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नेशनल किडनी फाउंडेशन एंड द एकेडमी ऑफ न्यूट्रीशियन डाइटिक्स ने गुर्दे के मरीजों के लिए 'मेडिकल न्यूट्रीशियन थैरेपी' की सिफारिश की है. फाउंडेशन का कहना है कि यदि गुर्दा रोगियों को हर्बल पदार्थो से परिपूर्ण और बेहतर आहार मिले तो बीमारी को नियंत्रित किया जा सकता है. इस बारे में सर गंगाराम अस्पताल के नेफ्रोलॉजिस्ट मनीष मलिक कहते हैं कि यह सिफारिश महत्वपूर्ण इसलिए भी है, क्योंकि हाल में 'अमेरिकन जर्नल ऑफ फार्मास्युटिकल रिसर्च' में एक भारतीय आयुर्वेदिक फार्मूले 'नीरी केएफटी' को गुर्दे के उपचार में उपयुक्त पाया गया. यह आयुर्वेदिक फार्मूला है लेकिन इसके इस्तेमाल से गुर्दा रोगियों में बड़ा सुधार देखा गया है. 'नीरी केएफटी' रक्त में सीरम क्रिएटिनिन, यूरिक एसिड तथा इलेक्ट्रोलेट्स के स्तर में सुधार करता है. इसलिए आजकुल गुर्दा रोगियों द्वारा बड़े पैमाने पर इसे टॉनिक के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है. क्या है नीरी केएफटी... नीरी केएफटी को 'एमिल फार्मास्युटिकल' द्वारा तैयार किया गया है. एमिल के अध्यक्ष कहते हैं कि इसमें पुनर्नवा नामक एक ऐसी बूटी है जो गुर्दे की क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को भी ठीक करती है. शिकागो स्थित 'लोयोला विश्वविद्यालय' के अध्ययनकर्ता डॉ. होली क्रमेर ने कहा कि ज्यादातर मरीजों को पता नहीं होता कि बीमारियों को नियंत्रित रखने में भोजन की क्या भूमिका है इसलिए अब आहार को गुर्दे की बीमारी के उपचार का हिस्सा बनाया जा रहा है. 'पुदुच्चेरी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज' के प्रोफेसर एवं नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. जी. अब्राहम भी इस शोध की पुष्टि करते हैं. उन्होंने एक शोध में पाया कि 42-77 फीसदी गुर्दा रोगी कुपोषण के शिकार थे. दरअसल, गुर्दे की बीमारी के चलते वह पर्याप्त भोजन नहीं ले रहे थे. कुछ अपनी मर्जी से तो कुछ घरवालों की सलाह पर ऐसा कर रहे थे. अब्राह्म कहते हैं कि यदि ऐसे मरीजों पर ध्यान केंद्रित किया जाए तथा उन्हें उचित पोषाहार मिले तो बीमारी को बढ़ने से रोका जा सकता है.
सेब में विटामिन ए, विटामिन सी, पोटेशियम, फाइबर, कार्बोहाइड्रेट्स मौजूद होता है. वहीं एक नॉर्मल साइज के सेब में करीबन 95 कैलोरी मौजूद होती हैं. सभी जानते हैं सेब सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होता है. लेकिन आपको सेब कितना फायदा पहुंचाएगा, ये इस बात पर निर्भर करता है कि आप इसे किस तरह खाते हैं. क्या आप सेब को छिलके के साथ खाते हैं या फिर उसे निकालकर? बता दें, कुछ लोग पेस्टिसाइड्स के डर से सेब के छिलके को निकालकर खाते हैं. लेकिन क्या आपने कभी ये जानने की कोशिश की है कि सेब को किस तरह खाना ज्यादा फायदेमंद होता है और क्यों... एक सेब के छिलके में लगभग 4.4 ग्राम फाइबर होता है. सेब के छिलके में सोल्यूबल (घुलनशील) और इंसोल्यूबल (अघुलनशील) दोनों तरह के फाइबर पाए जाते हैं, जिसमें 77 फीसदी इंसोल्यूबल फाइबर होता है. सेब के छिलके में मौजूद ये फाइबर कब्ज की समस्या को दूर करने में मददगार साबित होता है. इसके अलावा सोल्यूबल फाइबर ब्लड शुगर के स्तर को नॉर्मल रखता है. शरीर में न्यूट्रिएंट्स के एब्जोर्प्शन को स्थिर रखता है. साथ ही कोलेस्ट्रोल को भी कम करने में कारगर साबित होता है. विटामिन- एक सेब के छिलके में 8.4 मिलीग्राम विटामिन-सी और 29.4 माइक्रोग्राम विटामिन-ए पाया जाता है. लेकिन सेब का छिलका निकालने पर उसमें केवल 6.4 मिलीग्राम विटामिन-सी और 18.3 ग्राम विटामिन-ए ही रह जाता है. बता दें, पूरे सेब में मौजूद विटामिन-सी की लगभग आधी मात्रा इसके छिलके में ही होती है. इसलिए सेब को हमेशा छिलके के साथ ही खाएं. कैंसर से बचाव- साल 2007 में सामने आई 'कॉर्नेल यूनिवर्सिटी' की एक स्टडी की रिपोर्ट के मुताबिक, सेब के छिलके में triterpenoids कंपाउंड पाए जाते हैं. ये कंपाउंड कैंसर पैदा करने वाले सेल्स को नष्ट कर देते हैं. अमेरिकन इंस्टीट्यूट फॉर कैंसर रिसर्च' के मुताबिक, सेब में भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं, जो फेफड़ों में कैंसर के खतरे को कम कर देते हैं. सांस की समस्या दूर- एक स्टडी की रिपोर्ट में बताया गया था कि जो लोग एक हफ्ते में लगभग 5 या इससे ज्यादा सेब खाते हैं उनके फेफड़े ज्यादा अच्छी तरह से काम करते हैं. साथ ही इससे अस्थमा होने की संभावना भी बेहद कम हो जाती है. वजन कम होना- जो लोग अपना वजन कम करना चाहते हैं, उन्हें छिलकों के साथ ही सेब खाना चाहिए. दरअसल, सेब के छिलके में अर्सोलिक एसिड पाया जाता है. ये मांसपेशियों पर मौजूद फैट को बढ़ाता है, जो कैलोरी को कम कर के मोटापे को दूर करने में मददगार साबित होता है. सेब के छिलके के फायदे- यूनिवर्सिटी ऑफ इलिनोइस के मुताबिक, सेब के छिलकों में पोटेशियम, कैल्शियम, फोलेट, आयरन और फास्फोरस मौजूद होता है. ये सभी मिनरल्स हड्डियों को मजबूत करने के साथ-साथ शरीर को अलग-अलग तरह से फायदा पहुंचाते हैं.
इस बार का सावन महीना अपने साथ कई श्रेष्ठ संयोग लेकर आया है। पहला संयोग यह कि सावन इस बार शनिवार से शुरू हुआ है, जो अपने आप में खास होता है। दूसरे इस बार सावन में 5 सोमवार होंगे और तीसरे यह कि ऐसा 19 साल बाद संयोग बना है, जब सावन का महीना पूरे 30 दिनों का होगा। इन सबसे अलग कई शुभ मुहूर्त बन रहे है, जो सावन में शिव भक्तों को खुशियों से सराबोर कर रहे हैं… सावन का पहला सोमवार इस सावन का पहला सोमवार 30 जुलाई को है। इस दिन सौभाग्य योग बन रहा है। सौभाग्य योग बहुत शुभ और मंगलकारी माना जाता है। विवाह का मुहूर्त निकालते समय इस योग का विशेष महत्व होता है। मान्यता है कि इस मुहूर्त में शादी करने से गृहस्थ जीवन सुखमय रहता है। वहीं सावन के सोमवार में इस मुहूर्त में पति-पत्नी साथ में शिवलिंग की पूजा करें तो उन्हें भोले भंडारी सहित मां पार्वती की भी विशेष कृपा प्राप्त होती है। कैसे करें पूजा? पति-पत्नी या प्रेमी युगल अपने रिश्तों में बेहतर तालमेल के लिए सोमवार को शिवलिंग की पूजा करें। अविवाहित लोग मनचाहे जीवनसाथी की कामना के साथ शिवलिंग का पूजन कर शिव कृपा प्राप्त कर सकते हैं। पूजा करते समय इन बातों का ध्यान रखें… -शिवलिंग पर सबसे पहले गंगाजल चढ़ाएं। यदि गंगाजल उपलब्ध न हो तो ताजा जल तांबे के लोटे में भरकर शिवलिंग पर अर्पित करें। – इसके बाद दूध, दही, शहद,चावल शिवलिंग पर अर्पित करें। – फिर बेल के पत्ते, ताजे फलों और फूलों से शिवलिंग का श्रृंगार करें या शिवजी पर अर्पित करें। – शिवलिंग पर चंदन, रोली और अक्षत से टीका लगाएं और प्रसाद चढ़ाएं। प्रसाद में मिश्री, मीठे बताशे या मीठा इलायचीदाना रख सकते हैं। – शिवलिंग के सामने दीया-धूप करें और शिवजी की आरती कर प्रसाद सभी में बांट दें और खुद भी खाएं। दिन भर मन को साफ रखें, किसी के लिए गलत विचार मन में न लाएं और शिवजी से सुखमय जीवन के लिए प्रार्थना करें। दो बार सावन की शुरुआत क्यों? हमारे देश में कई संस्कृतियां एक साथ प्रेम-पूर्वक रहती हैं। देश के कई राज्यों में संक्रांति के साथ ही सावन की शुरुआत मानी जाती है। इस साल संक्रांति 16 जुलाई को थी। ऐसे में जिन लोगों के यहां संक्रांति से सावन की शुरुआत मानी जाती है, उनके लिए सावन का पहला सोमवार 23 जुलाई को था। संक्रांति से सावन की शुरुआत की मान्यता ज्यादातर पहाड़ी इलाकों जैसे उत्तराखंड, हिमाचल इत्यादि में है। जबकि ज्यादातर मैदानी इलाकों में सावन की शुरुआत पूर्णिमा से मानी जाती है, जो 27 जुलाई को थी। ऐसे में मैदानी क्षेत्रों में सावन का पहला सोमवार 30 जुलाई को मनाया जाएगा। संक्रांति की गणना के हिसाब से इस साल सावन में 5 सोमवार हैं। कुंवारों और गृहस्थों के लिए क्यों महत्वपूर्ण? सावन का महीना हर चराचर जीव के लिए महत्वपूर्ण है। युवा, वयस्क और वृद्ध अपनी-अपनी जरूरतों और इच्छाओं की पूर्ति के लिए शिव-पार्वती को मनाते हैं। मान्यता है कि सावन के सोमवार का व्रत कर कुंवारे युवक-युवतियां शिवजी से मनचाहे जीवनसाथी का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। वहीं, शादीशुदा लोग बेहतर गृहस्थी के लिए भोले को पूजते हैं तो वृद्ध बच्चों की तरक्की और अपने लिए मोक्ष की कामना के साथ सावन में शिव की भक्ति करते हैं। इसलिए सावन का महीना और विशेषकर सावन के सोमवार को हमारी देश में खास माना जाता है। क्योंकि धर्मशास्त्रों के अनुसार, सोमवार शिवजी के पूजन का दिन होता है।
नई दिल्ली,स्वाद और सेहत के लिए आप आलू तो खाते ही होंगे लेकिन क्या आपने कभी आलू का छिलका खाने के बारे में सोचा है? अगर अब तक नहीं सोचा है तो अब सोचिए. ज्यादातर घरों में आलू को छिलने के बाद छिलके को कूड़े मे फेंक दिया जाता है. लेकिन अगर आप आम के आम और गुठलियों के दाम वसूलना चाहते हैं तो आलू के साथ ही उसके छिलके को भी यूज करना शुरू कर दें. जितनी बार भी आपके घर में आलू की सब्जी बने, छिलके को कंज्यूम करें. आलू के छिलके को अलग-अलग तरह से यूज करके आप बहुत सी बीमारियों से सेफ रह सकते हैं और मेडिसिन का खर्च भी बचा सकते हैं. आप सोच रहे होंगे कि आलू के छिलकों को कंज्यूम कैसे किया जाए. आलू के छिलकों को उबालकर कंज्यूम किया जा सकता है. आपने अगर अब तक ये ट्राई नहीं किया है तो आपको बता दें कि आलू के छिलके खाने में बुरे नहीं लगते और इनका अरोमा भी काफी अच्छा होता है. अब जानते हैं आलू के छिलके को खाने से क्या-क्या फायदे हो सकते हैं.. 1. ब्लड प्रेशर को रेग्युलेट करने के लिए आलू में अच्छी-खासी मात्रा में पोटैशि‍यम पाया जाता है. पोटैशियम ब्लड प्रेशर को रेग्युलेट करने में हेल्प करता है. 2. मेटाबॉलिज्म के लिए भी अच्छे हैं छिलके आलू के छिलके मेटाबॉलिज्म को भी सही रखने में मददगार हैं. एक्सपर्ट्स की मानें तो आलू के छिलके खाने से नर्व्स को मजबूती मिलती है. 3. एनीमिया से सेफ रखने में अगर आप आयरन की कमी से जूझ रहे हैं तो बाकी सब्ज‍ियों के साथ आलू के छिलके खाना बहुत फायदेमंद रहेगा. आलू के छिलके में आयरन की अच्छी मात्रा होती है जिससे एनीमिया होने का खतरा कम हो जाता है. 4. आलू के छिलके खाने से आती है ताकत आलू के छिलके में भरपूर मात्रा में विटामिन बी3 पाया जाता है. विटामिन बी3 ताकत देने का काम करता है. इसके अलावा इसमें मौजूद नैसीन कार्बोज को एनर्जी में कंवर्ट करता है. 5. फाइबर से भरपूर हमारी डाइट में फाइबर की कुछ मात्रा जरूर होनी चाहिए. एक ओर जहां आलू में भरपूर मात्रा में फाइबर पाया जाता है वहीं इसके छिलके में भी अच्छी मात्रा में फाइबर्स होते हैं. ये डाइजेस्ट‍िव सिस्टम को भी बूस्ट करने का काम करता है.
नई दिल्ली, अखरोट ऊर्जा का एक बहुत अच्छा स्त्रोत है. इसके अलावा इसमें मौजूद लवण, एंटी-ऑक्सीडेंट, ओमेगा-3 फैटी एसिड और विटामिन शरीर की पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करने का काम करते हैं. यूं तो अखरोट का सेवन कभी भी और कोई भी कर सकता है लेकिन गर्भावस्था में इसका इस्तेमान करना खासतौर पर फायदेमंद होता है. गर्भावस्था में महिला को बहुत देखभाल की जरूरत होती है. देखभाल के साथ ही उसके आहार का भी विशेष ख्याल रखना होता है. ऐसे में अखरोट का सेवन मां और गर्भ में पल रहे बच्चे, दोनों के लिए ही फायदेमंद होता है. गर्भावस्था में अखरोट खाने के फायदे: 1. गर्भावस्था में अखरोट खाने से कोलेस्ट्रॉल बढ़ने नहीं पाता है जिससे ब्लड प्रेशर भी नियंत्रित रहता है. 2. अखरोट में मौजूद कई प्रकार के पोषक लवण पाए जाते हैं. अखरोट में पाया जाने वाला कॉपर गर्भ में बच्चे के विकास को प्रेरित करता है. 3. गर्भावस्था में अखरोट के सेवन से कई प्रकार के संक्रमण से सुरक्षा मिलती है. इस दौरान मां का स्वस्थ होना बहुत जरूरी होता है. एक छोटा सा भी इंफेक्शन मां और बच्चे के लिए जानलेवा साबित हो सकता है. अखरोट रोग प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत बनाने का काम करता है. 4. अखरोट में भरपूर मात्रा में फाइबर होते हैं. जो पाचन क्रिया के लिए बहुत ही फायदेमंद होता है. 5. गर्भावस्था के दौरान ज्यादातर महिलाओं को नींद नहीं आने की शिकायत हो जाती है. अखरोट खाने से नींद अच्छी आती है. अखरोट खाने से गर्भवती महिलाओं में मेलाटोनिन नाम का हॉर्मोन बनता है जिससे उन्हें अच्छी नींद आती है.
नई दिल्ली, तुलसी एक ऐसी जड़ी-बूटी है जो कहीं भी आसानी से मिल जाती है. तुलसी में एक या दो नहीं बल्क‍ि कई औषधीय गुण पाए जाते हैं. किसी भी समय और किसी भी उम्र में तुलसी के पत्तों का सेवन किया जा सकता है. ये हर उम्र के लिए फायदेमंद है. कई प्रकार के विटामिन, खनिज और पोषक तत्वों से भरपूर तुलसी का इस्तेमाल गर्भावस्था में भी करना फायदेमंद होता है. गर्भावस्था में इसके सेवन से कई तरह की बीमारियों और संक्रमण होने का खतरा कम हो जाता है. तुलसी में हीलिंग का गुण पाया जाता है. इसकी पत्त‍ियों में एंटी-बैक्टीरियल गुण होता है. इसके साथ ही ये पत्ति‍यां एंटी-वायरल और एंटी-फंगल गुणों से भी भरपूर होती हैं. तुलसी के पत्तों के नियमित सेवन से ढलती उम्र के लक्षण जल्दी सामने नहीं आते और कई खतरनाक बीमारियों से लड़ने में भी मदद मिलती है. गर्भावस्‍था में तुलसी का सेवन करना बहुत फायदेमंद है. ये एक सुपरफूड है. गर्भावस्था में तुलसी के पत्ते खाने के फायदे: 1. एनिमिया के खतरे को कम करने में मददगार गर्भावस्था में एनिमिया होने का खतरा बढ़ जाता है. जिन महिलाओं को गर्भावस्था में खून की कमी हो जाती है उन्हें कई दूसरी समस्याएं भी होने का खतरा बढ़ जाता है. ऐसे में हर रोज तुलसी की कुछ पत्त‍ियों के सेवन से इस खतरे को कम किया जा सकता है. ये लाल रक्त कण‍िकाओं को बढ़ाने का काम करता है. 2. थकान दूर करने में मददगार गर्भावस्था में थकान महसूस होना एक सामान्य बात है. इस दौरान तुलसी की पत्त‍ियों के सेवन से ऊर्जा मिलती है और सुबह आने वाले चक्कर और कमजोरी में फायदा होता है. 3. विटामिन के का अच्छा माध्यम तुलसी के पत्तों में भरपूर मात्रा में विटामिन के पाया जाता है. विटामिन के रक्त का थक्का जमाने में सहायक होता है. 4. भ्रूण के विकास में सहायक गर्भ में पल रहे बच्चे के लिए तुलसी काफी फायदेमंद है. इसमें मौजूद विटामिन ए बच्चे के विकास के लिए एक आवश्यक तत्व है. ये तंत्रिका तंत्र के विकास में भी महत्वपूर्ण है. 5. संक्रामक रोगों से सुरक्षा गर्भावस्था में कई तरह की बीमारियों के होने का खतरा बना रहता है. इस दौरान तुलसी के पत्तों के सेवन से कई तरह की संक्रामक बीमारियों के होने का खतरा कम हो जाता है.
नई दिल्ली निपाह वायरस की चपेट में आने से केरल में लगभग 13 लोगों की मौत हो चुकी है और करीब 40 लोग इससे प्रभावित हैं। निपाह वायरस स्वाभाविक रूप से कश्ज़रुकी जानवरों से मनुष्यों तक फैलती है। यह रोग 2001 में और फिर 2007 में पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में भी सामने आया था। इस बात की पुष्टि हो चुकी है कि केरल के बाहर के लोगों को केवल तभी सावधान रहना चाहिए जब वे प्रभावित क्षेत्रों की यात्रा कर रहे हों या किसी संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आ रहे हों। ऐसे में कुछ आसान उपाय अपनाकर निपाह वायरस से बचा जा सकता है। निपाह संक्रमण के लिए कोई प्रभावी उपचार नहीं हार्ट केयर फाउंडेशन (HCFI) के अध्यक्ष डॉ. के.के.अग्रवाल ने कहा, ‘क्लिनिकल तौर पर देखें तो निपाह वायरस के संक्रमण के लक्षणों की शुरुआत इंसेफेलाइटिक सिंड्रोम से होती है जिसमें बुखार, सिरदर्द, म्यालगिया की अचानक शुरुआत, उल्टी, सूजन, विचलित होना और मानसिक भ्रम शामिल है। संक्रमित व्यक्ति 24 से 48 घंटों के भीतर कोमा में जा सकता है। निपाह इंसेफेलाइटिस की मृत्यु दर 9 से 75 प्रतिशत तक है। निपाह वायरस संक्रमण के लिए कोई प्रभावी उपचार नहीं है। उपचार का मुख्य आधार बुखार और तंत्रिका संबंधी लक्षणों के प्रबंधन पर केंद्रित है। संक्रमण नियंत्रण उपाय महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि व्यक्तिगत रूप से यह ट्रांसमिशन से हो सकता है। गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति को गहन देखभाल की आवश्यकता है।’ बीमारी से बचने के लिए जरूरी सुझाव -सुनिश्चित करें कि आप जो खाना खाते हैं वह चमगादड़ या उनके मल से दूषित न हो। - चमगादड़ या किसी भी पक्षी या जानवर के कुतरे फलों को खाने से बचें। - ताड़ के पेड़ के पास खुले कंटेनर में बनी शराब पीने से बचें। - बीमारी से पीड़ित किसी भी व्यक्ति के संपर्क में आने से बचें। - अपने हाथों को अच्छी तरह से धोएं। - शौचालय के बाल्टी और मग को अच्छी तरह से साफ करें। - रोगी के लिए उपयोग किए जाने वाले कपड़े, बर्तन और सामान को अलग से साफ करें।
लखनऊ माइग्रेन का नाम सुनते ही दिमाग में सिर दर्द की तस्वीर आ जाती है। लेकिन क्या आपको पता है कि माइग्रेन के कारण पेट दर्द की समस्या भी हो सकती है। जी हां, माइग्रेन सिर्फ सिर में ही नहीं, बल्कि पेट में भी हो सकता है। पेट में होने वाले माइग्रेन को ऐब्डॉमिनल माइग्रेन कहते हैं और इसकी वजह से आपको तेज दर्द, मरोड़, थकान और उल्टी हो सकती है। किनको होता है खतरा पेट का माइग्रेन आमतौर पर अनुवांशिक होता है और छोटे बच्चों को होता है। इसका सबसे ज्यादा खतरा उन बच्चों को होता है जिनके माता-पिता पहले से माइग्रेन के शिकार हैं। बच्चों में भी इस तरह के माइग्रेन के मामले सबसे ज्यादा लड़कियों में देखे गए हैं। जिन बच्चों को बचपन में एब्डॉमिनल माइग्रेन की शिकायत होती है, बड़े होकर उन्हें सिर का माइग्रेन होने की संभावना भी बहुत ज्यादा होती है। ऐब्डॉमिनल माइग्रेन का कारण ऐब्डॉमिनल माइग्रेन के सही-सही कारण का अब तक पता नहीं लगा है, लेकिन डॉक्टर मानते हैं कि शरीर में बनने वाले दो कंपाउंड हिस्टामाइन और सेरोटोनिन इस तरह के दर्द के जिम्मेदार होते हैं। शरीर में ये दोनों ही कंपाउंड ज्यादा चिंता करने और अवसाद के कारण बनते हैं। चाइनीज फूड्स और इंस्टैंट नूडल्स में इस्तेमाल होने वाला मोनोसोडियम ग्लूटामेट या एमएसजी, प्रोसेस्ड मीट और चॉकलेट के ज्यादा सेवन से भी शरीर में ये कंपाउंड बनते हैं। कई बार ज्यादा मात्रा में हवा निगल लेने के कारण भी ऐब्डॉमिनल माइग्रेन की समस्या हो सकती है। लक्षण- 1. पेट में तेज दर्द की समस्या 2. पेट का रंग पीला दिखाई देना 3. दिनभर थकान और सुस्ती 4. भूख कम लगना और खाने-पीने का मन न करना 5. आंखों के नीचे काले घेरे आना 6. आमतौर पर ऐब्डॉमिनल माइग्रेन के लक्षण पहले से नहीं दिखाई देते हैं। कई बार ऐब्डॉमिनल माइग्रेन का दर्द आधे घंटे में ही ठीक हो जाता है और कई दफा 2-3 दिन तक बना रहता है।
कुछ लोग सुबह सुबह उठते ही पहले चाय पीते हैं. कुछ लोग गरम पानी पीते हैं तो कुछ लोग ठंडा पानी पीते हैं. यह पीने से उनकी उस दिन से किस्मत तय होती है. क्यों न सुबह कुछ ऐसा पिएं जिससे आपकी ग्रह अच्छे हो जाएं और किस्मत चमक जाएं मेष- अदरक वाली चाय या बहुत कम अदरक डालकर पानी पिएं. वृष- दूधवाली चाय या थोड़ी मिश्री या एक चम्मच दही डालकर पानी पिएं. मिथुन- हरी इलायची वाली चाय या एक तुलसी पत्र डालकर पानी पिएं. कर्क- मिश्री डालकर दूध वाली चाय या बहुत कम दही डालकर पानी पिएं. सिंह- दालचीनी डालकर दूधवाली चाय या थोड़ी गुड़ डालकर पानी पिएं कन्या- पुदीने वाली चाय या एक चुटकी सौंफ डालकर पानी पीएं. तुला- एक दाना सूखा धनिया डालकर ग्रीन वाली चाय या एक चुटकी अजवाइन डालकर पानी पिएं. वृश्चिक- एक कड़ी पत्ते डालकर गुड़ वाली चाय या आधा चम्मच शहद डालकर पानी पिएं. धनु- एक दाना केसर वाली चाय या एक एक दाना मेथी चबा कर पानी पिएं. मकर- एक लौंग वाली चाय या एक चुटकी तिल चबा कर पानी पिएं. कुम्भ- एक दाना काली मिर्च वाली चाय या थोड़ी एक दाना काला जीरा डालकर पानी पिएं. मीन- एक तेजपत्ते वाली चाय या एक छोटा टुकड़ा कच्ची हल्दी चबाकर कर पानी पिएं.
नई दिल्ली डॉक्टर्स की फी दिनोंदिन बढ़ती ही जा रही है। ऐसे में जेब पर यह भारी पड़ने लगी है। हॉस्पिटल में ओपीडी खर्चों के लिए अब इंश्योरेंस कवर की जरूरत पड़ने लगी है। रेग्लुलर हेल्थ इंश्योरेंस का फायदा तभी मिलता है जब हॉस्पिटलाइजेशन की जरूत पड़ती है। ओपीडी के माध्यम से इलाज या कंसल्टेशन का खर्च खुद वहन करना पड़ता है। लेकिन OPD प्लान प्रीमियम में आपको इस खर्च से भी राहत मिल जाती है। ओपीडी खर्चों में राहत को लेकर तमाम इंश्योरेंस कंपनियां अलग-अलग तरह के लाभ वाली पॉलिसी लेकर आई हैं। अपोलो म्यूनिख का हेल्थ वॉलेट रिजर्व बेनिफिट के रूप में OPD खर्चों के लिए भुगतान करता है। इसका इस्तेमाल फार्मेसी बिल, डेंटल ट्रीटमेंट, डायग्नोस्टिक टेस्ट, कंसल्टेशन जैसे खर्चों के लिए किया जा सकता है। बिना इस्तेमाल वाला बेनिफिट अगले वर्ष में चला जाता है और 6 पर्सेंट का क्यूमुलेटिव बोनस मिलता है। मैक्स बुपा की गोएक्टिव पॉलिसी एक बरस में प्रति अडल्ट 2500 रुपये तक के वार्षिक मेडिकल चेक-अप, डायग्नोस्टिक्स और 10 कैशलेस OPD कंसल्टेशन (500-600 रुपये प्रति कंसल्टेशन की लिमिट) का भुगतान करती है। यूनिवर्सल सॉम्पो के OPD बेनिफिट में चश्मे, कॉन्टैक्ट लेंस और हियरिंग ऐड के खर्चों को कवर किया जाता है। यूनिवर्सल सॉम्पो के चेयरमैन, ओ एन सिंह ने बताया, ‘इसमें बिना किसी अतिरिक्त प्रीमियम के तीन वर्ष का वेटिंग पीरियड है। सब-लिमिट सम एश्योर्ड के 1 पर्सेंट से चुने गए प्लान के अनुसार 7,500 रुपये की अधिकतम लिमिट तक है।’ पॉलिसीहोल्डर इसके तहत भुगतान ओरिजिनल प्रेस्क्रिप्शन और बिल जमा कर ले सकते हैं। ICICI लोम्बार्ड और स्टार हेल्थ के इस तरह के प्रॉडक्ट पहले से मौजूद हैं, जिनमें OPD का हिस्सा प्रीमियम स्लैब और सम एश्योर्ड पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए, अगर आप स्टार हेल्थ गेन पॉलिसी के तहत 5 लाख रुपये का सम एश्योर्ड और 15,000 रुपये का प्रीमियम स्लैब चुनते हैं तो आपका OPD कंपोनेंट 8,635 रुपये होगा। इसके साथ कैरी फॉरवर्ड बेनिफिट भी मौजूद है। OPD कवरेज अच्छा बेनिफिट है, लेकिन यह महंगा भी है। आपको अपनी हेल्थ से जुड़ी जरूरतों और उम्र को ध्यान में रखकर यह आकलन करना होगा कि क्या यह बेनिफिट इसकी कॉस्ट के लिहाज से सही है। पॉलिसी लेते समय सब-लिमिट और केवल नेटवर्क में आने वाले हॉस्पिटल में इलाज करवाने की शर्तों का ध्यान रखें। आप चाहें तो OPD कवरेज लेने के बजाय इन्फ्लेशन का मुकाबला करने और मेडिकल से जुड़े खर्चों के लिए फंड को एक फिक्स्ड डिपॉजिट या लिक्विड फंड में रख सकते हैं। सभी प्रकार के कर समेत प्रीमियम। ICICI लोम्बार्ड कंप्लीट हेल्थ इंश्योरेंस (ऑप्शन A) चुने गए प्लान के हिसाब से आउटपेशेंट पर होने वाले खर्च को रीइम्बर्स करता है। अपोलो म्यूनिख हेल्थ वॉलेट का सम इंश्योर्ड और रिजर्व बेनिफिट अलग है, इसका इस्तेमाल OPD खर्च पर हो सकता है। मैक्स बुुपा गोएक्टिव का OPD कंसल्टेशन फी जोन-1 में 600 रुपये और जोन-2 में 500 रुपये है। स्रोत: COVERFOX nbt

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