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राफेल पर राहुल के बाण और सौदेका सच
आगामी लोकसभा और इस साल होनेजा रहे कर्नाटक सहित आठ राज्य विधान सभाओं के चुनाव राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस पार्टी केअस्तित्व को बचाने और प्रतिष्ठा का सवाल बन गये हैं। लिहाजा राहुल और पार्टी हर उस चीज पर सवाल खड़े कर रही है जिससे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को घेरा जा सके। बिना इस बात को समझे कि देश के सामने आरोपोंकी सच्चाई सामने आने पर इसका खामियाजा उन्हें ही भुगतना होगा । शायद राहुल इस बात को नहीं समझ पा रहेहैं कि न तोसच्चाई ज्यादा दिनों तक छिपाई जा सकती है और न ही पुख्ता सबूत के जनता को बरगलाया जा सकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर पीएनबी केफर्जीवाड़े और राफेल सौदे को लेकर सवाल उठाये जा रहे हैं। राहुल गांधी इनमें सीधे प्रधानमंत्री की संलिप्तता का आरोप लगा जवाब मांग रहे हैं। राहुल जानते हैं की अपनी आदत के अनुसार मोदी उनके सवालों का जवाब ट्वीटर या सभाओं में नहीं देंगे। पीएनबी फर्जीवाड़ेको लेकर सीबीआई न्यायालय में मुख्य आरोपी गोकुल शेट्टी के प्रारम्भिक ब्यान पेश कर चुकी है जिसमें फर्जीवाड़े केयूपीए के शासनकाल के दौरान साल 2008 में शुरू होने की बात कही गईहै। इस फर्जीवाड़े का बड़ा हिस्सा यूपीए के शासन काल में अंजाम दिए जाने के बाद इसका ठीकरा अगर केवल मोदी पर फोड़ा जाएगा तोदेश उस पर कैसे विश्वास करेगा। वैसे भी यह किसी सरकार का फर्जीवाड़ा न होकर बैंक अधिकारियों, नीरव मोदी और मेहुल चौकसी का फर्जीवाड़ा हैऔर बैंक के भ्रष्ट अधिकारी ऐसे फर्जीवाड़ेदेश की आजादी के बाद पहले प्रधानमंत्री पं.जवाहरलाल नेहरू के समय से करते आ रहे हैं। राहुल राफेल सौदे कोलेकर सवाल उठा रहे हैं। मैं कोई रक्षा विशेषज्ञ नहीं हूंलेकिन मेरा मानना हैकि यह केवल मात्र भाजपा द्वारा यूपीए शासन के दौरान हुए घोटालोंके आरोप का कांग्रेस का जवाब हैऔर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को घेरने का एक असफल प्रयास है। जो लोग राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्देपर नजर रखते हैं, वे जानते हैंकि यूपीए के दस साल के शासन के दौरान सैन्य क्षमताओं के विकास में ठहराव आ गया था। यूपीए शासन के दौरान एके एंटनी के अधीन रक्षा मंत्रालय विभिन्न रक्षा प्रस्तावों पर कुंडली मार कर बैठा रहा और उसने किसी भी रक्षा सौदेको मंजूरी नहीं दी। जिसका एकमात्र कारण एंटनी का अपनी साफ सुथरी छवि को लेकर फिक्रमंद होना था। खरीद के हर सौदे पर बोफोर्स का भूत मंडराने लगता था। गोला बारूद केभंडार न्यूनतम स्तर पर पहुंच गऐ थेऔर जरूरी साजो सम्मान की कमी हो गईथी। रक्षा तैयारी की कमजोर स्थिति ने लगभग हर क्षेत्र में सैन्य बलों को अत्यंत कमजोर स्थिति में पहुंचा दिया था। जाने माने रक्षा विशेषज्ञ रिटायर्ड मेजर जनरल हर्ष कक्कडक़े अनुसार यदि दो मोर्चों पर युद्ध की नौबत आती ,तो वायुसेना के लिए मुश्किल हो सकती थी। तौपखानेने बोफोर्स के बाद कोई और सौदा नहीं देखा जबकि एक नौसेना प्रमुख ने खराब उपकरणों,बदइंतजामी और कईदुर्घटनाओं,जिनमें कई मौतें तक हो गई, के बाद इस्तीफा देदिया। जनरल कक्कड़ के अनुसार तत्कालीन थल सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह को सैन्यबल की कमियों को लेकर सरकार को खुला पत्र लिखना पड़ा। मगर सरकार बेफिक्र सोती रही और सिर्फ इस बात की चिंता करती रही कि उसकी बची खुची प्रतिष्ठा पर कोई और आंच न आए। जनरल कक्कड़ के अनुसार ऐसे हालात में मौजूदा सरकार के लिए जरूरी होगया कि वह सैन्य बलों की जिन क्षमताओंऔर कौशल की जरूरत है,उन पर ध्यान दे। इनमें राफेल सौदा सबसे पहला है, जिसे सरकार ने मंजूरी दी है। जनरल कक्कड़ राफेल सौदे को लेकर राहुल गांधी और कांग्रेस के अन्य नेताओं की ओर से लगाए जा रहे आरोपों सेबिलकुल भी इतेफाक नहीं रखते हुए कहते हैं कि इन आरोपों को लगाने से पूर्व तथ्यों पर परखा जाना जरूरी है। जनरल कक्कड़ के अनुसार वे सेना के पूर्व अधिकारी हैं और किसी राजनीतिक दल की ओर उनका कोई झुकाव नहीं है,और इसलिए मैं निष्पक्ष रूप से इस सौदे को देख रहा हूं। वायुसेना नेयूपीए सरकार से126 विमानोंकी जरूरत बताई थी,ताकि आने वाले वर्षों मेंपुराने पड़ चुके विमानों की जगह उनकी भरपाई हो सके और उसके पास किसी भी दो मोर्चोंवाले युद्ध के लिए आवश्यक विमान मौजूद हों। जनरल कक्कड़ के अनुसार विमानोंकीे खरीद से संबंधित प्रस्ताव 2007 में जारी किया गया। उसके बाद से 2011 तक वायु सेना नेविमान के चयन के लिए कई चरणों मेंपरीक्षण किये। अंत में राफेल और यूरोफाइटर टाइकून को छांटा गया। 2012 मेंराफेल को एल1बिडर घोषित किया गया,जिसका मतलब था कि इसकी कीमत सबसे कम थी। यूरोफाइटर नेइसकेबाद डिस्काउंट की पेशकश की,मगर अब उसका कोई मतलब नहीं था। 2012- 2014के दौरान जब यूपीए शासन था,ठेके से संबंधित बातचीत अधूरी रही, इसके पीछे सबसे बड़ा कारण था कि प्रस्ताव की शर्तों और कीमत पर सहमति नहींबन पा रही थी। इससेऐसा लगा कि यूपीए सरकार इस सौदे के प्रति गंभीर नहीं है। जनरल कक्कड़ के अनुसार विमान की कीमत कभी भी बुनयादी कीमत नहीं होती,जैसा कि कांग्रेस कह रही है। कीमत वैमानिकी,अस्त्र-शस्त्र,रखरखाव और साजो-सामान पर निर्भर करती हैऔर इन्हें तय करने का एकमात्र अधिकार वायुसेना के पास होता है। ये सारे पहलू गोपनीय होते हैंऔर इन्हें सार्वजनिक किए जाने का असर देश की सुरक्षा पर पड़ सकता है। इसलिए इन्हें दोनों देशों के हस्ताक्षर से नॉन डिस्क्लोजर क्लास यानी सार्वजनिक नहीं किए जाने के प्रावधान के तहत रखा जाता है। जनरल कक्कड़ के अनुसार जो दूसरा मुद्दा उठाया जा रहा है, वह हैप्रौद्योगिकी का स्थानांतरण टीओटी। इसका आशय प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण से है, ताकि भारत में उत्पादन की क्षमता तैयार हो सके। यूपीए शासन काल के दौरान दोंनो देशों के बीच शुरूआती बातचीत में टीओटी प्रमुख बाधा बना हुआ था। राफेल का निर्माण करने वाली कम्पनी डसॉल्ट एविएशन कंपनी ने एचएएल हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड का निरीक्षण किया था,जहां 108 विमानों का निर्माण होना था लेकिन वह कार्यशैली और गुणवता से संतुष्ट नहीं थी और उसने गुणवता नियंत्रण की जिम्मेदारी लेनेमें असमर्थता जताई। इसके अलावा डसॉल्ट ने भारत में 108 विमानों की एसेंबलिंग के लिए तीन करोड़ मानव घंटे को पर्याप्त बताया,जबकि एचएएल ने इसका दोगुना वक्त चाहा था,जिससे विमान की लागत बढ़ गई। टीओटी पर कभी बात ही नहीं हुई,सिर्फ भारत में एसेंबलिंग की बात हुई थी। मोदी की सरकार बनने के बाद तय किया गया कि विमान खरीद के मामले में सरकारों के बीच समझौता हो। सरकार ने भारत में टीओटी के तहत विमानों का निर्माण किए जाने के बजाय वायुसेना की जरूरत को ध्यान में रखते हुए पूरी तरह से तैयार 36 विमान खरीदने का निर्णय लिया। इस तरह डसॉल्ट कंपनी बातचीत के दौर से बाहर हो गईऔर यह सौदा सरकारों के बीच हुआ और किसी भी तरह की घूसखोरी को खत्म कर दिया गया। समझौते में यह शामिल था कि विमान की आपूर्ति समय पर होगी और उसमें विमानिकी के साथ ही वायुसेना की जरूरतों के अनुरूप हथियार प्रणाली लगी होगी। इसके बाद प्रस्ताव को रक्षा अर्जन परिषद के पास एक से अधिक बार भेजा गया और उसकी सलाह को इसमें शामिल किया गया। सरकार के स्तर पर अंतिम समझौतेको 2016 में मंजूर किया गया,न कि 2014 में,जैसा कि कांग्रेस दावा कर रही है। इसी तरह से अधिक कीमत की बात भी इस सौदेके बारे में गलत तस्वीर पेश किये जाने के लिए की जा रही है। वैचारणिय प्रश्र यह है कि जब यूपीए सरकार के दौरान डील हुई ही नहीं तो किस आधार पर घोटाले के आरोप लगाए जा रहे हैं। उस समय सरकार बोफोर्स की तरह सीधे कम्पनी से डील का प्रयास कर रही थी ,जिसमें घोटाले की पूरी पूरी संभावनाएं हो सकती थी ,जबकि मोदी सरकार ने सीधे सरकार से डील कर रिश्वतखोरी और घोटाले की संभावनाओंको ही खत्म करनेका बड़ा काम किया। गौरतलब है कि कांग्रेस के आरोपों के बाद खुद फ्रांस सरकार ने आगे आ डील में किसी भी तरह की एक पैसे के घोटाले को खारिज कर दिया था। रक्षामंत्री ने भी खरीदे जा रहे विमानों की खासयित बताते हुए स्पष्ट किया था कि सौदा कांग्रेस के मुकाबले सस्ते में किया गया हैशर्तों से बंधे होने के कारण सही कीमत जाहिर नहीं की जा सकती और राहुल गांधी इसी शर्त की आड़ में आरोप लगा प्रधानमंत्री की छवि पर कीचड़ उछालने में लगे हैं। शायद घोटालों से काली हुई कांग्रेस की चादर के मद्देनजर राहुल भाजपा की चादर दागदार साबित करने की नाकामयाब कोशिश में लगे हैं। राहुल गांधी को ध्यान रखना होगा कि कहीं ऐसी कोशिशों से उनकी छवि पर सवाल उठने शुरू न हो जाऐं। मदन अरोड़ा, स्वतंत्र पत्रकार

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