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गाजियाबाद में सामने आया नाले की गैंस पर चाय की दुकान चलाने वाला रामू
इंजिनियरिंग के छात्रों ने 2013 में बनाया था इसका प्रोजेक्ट नाले की गैस पर चाय बनाने को लेकर मोदी विरोधी लगातार उन पर निशाना साधते आ रहे हैं और कई यह सवाल भी उठा रहे हैं कि यदि ऐसा संभव है तो मोदी इसे बड़े स्तर पर लागू क्यों नहीं कर रहे । मुझे नहीं लगता कि नई जानकारी सामने आने के बाद मोदी को निशाना बनाना बंद कर दिया जाएगा और इसका मजाक बनाने वाले देश से माफी मांगेगे। इसे बनाने वाले हैं साहिबाबाद के रामू चायवाला। नाले की गैस से चाय बनाकर रामू फेमस हो रहे हैं तो दूसरी ओर उनके पास ग्राहकों की भीड़ भी बढ़ रही है। इंद्रप्रस्थ इंजिनियरिंग कॉलेज, साहिबाबाद के सामने से सूर्य नगर का नाला निकल रहा है। कड़कड़ मॉडल निवासी रामू बताते हैं कि रोज सुबह ७ बजे वह अपनी साइकल पर घर से चूल्हा और अन्य सामान लेकर निकलते हैं। रेहड़ी पर पहुंचते ही चाय बनाने का सिलसिला शुरू होता है। उन्होंने कहा कि वह इस जगह पर पहले से चाय बनाते आ रहे हैं। पहले महीने में ५ हजार रुपये तक कमाई होती थी, जिसमें से १२०० रुपये सिलेंडर पर ही खर्च हो जाते थे। कॉलेज के छात्रों की मदद से उन्होंने यहां नाले की गैस से चाय बनाना शुरू किया। इससे उनका एलपीजी का १२०० रुपये का खर्च तो बचा ही। १० दिन में ही ५ हजार रुपये की कमाई भी हो गई है। पहले नाले की गैस की चाय सुनकर लोग यहां आने में कतराते थे, लेकिन पीएम के भाषण के बाद यहां लोग आने लगे हैं। साथ ही उनकी प्रसिद्धि भी मिल रही है। ऐसे बनी नाले से गैस इसकी कहानी शुरू होती है इंद्रप्रस्थ इंजिनियरिंग कॉलेज से, जहां बी.टेक के दो छात्र अभिषेक वर्मा और अभिनेंद्र पटेल हॉस्टल की छत से रोज सूर्यनगर के नाले में गैस के बुलबुले उठते देखते थे। उन्होंने सोचा कि इस गैस को कुकिंग में प्रयोग कर सकते हैं। अभिषेक ने बताया कि गैस क्रोमोटॉग्रफी से पता चला कि नाला करीब ६० से ७५ प्रतिशत मिथेन गैस उगलता है। इसे इकट्ठा करने के लिए लोहे के केस में छह बड़े ड्रम लगाए गए। इन सभी से जुड़ी एक पाइपलाइन गैस स्टोव तक आती है और कुकिंग के लिए ईंधन का काम करती है। छात्रों ने यह प्रॉजेक्ट साल २०१३ में तैयार कर लिया था और बाकायदा कुकिंग में इस गैस के प्रयोग की प्रदर्शनी भी लगाई थी। इस दौरान यहां मौजूद एक चाय विक्रेता शिव प्रसाद ने चाय बनाकर भी दिखाई थी, हालांकि कुछ दिन बाद जीडीए टीम ने इस प्रॉजेक्ट को खतरा बताकर यहां से हटवा दिया था। पहले कहा कबाड़, अब मदद की बहार साल २०१४ में जीडीए ने इस प्रॉजेक्ट को कबाड़-यूजलेस बताकर हटवा दिया था, लेकिन अब मामला सुर्खियों में आने के बाद छात्रों को इसके लिए सराहना मिल रही है। कॉलेज प्रशासन के अनुसार इसे बड़े स्तर पर तैयार करने के लिए एमएसएमई की ओर से मदद मिल रही है व वर्कशॉप प्लान करने की तैयारी की जा रही है। एसडीएम प्रशांत तिवारी ने भी छात्रों की सराहना की है। छात्र अब अगला प्रॉजेक्ट वसुंधरा मेन नाले पर तैयार करने की योजना बना रहे हैं और गैस के व्यापक प्रयोग के लिए भी जागरूक करेंगे। यह जानकारी आने के बाद भी अगर कोई मोदी को इस मुद्दे पर निशाना बना उनका मजाक उडा़ता है तो जाहिर है कि उसे सच्चाई से कोई लेना देना नहीं केवल देश के प्रधानमंत्री का मजाक उड़ाना ही मकसद है। मदन अरोड़ा, स्वतंत्र पत्रकार

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