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सियासत ने बनाया धर्म को चुनावी धंधा
ऐसा क्या होगया जो कर्नाटक विधानसभा चुनाव के समय आस्था और धर्म को नीजि मामला बताने वाले राहुल गांधी और कांग्रेस को नीजि धार्मिक कैलाश यात्रा की मार्केटिंग करनी पड़ रही है। राहुल ने धर्म और आस्था को नीजि मामला बताते हुए कहा था कि वे पक्के शिव भक्त हैं और उनकी दादी व पिता जी भी शिव भक्त थे, पर वे इसका प्रचार नहीं करते। अपने कथन के विपरित उन्होंने न केवल अपनी कैलाश यात्रा को लेकर लगातार ट्वीट किए , कांग्रेस ने यात्रा के वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर करते हुए यहां तक दावा किया कि राहुल ने 13 घंटे लगातार पैदल चल करीब 35 किलोमीटर की यात्रा तय की। यात्रा के दौरान काठमांडू के एक होटल वूटू में मांसाहारी खाना खाने की नेपाली मीडिया में खबरें आने के बाद जब इस पर विवाद खड़ा हुआ तो कांग्रेस ने भाजपा की निंदा करते हुए कह डाला कि भाजपा राहुल गांधी की कैलाश मान सरोवर यात्रा में विघ्न पैदा करना चाहती है. ये देव और दानवों की लड़ाई है. एबीपी न्यूज चैनल ने राहुल और उनकी टीम को खाना परोसने वाले वेटर से बात कर खबर की पुष्टि की थी। वेटर ने एबीपी न्यूज को बताया, राहुल ने नॉनवेज ऑर्डर किया । रेस्टोरेंट में उन्होंने नेवारी डिश खाई जिसके तहत उन्होंने चिकन मोमो, चिकन कुरकुरे और बंदेल की डिश ऑडर की थी. हालांकि विवाद बढ़ने के बाद रेस्टोरेंट ने इस खबर को गलत बताया । कांग्रेस को लगा कि यात्रा के दौरान मांसाहारी खाना खाने को लेकर अगर विवाद बढ ग़या तो राहुल गांधी को हिन्दू और पक्का शिव भक्त साबित करने की कोशिशों को पलीता लग सकता है। इसलिए उसने विवाद खड़ा करने के नाम पर राहुल को देव और भाजपा को दानव बता डैमेज कंट्रोल की कोशिश की। आखिर चुनाव आने पर ही क्यों नेताओं को भगवान और मंदिर की याद आती है। भाजपा पर आरोप लगाया जाता है कि उसे चुनाव आने पर ही राम मंदिर याद आता है। भाजपा पर कांग्रेस धर्म के नाम पर ध्रूवीकरण की राजनीति करने और लोगों को बांटने का आरोप भी लगाती है। सवाल उठ रहा है कि क्या कांग्रेस भाजपा के नक्शेकदम पर चल राहुल की ताजपोशी करवाना चाहती है। कैलाश यात्रा की मार्केटिंग से तो कम से कम यही लग रहा है। कांग्रेस के बयानों से लग रहा है कि वह राहुल गांधी को मोदी से बड़ा भक्त और हिन्दू साबित करना चाह रही है। रणदीप सुरजेवाला का राजीव गांधी और राहुल गांधी को पक्का शिव भक्त व ब्राह्मण बता कांग्रेस को ब्राह्मण पार्टी साबित करने की कवायद से तो यही संदेश जा रहा है। यक्ष सवाल है कि क्या राहुल हिन्दू चरित्र से 2019 का चुनाव जीतेंगे? ऐसे में बंद कमरे में मुस्लिम बुद्धिजीवियों को दिलाए गए भरोसे और मुस्लिम पार्टी बता उनका दिल जीतने के प्रयासों का क्या होगा । कहीं पेट वाले की आस में बाहर वाला ही हाथ से न निकल जाए। मुस्लिम नेताओ की आ रही प्रतिक्रियाओं से तो यही लग रहा है कि कहीं कांग्रेस की हालत न माया मिली न राम वाली न हो जाये। कांग्रेस को ब्राह्मणवादी पार्टी बताने से मुस्लिमों का भरोसा राहुल से उठने लगा है और हिन्दू उन पर कितना भरोसा करेगा भविष्य के गर्भ में है। हिन्दुओं के मन में उनके हिन्दू प्रेम को लेकर आशंकाएं हैं। सब से बड़ा सवाल तो यही है कि लोकसभा चुनाव हारने और एके एंटोनी की रिर्पोट आने के बाद हिन्दू बने राहुल पर भरोसा किया जा सकता है? ये सवाल इसलिए उठ रहा है कि कुछ दिनों पूर्व ही राहुल अपने को मुस्लिमों का शुभचिंतक और कांग्रेस को मुस्लिम पार्टी बता चुके हैं। सवाल ये भी है कि राहुल हिन्दू हैं पर परिवार में कभी हिन्दू पर्व मनाते नहीं दिखे। वे शिव भक्त और ब्राह्मण हैं पर उनके घर में हिन्दू उपासना स्थल यानि मंदिर नहीं है। वे जनेऊधारी ब्राह्मण पर मांसाहारी हैं। सोशल मीडिया पर पूछा जा रहा है कि वे अपने दादा और पिता का श्राद्ध क्यों नहीं मनाते। आस्था और धर्म दो अलग -अलग विषय हैं। राम केसाथ रहीम का स्मरण किया जाता है। रहीम मुसलमान थे पर हिन्दू धर्म के प्रति उनकी आस्था थी। बड़ी संख्या में हिन्दू अजमेर की दरगाह जाते हैं, इससे वे मुसलमान नहीं बन जाते। राहुल गांधी की हिन्दू धर्म और शिव के प्रति आस्था पर सवाल नहीं उठाया जा सकता पर पारसी फिरोज जहांगीर के पोते के हिन्दू और ब्राह्मण होने पर तो लोग और विपक्षी सवाल उठाएंगे ही । यक्ष सवाल यही है कि राजनीतिक पार्टियां चुनाव आने पर ही धर्म को चुनावी मुद्दा क्यों बनाती हैं। क्यों भाजपा को चुनाव के समय राम मंदिर की याद आती है। मदन अरोड़ा,स्वतंत्र पत्रकार

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