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रीजनल नेविगेशन सिस्टम क्या है? इसको हासिल करने वाला दुनिया का चौथा देश बना भारत

नई दिल्ली हिंदुस्तान लगातार जल, थल और वायु में अपनी ताकत बढ़ाता जा रहा है। इसी कड़ी में भारत कई नए नए प्रयोग भी कर रहा है। अभी तक भारत कई मामलों में विदेशी मुल्कों पर निर्भर रहता था, मगर अब भारत खुद आत्मनिर्भर हो रहा है। 11 नवंबर को भारत ने अपनी खुद की भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली (Indian Regional Navigational Satellite System) को हासिल कर लिया। ऐसा करने वाला भारत दुनिया में चौथा देश बन गया है। इसके पहले ये सिस्टम सिर्फ अमेरिका, रूस और चीन के पास ही थी। भारत सरकार के अधीन इंडियन रीजनल नैविगेशन सैटेलाइट सिस्टम आईआरएनएसएस भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने विकसित किया है। ये एक क्षेत्रीय स्वायत्त उपग्रह नौवहन प्रणाली है जो पूर्णतया भारत सरकार के अधीन है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका नाम भारत के मछुवारों को समर्पित करते हुए नाविक रखा है। 1500 किलोमीटर दूरी तक करेगा काम IRNSS का उद्देश्य देश तथा देश की सीमा से 1500 किलोमीटर की दूरी तक के हिस्से में इसके उपयोगकर्ता को सटीक स्थिति की सूचना देना है। सात उपग्रहों वाली इस प्रणाली में चार उपग्रह ही निर्गत कार्य करने में सक्षम हैं लेकिन तीन अन्य उपग्रह भी जुटाई गई जानकारियों को और सटीक बनायेगें। हर उपग्रह (सैटेलाइट) की कीमत करीब 150 करोड़ रुपए के करीब है। वहीं पीएसएलवी-एक्सएल प्रक्षेपण यान की लागत 130 करोड़ रुपए है। हिंद महासागर बताएगा सटीक लोकेशन आईआरएनएसएस भारत विकसित एक स्वतंत्र क्षेत्रीय नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम है। इसे हिंद महासागर में जहाजों के नेविगेशन में सहायता के लिए सटीक स्थिति सूचना सेवा प्रदान करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। यह भारतीय सीमा में लगभग 1500 किमी तक फैले हिंद महासागर में अमेरिका के स्वामित्व वाली ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) की जगह लेगा। अभी तक हम इस टेक्नॉलजी के लिए अमेरिका पर आश्रित थे। महानिदेशक अमिताभ कुमार ने कहा कि भारतीय जल सीमा में व्यापारी जहाज अब वैकल्पिक नेविगेशन मॉड्यूल के रूप में "आधुनिक और अधिक सटीक प्रणाली यानी IRNSS का उपयोग कर सकते हैं। 11 नवंबर को मिली मान्यता IMO संयुक्त राष्ट्र की विशेष एजेंसी है जो शिपिंग की सुरक्षा और जहाजों द्वारा समुद्री और वायुमंडलीय प्रदूषण की रोकथाम के लिए जिम्मेदार है। IMO की समुद्री सुरक्षा समिति (MSC) ने IRNSS को विश्व व्यापी रेडियो नेविगेशन प्रणाली (WWRNS) के रूप में मान्यता दी है, जिसके 4 नवंबर से 11 नवंबर तक आयोजित किए गए 102 वें सत्र के दौरान मान्यता मिली। डब्ल्यूडब्ल्यूआरएनएस और भारतीय नेविगेशन सिस्टम को जीपीएस के समान रखा गया है, जिसका उपयोग दुनिया भर में आमतौर पर समुद्री शिपिंग जहाजों या रूसी ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (ग्लोनास) द्वारा किया जाता है। भारत चौथा देश अमेरिका, रूस और चीन के बाद, जिनके पास अपना स्वयं का नेविगेशन सिस्टम है, भारत अपना स्वतंत्र क्षेत्रीय नेविगेशन सिस्टम रखने वाला चौथा देश बन गया है। जीपीएस के विपरीत, हालांकि, आईआरएनएसएस एक क्षेत्रीय है और वैश्विक नेविगेशन प्रणाली नहीं है। केंद्रीय परिवहन मंत्रालय, जहाजरानी और जलमार्ग के तहत नौवहन महानिदेशालय के अनुसार आत्मनिर्भर भारत की ओर ये बड़ा कदम है। 2500 जहाजों की करेगा मदद नौवहन महानिदेशक अमिताभ कुमार के अनुसार किसी भी समय भारतीय जल सीमा में 2,500 व्यापारी जहाज हैं जो सभी आईआरएनएसएस का उपयोग कर सकते हैं। उन्होंने कहा नेविगेशन की एक आधुनिक और अधिक सटीक प्रणाली है। यह प्रणाली भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के उपग्रहों पर आधारित है जो नेविगेशन के लिए उपयोग किए जाते हैं।

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