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नई दिल्ली, 07 नवंबर 2018,दिवाली (Diwali 2018) का त्योहार बड़ी धूम से मनाया जाता है. कार्तिक महीने की अमावस्या के दिन दीपावली यानी दिवाली (Diwali 2018) का त्योहार मनाते हैं. मान्यता है कि भगवान राम चौदह साल के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे. इस खुशी में अयोध्यावासियों ने घर में घी के दिए जलाए थे और अमावस्या की काली रात भी रोशन हो गई थी. इसलिए दिवाली को प्रकाशोत्सव भी कहा जाता है. दिवाली के दिन मां लक्ष्मी की पूजा की जाती है. पूजा का शुभ मुहूर्त- लक्ष्मी पूजा का मुहूर्त: शाम 17:57 से 19:53 तक. प्रदोष काल: शाम 17:27 बजे से 20:06 बजे तक. वृषभ लग्न: 17:57 बजे से 19:53 बजे से तक. दिवाली पूजा विधि- - दिवाली पूजन में सबसे पहले श्री गणेश जी का ध्यान करें. - इसके बाद गणपति को स्नान कराएं और नए वस्त्र और फूल अर्पित करें. - इसके बाद देवी लक्ष्मी का पूजन शुरू करें. मां लक्ष्मी की प्रतिमा को पूजा स्थान पर रखें. - मूर्ति में मां लक्ष्मी का आवाहन करें. हाथ जोड़कर उनसे प्रार्थना करें कि वे आपके घर आएं. - लक्ष्मी जी को वस्त्र अर्पित करें. वस्त्रों के बाद आभूषण और माला पहनाएं. - मां इत्र अर्पित कर कुमकुम का तिलक लगाएं. - अब धूप व दीप जलाएं और माता के पैरों में गुलाब के फूल अर्पित करें. - इसके बाद बेल पत्र और उसके पत्ते भी उनके पैरों के पास रखें. - 11 या 21 चावल अर्पित कर आरती करें. आरती के बाद परिक्रमा करें. - इसके बाद उन्हें भोग लगाएं. मां लक्ष्मी को ऐसे करें प्रसन्न- - महालक्ष्मी के महामंत्र ऊँ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद् श्रीं ह्रीं श्रीं ऊँ महालक्ष्मयै नम: जपें. - कमलगट्टे की माला से कम से कम 108 बार इस मंत्र को जपें. - इस उपाय से मां लक्ष्‍मी की कृपा बनी रहेगी.
नई दिल्ली, 24 अक्टूबर 2018, इस कारोबारी हफ्ते के तीसरे दिन की शेयर बाजार ने तेज शुरुआत की है. बुधवार को वैश्व‍िक बाजार से मिले मजबूत संकेतों और कच्चे तेल की कीमतों में आई कमी से बाजार मजबूत हुआ है. इसकी बदौलत बुधवार को सेंसेक्स 335.02 अंकों की तेजी के साथ (9.21AM) पर कारोबार कर रहा है. वहीं, निफ्टी ने भी रफ्तार भरी है. निफ्टी-50 112.40 अंकों की बढ़त के साथ 10,259.20 के स्तर पर बना हुआ है. शुरुआती कारोबार में तेल कंपनियों के शेयरों में उछाल देखने को मिल रहा है. फिलहाल निफ्टी-50 पर इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड, इंडियन ऑयल कंपनी, भारत पेट्रोलियम कंपनी लिमिटेड, हिंदुस्तान पेट्रोलियम के शेयर टॉप गेनर में शामिल हुए हैं. रुपये ने भी बुधवार को कारोबार की बढ़त के साथ शुरुआत की है. इस कारोबारी हफ्ते के तीसरे दिन डॉलर के मुकाबले रुपया 34 पैसे मजबूत हुआ है. इस मजबूती के साथ यह 73.23 के स्तर पर खुला है. इससे पहले मंगलवार को रुपया एक डॉलर के मुकाबले 73.57 के स्तर पर बंद हुआ था. मंगलवार को कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आने के बाद भी रुपया गिरावट के साथ बंद हुआ था.
नई दिल्ली एम्स के डॉक्टरों ने एक केस स्टडी का हवाला देते हुए कहा कि कुछ असाधारण केस ऐसे भी होते हैं जिसमें डेंगू का शिकार हुए व्यक्ति को बुखार नहीं आता। दरअसल, एक अस्पताल में काम करने वाले 50 साल के नर्सिंग सफाई कर्मी को किसी तरह का कोई बुखार नहीं आया बावजूद इसके उन्हें डेंगू डायग्नोज हुआ था। ब्लड टेस्ट में हुई डेंगू की पुष्टि बताया जा रहा है कि उस मरीज ने बहुत ज्यादा थकान की शिकायत की थी जिसके बाद डॉक्टरों ने उसका ब्लड टेस्ट किया। ब्लड टेस्ट में उनके खून में शुगर की अनियंत्रित मात्रा और ऐसिड का हाई लेवल पाया गया। साथ ही मरीज के खून में रेड सेल्स, वाइट सेल्स और प्लेटलेट्स की संख्या भी बहुत कम थी। ब्लड टेस्ट के इन नतीजों को देखते हुए डॉक्टरों ने मरीज का डेंगू टेस्ट किया। NS1 ऐंटिजेन टेस्ट का रिजल्ट पॉजिटिव निकला और इसके बाद दोबारा किए गए RT-PCR टेस्ट में भी डेंगू वायरस की पुष्टि हुई। प्लेटलेट्स काउंट में कमी होना खतरनाक जर्नल ऑफ द असोसिएशन ऑफ फिजिशन्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित स्टडी में एम्स के डॉक्टर कहते हैं, अगर किसी क्षेत्र या इलाके में डेंगू बहुत ज्यादा फैला हुआ हो तो ऐसी जगह पर मरीजों में अगर ल्युकोपीनिया यानी वाइट सेल्स काउंट में कमी और प्लेटलेट्स काउंट में कमी देखी जाए तो बुखार न होने पर भी मरीज के डेंगू की जांच की जानी चाहिए। बुखार न दिखे तब भी रहें सावधान डॉक्टरों की मानें तो डेंगू के वैसे मरीज जिनमें बुखार नहीं दिखता लेकिन उनके शरीर में डेंगू के वायरस मौजूद होते हैं उनमें ज्यादतर लोग या तो बुजुर्ग होते हैं या फिर पहले से ही डायबीटीज के मरीज या फिर इम्यूनिटी से जुड़ी दूसरी बीमारियों के शिकार होते हैं। पिछले एक दशक में दिल्ली, डेंगू प्रभावित क्षेत्र बन गया है जहां हर साल बड़ी संख्या में डेंगू का इंफेक्शन फैलता है। इन लक्षणों का रखें ध्यान - बिना वजह बहुत ज्यादा कमजोरी या थकान लगे - ब्लड प्रेशर बहुत ज्यादा लो हो जाए - खून में मौजूद प्लेटलेट की संख्या बहुत ज्यादा कम हो जाए
शरीर को स्वस्थ और फिट रखने में पानी की अहम भूमिका होती है. मानव शरीर में पानी की मात्रा 50-60 प्रतिशत होती है. पानी शरीर के अंगों और ऊतकों की रक्षा करता है. साथ ही कोशिकाओं तक पोषक तत्व और ऑक्सीजन पहुंचाने का काम भी करता है. हालांकि, सभी जानते हैं कि अच्छी सेहत के लिए सही मात्रा में पानी पीना कितना ज्यादा जरूरी है. लेकिन सिर्फ दिनभर में 8 गिलास पानी पीना ही अच्छी सेहत के लिए काफी नहीं होता है, बल्कि आप किस तरह और किस पोजीशन में पानी पीते हैं ये भी अच्छी सेहत के लिए बहुत मायने रखता है. हम में से अधिकतर लोग खड़े होकर पानी पीते हैं. खड़े होकर पानी पीने की आदत आपके शरीर को बुरी तरह नुकसान पहुंचाती है, आइए जानें कैसे... आयुर्वेद के मुताबिक, जब हम खड़े होकर पानी पीते हैं तो, इससे हमारे पेट पर अधिक प्रेशर पड़ता है, क्योंकि खड़े होकर पानी पीने पर पानी सीधा इसोफेगस के जरिए प्रेशर के साथ पेट में तेजी से पहुंचता है. इससे पेट और पेट के आसपास की जगह और डाइजेस्टिव सिस्टम को नुकसान पहुंचता है. इसके अलावा खड़े होकर पानी पीने से शरीर को इससे मिलने वाले किसी भी न्यूट्रिएंट्स का फायदा नहीं होता है. खड़े होकर पानी पीने से पानी प्रेशर के साथ पेट में जाता है, जिससे सभी इंप्योरिटीज ब्लैडर में जमा हो जाती हैं, जो किडनी को गंभीर नुकसान पहुंचता है. पानी पीने का तरीका हमारी सेहत को कई तरह से प्रभावित करता है, क्योंकि पानी के प्रेशर से शरीर के पूरे बायोलॉजिकल सिस्टम पर प्रभाव पड़ता है. इससे जोड़ों के दर्द की समस्या हो जाती है. खड़े होकर पानी पीने से फेफड़ों पर भी बुरा असर पड़ता है क्योंकि इससे हमारे फूड पाइप और विंड पाइप में ऑक्सीजन की सप्लाई रूक जाती है. अगर कोई शख्स लगातार खड़े होकर पानी पीता है तो उस व्यक्ति को फेफड़ों के साथ-साथ दिल संबंधी बीमारी होने की संभावना भी अधिक होती है. खड़े होकर पानी पीने से प्यास कभी नहीं बुझती है. यही कारण है कि पानी पीने के कुछ मिनट बाद ही आपको फिर से प्यास लगने लगती है. इसलिए बेहतर होगा कि बैठकर आराम से पानी पिएं. जब हम बैठकर पानी पीते हैं तो हमारी मांसपेशियां और नर्वस सिस्टम बहुत रिलेक्स रहते हैं. साथ ही खाना जल्दी डाइजेस्ट हो जाता है इसलिए हमेशा बैठकर ही पानी पीने की कोशिश करें. इस तरह से पानी का फ्लो धीमा रहेगा और शरीर को जरूरी न्यूट्रिएंट्स भी मिलेंगे.
एक नई स्टडी की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि विटामिन डी सप्लीमेंट लेने से बच्चों में बढ़ रहे मोटापे को कम किया जा सकता है. आजकल अधिकतर बच्चे मोटापे से पीड़ित हैं. इन सभी बच्चों की डाइट में मिनरल्स, विटामिन के साथ-साथ विटामिन डी की भी अधिक कमी देखी गई है. स्टडी में बच्चों का मोटापा रोकने का सबसे बेहतरीन विकल्प हेल्दी डाइट और एक्सरसाइज को बताया है. ग्रीस की एक नई स्टडी की रिपोर्ट के मुताबिक, रोजाना विटामिन डी की डोज लेने से बच्चों में बढ़ रहे मोटापे और कोलेस्ट्रोल के स्तर को नियंत्रण में रखने में मदद मिलती है. स्टडी की रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि मोटे और ज्यादा वजनी बच्चों में बढ़े होने पर मोटापे का शिकार होने की संभावना ज्यादा होती है. साथ ही उनमें डायबिटीज, दिल की बीमारी और कैसंर जैसी घातक बीमारी होने का खतरा भी अधिक होता है. इस स्टडी में बताया गया है कि जिन लोगों का पेट जरूरत से ज्यादा बढ़ा होता है, उन लोगों में विटामिन डी की कमी हो सकती है. साथ ही शरीर में न्यूट्रिएंट्स की कमी के कारण हड्डियां और इम्यून सिस्टम भी कमजोर होने लगता है. विटामिन डी से भरपूर चीजें, जैसे मछली और दूध, डायबिटीज, कैसंर और बालों के झड़ने जैसी समस्या को कम करने में मददगार साबित होती हैं. स्टडी के दौरान शोधकर्ताओं ने 232 मोटे बच्चों की 1 साल से ज्यादा समय तक जांच की. उनमें से आधे बच्चों को रोजाना विटामिन डी के कैप्सूल दिए गए, जबकि 115 बच्चों को प्लेसबो यानी उन्हें इंजेक्शन या चीनी को गोली दी गई. नतीजों में सामने आया कि जिन बच्चों को रोजाना विटामिन डी सप्लीमेंट दिया गया उनमें 12 महीने के बाद वजन और कोलेस्ट्रोल का स्तर उन बच्चों के मुकाबले बेहद कम पाया गया जिन्हें प्लेसबो दिया गया था. स्टडी के मुख्य लेखक Dr. Evangelia Charmandari ने बताया कि इस स्टडी कि रिपोर्ट के जरिए मोटापे से ग्रस्त बच्चों में दिल और दूसरी गंभीर बीमारियों को दूर करने में मदद मिलेगी.
हल्दी सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होती है। यह न केवल एक मसाला है बल्कि इसमें कई औषधीय गुण प्रचुर मात्रा में होते है। हल्दी का इस्तेमाल खाने के अलावा कई बीमारियों को दूर करने में भी किया जाता हैं। रोज हल्दी का सेवन करने से हमारे शरीर को कई सेहत लाभ मिलते हैं। रोजाना हल्दी खाने से आपकी याद्दाश्त अच्छी हो सकती है। आपका मूड तरोताजा हो सकता है। इसलिए अल्जाइमर से लड़ते हैं हल्दी के औषधीय गुण हल्दी में पाए जाने वाले ‘करक्यूमिन’ में ऑक्सीकरण-रोधी गुण होते हैं। इसे एक संभावित कारण बताया गया है कि भारत में, जहां करक्यूमिन आहार में शामिल होता है, बूढ़े-बुजुर्ग अल्जाइमर की चपेट में कम आते हैं। उनकी याददाश्त भी तुलनात्मक रूप से अच्छी होती है। लॉस ऐंजिलिस की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के शोध के मुताबिक करक्यूमिन अपना असर कैसे दिखाता है, यह ठीक-ठीक पता नहीं है, लेकिन दिमागी उत्तेजना को कम करने की इसकी काबिलियत के कारण ऐसा हो सकता है, जिसे अल्जाइमर रोग और गहरे अवसाद से जोड़ा गया है। खून साफ करता है हल्दी का जूस शरीर के विषैले तत्वों को निकालने और रक्त शुद्धि के लिए हल्दी का जूए सबसे अच्छा विकल्प है। इसे बनाने के लिए कच्ची हल्दी का टुकड़ा या पाउडर, नींबू और नमक चाहिए। पहले आधा नींबू निचोड़ लें फिर इसमें हल्दी और नमक मिक्स करके मिक्सर या ब्लेंडर में ब्लेंड कर लें। अब इस मिश्रण में आवश्यकता के अनुसार पानी मिलाइये और इसका सेवन कीजिए। दिमाग की बीमारियां होंगी दूर हल्दी दिमाग में एक ऐसे प्रोटीन को बनने से रोकती है जो याददाश्त को नुकसान पहुंचाता है। मजबूत होता है रक्त संचार केजीएमयू के फिजियोलॉजी विभाग के डॉक्टर नरसिंह वर्मा ने बताया कि हल्दी को ब्लड प्यूरिफायर माना जाता है। यह शरीर में ब्लड सर्कुलेशन को मजबूत बनाता है। हल्दी में पाए जाने वाले करक्यूमिन से अल्जाइमर का खतरा कम करता है। रोजाना हल्दी खाने से याद्दाश्त अच्छी हो सकती है। डायबीटीज का घटता है खतरा हल्दी का सेवन करने से डायबीटीज का खतरा कम हो जाता है। हल्दी शरीर से मोटे ऊतकों को हटाती है, जिससे वजन नहीं बढ़ता है। जोड़ों का दर्द होता है दूर अगर जोड़ों में दर्द होता है तो हल्दी का सेवन करने से आराम मिलता है। इसके सेवन से जोड़ों की अकड़न और सूजन कम होती है।
डेंगू का प्रकोप शुरू हो चुका है।ऐसे में खून पीकर गंभीर बीमारियां फैलाने वाले मच्छरों को भगाने के लिए जहरीली दवाओं की जगह इन प्राकृतिक उपायों को अपनाएं।ये कुदरती उपाय न सिर्फ आपकी समस्या दूर करेंगे बल्कि आपकी सेहत का भी ध्यान रखंगे। यकीन मानिए इन उपायों को करने से मच्छर आपके घर से दफा हो जाएंगे। नीम नीम के कई सारे फायदे हैं।सेहत का ध्यान रखने के अलावा ये मच्छरों को भगाने में भी मदद करता है। नारियल तेल के साथ नीम के तेल को मिलाकर प्रयोग करने से मच्छर भागते हैं। नीम की एक अलग तरह की गंध होती है जो मच्छरों को दूर रखती है। नीम का तेल और नारियल तेल मिलाएं और शरीर पर रगड़ें। ये कम से कम आठ घंटे के लिए मच्छरों से बचाता है। नींबू के तेल नींबू के तेल और नीलगिरी के तेल का मिश्रण प्राकृतिक रूप से मच्छरमुक्त रखने का एक बहुत असरदार उपाय है। इस मिश्रण के बारे में सबसे अच्छी बात यह है कि यह प्राकृतिक है। इस मिश्रण का उपयोग करने के लिए बराबर अनुपात में नींबू के तेल और नीलगिरी के तेल का मिश्रण बनाएं और आपके शरीर पर इसका इस्तेमाल करें। कपूर मच्छरों से बचाव करने के लिए कपूर का भी प्रयोग किया जा सकता है। एक कमरे में कपूर जलाएं और सभी दरवाजे-खिड़कियां बंद कर दें। 15 से 20 मिनट बाद दरवाजा खोल दें सारे मच्छर भाग जाएंगे। पुदीना अगर आपको यह लगता है कि पेड़ और झाड़ियां मच्छरों का पैदा करते हैं तो आप गलत हैं। झाड़ियों और पेड़ों का सही तरह रोपण करना आपके घर को मच्छरमुक्त रख सकता है। तुलसी की झाड़ियां, पुदीना, गेंदा, नींबू, नीम और सिट्रोनेला घास लगाने से मच्छर पैदा नहीं होते। नेप्थलीन बॉल्स कूलर में पानी रहने की वजह से मच्छरों को उनमें पनपने का मौकाै मिल जाता है। ऐसे में इसमें नेप्थलीन बॉल्स डाल दीजिए, इससे मच्छर नहीं आएंगे। एंटी-हिस्टामिन क्रीम मच्छर के काटने पर उस जगह एंटी-हिस्टामिन क्रीम या लोशन लगा लें। ऐसा इसलिए क्योंकि मच्छर खून चूसते समय अपने डंक की मदद से व्यक्ति के शरीर में प्रोटीन को प्रवेश करवा देते हैं। जिससे बचने के लिए व्यक्ति की रोगप्रतिरोधक क्षमता उसकी मदद करती है। ऐसा करते समय व्यक्ति की रोगप्रतिरोधक क्षमता हिस्टामिन नाम का एक कंपाउंड रिलीज करती है। यह कंपाउंड आपके सफेद रक्त कोशिकाओं या व्हाईट ब्लड सेल्स को उस प्रभावित क्षेत्र में पहुंचकर उस प्रोटीन से लड़ने में मदद करता है। हिस्टामिन नाम के इस कंपाउंड की वजह से भी व्यक्ति को खुजली और सूजन महसूस होती है। ऐसे ऑइंटमेंट जिनमे एंटीहिस्टामिन, एनाल्जेसिक और कोर्टिकोस्टेरॉयड का कॉम्बिनेशन पाया जाता है दर्द और खुजली दोनों से राहत पहुंचाता है।
नई दिल्ली, देश में हर साल होने वाली असमय मौतों में लगभग 50 प्रतिशत मौतें बगैर लक्षण वाले दिल के दौरों के कारण होती हैं. यह जानकारी एक हृदय रोग विशेषज्ञ ने यहां दी है. यहां स्थित मैक्स सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में हृदयरोग विभाग के अध्यक्ष और निदेशक, डॉ. नवीन भामरी ने एक बयान में कहा है, देश में हर साल हृदय रोगों और यहां तक कि समयपूर्व मौत के लगभग 45-50 प्रतिशत मामलों के लिए बगैर लक्षण वाले दिल के दौरों को जिम्मेदार पाया गया है, जिसे चिकित्सा शब्दावली में असिम्टोमैटिक हार्ट अटैक कहा जाता है. डॉ. भामरी ने कहा, एसएमआई का सामना करने वाले मध्यम आयु वर्ग के लोगों में ऐसी घटनाएं महिलाओं की तुलना में पुरुषों में दोगुना होने की आशंका होती है. वास्तविक दिल के दौरे की तुलना में एसएमआई के लक्षण बहुत हल्के होते हैं, इसलिए इसे मूक हत्यारा कहा गया है. उन्होंने कहा, सामान्य दिल के दौरे में छाती में तेज दर्द, बाहों, गर्दन और जबड़े में तेज दर्द, अचानक सांस लेने में परेषानी, पसीना और चक्कर आना, जैसे लक्षण होते हैं. जबकि इसके विपरीत एसएमआई के लक्षण बहुत कम और हल्के होते हैं, और इसलिए इसे लेकर भ्रम हो जाता है और लोग इसे नियमित रूप से होने वाली परेशानी मानकर इसे अक्सर अनदेखा कर देते हैं. इसके लिए अधिक उम्र, पारिवारिक इतिहास, धूम्रपान या तंबाकू चबाना, उच्च रक्त चाप, उच्च कोलेस्ट्रॉल, मधुमेह, वजन संबंधित समस्याएं, शारीरिक गतिविधि की कमी जिम्मेदार हो सकते हैं. डॉ. भामरी के अनुसार, मध्यम आयु वर्ग के लोगों (पुरुषों और महिलाओं दोनों) का धूम्रपान करना और शराब पर बढ़ती निर्भरता असमय दिल की समस्याओं के लिए जिम्मेदार है. आरामतलब जीवनशैली, खाने की खराब आदतें और शारीरिक गतिविधि की कमी का मोटापे से संबंध है और इससे दिल की समस्याएं पैदा होती हैं. अब युवा पीढ़ी में भी दिल से संबंधित ये बीमारियां बढ़ रही हैं. उन्होंने कहा, किसी भी रोगी को हमेशा एसएमआई से जुड़ी दो जटिलताओं- कोरोनरी आर्टरी डिजीज (सीएडी) और सडन कार्डियक डेथ (एससीडी) से अवगत होना चाहिए. उपचार का उद्देश्य दवाइयों, स्टेंट का उपयोग कर रिवैस्कुलराइजेशन और यहां तक कि बाईपास सर्जरी की मदद से इस्कीमिया, हार्ट फेल्योर और कार्डियक एरीथमिया के कारण होने वाली मृत्यु को रोकना है. डॉ. भामरी का कहना है, डॉक्टर स्ट्रेस टेस्ट कराने की सलाह दे सकते हैं, जिससे दो उद्देश्य हल हो सकते हैं. इससे डॉक्टर को व्यायाम की सीमा को मापने में मदद मिलती है, जो इस्कीमिया पैदा कर सकता है और डॉक्टर सबसे सुरक्षित गतिविधियों से संबंधित विशिष्ट निर्देश दे सकते हैं.
नेशनल किडनी फाउंडेशन एंड द एकेडमी ऑफ न्यूट्रीशियन डाइटिक्स ने गुर्दे के मरीजों के लिए 'मेडिकल न्यूट्रीशियन थैरेपी' की सिफारिश की है. फाउंडेशन का कहना है कि यदि गुर्दा रोगियों को हर्बल पदार्थो से परिपूर्ण और बेहतर आहार मिले तो बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है. इस बारे में सर गंगाराम अस्पताल के नेफ्रोलॉजिस्ट मनीष मलिक कहते हैं कि यह सिफारिश महत्वपूर्ण इसलिए भी है, क्योंकि हाल में 'अमेरिकन जर्नल ऑफ फार्मास्युटिकल रिसर्च' में एक भारतीय आयुर्वेदिक फार्मूले 'नीरी केएफटी' को गुर्दे के उपचार में उपयुक्त पाया गया. यह आयुर्वेदिक फार्मूला है लेकिन इसके इस्तेमाल से गुर्दा रोगियों में बड़ा सुधार देखा गया है. 'नीरी केएफटी' रक्त में सीरम क्रिएटिनिन, यूरिक एसिड तथा इलेक्ट्रोलेट्स के स्तर में सुधार करता है. इसलिए आजकुल गुर्दा रोगियों द्वारा बड़े पैमाने पर इसे टॉनिक के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है. क्या है नीरी केएफटी... नीरी केएफटी को 'एमिल फार्मास्युटिकल' द्वारा तैयार किया गया है. एमिल के अध्यक्ष कहते हैं कि इसमें पुनर्नवा नामक एक ऐसी बूटी है जो गुर्दे की क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को भी ठीक करती है. शिकागो स्थित 'लोयोला विश्वविद्यालय' के अध्ययनकर्ता डॉ. होली क्रमेर ने कहा कि ज्यादातर मरीजों को पता नहीं होता कि बीमारियों को नियंत्रित रखने में भोजन की क्या भूमिका है इसलिए अब आहार को गुर्दे की बीमारी के उपचार का हिस्सा बनाया जा रहा है. 'पुदुच्चेरी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज' के प्रोफेसर एवं नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. जी. अब्राहम भी इस शोध की पुष्टि करते हैं. उन्होंने एक शोध में पाया कि 42-77 फीसदी गुर्दा रोगी कुपोषण के शिकार थे. दरअसल, गुर्दे की बीमारी के चलते वह पर्याप्त भोजन नहीं ले रहे थे. कुछ अपनी मर्जी से तो कुछ घरवालों की सलाह पर ऐसा कर रहे थे. अब्राह्म कहते हैं कि यदि ऐसे मरीजों पर ध्यान केंद्रित किया जाए तथा उन्हें उचित पोषाहार मिले तो बीमारी को बढ़ने से रोका जा सकता है.
सेब में विटामिन ए, विटामिन सी, पोटेशियम, फाइबर, कार्बोहाइड्रेट्स मौजूद होता है. वहीं एक नॉर्मल साइज के सेब में करीबन 95 कैलोरी मौजूद होती हैं. सभी जानते हैं सेब सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होता है. लेकिन आपको सेब कितना फायदा पहुंचाएगा, ये इस बात पर निर्भर करता है कि आप इसे किस तरह खाते हैं. क्या आप सेब को छिलके के साथ खाते हैं या फिर उसे निकालकर? बता दें, कुछ लोग पेस्टिसाइड्स के डर से सेब के छिलके को निकालकर खाते हैं. लेकिन क्या आपने कभी ये जानने की कोशिश की है कि सेब को किस तरह खाना ज्यादा फायदेमंद होता है और क्यों... एक सेब के छिलके में लगभग 4.4 ग्राम फाइबर होता है. सेब के छिलके में सोल्यूबल (घुलनशील) और इंसोल्यूबल (अघुलनशील) दोनों तरह के फाइबर पाए जाते हैं, जिसमें 77 फीसदी इंसोल्यूबल फाइबर होता है. सेब के छिलके में मौजूद ये फाइबर कब्ज की समस्या को दूर करने में मददगार साबित होता है. इसके अलावा सोल्यूबल फाइबर ब्लड शुगर के स्तर को नॉर्मल रखता है. शरीर में न्यूट्रिएंट्स के एब्जोर्प्शन को स्थिर रखता है. साथ ही कोलेस्ट्रोल को भी कम करने में कारगर साबित होता है. विटामिन- एक सेब के छिलके में 8.4 मिलीग्राम विटामिन-सी और 29.4 माइक्रोग्राम विटामिन-ए पाया जाता है. लेकिन सेब का छिलका निकालने पर उसमें केवल 6.4 मिलीग्राम विटामिन-सी और 18.3 ग्राम विटामिन-ए ही रह जाता है. बता दें, पूरे सेब में मौजूद विटामिन-सी की लगभग आधी मात्रा इसके छिलके में ही होती है. इसलिए सेब को हमेशा छिलके के साथ ही खाएं. कैंसर से बचाव- साल 2007 में सामने आई 'कॉर्नेल यूनिवर्सिटी' की एक स्टडी की रिपोर्ट के मुताबिक, सेब के छिलके में triterpenoids कंपाउंड पाए जाते हैं. ये कंपाउंड कैंसर पैदा करने वाले सेल्स को नष्ट कर देते हैं. अमेरिकन इंस्टीट्यूट फॉर कैंसर रिसर्च' के मुताबिक, सेब में भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं, जो फेफड़ों में कैंसर के खतरे को कम कर देते हैं. सांस की समस्या दूर- एक स्टडी की रिपोर्ट में बताया गया था कि जो लोग एक हफ्ते में लगभग 5 या इससे ज्यादा सेब खाते हैं उनके फेफड़े ज्यादा अच्छी तरह से काम करते हैं. साथ ही इससे अस्थमा होने की संभावना भी बेहद कम हो जाती है. वजन कम होना- जो लोग अपना वजन कम करना चाहते हैं, उन्हें छिलकों के साथ ही सेब खाना चाहिए. दरअसल, सेब के छिलके में अर्सोलिक एसिड पाया जाता है. ये मांसपेशियों पर मौजूद फैट को बढ़ाता है, जो कैलोरी को कम कर के मोटापे को दूर करने में मददगार साबित होता है. सेब के छिलके के फायदे- यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनोइस के मुताबिक, सेब के छिलकों में पोटेशियम, कैल्शियम, फोलेट, आयरन और फास्फोरस मौजूद होता है. ये सभी मिनरल्स हड्डियों को मजबूत करने के साथ-साथ शरीर को अलग-अलग तरह से फायदा पहुंचाते हैं.

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