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ब्रेन स्ट्रोक: साढ़े चार घंटे का गोल्डन टाइम, अस्पताल पहुंच गए तो लकवा बेअसर
नई दिल्ली अतुल और संजय को ब्रेन स्ट्रोक हुआ...लेकिन दोनों ही न केवल लकवे से बच गए बल्कि दोनों की आवाज भी वापस आ गई। डॉक्टर का कहना है कि ब्रेन स्ट्रोक के बाद साढ़े चार घंटे का गोल्डन पीरियड होता है। इस दौरान मरीज का इलाज हो जाए तो कुछ हद तक लकवे से वापस आने का चांस होता है। ऐसा ही इन दोनों मरीजों के साथ हुआ। एक घंटे के अंदर अतुल और संजय को इलाज मिल गया, जिसकी वजह से लकवे का असर भी खत्म हो गया और दोनों की आवाज भी वापस आ गई। इंट्रावीनस से खुल जाती हैं ब्लॉक्ड नसें अपोलो अस्पताल के न्यूरॉलजिस्ट डॉ. विनीत सूरी ने कहा कि इंट्रावीनस एक ऐसी दवा है, जिसका इस्तेमाल अगर स्ट्रोक के अटैक पड़ने के साढ़े चार घंटे के अंदर किया जाए तो इसका बहुत फायदा मिलता है। यह दवा देने से जो भी नसें ब्लॉक हो जाती हैं वे 30 मिनट के अंदर पूरी तरह से खुल जाती हैं। विनीत ने कहा कि चिंता की बात यह है कि यह दवा देश में 1994 से इस्तेमाल हो रही है, लेकिन जागरुकता की कमी के वजह से सिर्फ 2 प्रतिशत लोगों को ही इसका फायदा मिल पाता है। जितनी जल्दी इलाज मिले उतना अच्छा अतुल गुलाटी ने बताया कि ओखला में ऑफिस में मुझे स्ट्रोक आया था। मैं बोल नहीं पा रहा था। मेरे साथी ने मेरे ब्लड प्रेशर की जांच की तो पता चला कि 450 से भी ज्यादा है, वो तुरंत मुझे अपोलो लेकर आ गए। 20 से 30 मिनट के अंदर मैं अस्पताल में पहुंच गया। डॉक्टर सूरी ने कहा कि यही वजह है कि अतुल आज बात कर पा रहे हैं। अगर 3-4 घंटे के बाद आते तो जितनी रिकवरी अभी हुई है उतनी नहीं हो पाती। उन्होंने कहा कि यह सच है कि गोल्डन आवर साढ़े चार घंटे का है, लेकिन जितनी जल्दी मरीज अस्पताल पहुंचता है, रिकवरी उतनी बेहतर होगी, वरना नसों में ब्लॉकेज की वजह से किसी के हाथ में लकवा हो जाता है तो किसी के पैर में, तो किसी की आवाज इतनी लड़खड़ा जाती है कि वह वापस नहीं आती। दवा से ब्लॉकेज न खुले तो स्टेंट का इस्तेमाल डॉक्टर ने कहा कि संजय के साथ भी ऐसा ही हुआ। ऑफिस से घर पहुंचे। पत्नी ने पानी पीने को दिया तो मुंह से पानी गिरने लगा, उनकी पत्नी को समझने में देर नहीं लगी कि यह स्ट्रोक है, वह तुरंत उन्हें लेकर अस्पताल पहुंची और इलाज हो गया। डॉक्टर सूरी ने कहा कि ऐसा इसलिए हुआ कि उनके घर में पहले भी किसी को स्ट्रोक आया था, इसलिए वह इसके बारे में जानती थीं। हालांकि डॉक्टर ने कहा कि संजय की नसों में जो ब्लॉकेज थी वह दवा से नहीं खुली तो फिर स्टेंट का यूज कर ब्लॉकेज ओपन किया गया। अब दोनों मरीज ठीक हैं।

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