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Hanumangarh Live || man ki baat || गठबंधन का अंत नहीं, भाजपा के प्रचार की शुरुआत है यह
taaja khabar....अमेरिका ने भारत को हथियार क्षमता वाले गार्जियन ड्रोन देने की पेशकश की: सूत्र....अविश्वास प्रस्ताव: मोदी सरकार को मिलेगा विपक्ष पर निशाना साधने का मौका....संसद भवन पर हमले के लिए निकले हैं खालिस्तानी आतंकी: खुफिया इनपुट....धरती के इतिहास में वैज्ञानिकों ने खोजा 'मेघालय युग'....कठुआ केस में नया मोड़, पीड़िता के 'असल पिता' कोर्ट में होंगे पेश...निकाह हलाला: बरेली में ससुर पर रेप का केस, अप्राकृतिक सेक्‍स के लिए पति पर भी मुकदमा...मॉनसून सत्र: अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन नहीं करेगी शिवसेना?....देश के हर गांव को जाएगा कुंभ का न्योता, योगी पत्र लिख मुख्यमंत्रियों को बुलाएंगे....क्या अविश्वास प्रस्ताव के मुद्दे पर मोदी सरकार के दांव में फंस गया विपक्ष?...लखनऊ में बड़े कारोबारी के यहां छापे, 89 किलो सोना-चांदी बरामद, 8 करोड़ कैश भी...
गठबंधन का अंत नहीं, भाजपा के प्रचार की शुरुआत है यह
जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ गठबंधन तोड़कर भारतीय जनता पार्टी ने 2019 के लिए चुनाव प्रचार का तेवर तय कर दिया है. भाजपा अच्छे से जानती है कि अल्पसंख्यकों का, खासकर मुसलमानों का वोट उसके हिस्से में आने वाला नहीं है. ऐसे में कबतक कश्मीर में सरकार के बहाने वो अपने गले को बांधे रखती. मुस्लिम बाहुल्य कश्मीर में सरकार में शामिल रहते हुए भाजपा को अक्सर भीतर और बाहर से हमले झेलने पड़ते थे. पीडीपी से नाता तोड़कर भाजपा ने उस मजबूरी से मुक्ति पा ली है. यहां से दो चीज़ें एकदम साफ दिखाई दे रही हैं. पहली यह कि भाजपा को इस बात का आभास है कि केवल विकास के नारे पर 2019 में वोट मिलने वाला नहीं है. दूसरा यह कि क्षेत्रीय दलों के वोट बैंकों को तोड़ने के लिए जातियों को हिंदू पहचान के बुखार तक लाना पड़ेगा. यानी ध्रुवीकरण के ज़रिए ही अपेक्षित वोटों को सुनिश्चित किया जा सकता है. लेकिन कश्मीर में सरकार में रहते हुए हिंदू हित और हिंदू अस्मिता की बात कर पाना आसान नहीं रहता. लिहाजा भाजपा ने बड़े लाभ के लिए छोटे नुकसान को उठाना ज़्यादा फायदेमंद समझा. इसकी पुष्टि इस बात से भी हो जाती है कि इस फैसले के लिए भाजपा ने न तो राज्य में पिछले दिनों अपने तेवर बदले, न विरोध जताया, न महबूबा मुफ्ती को इसकी आहट लगने दी और न ही राज्य स्तर पर भाजपा के पास रूठने के लिए कोई बड़े तर्क हैं. अचानक ही सुरक्षा सलाहकार से परामर्श लेकर जनादेश को राज्यपाल शासन के हवाले कर दिया गया. ऐसा करने वाली यह वही भाजपा है जिसने महीनों मान मुनौवल के बाद महबूबा को गठबंधन के लिए राजी किया था और राज्य में भाजपा-पीडीपी गठबंधन की सरकार बनी थी. तीन साल तक भाजपा इस गठबंधन के साथ सत्ता में बनी रही. विरोध के स्वर कुछ भीतर भी थे और कई बाहर भी. लेकिन भाजपा ने सत्ता में बने रहना मुनासिब समझा और धीरे-धीरे जम्मू क्षेत्र में अपने वर्चस्व और सांगठनिक प्रभाव को और व्यापक करने का काम जारी रखा. जब 2019 के चुनाव की दस्तक पार्टी को अपने दरवाजे पर सुनाई देने लगी तो उसने इस गठबंधन को हवन कुंड में डालकर कश्मीरियों और अल्पसंख्यकों के प्रति अपनी नरमी की मजबूरी से मुक्ति पा ली. अब भाजपा खुलकर खेलने के लिए तैयार है. भाजपा की भाषा आने वाले दिनों में बदली हुई सुनाई दे सकती है. दूसरा बड़ा लाभ यह है कि लगातार सीमा पार से गोलीबारी और कश्मीर में बिगड़ते हालात के लिए घेरी जा रही सरकार अब राज्यपाल शासन के बहाने सेना, अर्धसैनिक बलों और विशेषाधिकार कानूनों का मनमाने ढंग से इस्तेमाल कर सकेगी. भाजपा ने पीडीपी के साथ गठबंधन तोड़कर तुष्टिकरण का पर्दा उतार फेंका है. अब उसे प्रचार में कूदना है और ध्रुवीकरण की धुरी पर आधारित प्रचार के लिए महबूबा से मुक्ति भाजपा के लिए एक बड़ी राहत है. इस तरह भाजपा ने चुनाव प्रचार के अपने पैंतरे और भाषा की बानगी दे दी है. ऐसे समय में जबकि बाकी विपक्षी दल सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर भाजपा से जूझते नजर आ रहे हैं, पार्टी हार्ड हिंदुत्व के ज़रिए विपक्ष से भी निपटेगी और जाति आधारित गठबंधनों से भी. भाजपा के लिए गले की फांस बन रहा था पीडीपी का साथ, इसलिए तोड़ा नाता! जम्मू-कश्मीर में एक बार फिर राजनीतिक हालात उफान पर हैं. भारतीय जनता पार्टी ने महबूबा मुफ्ती सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया, इसी के साथ राज्य में राज्यपाल शासन लागू हो गया. कश्मीर में पीडीपी का साथ भारतीय जनता पार्टी के लिए लगातार गले की फांस बनता जा रहा था. कश्मीर के हालातों को लेकर लगातार बीजेपी निशाने पर आ रही थी, ऐसे में बीजेपी के सामने इसके अलावा कोई चारा नहीं बचता था. सरकार बनने के बाद से ही पीडीपी ने अलगाववादियों और पत्थरबाजों की तरफ नरम रुख अपनाया, जिसने कई बार बीजेपी को बैकफुट पर धकेला महबूबा ने अपना अधिकतर फोकस घाटी पर ही रखा, ऐसे में जम्मू-लद्दाख के साथ लगातार भेदभाव हो रहा था. महबूबा अपना किला तो मजबूत कर रही थीं, लेकिन बीजेपी लगातार अपने इलाके में पिछड़ती जा रही थी, 2019 लोकसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर ये संदेश देना चाहती है कि वह अभी भी आतंकवादियों के खिलाफ सख्त है. इसके लिए पीडीपी का साथ छोड़ना जरूरी था. लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव कराने के लिए बीजेपी ने गिराई जम्मू-कश्मीर सरकार? जम्मू-कश्मीर में बीजेपी के सरकार से समर्थन वापस लेने की टाइमिंग को लेकर भी काफी चर्चा हो रही है। दरअसल, बीजेपी ने यह सुनिश्चित करते हुए सरकार से समर्थन वापस लिया कि जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनाव से पहले नहीं होंगे। जम्मू-कश्मीर में 6 महीने राज्यपाल शासन का प्रावधान है। बीजेपी नेतृत्व चाहता है कि ये 6 महीने ऐसे ही निकाले जाएं। इसके पीछे रणनीति यह है कि ये 6 महीने दिसंबर तक पूरे होंगे। इसके बाद लोकसभा चुनाव के लिए मंच सज जाएगा, ऐसे में जम्मू-कश्मीर के चुनाव भी लोकसभा के साथ ही हो सकते हैं। लोकसभा चुनाव की तैयारी 2019 के मार्च में शुरू होने की संभावना है। अब आगे क्या राज्यपाल शासन लागू होने से आतंक के खिलाफ सेना को होगी खुली छूट जम्मू-कश्मीर में रमजान सीजफायर खत्म करने और गठबंधन राजनीति की बाध्यता खत्म होने के बाद राज्यपाल शासन लागू होने से सुरक्षा बलों के पास आतंकियों के खिलाफ मोर्चा खोलने की पूरी छूट होगी। इसके अलावा जम्मू-कश्मीर पुलिस पर भी स्थानीय नेताओं के दबाव में अलगाववादियों के प्रति नरम रवैया अपनाने का दबाव होता है, ऐसे में स्थानीय पुलिस भी स्वतंत्रता के साथ काम कर सकती है। साथ ही सुरक्षा बल और पुलिस इंटेलिजेंस इनपुट्स साझा कर बेहतर ढंग से काम करेंगे। यह जानकारी टाइम्स ऑफ इंडिया को केंद्र सरकार के सीनियर अधिकारी ने दी है। CASO, SADO फिर से लागू सेना को उम्मीद है कि स्थानीय नेताओं का दबाव खत्म होने से स्थानीय पुलिस ज्यादा सक्रियता के साथ आतंक विरोधी गतिविधि में सेना का साथ दे सकती है। सेना ने अपने अति सक्रिया CASO (कार्डन ऐंड सर्च) और SADO (सीक ऐंड डेस्ट्रॉय) ऑपरेशन को जम्मू कश्मीर में फिर से लागू कर दिया है। सुरक्षा बलों को उम्मीद है कि अब इंटेलिजेंस इनपुट्स बेहतर तरीके से साझा हो सकेंगे। इसके अलावा घनी आबादी वाली जगहों पर सुरक्षा बलों की सक्रियता बढ़ाई जाएगी। अक्रामक ऑफिसर आएंगे आगे 'कुछ राजनेताओं की तरफ से पत्थरबाजों, अलगाववादियों और कट्टरपंथियों को समर्थन मिलता है। कोई राजनीतिक दबाव न होने से सुरक्षा बल ज्यादा अक्रामकता से काम करेंगे।' माना जा रहा है कि अति संवेदनशील वाली जगहों पर 'समर्थ' ब्यूरोक्रेट्स और सुप्रींटेंडेंट्स ऑफ पुलिस की तैनाती की जाएगी, ताकि वे बगैर दबाव में आए आतंक विरोधी गतिविधियों का नेतृत्व कर सकें। अधिकारी ने बताया, 'फिलहाल कई ऐसे काबिल ऑफिसर हैं, जो साइड लाइन कर दिए गए हैं। आतंकी बुराहन वानी की मौत के बाद घाटी में स्थिति और खराब हो गई थी। ऐसे में अब उन ऑफिसरों को आगे लाकर आतंकियों को काउंटर करने की रणनीति पर काम हो सकता है।' पत्थरबाजों पर और सख्ती सेना के ऑपरेशंस के अलावा दक्षिण कश्मीर में पत्थरबाजों पर बड़ी कार्रवाई भी की जा सकती है। अगर अतीत पर गौर करें तो यह देखने को मिलता है कि 2016 की हिंसा के दौरान कश्मीर में बीजेपी-पीडीपी सरकार के दौरान 9 हजार से अधिक पत्थरबाजों पर केस दर्ज हुए थे। गिरफ्तारी के कुछ महीनों बाद महबूबा सरकार ने सैकड़ों पत्थरबाजों पर से मुकदमे वापस ले लिए थे। सरकार का कहना था कि युवाओं को मुख्यधारा में लाने के लिए यह कदम उठाए गए हैं, जबकि विपक्षी पार्टियों का आरोप था कि महबूबा ने श्रीनगर और अनंतनाग सीटों पर होने वाले उपचुनाव के मद्देनजर लोगों के समर्थन के लिए ऐसा किया था। इस फैसले के बाद बीजेपी सरकार को कई मोर्चों पर विरोध और आलोचना का सामना करना पड़ा था। ऐसे में अब यदि राज्यपाल शासन की स्थितियां बनती हैं तो फिलहाल 2019 के चुनाव तक पत्थरबाजों पर कार्रवाई पर कोई सियासी दखलंदाजी नहीं होगी। इसके साथ-साथ ऐसे फैसले की स्थिति में देशभर में बीजेपी को इससे फायदा भी मिल सकेगा। बीजेपी समर्थकों को राष्ट्रवाद की अतिरिक्त खुराक फंड के बंटवारे और गवर्नेंस के दूसरे मामलों में जम्मू और लद्दाख क्षेत्र के साथ सौतेला व्यवहार हो रहा था। देशभर के बीजेपी काडर के लिए जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक घटनाक्रम के खास मायने हैं। बीजेपी और पीडीपी विचारधारा के मोर्चे पर एक दूसरे से एकदम अलग हैं। गठबंधन टूटने और सेना की कार्रवाई तेज होने से पार्टी समर्थकों को राष्ट्रवाद की अतिरिक्त खुराक मिलने की संभावना है। इससे अगले साल के लोकसभा चुनाव सहित आगामी विधानसभा चुनावों में बीजेपी को बड़ा फायदा हो सकता है। बीजेपी की वैचारिक संरक्षक आरएसएस भी कश्मीर में पीडीपी से गठबंधन तोड़ने और सख्ती करने के पक्ष में थी। बीजेपी इस मसले से निपटने के तौर-तरीकों को स्थानीय और अंतराष्ट्रीय मंच पर सही तरीके से पेश करने की पूरी कोशिश की है। मदन अरोड़ा,स्वतंत्र पत्रकार

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