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राफेल डील का कांग्रेस की अगुआई वाले यूपीए से क्या है कनेक्शन, चीन और पाक में क्यों बढे़गी बेचैनी

नई दिल्ली दुनिया के सबसे अत्याधुनिक लड़ाकू विमानों में गिना जाने वाला राफेल (Rafale fighter jets landed in Ambala) भारत आ चुका है। फ्रांस के साथ 36 राफेल लड़ाकू विमानों के सौदे के तहत 5 लड़ाकू विमानों की पहली खेप बुधवार को अंबाला एयरबेस पहुंची। पूर्वी लद्दाख में चीन के साथ तनाव के बीच (Rafale arrived India amid tension with China) राफेल लड़ाकू विमानों का हिंदुस्तान आना बहुत ही महत्वपूर्ण है। ये विमान भारत को हवाई युद्धक क्षमता के मामले में चीन और पाकिस्तान पर बढ़त देने वाले हैं। खास बात यह है कि 2019 के आम चुनाव में राफेल डील में कथित भ्रष्टाचार को कांग्रेस ने बड़ा मुद्दा भी बनाया था। यह भी दिलचस्प है कि राफेल खरीद की पहल कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार ने ही शुरू की थी लेकिन 7 साल लंबे जद्दोजहद के बाद भी यह परवान नहीं चढ़ सकी और बाजी नरेंद्र मोदी सरकार के हाथ लगी। चीन और पाकिस्तान को इसलिए होगी चिंता राफेल लड़ाकू विमानों के आने से भारतीय वायुसेना को चीन और पाकिस्तान पर स्पष्ट बढ़त मिलने वाली है। वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर जारी तनाव के बीच आसमान के इन सिकंदरों के भारत आने से निश्चित तौर पर चीन और पाकिस्तान की बेचैनी बढ़ने वाली है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने दोनों देशों का नाम लिए बगैर यही बात कही कि भारत की क्षेत्रीय अखंडता की ओर बुरी नजर रखने की चाहत वालों की चिंता बढ़ने वाली है। चीन, पाक के पास राफेल की टक्कर का लड़ाकू विमान नहीं चीन और पाकिस्तान दोनों ही के पास राफेल की टक्कर का कोई लड़ाकू विमान ही नहीं है। एयर टु एयर और एयर टु ग्राउंड स्ट्राइक के मामले में राफेल का चीन या पाकिस्तान के विमानों से कोई तुलना ही नहीं है। पाक के पास जो सबसे आधुनिक विमान हैं, वे हैं अमेरिका से आए एफ-16 और एफ-17। पिछले साल फरवरी में विंग कमांडर अभिनंदन वर्तमान ने पाकिस्तान के एफ-16 को मार गिराया था। एफ-16 चौथी पीढ़ी का विमान है, जबकि राफेल 4.5 वीं पीढ़ी का है। एफ-16 सिंगल इंजन का है तो राफेल डबल इंजन है। इसमें एफ-16 के मुकाबले काफी अधिक घातक हथियारों, मिसाइलों को लोड किया जा सकता है। चीन के जे-20 की तुलना में बहुत आगे है राफेल चीन के पास जो सबसे आधुनिक विमान है वह है चेंगदु जे-20। राफेल में उससे ज्यादा खूबियां हैं। दूसरे देशों की टेक्नॉलजी की नकल में माहिर चीन ने जे-20 को नकल के जरिए बनाया है इसलिए उसकी क्षमताओं के बारे में वह जो दावा करता है वह भी संदिग्ध है जबकि राफेल लीबिया, इराक और सीरिया में अपना लोहा मनवा चुका है। खास बात यह है कि भारत ने राफेल में अपनी जरूरतों के हिसाब से कुछ अहम बदलाव भी कराए हैं। इसमें इजरायली हेल्मेट-माउंटेड डिस्प्ले को जोड़ा गया है। इसके अलावा भारत की गुजारिश पर इसमें रेडार वॉर्निंग रिसिवर्स, लो बैंड जैमर्स, 10 घंटे की फ्लाइट डेटा रिकॉर्डिंग, इन्फ्रारेड सर्च ट्रैकिंग सिस्टम जैसे कुछ अहम खूबियां जोड़ी गई हैं। इसलिए मौजूदा वक्त में दुनिया का सबसे खतरनाक फाइटर है राफेल वायु रक्षा, बेहद सटीकता से हमले, जहाज रोधी हमले की खासियत समेत इसकी अधिकतम रफ्तार 1.8 मैक है। अमेरिका के एफ-35 और एफ-22 लड़ाकू विमानों से भी इसकी तुलना की जाती है। विशेषज्ञों की माने तो राफेल एफ-35 से ज्यादा फुर्तीला है क्योंकि यह लंबे समय तक हथियारों को लेकर उच्च गति के साथ उड़ान भर सकता है। हालांकि वैमानिकी और इलेक्ट्रॉनिक युद्धक प्रणाली के मामले में एफ-35, राफेल से आगे है। रक्षा विशेषज्ञ लक्ष्मण बेहेरा ने पीटीआई को बताया, 'वैश्विक बाजार में उपलब्ध यह सर्वश्रेष्ठ लड़ाकू विमान है। चीन में उपलब्ध लड़ाकू विमानों की तुलना में यह अत्याधुनिक है और मारक क्षमता भी अधिक है। निश्चित तौर पर भारत की रक्षा तैयारियों को इससे बढ़ावा मिलेगा। राफेल के आगमन का समय भी बिल्कुल उपयुक्त है।' चीन के लड़ाकू विमान जे-20 के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि इसकी तुलना राफेल से नहीं की जा सकती क्योंकि फ्रांस निर्मित विमान चीनी लड़ाकू विमान की तुलना में ज्यादा दक्ष है। पूर्व वायु सेना प्रमुख फली होमी मेजर ने भी डॉक्टर बेहेरा की राय से सहमति जाहिर की। पूर्व वायु सेना प्रमुख ने पीटीआई से कहा, 'राफेल और जे-20 के बीच कोई तुलना नहीं है। दुनिया जे-20 के बारे में नहीं जानती है। राफेल विमान भारतीय वायु सेना की क्षमता को और बढ़ाएंगे। ...तो कांग्रेस के सिर बंधता राफेल डील का सेहरा भारतीय वायुसेना की जरूरतों के मद्देनजर राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद की पहल सबसे पहले कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार ने ही की थी। साल 2007 में एयरफोर्स ने सरकार के पास मीडियम मल्टी रोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (MMRCA) खरीदने का प्रस्ताव भेजा था। इसके बाद तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने 126 लड़ाकू विमानों को खरीदने का टेंडर जारी किया। टेंडर में सबसे कम कीमत पर राफेल ने बोली लगाई थी। मनमोहन सिंह सरकार लड़ाकू विमान खरीदना चाह रही थी लेकिन उसके लिए चल रही बातचीत कभी अंजाम तक नहीं पहुंच पाई। यूपीए के दौरान 18 राफेल विमानों को फ्रांस से खरीदा जाना था जबकि बाकी 108 विमानों का भारत में ही निर्माण के लिए बातचीत चल रही थी। 2014 के आम चुनाव में यूपीए सरकार सत्ता से बाहर हो गई। नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने और 23 सितंबर 2016 को फ्रांस की सरकार के साथ 59 हजार करोड़ रुपये में हथियारों से सुसज्जित 36 राफेल लड़ाकू विमानों की डील फाइनल हुई। 8 अक्टूबर 2019 यानी वायु सेना दिवस के दिन भारत को फ्रांस से पहला राफेल लड़ाकू विमान मिला जिसे रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने रिसीव किया। अब 5 लड़ाकू विमान अंबाला एयरबेस पहुंच चुके हैं जो कॉम्बैट रेडी हैं यानी जरूरत पड़ने पर कभी भी इनका इस्तेमाल के लायक हैं। क्यों जरूरी थे राफेल राफेल विमानों की खरीद का यह सौदा भारतीय वायुसेना की कम होती युद्धक क्षमता में सुधार के लिए किया गया था, क्योंकि वायुसेना के पास फिलहाल 31 लड़ाकू विमान हैं जबकि वायुसेना के स्क्वॉड्रन में इनकी स्वीकृत संख्या के अनुसार, कम से कम 42 लड़ाकू विमान होने चाहिए। चीन के साथ तनाव और पाकिस्तान की धूर्तता के इतिहास के मद्देनजर भारत के पास पर्याप्त संख्या में लड़ाकू विमानों की सख्त जरूरत थी। अंबाला पहुंचे पांच राफेल विमानों में से तीन विमान एक सीट वाले जबकि दो राफेल दो सीट वाले लड़ाकू विमान हैं। इन्हें भारतीय वायुसेना के अंबाला स्थित स्क्वॉड्रन 17 में शामिल किया जाएगा जो 'गोल्डन एरोज' के नाम से मशहूर हैं। राफेल डील से चूकी कांग्रेस ने विमानों के भारत आने का स्वागत तो किया है लेकिन डील में कथित भ्रष्टाचार से जुड़े अपने पुराने सवालों को फिर दागा है। दूसरी तरफ, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस ब्रह्मास्त्र के भारत आने का पूरा श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी निर्णय क्षमता को दिया है।

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