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क्या चोट दिखाकर सहानुभूति वोट बटोर ले गईं 'दीदी'? देखें चरण-दर-चरण कैसे बंगाली वोटरों ने दिखाई 'ममता'

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने चुनाव प्रचार के दौरान ही कह दिया था- 'खेला होबे।' सबको पता है कि ममता मैदान में डटने वाली और विरोधियों से दो-दो हाथ करने वाली नेता हैं। उन्होंने प. बंगाल में तीन दशक से जड़ जमाए वामपंथियों को सत्ता से उखाड़ फेंका था। सड़क की लड़ाई लड़ने में ममता की कोई सानी नहीं है, लेकिन इस बार बीजेपी के पक्ष में गोलबंदी पर ज्यादा भरोसा किया जा रहा था। यही वजह है कि ममता के 'खेला' पर किसी को इतना यकीन नहीं था कि 2016 के विधानसभा चुनाव से भी ज्यादा सीटें टीएमसी के झोले में आ जाए। बीजेपी के पक्ष में मच रहे शोर के बीच कई राजनीतिक धुरंधर ममता की ताकत का अहसास करवा तो रहे थे, लेकिन वो भी दावे से नहीं कह पा रहे थे कि दीदी का जादू चलकर ही रहेगा। अब जब टीएमसी के खाते में 294 में से 211 सीटें आ चुकी हैं तो विश्लेषक कारण तलाश में और गहरे उतरने लगे हैं। इसी क्रम में यह भी कहा जा रहा है कि बंगाल की जनता ने 'दीदी' को लगी चोट पर भी सहानुभूति दिखाई और उनकी झोली भर दी... 10 मार्च को लगी थी चोट अपना चुनावी क्षेत्र गईं मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी के पैर में 10 मार्च को चोट लगी जिसके बाद पश्चिम बंगाल का राजनीतिक पारा अचानक से बढ़ गया। एक तरफ ममता बनर्जी ने बीजेपी पर अपने गुंडे भेजकर उनका पैर कुचलवाने का आरोप लगाया तो दूसरी तरफ बीजेपी ने इसे ममता राजनीतिक ड्रामा बताया। पार्टी ने कहा कि ममता को पता चल गया है कि बंगाल की जनता उन्हें दुत्कार रही है तो वो सहानुभूति बटोरने की कोशिश करने लगी हैं। हालांकि, ममता ने कहा कि नंदीग्राम में उन्हें चार-पांच लोगों ने धक्का दे दिया और वह गिर गईं, उनका पैर सूज गया, फिर बुखार के साथ उन्हें सीने में दर्द महसूस हो रहा है। चोट लगते ही ममता बनर्जी को अस्पताल में भर्ती कराया गया। यूं और मजबूत हुई ममता की छवि हालांकि, कई लोगों ने घटना का चश्मदीद होने का दावा किया। उनमें से एक चितरंजन दास ने कहा था, 'मैं तो मौके पर मौजूद था, मुख्यमंत्री अपनी कार में बैठी हुई थीं लेकिन कार का दरवाजा खुला था। एक पोस्टर से टकराकर कार का दरवाजा बंद हो गया, किसी ने ना तो दरवाजे को छुआ ना ही धक्का दिया। हां, दरवाजे के पास कोई भी नहीं था।' बहरहाल, अस्पताल से निकलने के बाद ममता बनर्जी वील चेयर से ही प्रचार करने लगीं। स्वाभाविक है कि इससे जुझारू नेता की उनकी छवि और भी मजबूत हुई। ममता बनर्जी को चोट लगने के बाद हमने एक पोल पूछा था। हमने अपने पाठकों से पूछा था कि क्या बंगाल में ममता बनर्जी पर हुए कथित हमले से चुनाव में BJP को नुकसान होगा? तब सिर्फ 21% लोगों को ही लगा कि यह चोट ममता बनर्जी को बीजेपी पर बढ़त दिला सकती है। 75% लोगों ने साफ-साफ कहा था कि इस घटना से बीजेपी को कोई नुकसान नहीं होगा जबकि 4% लोग यह फैसला नहीं कर सके थे कि ममता को चोट लगने से किसे फायदा और किसे नुकसान होगा या फिर इससे कोई अंतर भी पड़ेगा या नहीं। हर चरण में TMC ने BJP को दी पटखनी लेकिन पाठकों की राय से अलग 2 मई को आए चुनाव परिणाम ने सबको चौंका दिया। किस इलाके में बीजेपी की पकड़ मजबूत हो रही है, कहां टीएमसी का कुनबा बिखर रहा है, इस तरह के विश्लेषणों से बताया जा रहा था कि किस-किस चरण में बीजेपी आगे निकल जाएगी और इतना आगे निकलेगी कि सत्ता तक पहुंच जाएगी। हालांकि, ऊपर के आंकड़े बताते हैं कि किस तरह बीजेपी हर चरण में टीएमसी से पीछे रही। ​फिर खुद ममता कैसे हार गईं? ध्यान रहे कि टीएमसी ने भले ही पश्चिम बंगाल में 211 सीटें जीत लीं, लेकिन ममता बनर्जी को नंदीग्राम से हार का मुंह देखना पड़ा। उन्हें दो दशकों से भरोसेमंद रहे शुभेंदु अधिकारी ने शिकस्त दी जिन्होंने चुनाव से ऐन पहले टीएमसी को छोड़ बीजेपी का दामन थाम लिया था। तो क्या यह सवाल लाजिमी नहीं है कि जनता ने दीदी की चोट देखकर पूरे प्रदेश में उनके प्रत्याशियों को जीत दिलाई तो फिर खुद ममता को ही क्यों हरा दिया?

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