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देश को शर्मसार करता है, 62 का युद्ध
नवंबर महीने में देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं.जवाहरलाल नेहरू की जयंती के साथ ही अनायास ही देश को शर्मसार कर देने वाले 1962 के उस युद्ध की याद आ जाना स्वाभाविक है, जिसका दंश आज भी देश उतरी सीमाओं पर भुगत रहा है। यह सब उस प्रधानमंत्री नेहरू की गलत रक्षा और विदेश नीति का परिणाम था, जिसे भारत के विकास का जनक कहा जाता है। पं. नेहरू ने दुनिया में अपने को शांति के मसीहा के रूप में स्थापित करने के प्रयासों में देश की सीमाओं को बिसरा दिया। उन्होंने 1948 में पाकिस्तान की ओर से कश्मीर पर किए गये हमले से भी कोई नसीहत नही ली। पं. नेहरू अपनी शांतिदूत की छवि में आत्ममुग्ध रहे और उनका परम मित्र चीन,भारत पर हमले की तैयारी करने में लगा रहा और 20 अक्टूबर 1962 को देश पर हमला कर दिया। सामरिक विशेषज्ञ आर विक्रम सिंह के अनुसार 20 अक्टूबर से 20 नवंबर तक का समय देश के लिये राष्ट्रीय शर्म का कालखंड है। भारत को सबक सिखाने के लिए 20 अक्टूबर 1962 को हमारी सीमाओं पर हुए चीनी हमले ने हमारे स्वाभिमान को धूल-धूसरित करते हुए पूरे विश्व में दया का पात्र बना कर छोड़ दिया था। 20 नवंबर 1962 को चीन की स्वत: युद्ध विराम की घोषणा ने इस शर्म को ही बढ़ाने का काम किया। जिस अमेरिका के भारत के लिए परमाणु बम केप्रस्ताव को जवाहर लाल नेहरू ठुकरा चुके थे, जिस अमेरिका के संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत को स्थायी सदस्य बनाये जाने के प्रस्ताव को भी वह यह कहते हुए मना कर चुके थे, कि इस सीट पर चीन का हक है, उसी अमेरिका से वह सिर्फ हथियार ही नहीं, बल्कि हमारी ओर से चीन से युद्ध करने का निवेदन करने को बाध्य हो गये। आर विक्रम सिंह के अनुसार नेहरू के अमेरिका को लिखे पत्रों को देख कर अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन फास्टर डलेस ने तंज कसते हुए कहा भी कि नेहरू को पता है कि वह क्या कह रहे हैं। हम भारत की ओर से चीन से युद्ध लड़ें। उनकी गुटनिरपेक्षता नीति का क्या होगा। यह नेहरू की लुंजपुंज रक्षा-विदेश नीति का परिणाम था। चीनी सेनाओं ने सेला पास का मोर्चा तोड़ दिया। भगदड़ मची हुई थी,तेजपुर और असम की घाटी का रास्ता चीनी सेनाओं के लिए खुला पड़ा था। हमारी मदद के लिए दुनिया में कोई नहीं आया, गुट निरपेक्षता और पंचशील के नेहरू के करीबी देशों में से भी मदद के लिए किसी ने कदमताल नहीं की। चीन के विरोध में कोई भी देश नेहरू के साथ खड़ा नहीं हुआ। अमेरिकी शर्तें मानते हुए पाकिस्तान के साथ कश्मीर समस्या के समाधान के लिए वार्ता करनी पड़ी। 62 के इस युद्ध ने नेहरू की विदेश और रक्षा नीति के नकलीपन को उघाड़ कर उसे अपना असल चेहरा देखने पर मजबूर कर दिया। नेहरू ने उतरी सीमाओं की सुरक्षा की परवाह नहीं की थी। परिणाम सामने था। आर विक्रम सिंह के अनुसार भारत तो ब्रिटिश उपनिवेश ही था,लेकिन वे किस हद तक अपने साम्राज्य की उतरी सीमाओं के प्रति सजग रहे थे,यह उनके सुरक्षा संबंधी अभिलेखों से स्पष्ट होता है। ब्रिटिश सेनाध्यक्ष ने इसका भी आकलन कर रखा था कि यदि चीनी खतरे के विरूद्ध तिब्बत को बचाने के लिए जरूरत पड़ी तो किस प्रकार सेनाओं को ल्हासा में उतारा जाएगा। परन्तु पं. नेहरू ने सेना को रणनीतिक रूप से मजबूत बनाने में कोई दिलचस्पी नहीं ली और सेना को नजर अंदाज ही किया। फ्रांसीसी मूल के सामरिक विशेषज्ञ लाड आर्पी ने अपनी किताब, 1962 ऐंड द मैकमोहन लाइन सागा में लिखा है कि जब 1946 में नेहरू अंतरिम प्रधानमंत्री बने, तो तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल लोकहार्ट ने भारत की सुरक्षा के संबंध में एक नीतिगत निर्देश पत्र का आलेख उनके सामने रखा। नेहरू ने उसे देख कहा,बकवास,हमें किसी सुरक्षा प्लान की जरूरत नहीं है। अहिंसा हमारी नीति है। हमें कोई सैनिक खतरा नहीं दिखता। सेना को खत्म कर दो, पुलिस ही काफी है, हमारी सुरक्षा के लिए। वह आगे लिखते हैं कि नेहरू की इस अहिंसक नीति का पहला शिकार कश्मीर हुआ और फिर दूसरा शिकार तिब्बत बना। आर विक्रम सिंह केअनुसार तिब्बत 1912 से लेकर 1950 तक एक आजाद देश की हैसियत से रहा था। 1912 में उसने अपने को चीन की गुलामी से मुक्त किया था। हम जो खुद हजार साल की गुलामी के बाद 1947 में आजाद हुए थे, हमारा दायित्व यह तो नहीं था कि हम सहायता करने के बजाय तिब्बत की गुलामी की पटकथा लिखें। अक्टूबर 1950 में तिब्बत पर विस्तारवादी चीन के कब्जे ने हमारी उतरी सीमाओं को पूरी तरह से असुरक्षित कर दिया। चीन काबिज इसलिए हो सका,क्योंकि नेहरू तिब्बत की आजादी के महत्व को समझ ही नहीं सके। इस तरह नेहरू ने तिब्बत की गुलामी पर अपनी मुहर लगा दी और इसे चीन का आंतरिक मामला बता डाला। आर विक्रम सिंह के अनुसार दोकलाम भूटान में पड़ता है, भारत का भाग नहीं है। लेकिन भूटान से हमारी रक्षा संधि के चलते भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने किस प्रकार चीनी सेनाओं, व उनकी कूटनीति का मुकाबला किया उस पर गर्व होता है। इतना होने के बावजूद भी हम संयुक्त राष्ट्र संघ में चीन की स्थायी सदस्यता के लिए चीन की पैरवी करते रहे। प्रश्र उठता है कि क्या 1962 की पराजय से बचा जा सकता था?जवाब है,जी हां, यदि हमनेआजादी के प्रारम्भिक वर्षों में अपनी सेनाओं को उतरी सीमाओं तक पहुंचाने की समझ रही होती। अक्साई चिन कैसा भी निर्जन स्थान हो,इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। समस्या चीन के अक्साई चिन क्षेत्र से होकर सडक़ बना लेने से पैदा हुई है। जब 1957 में उस सडक़ का उद्घघाटन भी हो चुका, तब हम यह तथ्य जान सके कि हमारे इलाके से सडक़ बन गई है। इससे पहले 1954 में चीन के साथ हुआ पंचशील समझौता तिब्बत में राष्ट्रीय हितों का समर्पण ही तो था। नेहरू आजाद तिब्बत के सामरिक महत्व को समझने में विफल रहे। उनका यह नीतिगत विभ्रम ही तिब्बत की गुलामी, कश्मीर के विभाजन और फिर 1962 की शर्मनाक पराजय का सबब बना। कोई भी साम्राज्य उतना ही शक्तिशाली होता है, जितनी कि उसकी सेनायें। उस समय ब्रिटिश प्रधान मंत्री ऐटली ने स्वीकार किया कि अंग्रेजों के भारत से जाने का मुख्य कारण तत्कालीन भारतीय सेना पर बढ़ रहा आजाद हिंद फौज व नेता जी सुभाष चन्द्र बोस का प्रभाव था। जिस सत्य, अहिंसा के सिद्धांतों पर देश आजाद हुआ था, वे अंतरराष्ट्रीय राजनय में अर्थहीन थे। कुल मिला कर एक नीतिगत लक्ष्य विहीनता ही दृष्टिगत होती है, जिसने 1962 की पराजय की इबारत लिखी और पूरी दुनिया में भारत को शर्मसार होना पड़ा। उतरी सीमा पर चीन के साथ विवाद ,कश्मीर समस्या का नासूर और संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थाई सदस्यता का मामला पं. नेहरू की नीतिगत लक्ष्य विहीनता का ही परिणाम है। मदन अरोड़ा, स्वतंत्र पत्रकार

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