taaja khabar....अमेरिका ने भारत को हथियार क्षमता वाले गार्जियन ड्रोन देने की पेशकश की: सूत्र....अविश्वास प्रस्ताव: मोदी सरकार को मिलेगा विपक्ष पर निशाना साधने का मौका....संसद भवन पर हमले के लिए निकले हैं खालिस्तानी आतंकी: खुफिया इनपुट....धरती के इतिहास में वैज्ञानिकों ने खोजा 'मेघालय युग'....कठुआ केस में नया मोड़, पीड़िता के 'असल पिता' कोर्ट में होंगे पेश...निकाह हलाला: बरेली में ससुर पर रेप का केस, अप्राकृतिक सेक्‍स के लिए पति पर भी मुकदमा...मॉनसून सत्र: अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन नहीं करेगी शिवसेना?....देश के हर गांव को जाएगा कुंभ का न्योता, योगी पत्र लिख मुख्यमंत्रियों को बुलाएंगे....क्या अविश्वास प्रस्ताव के मुद्दे पर मोदी सरकार के दांव में फंस गया विपक्ष?...लखनऊ में बड़े कारोबारी के यहां छापे, 89 किलो सोना-चांदी बरामद, 8 करोड़ कैश भी...
चीफ जस्टिस बनाम 4 जज: सामने आई जजों की चिट्ठी, लगाए गंभीर आरोप
नई दिल्ली आजाद भारत के इतिहास में पहली बार सुप्रीम कोर्ट के 4 जजों ने शुक्रवार को मीडिया के सामने आकर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की प्रशासनिक कार्यशैली पर सवाल उठाए। प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद चारों जजों ने एक चिट्ठी जारी की, जिसमें गंभीर आरोप लगाए गए हैं। जजों के मुताबिक यह चिट्ठी उन्होंने चीफ जस्टिस को लिखी थी। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को संबोधित 7 पन्नों के पत्र में जजों ने कुछ मामलों के असाइनमेंट को लेकर नाराजगी जताई है। बता दें कि जजों का आरोप है कि चीफ जस्टिस की ओर से कुछ मामलों को चुनिंदा बेंचों और जजों को ही दिया जा रहा है। - घोर दुख और चिंता है इसलिए लेटर लिखा है। यह सही होगा कि आपको लेटर के जरिये मामले को बताया जाय। हाल में जो आदेश पारित किये उससे न्याय प्रक्रिया पर बुरा प्रभाव पड़ा है साथ ही सीजेआई के ऑफिस और हाई कोर्ट के प्रशासन पर सवाल उठा है। - यह जरूरी है कि उक्त सिद्धान्त का पालन हो और सीजेआई पर भी वह लागू है। सीजेआई खुद ही उन मामलों में अथॉरिटी के तौर पर आदेश नहीं दे सकती, जिन्हें किसी और उपयुक्त बेंच ने सुना हो चाहे जजों की गिनती के हिसाब से ही क्यों न हो। उक्त सिद्धान्त की अवहेलना अनुचित, अवांछित और अशोभनीय है। इससे कोर्ट की गरिमा पर संदेह उत्पन्न होता है। - 27 अक्टूबर, 2017 को आर.पी. लूथरा बनाम केंद्र को आपने सुना था। पर एमओपी मामले में सरकार को पहले ही कहा जा चुका है कि वह इसे फाइनल करे। ऐसे मामलों को संवैधानिक बेंच को ही सुनना चाहिए कोई और बेंच नहीं सुन सकता। - एमओपी के लिए निर्देश के बाद भी सरकार चुप है ऐसे में ये माना जाय कि सरकार उसे मान चुकी है। कोई और बेंच उस पर टिप्पणी न करे। जस्टिस कर्णन केस का भी जिक्र किया गया और कहा कि जजों की नियक्ति को लेकर सवाल उठे थे और उसे दोबारा देखने को कहा था साथ ही महाभियोग का विकल्प भी तलाशने को कहा था पर फिर भी एमओपी की चर्चा नहीं हुई थी। - एमओपी गंभीर मामला है अगर मामला सुना भी जाये तो संवैधानिक बेंच ही सुने। ये तमाम बातें गंभीर हैं और चीफ ड्यूटी बाउंड है और सही रास्ता निकलते हुए ठीक करें।

Top News

http://www.hitwebcounter.com/