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लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की ये कैसी भूमिका?

लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की ये कैसी भूमिका? दुष्ट लोगों को दूसरों के भीतर राई बराबर दोष भी दिख जाता है लेकिन खुद में मौजूद बेल के बराबर की कमी को देखते हुए भी वह अनदेखा कर देता है।भारतीय मनीषियों द्वारा कही गई इस बात पर इन दिनों पश्चिमी देशों का मीडिया और उनका अंधाधुंध अनुसरण करने वाला भारतीय मीडिया का एक खास समूह खरा उतरता दिख रहा है। किसी भी सभ्य समाज में असमय या अप्राकृतिक वजह से एक भी मौत को जायज नहीं ठहराया जा सकता है।अपनों को खोने का दर्द क्या होता है, वह वही बता सकता है , जिसने अपने प्रियजन को खोया है।लेकिन इनसे परे पश्चिमी मीडिया और भारतीय मीडिया का एक खास समूह लाशों और श्मशानों की सनसनीखेज खबरें परोस कर भारत की छवि खराब करने में लगा है।इसमें गैरभाजपा सियासी दल,एनजीओ,कथित बुद्धिजीवी वर्ग भी अपनी आहुति डाल रहे हैं। दरअसल जब भी भारत में कुछ अच्छा होने वाला होता है,देश और पश्चिमी देशों में एक ऐसा वर्ग है जो भ्रामक सूचनाओं का षड्यंत्र रचना शुरू कर देते हैं।जिससे अच्छा होने से पहले ही भय और अनिश्चितता का माहौल पैदा किया जा सके।इनफार्मेशन वारफेयर स्टडीज शोधकर्ता सुमित कुमार और लेखक एवं पालिसी कमेंटेटर शांतनु गुप्ता ने जो डेटा एकत्रित किये हैं ।उसे देखने से साफ होता है कि जबसे वेक्सीन आई है और देश कोरोना की महामारी से जैसे जैसे उबरने लगा देश और पश्चिमी मीडिया के एक खास वर्ग और सियासी लोगों ने दुष्प्रचार शुरू कर देश की छवि धूमिल करने और वेक्सीन के प्रति भ्रम फैलाने का काम शुरू कर दिया। इसमें कोई दो राय नहीं कि कोरोना की दूसरी लहर ने भारत को बुरी तरह प्रभावित किया है।इस दौरान भारत के मीडिया के एक खास हिस्से और पश्चिमी मीडिया ने जिस तरह से हाय तौबा मचाई उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत विरोधी एजेंडे की पोल खोल कर रख दी है। लेखक एवं पालिसी कमेंटेटर शांतनु गुप्ता के अनुसार पश्चिमी मीडिया भारत के बड़े बड़े शहरों में कोरोना मरीजों और होने वाली मौतों का बार बार उल्लेख करते हैं ताकि भारत की छवि धूमिल कर बाकी दुनिया को यह बताया जा सके कि भारत महामारी से सबसे ज्यादा प्रभावित है।हालांकि पश्चिमी मीडिया प्रति 10 लाख जनसंख्या पर न तो कोरोना मरीजों की बात करता है और न ही मृतकों का सही आंकड़ा बताता है।क्योंकि अगर इन आंकड़ों की बात करें तो भारत की स्थिति पश्चिमी देशों की तुलना में काफी बेहतर है। शांतनु गुप्ता के अनुसार पश्चिमी मीडिया भारत को लेकर तथ्यात्मक रिपोर्टिंग में विश्वास नहीं रखता है।उसकी कोशिश भारत सरकार के विरुद्ध एक विमर्श स्थापित करने की होती है। यही वजह है कि हमारे देश को लेकर ,वे लोग जो खबरें प्रकाशित करते हैं,उसमें से सिर्फ 20 फीसद समाचार ही तटस्थ रिपोर्टिंग पर आधारित होते हैं। पिछले 14 महीनों के दौरान भारत में कोरोना महामारी को लेकर पश्चिमी मीडिया की भूमिका का पता लगाने के लिए शांतनु गुप्ता ने 550 से ज्यादा लेखों का विश्लेषण किया।उन्होंने ब्रिटिश और अमेरिकी मीडिया से जुड़े शीर्ष समाचार पत्रों,71 चैनलों द्वारा चलाये गए 550 से ज्यादा लेखों का अध्ययन किया।जिसमें चौकाने वाले तथ्य सामने आए ।खास बात यह रही कि इन समाचारों का एक बड़ा हिस्सा न केवल लोगों में डर पैदा करता है बल्कि भ्रामक भी है।50 फीसद ऐसे समाचार अकेले बीबीसी ने प्रसारित किए।।शांतनु ने अपने अध्ययन के 14 महीनों को दो हिस्सों में बांटा है।एक हिस्सा संक्रमण की दूसरी लहर से पहले मार्च 2020 से मार्च 2021का था। वहीं दूसरा हिस्सा अप्रैल2021 से मई अंत तक का है।बीबीसी,द इकोनॉमिस्ट33,द गार्जियन,वाशिंगटन पोस्ट,न्यूयार्क टाइम्स और सीएनएन ने मार्च 2020 से अप्रैल 2021 के बीच 553 लेख लिखे और दिखाए।अकेले बीबीसी ने 275 समाचार दिखाए।न्यूयार्क टाइम्स ने जहां इस दौरान 91 आलेख लिखे,वहीं वाशिंगटन पोस्ट ने 69 समाचार और सम्पादकीय के माध्यम से भारत में कोरोना महामारी को विभत्स रूप से दिखाया।सिर्फ दो फीसद समाचारों में भारत सरकार के प्रयासों की सराहना की गई। जबकि 76 फीसद समाचारों की हैडिंग डराने वाली और दुर्भावना से प्रेरित थी। अप्रैल 2021 से पहले बीबीसी की 60 फीसद हैडिंग भ्रामक थी जबकि अप्रैल 2021 में इसकी संख्या 82 फीसद हो गई।वाशिंगटन पोस्ट और सीएनएन की बात करें तो अकेले अप्रैल 21 में ही दोनों ने 50 फीसद से ज्यादा आलेख में कोरोना महामारी को लेकर भारत सरकार की आलोचना की गई। इनफार्मेशन वारफेयर स्टडीज के शोधार्थी सुमित कुमार ने भारतीय मीडिया के कुछ वेबसाइट की सूची तैयार की।जिसमे इंडियन एक्सप्रेस ने 182 ,लोकसत्ता ने 172,नवभारत टाइम्स ने 236,हिंदुस्तान टाइम्स ने 123,टाइम्स ऑफ इंडिया ने 287,द वायर ने 78,स्क्रॉल ने 122, न्यूज़ लुंडरी ने 54,द हिन्दू ने 128 लेख वेक्सीन के विरोध में लिखे। जब इटली,फ्रांस,अमेरिका,ब्राजील और यूरोप के अन्य देशों में लाशों का अंबार लग रहा था ,कितने मीडिया समूह ऐसे थे जिन्होंने लाशों और कब्रिस्तानों की इतनी आक्रामक रिपोर्टिंग की।बिना किसी वैज्ञानिक अध्ययन के पता नहीं कहां से पश्चिमी और देश के एक खास हिस्से के मीडिया को यह मालूम पड़ गया कि दूसरी लहर कुम्भ मेले और पश्चिम बंगाल के चुनावों की वजह से भयावह हुई। दूसरे प्रदर्शनों की भीड़ से इन्हें संक्रमण के प्रसार का खतरा नहीं दिखता।सवाल ये है कि जहां कुम्भ का आयोजन नहीं हुआ और चुनाव भी नहीं थे वहां कोरोना के हालात भयावह क्यों हुए।महाराष्ट्र में तो चुनाव नहीं थे फिर वहां सबसे ज्यादा संक्रमण क्यों फैला और कुल मौतों का करीब 30 फीसद मौत वहां कैसे हुई।उत्तरी अमेरिका और यूरोप में 87 देश आते हैं।इनकी संयुक्त आबादी से ज्यादा भारत की आबादी है।लेकिन किसी भी मीडिया समूह ने इन देशों में हुई कुल मौतों की भारत में हुई मौतों से तुलना नहीं कि क्योंकि वहां भारत से कई गुना ज्यादा मौतें हुई हैं।जनस्वास्थ्य सुविधाओं में पिछड़े होने के बावजूद भारत ने अल्प संसाधनों के साथ मृत्यु दर को स्थिर रखा है।ये पहलू दिखाने के बजाए लगातार उत्तरप्रदेश को हाई लाइट किया जाता रहा ।गंगा में मिली लाशों और दफनाई गई लाशों को बारम्बार दिखाया गया।पर इसी तरह से 2015 में भी गंगा में लाशें मिली इसे छिपाया गया।क्या यह हैरानी की बात नहीं कि जो मीडिया गंगा में बहती लाशें दिखा यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को कटघरे में खड़ा करने की पुरजोर कोशिशें करता रहा,वह एक भी ऐसा व्यक्ति सामने लाने में विफल रहा जो यह दावा करता हो कि उसके परिजन की लाश उसे न देकर प्रशासन ने लाश को गंगा में बहा दिया।बार बार खबरें दिखाई और छापी गई कि मौतों के आंकड़े प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी छिपा झूठे आंकड़े बता रहे हैं।क्या मीडिया में ऐसी खबरें चलाने वाले नहीं जानते कि जो आंकड़े राज्य सरकारें देती हैं ,केंद्र सरकार वही आंकड़े जारी करती है। जिन लोगों ने वेक्सीन को लेकर भ्रम फैला टीकाकरण अभियान को विफल करने के प्रयास किये।क्यों वेक्सीन को भाजपा की बता इसे नहीं लगाने की अपील करने,अपने राज्य में एक वेक्सीन विशेष को नहीं लगाने देने और बाद में उसी को लगाने की होड़ करने वाले मुख्यमंत्रियों के चेहरे बेनकाब करने का काम क्या मीडिया ने किया? पूरा मई 18 से 44 आयु वर्ग को वेक्सीन कैसे लगे ,कौन लगाए की जद्दोजहद में निकल गया,इसके वास्तविक गुनहगार कौन हैं क्या मीडिया ने इसे उजागर करने की कोई कोशिश की? दरअसल अगले साल यूपी में चुनाव हैं और दिल्ली का रास्ता वाया यूपी होकर जाता है।इसलिए मोदी विरोधी मीडिया के खास हिस्से के निशाने पर यूपी है।कोरोना से निपटने को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन जिस मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सराहना कर रहा हो,जो मुख्य मंत्री कोरोना से पीड़ित हो जाने के बाद भी पहली और दूसरी लहर के दौरान अपने सूबे के अस्पतालों में जा जा कर हालात का जायजा ले रहा हो और कोरोना पीड़ितों से मिल उनका कुशलक्षेम पूछ रहा हो।जिस मुख्यमंत्री ने हालात को जिस तीव्र गति से काबू पाया हो उसकी सराहना करने के बजाए उस पर निशाने साधे जाएं तो मतलब साफ है।वार भले ही आदित्यनाथ योगी पर किये जा रहे हैं लेकिन असली निशाना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही हैं।मोदी विरोधी मीडिया जानता है कि यदि मोदी को रोकना है तो योगी को हराना होगा।इसीलिए मीडिया का यह तबका पत्रकारिता की नैतिकता को ताक पर रख यूपी की लाशें ही दिखा रहा है।उसे न महाराष्ट्र दिखता है न केरल।न तमिलनाडु और न पंजाब दिखता है और न ही राजस्थान,छतीसगढ़ दिखाई देता है ।जहां सबसे ज्यादा मौते हुई और कोरोना का प्रसार हुआ।क्योंकि वहां निशाना साधने के लिए भाजपा सरकारें नहीं है। कहा जाता है कि मीडिया समाज का आईना होता है।पर निष्पक्षता के नाम पर झूठ और भ्रम की पॉलिशिंग कर इस आईने को धुंधलाने का काम मीडिया का एक हिस्सा विशेष कर रहा है। यह वही मीडिया का हिस्सा है जो 2014 चुनाव पूर्व से गला फाड़ रहा है। मोदी आ गया तो ये हो जाएगा,वो हो जाएगा।भारत रसातल में चला जायेगा।साम्प्रदायिक सौहार्द बिगड़ जाएगा।कभी कहता है ,मोदी ने देश की अर्थ व्यवस्था को चौपट कर दिया तो कभी उन पर खून की दलाली के आरोप लगाए जाते हैं।जिन्हें मोदी को गिराने के लिए देश की छवि धूमिल करने से भी गुरेज नहीं है। लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ का एक स्तम्भ टूट चुका है।जरूरत इस बात की है कि इस प्रतिकूल हालात में देश के साथ खड़े हो इस टूट चुके स्तम्भ को आईना दिखा सही रास्ते पर लाया जाए। मदन अरोड़ा स्वतंत्र पत्रकार arora.madan50@gmail .com

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