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कांग्रेस के मिशन 2019 के लक्ष्य को झटका देंगी लेफ्ट पार्टियां?
नई दिल्ली कांग्रेस ने कर्नाटक में भले ही सत्ता की लड़ाई जीत ली हो, लेकिन अगर लेफ्ट पार्टी से आ रही आवाजों पर ध्यान दें तो शायद कांग्रेस के मिशन 2019 के लक्ष्य को झटका लग सकता है। कांग्रेस और जेडीएस गठबंधन की सरकार पर लेफ्ट पार्टियों ने इशारों में ही 2019 लोकसभा चुनावों से पहले विपक्षी एकता के ख्वाब पर अपनी आपत्ति जाहिर कर दी है। लेफ्ट पार्टियां 2014 के लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद से ही देश में सभी धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के एकजुट होकर फासीवादी ताकतों का मुकाबला करने की वकालत कर रही हैं। हालांकि, शनिवार को कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन + की जीत के कुछ घंटों बाद ही लेफ्ट ने थोड़ी तीखी प्रतिक्रिया जाहिर कर दी। लेफ्ट की तरफ से जारी प्रतिक्रिया में कहा गया कि कर्नाटक चुनाव के नतीजे कांग्रेस के लिए एक सबक है। कांग्रेस अगर दूसरे राज्यों में भी जीत के समीकरण तलाश रही है तो उसे क्षेत्रीय पार्टियों के प्रति अधिक उदार होना होगा। सीपीएम ने अप्रैल में ही एक बयान में कहा था कि कांग्रेस के साथ राजनीतिक समझदारी संभव है और अगर संभावनाएं बनीं तो दोनों पार्टी मिलकर संसद के अंदर और बाहर सड़क पर भी काम कर सकती हैं। हालांकि, कांग्रेस के प्रति थोड़ी तल्खी जाहिर करते हुए वृंदा करात + ने कहा, 'कांग्रेस सॉफ्ट हिंदुत्व के रास्ते पर चल रही है और आर्थिक सुधारों को लेकर नहीं बोल रही तो यह जाहिर है कि कहीं न कहीं पार्टी के आत्मविश्वास में कमी है। कांग्रेस भी बीजेपी की ही नकल कर रही है।' सीपीआई नेता डी. राजा ने कहा, 'हमें यह मानने में कोई आपत्ति नहीं है कि कांग्रेस पार्टी अब वह नहीं रही जो 1967 के पहले थी। अब यथार्थ के धरातल पर उतरकर कांग्रेस को राज्यों की हकीकत और जरूरत को समझना होगा। कांग्रेस को फिर से नेहरू वाले राजनीतिक मॉडल को अपनाना होगा।' लेफ्ट नेता ने यह भी कहा कि 2019 में कांग्रेस के विपक्षी दलों को एकजुट करने और सर्वमान्य नेतृत्वकर्ता बनने को लेकर कुछ भी कहना अभी जल्दबाजी है।

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