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लोकसभा उपचुनाव के नतीजों का संदेश
राजनीति में एक वर्ष का समय काफी होता है। लेकिन 2019 के आम चुनाव से पूर्व उतरप्रदेश और बिहार की तीन लोकसभा सीटों पर हुए उपचुनावों में भाजपा को मिली हार पार्टी के लिए बड़ा झटका है, गोरखपुर और फूलपुर सीटों के नतीजे इस मायने में अहम हैं क्योंकि ये सीटें योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री और केशवप्रसाद मौर्य के उपमुख्यमंत्री बनने के बाद खाली हुई थी। योगी खुद पांच बार से गोरखपुर से चुनाव जीतते आ रहे थे और 1991 से वहां भाजपा का कब्जा रहा है। नतीजे बता रहे हैं कि भाजपा के चुनावी प्रबंधकों ने सपा को मिले बसपा के समर्थन को कम आंका और यह समझ नहीं सके कि यूपी की इन दो बड़ी पार्टियों का सांझा मत भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं। नतीजे बताते हैं कि सपा अपने उम्मीदवारों के पक्ष में बसपा के मतों का स्थानांतरण करवान में सफल रही है। नतीजों में यह संदेश भी साफ है कि कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं की भावनाओं का निरादर कर उम्मीदार थोप चुनाव कभी भी नहीं जीता जा सकता। भाजपा हाईकमान ने योगी आदित्यनाथ और केशवप्रसाद मौर्य से बाहर जाकर उम्मीदवार थोपा और कार्यकर्ताओं ने मतदान में हिस्सा नहीं लेकर हाईकमान को आईना दिखा दिया। आमतौर पर माना जाता है कि ज्यादा मतदान सता विरोधी रूख को दिखाता है लेकिन इन उपचुनाव में यह मिथक भी धरासाई हो गया। बिहार में राजद ने तसलीमुद्दीन के निधन से रिक्त हुई अपने कब्जे वाली अररिया लोकसभा सीट पर फिर से कब्जा किया है और जहानाबाद में भी अपना कब्जा बरकरार रखने में कामयाब हुई है। यह बिहार के राजनीतिक गणित की पुनरावृति तो है ही भाजपा के साथ ही नीतीश कुमार के लिए भी झटका है क्योंकि राजद से रिश्ता तोडक़र उन्होंने भाजपा का दामन थामा था। इन चुनावों में कांग्रेस की स्थिति कोई अच्छी नहीं रही। यूपी में कांग्रेस के उम्मीदवारों की जमानत जब्त होने से पार्टी के 2019 में सता में आने की उम्मीदों पर पूरी तरह से पानी फिरता लग रहा है। हालांकि उपचुनावों के आधार पर राष्ट्रीय परिदृश्य के बारे में कोई राय बनाना आसान नहीं है, लेकिन इन नतीजों के दो स्पष्ट संदेश हैं। पहला यह कि अब गैर भाजपा विपक्ष को एक जुट करने की मुहिम तेज हो सकती है, जैसा कि ममता बनर्जी से लेकर चन्द्र बाबू नायडू और अखिलेश की प्रतिक्रियाओं में देखा जा सकता है। दूसरा,इन नतीजों को प्रधानमंत्री मोदी की छवि से जोड़ कर भले ही न देखा जाये, लेकिन ये भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की चुनावी रणनीति और आदित्यनाथ सरकार की छवि पर सवाल तो खड़े करते ही हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं , वहां उसे सता विरोधी रूझान का सामना करना पड़ रहा है। यह चुनावी हार पार्टी के अति आत्मविश्वास का खामियाजा भी है।नतीजों ने अटलबिहारी वाजपेयी की कविता टूटता तिलिस्म आज सच में भय खाता हूं की याद दिला दी है। नतीजों से भाजपा की रणनीति और नेताओं का तिलिस्म टूट गया है। भाजपा के बूथ मैनेजमेंट व जनता से लगातार संवाद टूट गया लगता है, जिसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ा है। जाहिर है ये नतीजे भाजपा संगठन व सरकार दोनो के लिए कई सबक और संदेश लेकर आये हैं। भाजपा के रणनीतिकार अब गंभीरता से विचार कर रहे हैं कि एक साल पहले तक जिन मतदाताओं ने समर्थन दिया वे उससे छिटक कर उसके खिलाफ क्यों चले गये। सपा को मिली जीत आगे भी विरोधियों को मिलकर भाजपा के खिलाफ लडऩे की ताकत देगी। इससे राजस्थान के लिए भी साफ संदेश है सुधरो या फिर सता से बाहर जाने के लिए तैयार रहो। मदन अरोड़ा, स्वतंत्र पत्रकार

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