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विपक्ष के पास अब क्या विकल्प, चुनावों पर क्या असर डालेगा मोदी का दांव?
नई दिल्ली, 08 जनवरी 2019,लोकसभा चुनाव 2019 से पहले मोदी सरकार ने सवर्ण आरक्षण का बड़ा दांव चला है, जिससे विपक्ष पसोपेश में है. सियासी नजरिये से देखा जाए तो गरीब सवर्णों के लिए घोषित आरक्षण इस वर्ग की नाराजगी को दूर करने की बीजेपी की एक कोशिश मानी जा रही है. मोदी सरकार 10 प्रतिशत सवर्ण आरक्षण देने के लिए मंगलवार को लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक पेश करेगी. आरक्षण को लेकर एक बार फिर सियासी बिसात बिछाई जाने लगी है. संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण की बात नहीं कही गई है. और आर्थिक आधार पर आरक्षण देने के लिए संविधान संशोधन करना जरूरी होगा. इस प्रस्ताव पर दलों के रुख से भाजपा चुनाव मैदान में अपनी रणनीति को धार देगी. मोदी सरकार के सवर्ण आरक्षण दांव को लेकर अभी तक विपक्ष की ओर से आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने ही विरोध जताया है. इसके अलावा बाकी दल कहीं न कहीं सवर्ण आरक्षण के पक्ष में खड़े नजर आ रहे हैं. दरअसल कांग्रेस से लेकर सपा, बसपा, एलजेपी जैसे राजनीतिक दल गरीब सवर्ण को आरक्षण देने की वकालत करते रहे हैं. ऐसे में ये पार्टियां खुलकर विरोध नहीं करेंगी, लेकिन लोकसभा में इसे लाने की टाइमिंग और प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर मोदी सरकार को घेर सकती हैं. स्टैंडिंग कमेटी को भेजने की मांग मोदी सरकार सवर्ण आरक्षण विधेयक को लोकसभा में पेश करेगी. लोकसभा चुनाव के मद्देनजर कोई भी राजनीतिक पार्टी इसका विरोध करके सवर्णों की नाराजगी मोल लेना नहीं चाहेगी. ऐसे में संविधान संशोधन विधेयक को स्टैंडिंग कमेटी के पास भेजने की सिफारिश विपक्षी दलों की ओर से की जा सकती है. हालांकि मोदी सरकार इसे स्वीकार नहीं करेगी. सदन में चर्चा सवर्ण आरक्षण को लेकर सत्ता पक्ष लोकसभा में चर्चा की बात करेगा, ताकि इस पर सभी की राय सामने आए. जबकि विपक्ष इसे स्वीकार करे, ये कहना मुश्किल है. हालांकि मोदी सरकार की पूरी कोशिश होगी कि चर्चा के जरिए सवर्ण आरक्षण पर सभी राजनीतिक दलों की राय सामने लाई जा सके. क्षेत्रीय दल कर सकते हैं विरोध सवर्ण आरक्षण को लेकर मोदी सरकार को सदन में क्षेत्रीय दलों के विरोध का सामना करना भी पड़ सकता है. आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने इसका विरोध करके अपने मंसूबे जाहिर कर दिए हैं. इतना ही नहीं एनडीए की सहयोगी पार्टी अपना दल ने सवर्ण आरक्षण आने के बाद ओबीसी के दायरे को 27 प्रतिशत से और आगे बढ़ाने की बात करने लगी है. इसके अलावा सपा और बसपा भी आबादी के लिहाज से आरक्षण की मांग उठा सकती है. इसके अलावा जातिगत जनगणना की रिपोर्ट जारी करने की बात सामने आ सकती है. कोर्ट से अड़ंगा सवर्ण आरक्षण को लेकर कुछ लोग सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं. इससे पहले भी नरसिम्हा राव सरकार में जब 10 फीसदी सवर्ण आरक्षण देने की सिफारिश की गई थी तो कोर्ट ने रोक लगा दी थी. इसके अलावा अल्पसंख्यकों, जाटों, मराठों और राजस्थान में ब्राह्मणों के आरक्षण की सिफारिश को कोर्ट से झटका लग चुका है. ऐसे में मोदी सरकार के इस दांव को कोर्ट से भी झटका लग सकता है. दरअसल देश में अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को मिलाकर 49.5 फीसदी आरक्षण है. सुप्रीम कोर्ट 1992 के इंदिरा साहनी के अपने फैसले में साफ कर चुका है कि कुल आरक्षण 50 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकता. इसके बावजूद कुछ राज्यों जैसे तमिलनाडु में आरक्षण इस सीमा से ज्यादा है जिसका केस सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है. ऐसे में ये मामला भी सुप्रीम कोर्ट की भेंट चढ़ सकता है.

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