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न्यायपालिका की साख और सियासत
उपराष्ट्रपति वैंकया नायडू ने कांग्रेस सहित सात विपक्षी दलों के सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा को हटाये जाने संबंधी प्रस्ताव को खारिज कर दिया है, जो कि अप्रत्याशित नहीं है। महाभियोग के प्रस्ताव को खारिज करने से पहले उन्होंने इसको लेकर अटॉर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल,संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप, पूर्व विधि सचिव पी.के. मल्होत्रा सहित संविधानविदों और कानूनी विशेषज्ञों के साथ प्रस्ताव पर विचार-विमर्श करने के बाद ये फैसला लिया । कांग्रेस के नेतृत्व में सात दलों ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव उपराष्ट्रपति को दिया था। यह एक अभूतपूर्व कदम था। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के खिलाफ कभी भी महाभियोग का प्रस्ताव नहीं आया था। कानून के कई जानकार इसे अभूतपूर्व कदम बता रहे थे। वरिष्ठ वकील फाली नरीमन ने इसे काला दिन बताया था। देश के अनेक शीर्ष संविधानविदों और पूर्व न्यायमूर्तियों ने पहले ही इस प्रस्ताव की वैधता पर सवाल खड़े किये थे। इसके बावजूद शीर्ष न्यायपालिका अभूतपूर्वस संकट से गुजर रही है, क्योंकि देश के न्यायिक इतिहास में पहली बार चीफ जस्टिस को हटाने के लिए ऐसी मुहिम चलाई गई है। कांग्रेस ने अब सुप्रीम कोर्ट में जाने की घोषणा की है,जिससे उसकी बेताबी ही झलकती है, जबकि इस प्रस्ताव में पार्टी के भीतर तो विभाजन था ही, तृणमूल कांग्रेस ,बीजेउी, द्रमूक और राजद जैसे विपक्षी दलों ने भी खुद को इससे अलग रखा है। सच्चाई यह भी है कि यह प्रस्ताव संसद मेंआ भी जाता, तो इसका पारित होना संभव नहीं था,क्योंकि इसके पक्ष में सांसदों की पर्याप्त संख्या नहीं है। फिर ऐसे में इस प्रस्ताव के जरिये कांग्रेस और दूसरे दल आखिर क्या दिखाना चाहते हैं?विपक्ष ने जो आरोप लगाये हैं, वे महाभियोग के स्तर पर खरे नहीं उतरते, जिसके चलते उपराष्ट्रपति वैंकया नायडू ने प्रस्ताव को खारिज किया। आरोप अकाट्य सबूतों के साथ होने चाहिए,पर सांसदों ने अपने प्रस्ताव में हो सकता है, ऐसा प्रतीत होता है के साथ प्रस्ताव में आरोप लगाये हैं जिन्हें निराधार माना गया।। जो आरोप लगाये गये हैं उनमें से एक मेडिकल कॉलेज के घोटाले से संबंधित है और एक मामला तब कि जमीन खरीद से संबंधित है, जब न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा जज भी नहीं बने थे। प्रस्ताव को लेकर इस लिए भी सवाल उठ रहे हैं क्योंकि इनमें कई 32 साल पुराने हैं और इन्हें कांग्रेस ने पूर्व में कभी भी नहीं उठाया। न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा को कांग्रेस ने ही जज बनाया और वे कांग्रेस सरकार के दौरान ही सुप्रीम कोर्ट के भी जज बने। चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोग का सीधा मतलब तो न्यायपालिका की निष्पक्षता पर संदेह करने से है, जोकि और भी खतरनाक है, क्योंकि अब भी लोगों का अगर किसी संस्था पर सर्वाधिक विश्वास कायम है, तो वह न्यायपालिका ही है। मगर दुर्भाग्य से कुछ दिनों पहले ही सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों ने बाकायदा प्रेस कांफ्रेस कर चीफ जस्टिस के मामलों को आवंटित करने के अधिकार पर सवाल खड़े किये थे, जिससे यह संदेश गया कि न्यायपालिका में सब कुछ ठीकठाक नहीं है। इससे उन जजों के साथ ही संपूर्ण न्यायपालिका को ही सियासी चश्में से देखा जाने लगा है, फिर चाहे कितनी भी सफाई क्यों न दी जाये। यह वाकई चिंता की बात है कि न्यायपालिका को राजनैतिक टकराव का मुद्दा बना दिया गया है, जिसमें कांग्रेस और भाजपा के बीच यह बताने की होड़ मच गई है कि किसने न्यायपालिका का कितना दुरूपयोग किया। निस्संदेह न्यायपालिका के भीतर भी विसंगतियां हैं, लेकिन उन्हें दूर करने की जिम्मेदारी उसी पर छोड़ दी जानी चाहिए, यही संवैधानिक संस्थाओं को निष्पक्ष बनाये रखने का तकाजा है,पर दुर्भाग्य से राजनैतिक दल देश की सर्वोच्च कोर्ट को अपने तरीके से हांकने की कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस के महाभियोग को जज लोया और कोर्ट में चल रहे राम मंदिर के मामले की सुनवाई को टालने की कवायद के रूप में देखा जा रहा है। मदन अरोड़ा स्वतंत्र पत्रकार

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