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देशभक्त कट्टरपंथी हैं और देश तोड़ने वाले प्रगतिशील?
आजादी आसानी से नहीं मिलती, इसे हासिल करना पड़ता है। हमारे पूर्वजों ने इसके लिए लड़ाई लड़ी और हमारी पीढ़ी को एक स्वतंत्र राष्ट्र के नागरिक होने का अधिकार दिलाया। इसके लिए हमारे नेताओं और लोगों ने महान बलिदान दिए। ऐसे में, हम सभी के लिए यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि देश की क्षेत्रीय अखंडता को अक्षुण्ण रखा जाए। संविधान ने हमें कुछ निश्चित मौलिक अधिकार और आजादी दी है। चूंकि ये संविधान के मूलभूत ढांचे का हिस्सा हैं, इसलिए उन्हें संशोधित या बदला नहीं जा सकता। संविधान के अनुच्छेद 13 से लेकर अनुच्छेद 32 तक हमें बोलने, जीने, स्वतंत्रता और समानता सरीखे अधिकारों और आजादी की गारंटी दी गई है। हमारा संविधान नैतिक और वैधानिक तौर पर पवित्र है। इस उदार संविधान की रक्षा करना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है, जिसने हमें ये अधिकार दिए हैं। भारतीय संदर्भ में अगर खतरे की बात करें तो खतरा बाहर से है, खासकर हमारे पश्चिमी पड़ोसी से। जम्मू और कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है लेकिन इस पड़ोसी ने कभी भी इस हकीकत को स्वीकार नहीं किया और उसने पारंपरिक युद्ध का भी दुस्साहस किया। इसमें नाकाम होने के बाद वह भारत को अस्थिर करने के लिए राज्य प्रायोजित आतंकवाद का सहारा ले रहा है। स्वाभाविक है कि भारत की स्थिरता और अखंडता को सुनिश्चित करने की भावना देशभक्ति कहलानी चाहिए। क्या इसे लेकर दूसरा भी मत है? हालांकि, हाल के समय में एक परेशान करने वाला ट्रेंड देखने को मिल रहा है। वे जो देश की क्षेत्रीय अखंडता की हर हाल में रक्षा करना चाहते हैं और इसकी राह में आनेवाली हर चुनौतियों को दूर करना चाहते हैं, उन्हें कुछ खास तबकों द्वारा दकियानूस और कट्टरपंथी की संज्ञा दी जा रही है, उन्हें दक्षिणपंथी के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है। इसके विपरीत, जो लोग भारत की क्षेत्रीय अखंडता को कमजोर करना चाहते हैं और भारत को बांटने के लिए हिंसा को औजार के तौर पर इस्तेमाल करते हैं, लगातार देश को नीचा दिखाने की बातें करते हैं; उन्हें ऐक्टिविस्ट, प्रगतिशील और उदारवादी के तौर पर बताया जा रहा है। इस तरह का ठप्पा लगाना भ्रामक और गलत है। इसे देश की मौन दिखने वाली अधिसंख्य आबादी ने भी खारिज किया है। मिसाल के तौर पर, अपने देश के 2 तरह के लोगों को देखिए। एक तबका उन आतंकियों का है जो जम्मू और कश्मीर राज्य में हिंसा करते हैं, राज्य को नष्ट करना चाहते हैं और बेगुनाहों की हत्या करते हैं। वे राज्य के आर्थिक विकास को कुंद करते हैं। एक ऐसा क्षेत्र जिसे सबसे ज्यादा प्रति व्यक्ति आय के लिए जाना जाना चाहिए था, जिसे अनगित बादशाहों और कवियों द्वारा धरती का स्वर्ग बताया गया, उसे ये उग्र कट्टरपंथी बर्बाद कर रहे हैं। अब दूसरे तबके को देखिए। ये तबका मध्य भारत के माओवादियों/नक्सलवादियों का है जो राज्य को उखाड़ फेंकना चाहते हैं और जो क्षेत्र के आदिवासियों को आर्थिक विकास से लगातार वंचित कर रहे हैं। भारत आदिवासियों को जो मौके उपलब्ध करा रहा है, ये उन मौकों से उन्हें वंचित कर रहे हैं। क्या संवैधानिक आजादी ऐसे तत्वों पर भी लागू हो सकती है? क्या हमें हिंसा का इस्तेमाल करके देश को टुकड़ों में तोड़ने की आजादी है? सोचिए, भारत देश को मिटाने का दिवास्वप्न पालने वाले इन नफरत फैलाने वाले समूहों ने क्या विकल्प रखा है? ये दोनों समूह जिस राजनीतिक विकल्प को पेश करते हैं, उसमें समानता, धार्मिक सहिष्णुता, बोलने और जीने की आजादी के लिए कोई जगह नहीं है। यह सिर्फ बंदूक का शासन है। एक समूह मजहबी तानाशाही वाले देश का निर्माण चाहता है तो दूसरा समूह विचारधारा पर आधारित तानाशाही चाहता है। ये अतिवादी समूह संविधान के दायरे में बातचीत तक के इच्छुक नहीं हैं। इस परेशान करने वाले ट्रेंड को कुछ निहित स्वार्थों के लिए आम जनमानस में फैलाया जा रहा है कि इन आतंकियों का जो लोग विरोध कर रहे हैं वे वास्तव में अलोकतांत्रिक और दक्षिणपंथी हैं। यह हकीकत से बहुत दूर है, सत्य से परे है। कैसी विडंबना है कि हमारे राष्ट्रवादियों के खून, पसीने और बलिदान से ही जो लोग सुरक्षित हैं, वे राष्ट्रवाद से पहचाने जाने पर खुद को शर्मिंदा मसहूस करते हैं। उन्हें खुद से पूछने की जरूरत है कि जिन समूहों का ये तीव्र बचाव करते हैं, अगर किसी दिन इन्होंने भारत देश को तोड़ दिया तो क्या तब भी उनके बोलने की करीब-करीब ‘निरपेक्ष आजादी’ अस्तित्व में रहेगी। अधिकारों और स्वतंत्रता की सुरक्षा सिर्फ वही कर सकते हैं, जिनकी संविधान में आस्था है। इसे खुद की सेवा में लगे इन समूहों द्वारा हासिल नहीं किया जा सकता जो भूमिगत हिंसक अभियानों के सार्वजनिक चेहरा हैं और इन हिंसक समूहों के बचाव में खड़े हो जाते हैं। उनके ‘गुमराह’ विरोध-प्रदर्शन आमतौर पर सशस्त्र बलों और दूसरे सुरक्षा बलों के खिलाफ होते हैं। अपने जीवन का ज्यादातर हिस्सा सशस्त्र बलों में गुजारने की वजह से, मैं उनके बलिदानों से गहराई से वाकिफ हूं। वे भारत की आजादी की रक्षा करते हैं, कई बार इसके लिए अपना जीवन कुर्बान कर देते हैं। यह निराशाजनक है कि हमारे सशस्त्र बल भारत को जिन विघटनकारी समूहों से रक्षा करते हैं उन्हीं समूहों को छद्म मानवाधिकारवादी संगठनों का समर्थन मिलता है। क्या इन संगठनों ने कभी लेफ्टिनेंट उमर फयाज, जम्मू कश्मीर पुलिस के कॉन्स्टेबल जाविद अहमद डार या औरंगजेब के अधिकारों के पक्ष में कुछ किया? इन तीनों, इनके जैसे पहले कई, का अपहरण किया गया और अफजल गुरु के चाहने वालों ने उनकी हत्या कर दी, जिन्हें फर्जी उदारवादी गौरवान्वित कर रहे हैं। कुछ राजनीतिक दलों ने इस फर्जी उदारवाद को चमकाने का फैसला किया और मोदी सरकार के कार्यकाल में लगातार आजादी पर खतरे की बातें कही गईं। उनका ‘डर बेचना’ पूरी तरह आधारहीन है और जिस तरह उन्होंने ढोंग किया, उस पर हंसी आती है। साल 1986 में यही कांग्रेस पार्टी राजीव गांधी के कार्यकाल में भारतीय डाकघर (संशोधन) बिल को पास कराना चाहती थी जिससे देश के नागरिकों के खत पढ़ने की स्वीकृति मिल जाती लेकिन तत्कालीन राष्ट्रपति का बेहद शुक्रिया कि उन्होंने इस बिल पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। एक और उदाहरण है जब कांग्रेस ने अभिव्यक्ति की आजादी को दबाने की कोशिश की और लोकसभा में ऐंटी डेफमेशन बिल पास किया गया। दरअसल, राजीव गांधी ने 4 सितंबर, 1988 को कहा था- हम भी बिल पढ़ने के लिए उन (प्रेस) की तरह होंगे। हमें पूरा विश्वास है कि इस बिल की काफी जरूरत है। मैं खुद यकीन करता हूं कि हम सही दिशा में जा रहे हैं।’ 15 सितंबर को उन्होंने फिर कहा- प्रेस को मुझे इस बात पर यकीन कराना होगा कि यह बिल बकवास है। प्रेस को अपने विचार रखने चाहिए। बिल में कुछ समस्याएं हो सकती हैं लेकिन प्रेस हमसे बात करने को राजी नहीं है।’ प्रेस ने हालांकि इस मामले में कड़ा रुख अपनाया और राजीव गांधी का पुरजोर विरोध किया जिसके बाद यह बिल अंतिम चरण में पास नहीं हो सका। उस समय प्रेस की आवाज दबाने की कोशिश मामूली से अंतर से नाकाम हो गई। यह मीडिया की सतर्कता और स्वतंत्रता के प्रति अपनी अविश्वसनीय प्रतिबद्धता ही थी, जिसने लगभग तीस साल पहले इसे बचाया था। आज हमारी स्वतंत्रता की रक्षा और हमारे सामाजिक तानेबाने को बचाने के लिए सतर्कता बेहद अहम है- न केवल मीडिया से, बल्कि हम सभी से। भारत जैसे विशाल, विविध, जटिल देश में आज लोगों या किसी समूह में डर पैदा करना या उन्हें एक मामूली से वॉट्सऐप मेसेज के जरिए हिंसा करने को भड़काना बेहद आसान है। केवल एक मेसेज फॉरवर्ड करना ही भीड़ के उन्माद के लिए काफी है। इन्सटेंट मेसेज, सोशल मीडिया और बिना जांचे-परखे अफवाहों को फॉरवर्ड करने के इस दौर में नागरिकों को भी राष्ट्रीय एकता की रक्षा और सामाजिक तानेबाने को बचाने के लिए अपनी जिम्मेदारी समझने की जरूरत है। अपने परिवार की रक्षा किसी बाहरी स्रोत के जरिए नहीं की जा सकती है। ठीक उसी तरह, अपने देश की रक्षा, समाज को सुरक्षित रखना भी किसी और की जिम्मेदारी नहीं हो सकती है। हमें हमेशा सतर्क रहने की जरूरत है। तभी हम उस आजादी की रक्षा कर सकते हैं, जो हमें प्रिय है। लेखक: कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौर (रिटायर्ड) केंद्रीय सूचना प्रसारण राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) एवं युवा मामले और खेल मंत्री

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