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अयोध्या मामले की सुनवाई और दांव पर न्यायपालिका की साख
न्यायपालिका की साख एक बार फिर दांव पर है। सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले की सुनवाई टालते हुए कहा है कि जनवरी 2019 में उचित पीठ सुनवाई की तारीख तय करेगी। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोइ, संजय किशन कौल और केएम जोसफ की पीठ के समक्ष यूपी सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और रामलला के वकील सीएस वैद्यनाथन ने दिवाली के बाद सुनवाई की तारीख तय करने की गुहार लगाई, पर पीठ ने ठुकरा दिया। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा , हमारी अपनी प्राथमिकताएं हैं। हमे नहीं पता तारीख क्या होगी। यह जनवरी, मार्च या अप्रैल में भी हो सकती है। इसके साथ ही आम चुनाव से पहले इस पर फैसला आने की उम्मीद कम हो गई है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 2010 में विवादित जमीन को निर्मोही अखाड़ा, रामलला और सुन्नी वक्फ बोर्ड के बीच बराबर बांटने का आदेश दिया था। इस फैसले को पक्षकारों ने चुनौती दी। मई, 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगाते हुए यथास्थिति को कहा । सात साल तक यह मामला ठंडे बस्ते में रहा। 28 सितंबर, 2018 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के नेतृत्व में पीठ ने क कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल की 2019 चुनाव के बाद मामले की सुनवाई किये जाने की अपील को खारिज करते हुए 29 अक्टूबर 2018 से नियमित रूप से प्रतिदिन सुनवाई के आदेश दिए तो उम्मीद जगी , कि मामले का जल्द निपटारा हो जाएगा। इससे राजनीतिक दलों में इस बात को लेकर बेचैनी साफ देखी गई कि यदि चुनाव पूर्व फैसला आ गया तो इसका लाभ चुनाव में भाजपा ले जाएगी। सभी पक्षकारों और देश के करोड़ों लोगों को विश्वास था कि 29 अक्टूबर को नई बैंच का गठन कर मामले की नियमित सुनवाई शुरू हो जायेगी, पर मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के नेतृत्व में बनी पीठ के तीन मिनट में ही तीन महीने के लिए सुनवाई टाल दिये जाने से बेहद निराशा हुई है। सबसे ज्यादा हैरानी मुख्य न्यायाधीश के मामले को प्राथमिकता में नहीं होने को लेकर जतायी जा रही है और सवाल किया जा रहा है, कि जिस मामले में देश के करोड़ों लोगों की भावना और आस्था जुड़ी हुई है ,अगर वह न्यायालय की प्राथमिकता नहीं, तो अर्बन नक्सल का मामला जो कुछ लोगों के देश द्रोह से जुड़ा है, वह न्यायालय की प्राथमिकता कैसे हो गया, जिसके लिए न केवल कोर्ट रात को सुनवाई करती है, आरोपितों को पुलिस कस्टडी में दिये जाने के बजाय घर में नजरबंद कर दिया गया। तीन मिनट में ही सुनवाई को कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल की भावना के अनुरूप तीन महीनों के लिए टाल देने और पीठ में कनिष्ठ और ऐसे जज , जिसकी न्यायालय में नियुक्ति को लेकर सरकार के साथ लम्बा विवाद चला , को शामिल किये जाने से खुद मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की विश्वसनीयता और निष्पक्षता पर सवाल उठाये जा रहे हैं और पूछा जा रहा है, कि क्या अब फैसले विचार धारा के आधार पर होंगे? मुख्य न्यायाधीश गोगोई के हमें नहीं पता तारीख क्या होगी। यह जनवरी,मार्च अथवा अप्रैल के बयान ने आग में घी डालने का ही काम किया है। हिंदुओं के एक बड़े वर्ग में यह बात पहले ही घर कर चुकी है, कि न्यायपालिका हिंदू धर्म से जुड़े मामलों में आस्थाओं पर हमले कर रही है । अयोध्या मामले पर हुई सुनवाई ने इसे और पुख्ता कर दिया है । सवाल यह भी पूछा जा रहा है कि इसी साल 28 सितंबर में हुई सुनवाई के दौरान तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा जिस मामले को प्राथमिकता के आधार पर नियमित सुनवाई के आदेश देते हैं, एक महीने बाद ऐसा क्या हो गया कि वह न्यायालय की प्राथमिकता से बाहर हो गया? क्या इसके पीछे किसी सियासी दल , जिसकी पृष्ठभूमि से खुद मुख्य न्यायाधीश आते हैं, को चुनाव में किसी परेशानी से बचाने के लिए सुनवाई को लम्बा टाला गया है? हैरानी इस बात पर भी जताईजा रही है, कि जजों की कनिष्ठता के जिस मुद्दे को लेकर मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कुछ महीनों पहले ही तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ अपने तीन अन्य साथी न्यायाधीशों के साथ मोर्चा खोला था, उनकी पीठ में एक कनिष्ठ जज को क्योंकर शामिल कर लिया गया? सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से यह तो तय हो गया है, कि मामले की नियमित सुनवाई कम से कम 2019 के चुनाव से पूर्व नहीं होने जा रही है। सुनवाई के टाले जाने से कुछ लोग भले ही खुश हो राहत महसूस कर रहे हों और इससे भाजपा को नुकसान होने का काल्पनिक सपना देख रहे हों, लेकिन हकीकत में ऐसा होता दिख नहीं रहा है। इससे संदेश यही जा रहा है, कि इस सबके पीछे कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल की ही भूमिका है। यह सही है कि मंदिर समर्थकों और भाजपा के अन्दर ही मोदी सरकार पर अध्यादेश लाकर मंदिर बनाने का मार्ग प्रशस्त किये जाने का दबाव बढ़ा है, लेकिन लोगों के बीच बड़ा संदेश यह जा रहा है कि राम मंदिर बनाने में कांग्रेस ही सबसे बड़ी रूकावट पैदा कर रही है। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई का कांग्रेस पृष्ठभूमि से होना और कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल का मामले की जुलाई 2019 के बाद सुनवाई किये जाने की मांग और मात्र तीन मिनट में ही सुनवाई को तीन महीने के लिए टाल देना लोगों के जेहन में खटक रहा है और यह राहुल गांधी के मंदिरों की खाक छानने पर भारी पड़ता दिखने लगा है, जिसकी बड़ी कीमत कांग्रेस को चुनाव में चुकानी पड़ सकती है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से लोगों के बीच गया संदेश न्यायपालिका की सेहत और साख केलिए सही नहीं है। मदन अरोड़ा, स्वतंत्र पत्रकार

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