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आपातकाल के घुटन और बेचारगी के वे 21 महिने
आपातकाल में मीसा बंदी बनने का सौभाग्य मुझे नहीं मिला पर उस दौर को करीब से देखा ही नहीं उसके दंश को झेला भी। उस समय मैं एसजीएन लॉ कालेज श्री गंगानगर में एल एलबी प्रथम वर्ष का छात्र होने के साथ ही दैनिक सीमावर्ती नामक अखबार का पहला संपादक भी था। खालसा लॉ कालेज का हमारा प्रथम बैच था। यह इतफाक रहा कि जब 25जून1975 की रात को आपातकाल लगाया गया जिसकी घोषणा अगले दिन सुबह आठ बजे खुद इंदिरा गांधी ने की मैं लॉ प्रथम वर्ष का छात्र था और जब 21मार्च 1977 को आपातकाल खत्म करने की घोषणा की गयी तो उस समय मैं एलएलबी अंतिम वर्ष की परीक्षा दे रहा था।मेरा राष्ट्रीय पत्रकारिता से जुड़ाव 1980 से न्यूज एजेंसी हिन्दुस्तान समाचार से हुआ। उसके बाद न्यूज एजेंसी वार्ता, टाईम्स ऑफ इंडिया ग्रुप, दैनिक जागरण, दैनिक जनसता, दैनिक भास्कर और इंडिया टीवी से जुड़ा। मेरा सौभाग्य रहा कि सभी संस्थानों में शुरूवात जिला प्रभारी के रूप में हुई और जिले के कई दिग्गज पत्रकारों को इन संस्थाओं से जोडऩे का अवसर मिला। मेरी पुरानीपृष्टभूमि जिसे पत्रकारिता में आगाज करते समय पीछे छोड़ आया था आपातकाल में मेरा पीछा कर रही थी। मेरा सदैव मानना रहा है कि किसी विचार धारा से जुड़े रह कर निष्पक्ष पत्रकारिता नहीं की जा सकती। इसलिए मैंने अपने वैचारिक संगठनों और उनसे जुड़े लोगों से दूरी बना ली थी। मैं पत्रकारिता में आने से पहले गंगानगर में आरएसएस की प्रताप शाखा का मुख्य शिक्षक था। मेरी शाखा में राजस्थान के पीडब्ल्यूडी मंत्री रहे स्व. श्री ललित किशोर चतुर्वेदी, संघ के जोधपुर प्रांत देख रहे भ्राताश्री श्री कैलाश भसीन और राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार भाई श्री लोकपाल सेठी जैसी हस्तियां शाखा में आया करती थीं। श्रीगंगानगर जिले में तत्कालीन जिला प्रचारक भाई स्व. श्री अशोक काम्बोज के साथ मिलकर एबीवीपी की स्थापना की थी और मैं संगठन का संस्थापक जिला महामंत्री रहा। मेरे इसी जुड़ाव की वजह से जिसे मैं पत्रकारिता में आते समय नाता तोड़ चुका था आपातकाल के दौरान आई बी का एक अधिकारी मेरे पीछे पड़ा रहा। आते जाते बीच रास्ते में उक्त अधिकारी मेरे पुराने संपर्कों और जिला प्रचारक अशोक काम्बोज को लेकर पूछताछ करता और मीसा में बंद करने की धमकी देता। अशोक काम्बोज भूमिगत रह आपातकाल के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे। खुफिया एजेंसियों और पुलिस के लिए वे बड़ी चुनौती बने हुए थे। एजेंसियों का मानना था कि अशोक जी मुझसे संपर्क में है जो सही भी था। उनकी गिरफ्तारी के लिए ही आईबी लगातार मुझ पर दबाव बना और मीसा में बंद करने की धमकी दी जा रही थी पर मेरा एक ही जवाब होता कि मैं लम्बे समय से संघ और एबीवीपी से नाता तोड़ पत्रकारिता कर रहा हूं। मुझे न अशोक काम्बोज के बारे में कोई जानकारी है और न ही संघ की गतिविधियों के बारे में। संघ ही वह संगठन था जो आपातकाल के संघर्ष में मुख्य भूमिका निभा रहा था और इसके करीब एक लाख से ज्यादा कार्यकर्ता बंदी बना लिये गये थे। उधर अखबारों पर सेंसरशिप लगा दिये जाने से इनका प्रकाशन मुश्किल हो गया था। पहले जिलाधिकारी को अखबार दिखा उसकी अनुमति के बाद ही अखबार प्रकाशित करने का नियम बनाया गया और बाद सेल्फ सेंसरशिप लागू कर दी गयी। यानि पहले अखबार दिखाने की बाध्यता खत्म कर दी गई पर न इंदिरा गांधी संजय गांधी कांग्रेस के खिलाफ कुछ प्रकाशित किया जा सकता था और न ही सरकार और सरकारी तंत्र के खिलाफ कुछ छापा जा सकता था। जो थोड़ा सी प्रकाशित कर देता उसके कार्यालय पर ताला लगा दिया जाता था। जबरन नसबंदी का अभियान शुरू कर दिया गया। अधिकारियों को लक्ष्य दे दिये गये। कुवांरे युवकों की धड़पकड़ कर बड़े स्तर पर उनकी नसबंदी कर आंकड़े पूरे किये जाने लगे थे। लोगों में इतनी दहशत हो गई थी कि नसबंदी टीम की भनक मिलते ही लोग खेतोंऔर जंगलों में जाकर छिप जाते थे पर अखबार ऐसी खबरें छाप नहीं पाते थे। मैं देर रात तक अपने सहयोगी के साथ अपराधिक खबरें लाता और अखबार में कुछ मसाला डालता ताकि पाठक केवल सरकारी और दूसरी विज्ञप्ति नुमा उबाऊसमाचार ही नहीं कुछ दुसरे समाचार पढ़ सकें पर यह प्रशासन को नागवार गुजरता था बार बार मुझे ऐसे समाचार प्रकाशित नहीं करने की चेतावनियां दी जाती पर मैं उन्हें अनसुना कर देता क्योंकि मुझे लगता था कि ऐसी खबरें प्रकाशित कर मैं सेंसरशिप की गाईड लाईन का उल्लंघन नहीं कर रहा था। इसमें अखबार के मालिक स्व. श्री प्रदुमन भाटिया का मुझे पूरा सहयोग मिल रहा था और इस नैतिक सहयोग की वजह से जो मुझे बल मिल रहा था उसके चलते प्रशासन की मनाही के बावजूद मैं अपराधिक समाचारों का लगातार प्रकाशन करता रहा। आपातकाल के वे घुटन और बेचैनी के भयावह 21 महा सदैव स्मृतियों में बने रहेंगे।मदन अरोड़ा, स्वतंत्र पत्रकार

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