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अंबानी को मिले ठेके पर सवाल क्यों और यह घोटाला कैसे
जैसे जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं आरोप लगाने की गंदी राजनीति भी शुरू हो गई है। चिन्ताजनक बात यह है कि अपने सियासी फायदे के लिए देशकी सुरक्षा और प्रतिष्ठा को दांव पर लगाया जा रहा है। राफेल को लेकर आरोप लगाये जा रहे हैं पर हकीकत को छुपाया जा रहा है। कांग्रेस कुछ बयानों के आधार पर राफेल सौदे पर सवाल उठा रही है, पर एक भी सबूत अभी तक सामने लाने में विफल रही है। विडंबना यह है कि जब कोई जिम्मेदार पद पर बैठा व्यक्ति सच्चाई रखने की कोशिश करता है तो उसी पर सवाल खड़े कर दिए जाते हैं । राफेल की कीमत को लेकर शर्मनाक गंदा सियासी खेल खेला जा रहा है। ऑफसेट के तहत दसॉल्ट के रिलायंस डिफेंस की साझेदारी पर सवाल खड़े कर सबसे बड़ा घोटाला बताया जा रहा । सवाल उठाया जा रहा है कि सरकारी उपक्रम एचएएल के बजाये अनुभवहीन अनिल अंबानी की कंपनी को विमान बनाने का ठेका कैसे दे दिया गया, जबकि हकीकत में अंबानी के साथ दसॉल्ट करार केवल विमान के पुर्जे बनाने के लिए हुआ है। इस तथ्य को अंबानी और रक्षा मंत्रालय लगातार सामने लाते रहे हैं कि अंबानी की कंपनी केवल पुर्जे बनाने का काम करेगी और इस तरह का करार देश की अन्य कंपनियों के साथ भी किया गया है, पर कांग्रेस अंबानी की कंपनी को अनुभवहीन बताते हुए इसे लगातार नकारती आ रही है । इस बयानबाजी के बीच अब एक नया खुलासा किया जा रहा है कि अंबानी को रा फेल की अप्रेल 2015 को हुई डील के 6 महीने बाद विमान के पुर्जे बनाने का लाईसेंस दिया गया और इसे भी घोटाले की संज्ञा दी जा रही है। यक्ष सवाल यह है कि दो कंपनियों के बीच करार होने के बाद लाईसेंस लेना क्या कानूनन अपराध अथवा घोटाला है। यह अगर घोटाला है तो इसे जनता को समझाया जाना चाहिए कि यह किस तरह से घोटाला हुआ, पर इस खुलासे के साथ तो यह स्थापित हो गया कि अंबानी को विमान नहीं पुर्जे बनाने का ठेका मिला है, जो कांग्रेस के पूर्व के विमान बनाने के आरापों को झुठलाता है। अब तक यही बात भाजपा और अनिल अंबानी कह रहे थे। लेकिन राहुल गांधी इस बात को स्वीकार ही नहीं कर रहे थे। घोटाला घोटाला का विलाप करने वालों को समझाया गया, भाई जब डील में 36 राफेल रेडी टू फ्लाई कंडीशन में आ एंगे जिनमें एक पैसे का कोई काम भारत में नहीं होना है तो इस डील में अंबानी की कंपनी को राफेल बनाने का ठेका कैसे मिल गया पर वे लोग मान ही नहीं रहे थे । चलो अब मान लिया कि डील के 6 महीने बाद नवम्बर 2015 में अंबानी को राफेल के पुर्जे बनाने का लाइसेन्स मिला, ये अलग बात है कि डील 23 सितम्बर2016 को पूरी हुई थी। अब सवाल रिलाएंस के अनुभव और देश की सुरक्षा को खतरे में डालने का तो इस पर प्रबुद्ध कांग्रेस बताये, जब यूपीए सरकार के समय इसी दसॉल्ट ने मुकेश अंबानी की रिलाएंस ऐरोस्पेस को ठेका देने का समझौता किया था तब क्या अम्बानी की कंपनी को कोई अनुभव था। तब यह घोटाला नहीं था तो आज कैसे हो गया। तब देश की सुरक्षा खतरे में नहीं थी तो आज कैसे खतरे में आ गई।देश की कई कंपनी जो दूसरे क्षेत्रों में काम कर रही हैं आज डिफेंस क्षेत्र में अपना हाथ आजमा रही हैं ,उनको डिफेंस का कौनसा अनुभव है। पिछले दिनों ही अमेरिका की लड़ाकू विमान एफ१६ बनाने वाली कंपनी ने अपने लड़ाकू विमान के विंग्स बनाने का करार टाटा की कंपनी के साथ किया है , टाटा को क्या एफ१६ विमान बनाने का अनुभव है ।अंबानी जब पेट्रो इंडस्ट्रीज में आये तो क्या उन्हें इसका अनुभव था।अनुभव पैसे से रखे गए कार्मिकों का होता है न कि केवल मालिकों का। जब टाटा को विमान के पुर्जे बनाने का ठेका मिल सकता है ,महेंद्रा को मिल सकता है ,रशिया अडानी को आमंत्रित कर सकता है तो अंबानी को मिले ठेके पर सवाल क्यों और यह घोटाला कैसे। एचएएल को लेकर भी सवाल खड़े किये जा रहे हैं । इसे लेकर रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण स्थिति साफ कर चुकी हैं। रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस संबंध में कहा था कि एचएएल के पास फ्रांसीसी कंपनी दसॉ एविएशन के साथ मिल कर भारत में इस लड़ाकू विमान के विनिर्माण के लिए जरूरी क्षमता ही नहीं थी और सार्वजनिक क्षेत्र की यह कंपनी काम की गारंटी देने की स्थिति में नहीं थी. सीतारमण ने ये भी बताया था कि एचएएल के साथ कई दौर की बातचीत के बाद फ्रांसीसी कंपनी दसॉ एविएशन को महसूस हुआ कि यदि राफेल जेट का उत्पादन भारत में किया जाता है तो इसकी लागत काफी अधिक बढ़ जाएगी.। सीतारमण के बाद अब , वायुसेना प्रमुख सामने आये हैं, और एचएएल की क्षमता पर सवाल खड़े किये हैं । हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के साथ राफेल विमान का सौदा न होने पर भी वायुसेना प्रमुख ने टिप्पणी की. उन्होंने बताया कि एचएएल के साथ सुखोई के निर्माण में हम पहले से ही तीन साल पीछे चल रहे हैं, जबकि जगुआर में 6 साल की देरी हुई है. उन्होंने ये भी बताया कि एलएसी और मिराज में 5 और 2 साल की देरी हो रही है. वायुसेना प्रमुख का यह बयान अंग्रेजी अखबार की उस रिपोर्ट के बाद आया है, जिसमें दावा किया है कि सुखोई -30 युद्धक एयरक्राफ्ट के निर्माण में तीन साल की देरी होगी. यह विमान एचएएल ही बना रहा है. राफेल डील के सवाल पर धनोआ ने कहा, 'हम कठिन स्थिति में थे। हमारे पास तीन विकल्प थे, पहला या तो कुछ घटने का इंतजार करें, आरपीएफ को विद्ड्रॉ कर लें या फिर आपात खरीदारी करें। हमने इमर्जेंसी खरीदारी की। राफेल डील हमारे लिए बूस्टर के समान है।' धनोआ ने कहा, 'सरकार ने बोल्ड कदम उठाते हुए 36 राफेल फाइटर विमान खरीदा। एक उच्च प्रदर्शन वाला और उच्च तकनीक से सुसज्जित लड़ाकू विमान भारतीय वायुसेना को दिया गया है। ताकि हम अपनी क्षमता को बढ़ा सके।' क्या हैं कांग्रेस के आरोप कांग्रेस राफेल डील को रक्षा क्षेत्र का सबसे बड़ा घोटाला करार दे रही है. कांग्रेस का आरोप है कि मोदी सरकार इस विमान की खरीद 1670 करोड़ रुपये प्रति विमान की दर पर कर रही है जबकि यूपीए सरकार ने इसके लिए 526 करोड़ रुपये की कीमत को अंतिम रूप दिया था. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कीमत को आधार बनाकर नरेंद्र मोदी पर अपने उद्योगपति दोस्तों को लाभ पहुंचाने का आरोप लगा रहे हैं. कैग की खरी खरी, कहा बिना सबूत नहीं बनेगी बात राफेल को घोटाला बनाने में जुटी कांग्रेस और राहुल गांधी को कैग नेदो टूक कह दिया है कि सिर्फ आरोप लगाने और बयान देने से बात नहीं बनेगी। कांग्रेस नेताओं से 4 अक्टूबर को हुई मुलाकात में कैग ने साफ-साफ कह दिया कि जो आरोप सरकार पर लगा रहे हैं,उसके सबूत भी दें वरना इस मामले में आगे बढऩा मुश्किल होगा। मदन अरोड़ा, स्वतंत्र पत्रकार

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