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एकतरफा नहीं हो सकती पंथनिरपेक्षता, हिंदुओं को भी उतने ही धार्मिक अधिकार मिलने चाहिए, जितने अन्य मतावलंबियों के पास हैं?

हाल के दिनों में विभिन्न त्योहारों पर हिंसक टकराव की जैसी घटनाएं देखने को मिलीं वैसी इसके पहले कभी नहीं देखी गईं। इस सिलसिले के थमने के भी आसार नहीं दिख रहे। कुछ क्षेत्रीय दलों के साथ कांग्र्रेस इस स्थिति के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार है, क्योंकि वही है जो 2014 में केंद्रीय सत्ता से बेदखल होने के बाद सांप्रदायिक माहौल खराब होने और संविधान एवं कानून के खिलाफ काम होने का आरोप लगाती रहती है। एक अजीब मनोदशा से पीड़ित गांधी परिवार यही साबित करने पर तुला हुआ है उसकी सत्ता छिनने के बाद देश का सामाजिक तानाबाना छिन्न-भिन्न हो गया है। यह निरा झूठ है। सच यही है कि पंडित जवाहरलाल नेहरू के समय से ही पार्टी की नीतियों में हिंदू-विरोधी का भाव दिखने लगा था और अब पार्टी उसी पाप की कीमत चुका रही है। भले ही 1947 में देश का धार्मिक आधार पर विभाजन हो गया हो, लेकिन भारत में हिंदू बहुसंख्यकों ने देश को पंथनिरपेक्ष लोकतांत्रिक राष्ट्र बनाने पर पूरा जोर दिया। एक विविधतापूर्ण उदार समाज बनाने के प्रति हिंदुओं की इस असाधारण प्रतिबद्धता को कांग्र्रेस ने न तो कभी मान्यता दी और न ही उसका सम्मान किया। इसके बजाय पार्टी र्ने हिंदू परंपराओं का मखौल उड़ाया। वहीं अन्य पंथ-मजहबों की निंदा योग्य मान्यताओं पर भी आंखें बंद रखीं। यह तभी दिख गया था, जब नेहरू हिंदू कोड बिल को आगे बढ़ाने के इच्छुक और मुस्लिम एवं अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों में ऐसे ही सुधारों को लागू कराने के अनिच्छुक दिखे। यही समस्या का आरंभिक बिंदु था। जब हिंदुओं ने पंथनिरपेक्ष लोकतांत्रिक राज्य का विकल्प चुना तो कांग्र्रेस को चाहिए था कि वह भारत में सभी समुदायों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करती, जो सभी समुदायों के लिए मार्गदर्शक बनती। जो लोग किसी भी सूरत में मुस्लिम पर्सनल ला कायम रखना चाहते थे, उनके लिए पाकिस्तान का विकल्प था, परंतु नेहरू ने इनमें से कोई भी दांव नहीं आजमाया। इसके बजाय उन्होंने और उनकी पार्टी ने पहले दिन से ही मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति अपनाई। कांग्र्रेस को यही मुस्लिम वोट बैंक स्थायी दिखने लगा और उसे अपना मूल सिद्धांत मान लिया। साथ ही साथ हिंदुओं को हल्के में लेना शुरू कर दिया और उनके स्वाभिमान पर आघात किया। चूंकि नेहरू स्वतंत्रता संघर्ष के प्रमुख नेता और कद्दावर व्यक्तित्व के स्वामी थे तो हिंदुत्व के प्रति उनके तिरस्कार भाव ने हिंदुओं को अपने धर्म एवं संस्कृति के प्रति हीन भावना से भर दिया। इसके बाद अन्य दल भी मुस्लिम वोट की इस बंदरबांट में शामिल हो गए और उन्होंने कांग्र्रेस के इस खजाने में भरपूर सेंध लगाते हुए अपनी राजनीतिक जमीन को मजबूत किया। हिंदू केवल उदासी के साथ बेबस होकर यह सब देखते रहे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संगठन और उसकी राजनीतिक इकाई जनसंघ को छोड़कर कोई भी हिंदू हितों के लिए आवाज उठाने वाला नहीं था। दशकों तक यह सिलसिला कायम रहा। इसर्से हिंदुओं के भीतर असंतोष का भाव बढ़ने लगा। फिर एक निर्णायक पड़ाव आया। यह पड़ाव था राम मंदिर के समर्थन में आरंभ की गई लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा, जिसमें उन्होंने आह्वान किया था, ‘गर्व से कहो हम हिंदू हैं।’ इस नारे का उद्देश्र्य हिंदुओं को प्रेरित करना था, जिनकी कांग्र्रेस ने लगातार दुर्गति की थी। हिंदुओं को हेय दृष्टि से देखने वाले कांग्र्रेस और कम्युनिस्ट नेताओं के अलावा ऐसे ही अन्य वर्गों ने जब पहली बार यह नारा सुना तो उन्होंने उसका उपहास ही उड़ाया। उन्हें यह महसूस हुआ कि उन्होंर्ने हिंदुओं का इतना मानमर्दन कर दिया है कि अब वे कभी एकजुट होकर लामबंद नहीं हो सकेंगे। वे गलत साबित हुए। समय के साथ भारत में सेक्युलरिज्म ने छद्म-सेक्युलरिज्म का रूप धर लिया। इसमें जहां मुस्लिमों, ईसाइयों आदि के धार्मिक अधिकारों के लिए आवाज बुलंद होती रही, वहीं हिंदुओं के धार्मिक अधिकारों को नकारा जाता रहा। इसर्से हिंदुओं के आक्रोश का सैलाब भरता गया और एक समय पर वह फूट पड़ा। परिणामस्वरूप आज हिंदू भी अपने धर्म को लेकर मुस्लिम और ईसाई की भांति सजग एवं आग्र्रही है, लेकिन इसे अनुदार और पंथनिरपेक्षता विरोधी ठहराया जा रहा है। छद्म-सेक्युलर लोगों का एक वर्ग इसे साबित करने की मुहिम में लगा हुआ है, जबकि उनमें से कुछ के नाम ही ‘रामचंद्र’ और ‘सीताराम’ हैं। वे अपने उसी स्वर्णिम दौर की वापसी के लिए सक्रिय हैं, जब हिंदू दमित थे। कुछ लोग स्वतंत्रता के समय से ही इस अभियान में जुट गए थे। हालांकि अब उनकी संख्या घटी है और जो बचे हैं, वे इसी कारण कि उनके पास इससे निकलने के बाद कोई और विकल्प नहीं। इस बीर्च हिंदुओं को महसूस हुआ कि अगर उनके धार्मिक अधिकार अब्राहमिक पंथों-मजहबों की भांति संरक्षित नहीं हुए, तो हिंदुत्व समाप्त हो जाएगा। एक तरह से अपना अस्तित्व बचाने के लिए ही र्ंहदुओं में यह अलख जगी है। आज हिंदू एक नई व्यवस्था की मांग कर रहा है। कुल मिलाकर ‘गर्व से कहो हर्म हिंदू हैं’ नारे ने अब साकार रूप ले लिया है, परंतु इसमें करीब 25 साल का समय लग गया। एकाएर्क हिंदुओं में जागृति आई। वह चुनावों से लेकर इंटरनेट पर अपनी मौजूदगी दिखा रहा है। ‘इंटरनेट पर सक्रिय हिंदुओं’ ने उस छद्म-सेक्युलर तबके की घेराबंदी कर ली है, जो नेहरूवादी छतरी के तर्ले हिंदू-विरोधी खुराक पर जीता आया है। ऐसी स्थिति में हम किस दिशा में जाते दिख रहे हैं? जिस नई व्यवस्था की बात हो रही है, उसमें आखिर क्या होना चाहिए? इसमें हिंदुओं और मुस्लिमों एवं अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के बीच एक नया समीकरण बने, जिसमें अल्पसंख्यक पंथ-मजहबों को कुछ पहलुओं का ध्यान रखना होगा। उन्हें यह अवश्य स्मरण रहे कि भारत पंथनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक राष्ट्र इसी कारण है, क्योंकि बहुसंख्यर्क हिंदुओं ने यही चाहा। दूसरी बात यह कि पंथनिरपेक्षता एकतरफा नहीं हो सकती और सभी मतावलंबियों को पंथनिरपेक्ष आदर्शों का पालन करना होगा। किसी भी धर्म के विरुद्ध विषवमन पर प्रतिबंध और उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। हिंदुओं को भी उतने ही धार्मिक अधिकार मिलने चाहिए, जितने अन्य मतावलंबियों के पास हैं। क्या यह कुछ ज्यादा ही अपेक्षाएं हैं? अगर आपको यह कुछ ज्यादा ही लगता है तो अफसोस के साथ यही कहा जाएगा कि उभरती हुई समस्याओं का फिर कोई आसान समाधान नहीं। ए. सूर्यप्रकाश (लेखक लोकतांत्रिक विषयों के विशेषज्ञ एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)

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