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अफवाहों पर सवार मॉब लिंचिग
सुप्रीम कोर्ट की सख्त हिदायत और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चेतावनी के बाद भी देश में मॉब लिंचिंग की घटनायें रूकने का नाम नहीं ले रही हैं जो चिंता की बात है। 20 जुलाई की रात को अलवर जिले में हरियाणा के एक युवक की गो तस्करी के शक में पीट पीट कर हत्या कर दी गई। मॉब लिचिंग के पिछले दो माह में 17 मामले हो चुके हैं, जिनमें 23 लोगों को पीट-पीट कर मार डाला गया। देश के विभिन्न हिस्सों में संदेह के आधार पर अनेक लोगों को पीट- पीट कर मार डालने की घटनाओं में व्हाट्सएप के जरिये अफवाह फैलाने की बात समान रूप से सामने आई हैं। इससे पहले सांप्रदायिक तनाव की घटनाओं में सोशल मीडिया के दुरूपयोग की बातें सामने आ चुकी हैं। ऐसी घटनाओं में तेजी आने के बाद केंद्रीय सूचना प्रोद्योगिकी मंत्री रवि शंकर प्रशाद ने व्हाट्सएप को चेतावनी दी है कि वह जवाबदेही के साथ पेश आये और सुरक्षा के पहलू पर ध्यान दे। इसके जवाब में व्हाट्सएप ने आश्वस्त किया है कि वह कुछ नये फीचर ला रहा है, जिनसे पता चल सकेगा कि जो संदेश प्राप्त हुआ है, उसे भेजने वाले ने तैयार किया है या उसे सिर्फ फॉरवर्ड किया गया है। तकनीक का दुरूपयोग नया नहीं है, पर चूंकि व्हाट्सएप के जरिये किसी व्यक्ति या समूह को सीधे ही सूचनाएं, संदेश, तस्वीरें यहां तक कि वीडियो भी भेजे जा सकते हैं, तो इसका असर भी व्यापक होता है। इस माध्यम की एक बड़ी खामी यह भी है कि इसमें कोई व्यक्ति या पक्ष किसी दूसरे व्यक्ति या पक्ष के बारे में बिना उसका पक्ष जाने गलत जानकारियां प्रसारित कर सकता है। यह कितना खतरनाक हो सकता है, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि एक याचिका पर जल्द सुनवाई से इंकार करने पर व्हाट्सएप पर प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ ही अभियान छेड़ दिया गया। इस पर न्यायाधीश खानविलकर को कहना पड़ा कि फैसले किसी के पक्ष में आते हैं और किसी के खिलाफ, ऐसे में यदि जिसे राहत न मिले और वह प्रधान न्यायाधीश को निशाना बनाने लगे, तो यह न्यायपालिका के लिए अच्छा नहीं होगा। यदि झूठी खबरों और अफवाहों पर देश की सर्वोच्च अदालत को अपना पक्ष रखना पड़े, तो समझा जा सकता है कि मामला कितना गंभीर है। यह समझने की भी जरूरत है कि फेसबुक या व्हाट्सएप संदेश भेजने के सिर्फ माध्यम हैं, स्त्रोत नहीं। असल मामला स्त्रोत का है, जहां से ऐसी अफवाहें, फर्जी खबरें या सूचनाएं तैयार की जाती हैं और फैलाई जाती हैं। जाहिर है, व्हाट्सएप में सिर्फ तकनीकी बदलाव करने भर से काम नहीं चलेगा, इसके लिए व्यापक जागरूकता की भी जरूरत है। आखिर धुले की घटना में खुद पुलिस मान रही है कि गिरफ्तार किए गए अनेकों लोग तो बिना कुछ जाने ही दूसरे लोगों के साथ हिंसा में शामिल हो गये थे। सबसे हैरान करने वाली बात है कि आंध्र प्रदेश से लेकर त्रिपुरा, झारखंड से लेकर महाराष्ट्र तक, सभी ऐसी हत्याओं के पीछे न सिर्फ कारण एक ही थे बल्कि वॉट्सऐप से ऐसी अफवाह भी एक ही तरीके से फैलाई भी गई। मतलब इन सभी हत्याओं के पीछे मॉडस-ऑपरेंडी एक ही रहा। ऐसे में सबसे बड़ी चिंता इस बात को लेकर है कि वॉट्सऐप संदेश को अफवाह के रूप में देश के अलग-अलग हिस्सों में खास साजिश के तरह फैलाया जा रहा है। इसके लिए खास नेटवर्क है। हालांकि अभी तक जांच में कड़ी जुड़ने के संकेत नहीं मिले हैं। अब तक आए तमाम मर्डर में अफवाह का पैटर्न एक ही तरह का दिखा है। इलाके में एक वॉट्सऐप मेसेज फॉरवर्ड कर वायरल होता है, जिसमें कहा जाता है कि उनके इलाके में दूसरे प्रदेश से आया एक बच्चा चुराने वाला गिरोह सक्रिय है। वह बच्चों की चोरी कर उसके अंग को बेचता है। विपक्ष इसे लेकर लगातार मोदी सरकार पर हमलावर है और संसद में इस मुद्दे पर सरकार को घेर इसके खिलाफ सख्त कदम उठाये जाने की मांग भी की। अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने भी इन पर चिंता जताते हुए राज्य सरकारों से ऐसी घटनाओं को गंभीरता से लेने और रोकने की अपील की है। पर क्या इनको रोक पाना इतना आसान है। दरअसल मॉब लिंचिंग के इस तरह के मामलों को केवल कानून व्यवस्था के जरिये नहीं रोका जा सकता । इसके लिये जरूरत है लोगों को जागरूक कर यह समझाने की है कि अफवाहों के चलते वे कानून को अपने हाथ में न लें । किसी तरह का मामला सामने आने पर संदिग्ध लोगों को पकड़ कर पुलिस के हवाले करें, उनको पकड़ पीट पीट कर मारने से बचें। जरूरत इस बात की भी है कि सियासी पार्टियां अपने राजनीतिक फायदे के लिए इन्हें हवा देने से बचें। सोशल मीडिया पर सक्रिय लोग ऐसे मेसेज फॉरवर्ड करने से बचें। मदन अरोड़ा, स्वतंत्र पत्रकार

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