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कर्नाटक: 2019 लोकसभा चुनाव में गठबंधन का फायदा JDS को अधिक, कांग्रेस को लग सकता है झटका
बेंगलुरु कर्नाटक में बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के लिए कांग्रेस ने जेडी (एस) के साथ गठबंधन कर सरकार तो बना ली है लेकिन आने वाले चुनावों खासकर 2019 (लोकसभा चुनाव) में इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। पार्टी के स्थानीय नेता और राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले चुनाव में सबसे अधिक फायदा जेडीएस को होना है जबकि कांग्रेस को इस गठबंधन से कोई खास फायदा नहीं होगा। बल्कि पार्टी के स्थानीय नेताओं को इस बात का अधिक डर है कि कहीं इस गठबंधन के कारण 2019 चुनाव पर उल्टा असर न पड़ जाए। दरअसल, कांग्रेस के स्थानीय नेताओं की यह चिंता बेवजह नहीं है। कारण यह कि जेडीएस का अभी तक मजबूत जनाधार सूबे में सिर्फ पूराने मैसुरु क्षेत्र में ही रहा है। यही नहीं पिछले करीब दो दशक से कांग्रेस और जेडीएस एक-दूसरे के बड़े प्रतिद्वंदी भी रहे हैं। ऐसे में अब कांग्रेस के साथ सरकार में शामिल होने के बाद जेडीएस निश्चित रूप से उसके वोट बैंक को भुनाने में कामयाब होगी। इसके अलावा अगर पुराने मैसुरु को छोड़ दें तो कांग्रेस को सूबे में कहीं और जेडी (एस) से कोई खास मदद मिलती नहीं दिखती है। इसके पीछे बड़ा कारण यह है कि ज्यादातर जगहों पर या तो पार्टी बेहद कमजोर है या फिर उसकी उपस्थिति ही नहीं है। ऐसे में इन जगहों पर गठबंधन के बावजूद कांग्रेस को बीजेपी के खिलाफ अकेले ही मोर्चा संभालना होगा। सूबे के ज्यादातर हिस्सों में जेडीएस कमजोर आंकड़े भी इस बात की तस्दीक करते हैं कि जेडी (एस) के साथ गठबंधन का कोई खास फायदा 2019 में कांग्रेस के लिए नहीं है। दरअसल, 2009 लोकसभा चुनाव में जेडी (एस) का वोट शेयर 13 फीसदी रहा वहीं 2014 में यह 11 फीसदी पर पहुंच गया। इसमें से भी करीब 75 फीसदी आंकड़ा पुराने मैसुरु क्षेत्र का है, जहां जेडीएस मजबूत स्थिति में है। ऐसे में अगर देखें तो सूबे के अन्य हिस्सों में जेडी (एस) का वोट शेयर लगभग न के बराबर है। कई जिलों मे यह 1 फीसदी से भी कम है। राजनीतिक विश्लेषक महादेव प्रकाश कहते हैं, 'यह आंकड़े दिखाते हैं कि जेडी (एस) के साथ इस गठबंधन से कांग्रेस को कोई खास फायदा नहीं पहुंचने जा रहा है।' पुराने मैसुरु क्षेत्र से बाहर जेडीएस कमजोर सबसे महत्पूर्ण तथ्य यह है उत्तर, मध्य और तटीय इलाकों में बीजेपी की मजबूत स्थिति के बाद 2019 में बेहतर प्रदर्शन के लिए कांग्रेस और जेडीएस का प्रदर्शन पुराने मैसुरु पर अधिक निर्भर है। इस क्षेत्र की बात करें तो यहां 2014 में कांग्रेस ने 9 सीटों में से 5 सीटें जीती थीं जबकि 2009 में अकेले 4 सीटें उसके खाते में आई थीं। वहीं गठबंधन सहयोगी जेडीएस की बात करें तो उसने पिछले तीन लोकसभा चुनावों में पुराने मैसुरु क्षेत्र के बाहर एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं की है। सीट बंटवारे पर फंसेगी पेच यही वजह है कि फिलहाल यह माना जा रहा है कि 2019 लोकसभा चुनाव से पहले सीट बंटवारे को लेकर भी दोनों पार्टियों में मुश्किलें खड़ी होनी तय हैं। दरअसल, कांग्रेस के पास इस क्षेत्र में फिलहाल 5 सीटे हैं, जिसे वह छोड़ना नहीं चाहेगी लेकिन इस क्षेत्र की सिर्फ 2 सीटों पर (जो अभी जेडीएस के खाते में हैं) जेडीएस समझौता कर लेगी इसकी उम्मीद कम है। प्रकाश कहते हैं, 'सीटों के बंटवारे को लेकर मुश्किलें खड़ी होंगी। ऐसे में कांग्रेस को समझौता करना पड़ेगा और जेडीएस के लिए कुछ सीटें छोड़नी पड़ेंगी। खासकर मैसुरु, तुमकुरु और चिक्कबल्लापुर को जेडीएस मांग सकती है।' 'गठबंधन दोनों के लिए बेहतर' उधर, कांग्रेस एमएलसी वीएस उगरप्पा इस गठबंधन को दोनों पार्टियों के लिए बेहतर मान रहे हैं। उनका मानना है कि दोनों के लिए आने वाले चुनाव में यह भागीदारी बेहतर साबित होगी। उगरप्पा कहते हैं, 'मैं पूरी तरह से आश्वस्त हूं कि जेडीएस लोकसभा चुनाव में अधिक सीटें नहीं मांगेगी। अगर पुराने मैसुरु की कुछ सीटों पर हमें समझौता भी करना पड़ा तो भी गठबंधन इसका सही संकेत सूबे के अन्य हिस्सों में लोगों तक पहुंचाएगा और गैर बीजेपी वोटर्स को कांग्रेस से जोड़ने की कोशिश रहेगी।'

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