्व से प्रेरित निम्नवर्गीय राजनीति को सामने रखता है। अंग्रेजी वाले शहरी एलीट बीजेपी के इस झुकाव की दूसरी वजह साफ है। पिछले आठ वर्षों में भाजपा ने ऐसी धारणा बनाई कि अंग्रेजी बोलने वाले शहरी एलीट क्लास- खान मार्केट गैंग- ही भारतीय गरीबों की एक बड़ी आबादी को हाशिये पर धकेलने के लिए जिम्मेदार है। मोदी खुद को एक चाय बेचने वाले या एक चौकीदार के रूप में पेश करते रहे हैं, जिसके सपने और विचार बड़े हैं, इस भावना ने कुलीन-गरीब समीकरणों को प्रभावित किया है। पीड़ित वाले नैरेटिव को दो राजनीतिक फायदे हैं। इसके जरिए पिछली सरकारों की गरीब-हितैषी नीतियों पर सवाल खड़े किए गए। राहुल गांधी को शहजादे (प्रिंस) और नेहरू को एलीट ब्रिटिश समर्थक पीएम के तौर पर पेश किया गया। इसके साथ ही निम्नवर्गीय हितैषी नजरिये पर आगे बढ़ा गया, जिसमें राष्ट्रपति के ऑफिस समेत बड़े राजनीतिक संस्थानों तक पहुंच बनाने के बारे में सोचा गया। राष्ट्रपति अब रबर स्टैंप नहीं होता जो चुपचाप दिए गए निर्देशों को मानता रहे। इसकी बजाए, उससे सक्रिय भागीदारी की उम्मीद की जाती है जिससे वह अपनी पहचान से जुड़ी नई कहानी लिख सके। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की 3 जून को अपने गांव में दी गई स्पीच ऐसे में काफी प्रासंगिक है। राष्ट्रपति ने कहा था, 'प्रधानमंत्री जी, मैं और पूरा उत्तर प्रदेश हमारे लोकतंत्र की सर्वसमावेशी शक्ति के प्रति आपकी निष्ठा का उसी दिन कायल हो गया, जिस दिन इस राज्य के एक गरीब परिवार में जन्मे मुझ जैसे व्यक्ति को राष्ट्रपति पद की जिम्मेदारी देने की पहल आपने की।' यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि कोविंद ने यह कहकर न केवल राष्ट्रपति बनाने के लिए पीएम को धन्यवाद दिया बल्कि बेहद प्रभावी तरीके से अपनी गरीबी और निम्न वर्गों की व्यथा भी कह गए। महिला, आदिवासी और गरीब हिलाल लिखते हैं कि मुर्मू बीजेपी के उस फ्रेमवर्क में बिल्कुल फिट बैठती हैं। उनके साथ तीन महत्वपूर्ण पहचान जुड़ी हुई है- महिला, आदिवासी, गरीब- जो उनकी कहानी को और रोचक एवं प्रेरक बना देती है। राष्ट्रपति भवन में उनकी मौजूदगी सांकेतिक रूप से इस तर्क को पुष्ट करती रहेगी कि दलितों, वंचितों और गरीबों के लिए मार्ग प्रशस्त करने को भाजपा ने संस्थानों का लोकतंत्रीकरण किया है। यह भविष्य के लिए भाजपा के फायदे में होगा।

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