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राजस्थान चुनाव: BJP ने 'एक व्यक्ति एक वोट' के जरिए दिया पार्टी में पारदर्शिता का संदेश
पाली: पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र का दावा करती रही बीजेपी ने विधानसभा चुनाव से पहले एक बार फिर पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र की मजबूती दिखाने की कोशिश की है. बीजेपी अब से पहले पार्टी के आम कार्यकर्ता, नेता और सरकार के मंत्रियों तक को एक समान बताती आई है, लेकिन इस बार चुनावो के लिए रायशुमारी के दौरान मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे हो या फिर पार्टी का कोई सामान्य पदाधिकारी या कार्यकर्ता सभी की राय को एक वोट की अहमियत दी गई है. जिससे बीजेपी ने पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र के पहलू को महत्वपूर्ण होने का संदेश दिया है. पार्टी विद द डिफरेंस का नारा देने वाली बीजेपी में अब तक कई बार डिफरेंसेज भी देखे गए हैं, लेकिन बीजेपी अब चुनाव से पहले सभी तरह के मतभेदों को पाटने की तरफ बढ़ चुकी है. पार्टी नेताओं का कहना है कि संगठन में प्रधानमंत्री भी कार्यकर्ता के रूप में है और मुख्यमंत्री भी कार्यकर्ता ही है. बीजेपी कोर कमेटी के सदस्य यूनुस खान इसकी पुष्टि करते हुए कहा है कि बीजेपी के दूसरी पार्टियों के मुकाबले अलग होने का एहसास इस बात से भी हो जाता है कि उनकी पार्टी में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और दूसरे वरिष्ठ नेताओं का भी रायशुमारी के दौरान एक ही वोट गिना जा रहा है. हालांकि मुख्यमंत्री प्रदेश की सभी 200 विधानसभा सीटों पर टिकट तय करने में अहम भूमिका निभाती दिख रही हैं लेकिन जब कोटा संभाग की रायशुमारी बैठकें होंगी तो उस दौरान झालावाड़ की झालरापाटन सीट पर मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का और बारां झालावाड़ संसदीय क्षेत्र में आने वाली विधानसभा सीटों पर उनके पुत्र दुष्यंत सिंह का भी एक ही वोट गिना जाएगा. दरअसल बीजेपी में चल रही रायशुमारी के दौरान पार्टी ने मंडल स्तर के मौजूदा पदाधिकारियों से लेकर पूर्व मंडल अध्यक्ष, जिले की मौजूदा टीम के साथ पूर्व जिला अध्यक्ष, मौजूदा और पूर्व विधायक और सांसद के साथ ही नगर निगम के पार्षदों तक से रायशुमारी की जा रही है. ऐसी सूरत में जब मंगलवार को कोटा संभाग की रायशुमारी के दौरान भी एक व्यक्ति एक वोट का सिद्धांत लागू होता दिखेगा तो पार्टी के आम कार्यकर्ता में भी यही मैसेज जाएगा कि बीजेपी सभी कार्यकर्ताओं को एक समान मानती है. बीजेपी नेता शंभू सिंह खेतासर कहते हैं कि पार्टी की ऐसी अवधारणा और संगठन के ऐसे नियम बीजेपी को और ज्यादा मजबूत बनाते हैं. पार्टी में शीर्ष नेतृत्व से लेकर साधारण कार्यकर्ता को बराबर बताने की इस कवायद से बीजेपी के ज्यादातर नेता खुश दिख रहे हैं और वह इसके समर्थन में भी खड़े होते दिखाई दे रहे हैं. लेकिन इसी पार्टी के कुछ कार्यकर्ताओं के मन में यह सवाल भी उठता है कि क्या यह सारी कवायद असली है या सिर्फ आभासी जिससे कार्यकर्ता को यह लग सके की पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता भी है और एकरूपता भी.

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