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जींद, 21 जनवरी 2019, खेती-किसानी के साथ विकास की दौड़ में जब हुक्का जगह-जगह गुड़गुड़ाता दिखे, तो समझ जाइए कि आप हरियाणा में हैं. हरियाणा की धरती पर एक वक्त तीन लालों का दबदबा था- भजनलाल, बंसीलाल और देवीलाल. लेकिन आज देवीलाल परिवार विरासत की जंग से जूझ रहा है और जींद के उपचुनाव का फैसला तय करने वाला है कि देवीलाल की विरासत किसकी होगी. दरअसल, देवीलाल ने अपनी विरासत ओमप्रकाश चौटाला को सौंपी थी, लेकिन अब ओमप्रकाश चौटाला के बेटे अजय और अभय आमने-सामने आ गए हैं. ओमप्रकाश चौटाला ने अपनी पार्टी इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) की कमान अपने बेटे अभय चौटाला के सुपुर्द कर दी तो अजय ने नई जननायक जनता पार्टी बना ली. इसके बाद अजय चौटाला के छोटे बेटे दिग्विजय ने पार्टी बनने के बाद जींद उपचुनाव से ताल ठोंककर दादा देवीलाल की विरासत पर अपना दावा भी ठोंक दिया. कप-प्लेट चुनाव चिन्ह लेकर वह इनेलो के ऐनक चुनाव चिन्ह के खिलाफ मैदान में हैं. जाटलैंड में दिग्विजय दावा करते हैं कि देवीलाल युगपुरुष थे और जींद की विरासत पर हक को लेकर जनता जबाब देगी. वैसे दिग्विजय चुटकी लेना नहीं भूलते कि चुनाव नतीजे आएंगे तो उनके दादा ओपी चौटाला को भी सुकून होगा. वैसे जींद का उपचुनाव अगर चौटाला परिवार के लिए विरासत की जंग है तो कांग्रेस के लिए भी वापसी की बड़ी कोशिश है. वर्षों से हरियाणा की सत्ता पर काबिज कांग्रेस पिछले चुनाव में राज्य में तीन नंबर की पार्टी हो गई. जींद से इनेलो विधायक के निधन के बाद बीजेपी ने उनके बेटे कृष्ण मिड्ढा को उम्मीदवार बना दिया. इलाके के मजबूत नेता जयप्रकाश उर्फ जेपी कांग्रेस छोड़ बगल की सीट से निर्दलीय विधायक बन गए. ऐसे में उपचुनाव में कांग्रेस को खोजने पर भी जिताऊ उम्मीदवार नहीं मिल रहा था. खस्ताहाल कांग्रेस पार्टी ने आखिरकार हरियाणा में वापसी की आस में जींद जिले की कैथल सीट से विधायक, कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रभारी और राहुल गांधी के करीबी रणदीप सुरजेवाला को उम्मीदवार बनाकर मुकाबले को रोचक बना दिया. दरअसल, जब जींद का मसला राहुल गांधी के सामने आया तो मजबूत उम्मीदवार नहीं होने की बात सभी ने कही. इस बीच पार्टी में लगातार बढ़ते कद के चलते सुरजेवाला राज्य के नेताओं की नजरों में खटक रहे थे. ऐसे में बाकी नेताओं ने सुरजेवाला को जींद के चक्रव्यूह में अभिमन्यु बनाकर सियासी शहीद बनाने की व्यूह रचना की, लेकिन सुरजेवाला ने सबको चौंकाते हुए राहुल के सामने चुनौती स्वीकार कर ली. इसके साथ ही पार्टी नेताओं से पहले इलाके के बाहुबली और पहले कांग्रेस में रहे जेपी को साधने के लिए राहुल गांधी ने अहमद पटेल का सहारा लिया और कामयाब हुए. अहमद पटेल से मिलने के बाद अब जेपी सुरजेवाला से अपनी पुरानी अदावत भूलकर उनके मददगार बन गए हैं और खुलकर इसका ऐलान भी कर रहे हैं. वहीं, अर्जुन की तरह कुरुक्षेत्र जीतने का ख्वाब लिए सुरजेवाला अभिमन्यु बनाए जाने के सवाल पर कहते हैं कि, वह भगवान से अपनी तुलना तो नहीं करते, लेकिन हरियाणा के कुरुक्षेत्र में अभिमन्यु नहीं, बल्कि कृष्ण की भूमिका में हैं. हालांकि, दिग्विजय हों या बीजेपी के मिड्डा, दोनों ही सुरजेवाला को बाहरी बताते हैं. जिस पर पलटवार करते हुए कांग्रेसी कहते हैं कि जनता तो सुरजेवाला को भारी उम्मीदवार मानती है. विपक्षी उम्मीदवार भी जब बाहरी कहते हैं तो जनता पलटकर भारी बता देती है. पिता के प्रति सहानुभूति लहर के साथ सत्तारूढ़ बीजेपी के उम्मीदवार डॉक्टर कृष्ण मिड्डा कहते हैं कि खट्टर सरकार की साख का सवाल तो तब आता जब कोई मुकाबला होता, यहां तो बीजेपी की जीत तय है. मिड्डा साफ कहते हैं कि मोदी सरकार के आने के बाद फिजा बदली है और यहां भी उसका फायदा ही होगा.
नई दिल्ली, हरियाणा में मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और उनकी सरकार के कामकाज को लेकर बीते तीन महीने में वोटरों की राय कुछ सुधरी है. वहीं गुड़गांव भूमि घोटाले में आरोपों को लेकर कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा को नुकसान होता दिख रहा है. इंडिया टुडे ग्रुप के लिए एक्सिस माई इंडिया की ओर से पॉलिटिकल स्टॉक एक्सचेंज PSE सर्वे के डेटा के मुताबिक खट्टर को 35% प्रतिभागियों ने मुख्यमंत्री के लिए पहली पसंद बताया. वहीं हुड्डा को 28% प्रतिभागियों ने मुख्यमंत्री के लिए अपनी पसंद बताया. बता दें कि तीन महीने पहले हुए PSE सर्वे में खट्टर और हुड्डा को बराबर यानी 33%-33% लोगों ने मुख्यमंत्री के लिए अपनी पसंद बताया था. हरियाणा में मनोहर लाल खट्टर के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार के कामकाज को लेकर PSE सर्वे में 32% प्रतिभागियों ने खुद को संतुष्ट बताया. तीन महीने पहले हुए सर्वे में ये आकंड़ा 30% था. हालांकि ताजा सर्वे में भी राज्य सरकार के कामकाज से असंतुष्ट वोटरों की संख्या ज्यादा है. PSE सर्वे में 35% वोटरों ने खट्टर सरकार के कामकाज से खुद को असंतुष्ट बताया. अक्टूबर PSE सर्वे में 42% प्रतिभागियों ने खुद को राज्य सरकार के कामकाज से असंतुष्ट बताया था. इसके मायने हैं कि बीते तीन महीने में हरियाणा की बीजेपी सरकार के कामकाज को लेकर वोटरों की नाराजगी पहले की तुलना में कम हुई है. जहां तक केंद्र में बीजेपी सरकार के कामकाज का सवाल है तो ताजा PSE सर्वे में 43% वोटरों ने खुद को संतुष्ट बताया. तीन महीने पहले ये आंक़ड़ा 40% पर था. हरियाणा में केंद्र की बीजेपी सरकार के कामकाज को लेकर सर्वे में 28% प्रतिभागियों ने खुद को असंतुष्ट बताया. अक्टूबर PSE में ऐसे प्रतिभागी 31% थे. प्रधानमंत्री के लिए लोकप्रियता के मामले में नरेंद्र मोदी ने राहुल गांधी पर भारी बढ़त बनाई हुई है. बीते तीन महीने में मोदी की लोकप्रियता में जहां 2% का इजाफा हुआ है वहीं राहुल की लोकप्रियता 4% गिरी है. ताजा PSE सर्वे में 56% प्रतिभागियों ने मोदी को पीएम के लिए पहली पसंद बताया. तीन महीने पहले हुए सर्वे में ये आंकड़ा 54% था. वहीं राहुल को ताजा PSE सर्वे में 31% वोटरों ने पहली पसंद बताया. तीन महीने पहले सर्वे में 35% वोटरों ने राहुल को पीएम के लिए अपनी पसंद बताया था. PSE सर्वे में 5% प्रतिभागियों ने अरविंद केजरीवाल को भी पीएम के लिए अपनी पसंद बताया. हरियाणा में मुख्यमंत्री को लेकर मनोहर लाल खट्टर वोटरों की पहली पसंद हैं. ताजा PSE सर्वे में खट्टर को 35% प्रतिभागियों ने मुख्यमंत्री के लिए पहली पसंद बताया. अक्टूबर PSE सर्वे में 33% वोटरों ने खट्टर को पहली पसंद बताया था. ताजा सर्वे में कांग्रेस नेता भूपिंदर सिंह हुड्डा को 28% ने मुख्यमंत्री के लिए अपनी पसंद बताया. बीते तीन महीने में हुड्डा की लोकप्रियता में 5% की गिरावट हुई है. अक्टूबर PSE सर्वे में 33% प्रतिभागियों ने खट्टर के बराबर ही हुड्डा को मुख्यमंत्री के लिए पहली पसंद बताया था. PSE सर्वे में जब किसान प्रतिभागियों से पूछा गया कि क्या पिछले चार सालों में किसानों की स्थिति में सुधार हुआ तो 39% प्रतिभागियों ने हां में जवाब दिया. वहीं 26% का कहना था कि किसानों की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ. PSE सर्वे से सामने आया कि हरियाणा में सबसे ज्यादा वोटर रोजगार के अवसर को सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा मानते हैं. 28% प्रतिभागियों ने इसे सबसे अहम मुद्दा बताया. वहीं 20% वोटरों की नज़र में महंगाई और 18% के मुताबिक कृषि और किसानों की दिक्कतें अहम मुद्दे हैं. PSE सर्वे से सामने आया कि कुछ महीने बाद होने वाले लोकसभा चुनाव में राम मंदिर निर्माण का मुद्दा वोटरों को प्रभावित करेगा. सर्वे में जब पूछा गया कि क्या आप आने वाले चुनाव में अयोध्या में राममंदिर निर्माण पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ध्यान रखते हुए वोट करेंगे तो 54% ने हां में जवाब दिया. वहीं 24% प्रतिभागियों का जवाब नहीं था. 22% वोटरों ने इस सवाल पर कोई स्पष्ट राय व्यक्त नहीं की. PSE सर्वे में 46% प्रतिभागियों ने राय व्यक्त की कि बीजेपी सरकार को अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए अध्यादेश (क़ानून) लाना चाहिए. वहीं 20% प्रतिभागियों ने कहा कि अध्यादेश नहीं लाना चाहिए. इस सवाल पर 34% वोटर कोई स्पष्ट राय व्यक्त नहीं कर सके. PSE ताजा सर्वे में 47% प्रतिभागियों ने माना कि गुड़गांव भूमि घोटाले में कांग्रेस नेता भूपिंदर सिंह हुड्डा के खिलाफ आरोप उन्हें राजनीतिक रूप से नुकसान पहुंचा सकते हैं. 22% वोटरों की राय में ऐसे आरोप से हुड्डा को राजनीतिक तौर पर नुकसान नहीं पहुंचेगा. इस मुद्दे पर 31% प्रतिभागी कोई स्पष्ट राय नहीं व्यक्त कर सके. आम आदमी पार्टी (AAP) के हरियाणा में चुनाव लड़ने के फैसले को लेकर भी PSE में प्रतिभागियों की राय जानी गई. 23% वोटरों ने राय व्यक्त की कि AAP चुनाव जीत सकती है. 28% वोटरों का कहना था कि AAP के चुनाव लड़ने से कांग्रेस को नुकसान हो सकता है. सर्व में 15% प्रतिभागियों की राय में AAP के चुनाव लड़ने से इंडियन नेशनल लोकदल को नुकसान हो सकता है. वहीं 34% वोटर मानते हैं कि AAP के चुनावी ताल ठोकने से बीजेपी को नुकसान हो सकता है. एक्सिस माई इंडिया की ओर से PSE सर्वे 2 जनवरी से 9 जनवरी 2019 के बीच किया गया. इस दौरान हरियाणा के सभी 10 संसदीय क्षेत्रों में टेलीफोन से इंटरव्यू लिए गए. इसमें 1,024 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया.
चंडीगढ़ पंजाब आम आदमी पार्टी (आप) के एक और नेता मास्टर बलदेव ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। वह जैतो से विधायक थे। बीते कुछ महीनों से एक के बाद एक नेताओं के पार्टी छोड़ने से आम आदमी पार्टी को गहरा झटका लगा है। पिछले दिनों पंजाब आम आदमी पार्टी के नेता एचएस फुल्का और सुखपाल सिंह खैरा के पार्टी छोड़ने के बाद से पंजाब आप में बगावत खुलकर सामने आई थी। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मास्टर बलदेव ने अपना इस्तीफा ई-मेल के जरिए पार्टी के संयोजक और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल को भेजा है और इसमें उन्होंने केजरीवाल पर केवल दलित कार्ड का केवल इस्तेमाल करते हैं। इससे पहले आम आदमी पार्टी के पूर्व विधायक और वकील एचएस फुल्का अन्ना आंदोलन को राजनीतिक दल में तब्दील करने के फैसले को गलत करार देते हुए पार्टी से अलग हो गए थे। फुल्का ने 1984 के दंगों के पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए गैर कांग्रेसी पार्टियों को साथ आने का कई बार जिक्र किया, जिससे वह यह भी संदेश दे गए कि आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच चल रही गठबंधन की चर्चा से वह नाराज थे। वहीं पार्टी से पहले से ही निलंबित चल रहे सुखपाल सिंह खैरा ने भी पिछले दिनों इस्तीफे में पार्टी छोड़ने के पीछे कारण बताते हुए कहा था कि पार्टी अपने आदर्शों से पूरी तरह भटक चुकी है। पार्टी अपने उन सिद्धांतों को भी भूल चुकी है जिन सिद्धांतों पर अन्ना हजारे आंदोलन के बाद पार्टी की स्थापना हुई थी। चुनावी हार बनी वजह बता दें कि पंजाब में विधानसभा चुनाव के बाद से ही पार्टी गुटबाजी और बगावत का सामना कर रही है। पंजाब विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने अपनी पूरी ताकत झोंकी थी। चुनाव से कुछ वक्त पहले ही पार्टी के राज्य संयोजक सुच्चा सिंह छोटेपुर को अध्यक्ष पद से हटा दिया गया और उन पर पार्टी फंड के नाम पर पैसे मांगने का आरोप भी लगा था। तब सुच्चा सिंह ने पार्टी के दिल्ली नेताओं पर आरोप जड़े थे। चुनाव से पहले पार्टी में ज्यादा उथल-पुथल नहीं दिखी, लेकिन नतीजे आने के बाद से ही पार्टी में भूचाल शुरू हो गया। पंजाब के नेताओं ने दिल्ली इकाई के नेताओं पर खुलकर आरोप लगाने शुरू कर दिए। ऐसा कहा गया कि आप के दिल्ली वाले नेता पंजाब को रिमोट कंट्रोल से चलाना चाहते हैं। इसके बाद पार्टी का पूरा संगठन फिर से बनाया गया। संजय सिंह की जगह पर मनीष सिसोदिया को पार्टी का पंजाब इंचार्ज बनाया गया। भगवंत मान को पंजाब का संयोजक बनाया गया और नए पदाधिकारी भी बनाए गए। दखल घटा, गुटबाजी बढ़ी 2017 के पंजाब चुनाव के बाद आप के दिल्ली नेताओं का पंजाब में दखल ना के बराबर ही रहा, लेकिन पार्टी में गुटबाजी बढ़ती चली गई। पार्टी पंजाब में मुख्य विपक्षी दल होने के बावजूद कोई असरदार आंदोलन खड़ा नहीं कर पाई। अरविंद केजरीवाल के मानहानि के एक मामले में अकाली दल नेता विक्रम सिंह मजीठिया से माफी मांगने के बाद पंजाब के नेताओं ने फिर से दिल्ली नेतृत्व पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। पार्टी अब जब लोकसभा चुनाव पर फोकस कर रही है तो पंजाब में गुटबाजी और नेताओं की नाराजगी को दूर करने के सिवा पार्टी के पास दूसरा विकल्प नहीं है। हालांकि पार्टी के लिए वहां हुई उथल-पुथल की वजह से हुए नुकसान की भरपाई करना इतना भी आसान नहीं।
चंडीगढ़ आम आदमी पार्टी की प्राथमिक सदस्यता छोड़ने के दो दिन बाद सुखपाल सिंह खैरा ने मंगलवार को अपने नए राजनीतिक दल का ऐलान कर दिया। खैरा ने बताया, 'नई पार्टी का नाम पंजाबी एकता पार्टी रखा गया है और यह पूरी तरह पंजाब केंद्रित और क्षेत्रीय दल होगा।' इस दौरान आम आदमी पार्टी के छह विधायक- कंवर सिंह संधू, जगदेव सिंह कमालु, जगतार सिंह हिस्सोवाल, पीरमल सिंह खालसा, मास्टर बलदेव सिंह और नाजर सिंह मानशहिया मौजूद थे। पंजाब विधानसभा में विपक्ष के नेता पद से हटाए जाने के छह महीने बाद रविवार को खैरा ने आम आदमी पार्टी छोड़ दी थी। खैरा ने हालांकि, विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा नहीं दिया है। खैरा 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी के टिकट पर कपूरथला जिले के भुलत्थ से चुने गए थे। खैरा ने इससे पहले पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल पर हमला बोलते हुए कहा कि उनके 'तानाशाही' रवैये ने भारतीयों और पंजाबियों के दशकों पुराने सड़े गले प्रणाली के विकल्प के सपने को चकनाचूर कर दिया। मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के करीबी रह चुके और दिसंबर 2015 में कांग्रेस छोड़ कर आम आदमी पार्टी में शामिल होने वाले खैरा ने अपना इस्तीफा केजरीवाल को भेजा था। अपने पत्र में खैरा ने आरोप लगाया कि अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बाद जिस मकसद से पार्टी का गठन किया गया था, यह उस विचारधारा और सिद्धांत से पूरी तरह भटक गई है। खैरा और पार्टी के एक अन्य बागी विधायक कंवर संधू को पिछले साल नवंबर में पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण निलंबित कर दिया गया था।
चंडीगढ़ लोकसभा चुनाव से ठीक पहले आम आदमी पार्टी को पंजाब में एक और झटका लगा है। पार्टी से निलंबित चल रहे सुखपाल सिंह खैरा ने आम आदमी पार्टी से इस्‍तीफा दे दिया है। खैरा से पहले एचएस फूलका भी पार्टी को अलविदा कह चुके हैं। खैरा ने पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। सुखपाल खैरा आम आदमी पार्टी के शीर्ष नेतृत्‍व के खिलाफ बगावत करने के बाद चर्चा में आए थे और उनको पार्टी से निलंबित कर दिया गया था। खैरा ने अपना इस्तीफा पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल को भेज दिया है। इस्तीफे में पार्टी छोड़ने के पीछे कारण बताते हुए खैरा ने कहा, 'पार्टी अपने आदर्शों से पूरी तरह भटक चुकी है। पार्टी अपने उन सिद्धांतों को भी भूल चुकी है जिन सिद्धांतों पर अन्ना हजारे आंदोलन के बाद पार्टी की स्थापना हुई थी।' खैरा और फूलका के इस्तीफे के बाद पंजाब विधानसभा में आम आदमी पार्टी के विधायकों की संख्या 18 रह गई है। बता दें कि पूरा विवाद पंजाब विधानसभा चुनाव में पार्टी के दावों के विपरीत मिले परिणामों के बाद शुरू हुआ था। पार्टी दावा कर रही थी कि उसे पंजाब में 100 सीटें मिल रही हैं जबकि वह महज 20 सीटों में ही सिमट गई। खैरा समेत अन्य बागी नेताओं का कहना था कि इतनी शर्मनाक हार के बाद भी जिम्मेदार नेताओं की कोई जवाबदेही नहीं तय की गई। बताया जा रहा है कि खैरा अब अपनी नई पार्टी बना सकते हैं, जिसका ऐलान लोकसभा चुनाव से पहले ही संभव है।
पांच नगर निगमों में से अभी तक 4 के नतीजे घोषित किए जा चुके हैं. इनमें करनाल पर बीजेपी की रेणु बाला ने 9000 से अधिक वोटों से जीत दर्ज की है. उन्हें कुल 69960 वोट मिले. पानीपत में बीजेपी की अवनीत ने 74000 वोटों से जीत दर्ज की. यमुनानगर में बीजेपी के मदन सिंह ने 40000 वोटों से अपने प्रतिद्वंदी को हराया. BJP ने हिसार भी जीता हिसार से बीजेपी के गौतम सरदाना ने 28 हजार वोटों से जीत दर्ज की. पांच शहरों में से अभी तक चार शहर में बीजेपी ने जीत दर्ज कर ली है, रोहतक में आगे
पानीपत हरियाणा में पांच नगर निगमों और दो नगरपालिकाओं के लिए हुए चुनाव के लिए वोटों की गिनती बुधवार सुबह 8 बजे से जारी है। अभी तक मिल रही जानकारी के मुताबिक शुरुआती रुझानों/परिणामों में बीजेपी सभी 5 नगर निगमों में जीत हासिल करती दिख रही है। फिलहाल पानीपत से मेयर प्रत्याशी अवनीत कौर जीत गई हैं। आगे है। इस बीच परिणामों से उत्साहित मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई है। उधर, रोहतक और यमुनानगर में बीजेपी के मेयर प्रत्याशी बड़ी बढ़त बनाए हुए हैं। यमुनानगर वार्ड 6 से बीजेपी प्रत्याशी प्रीति जोहर ने जीत दर्ज की है। वहीं करनाल में भी दो वार्डों से बीजेपी के प्रत्याशी जीते हैं। हालांकि यहां एक सीट पर निर्दलीय उम्मीदावर की जीत हुई है। बता दें कि कांग्रेस ने इस चुनाव में पार्टी चिह्न का इस्तेमाल नहीं करने का निर्णय किया है। वह चुनाव मैदान में उतरे कुछ निर्दलीयों का समर्थन कर रही है। जारी रुझानों और नतीजों में यह स्थिति -पानीपत से बीजेपी प्रत्याशी अवनीत कौर जीत गई हैं। -करनाल में बेजेपी प्रत्याशी रेणु बाला गुप्ता 36 हजार वोटों से आगे -हिसार में बीजेपी प्रत्याशी गौतम सरदाना भी रेस में आगे -यमुनानगर में बीजेपी प्रत्याशी मदन चौहान भी बड़ी जीत की ओर बढ़ रहे पानीपत में 12 सीटों पर BJP की जीत पानीपत में बीजेपी ने जबरदस्त प्रदर्शन किया है। अब तक परिणामों में वार्ड 1 से 12 तक सभी में बीजेपी ने जीत दर्ज कर ली है।वार्ड 1 से बीजेपी की अनीता परुथी ने जीत दर्ज की है। वहीं वार्ड 2 से पवन, वार्ड 3 से अंजलि, वार्ड 4 से रविन्द्र नागपाल, वार्ड 5 से अनिल बजाज, वार्ड 6 से रविंद्र जीते, वार्ड 7 से अशोक भाटिया, वार्ड 8 से चंचल रेवड़ी सहगल, वार्ड 9 से मीनाक्षी नारंग, वार्ड 10 से रवींद्र भाटिया, वार्ड 11 से कोमल सैनी और वार्ड 12 से सतीश सैनी जीते हैं। राज्य निर्वाचन आयोग के मुताबिक इस बार नगर निगम चुनाव में 16 दिसंबर को करीब 70 फीसदी मतदान हुआ था। इस चुनाव में 734 उम्मीदवारों की किस्मत दांव पर है। इसमें करीब 14 लाख मतदाताओं ने हिस्सा लिया। महापौर तथा नगर निगम एवं नगरपालिका सदस्यों के लिए यह मतदान 136 वार्डों में कराया गया। बता दें कि यह चुनाव हिसार, रोहतक, यमुनानगर, पानीपत और करनाल नगर निगमों और दो नगरपालिकाओं जाखलमंडी (फतेहाबाद) और पुंडरी (कैथल) के लिए 16 दिसंबर को हुए। पहली बार नगर निगमों के मेयर का सीधा चुनाव होना है।
चंडीगढ़ कांग्रेस अध्‍यक्ष राहुल गांधी को अपना कैप्‍टन बताकर चौतरफा घिरे पंजाब के कैबिनेट मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू के खिलाफ राज्य के 18 मंत्रियों ने मोर्चा खोल दिया है। पंजाब के इन मंत्रियों की मांग है कि सिद्धू सीएम से माफी मांगें और 'बड़ों का सम्‍मान करना सीखें।' उधर, सिद्धू भी राज्‍य के मुख्‍यमंत्री कैप्‍टन अमरिंदर सिंह से माफी मांगने के मूड में दिखाई नहीं पड़ रहे हैं। कैप्‍टन के वफादार मंत्री सिद्धू का मुद्दा सोमवार को होने वाली राज्‍य कैबिनेट की बैठक में उठा सकते हैं। सूत्रों के मुताबिक ये सभी मंत्री सिद्धू द्वारा माफी नहीं मांगने पर उनपर इस्तीफे का दबाव बनाने के लिए कैबिनेट में प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहे हैं। इस बीच, ऐसी भी खबरें हैं कि सिद्धू इस बैठक में शामिल नहीं होंगे। उधर, इस मसले पर सिद्धू का कहना है कि 'उन्‍होंने कुछ भी गलत नहीं कहा है।' चुनावी राज्‍य राजस्‍थान में चुनाव प्रचार कर रहे सिद्धू ने कहा, 'मैं ऐसे स्‍थान पर रहता हूं जहां दिमाग बिना भय के रहता है और सिर ऊंचा रहता है।' इससे पहले शुक्रवार को सिद्धू से पूछा गया था कि क्‍या करतापुर कॉरिडोर के शिलान्‍यास समारोह में पाकिस्‍तान जाने से उन्‍हें सीएम ने रोका था ? इस पर सिद्धू ने कहा, 'किस कैप्‍टन की बात कर रहे हो? ओह! कैप्‍टन अमरिंदर सिंह। वह सेना में एक कैप्‍टन थे, मेरे कैप्‍टन राहुल गांधी हैं। उनके (सीएम के) कैप्‍टन भी राहुल गांधी हैं।' इसके बाद शनिवार को पंजाब के मंत्री तृप्‍त रजिंदर सिंह बाजवा ने सिद्धू से कहा कि वह या तो इस्‍तीफा दें या माफी मांगें। इस बीच खेल मंत्री राणा गुरमीत सिंह ने कहा, 'मेरे कैबिनेट के ज्‍यादातर साथी चाहेंगे कि इस मुद्दे पर सोमवार को होने वाली कैबिनेट की बैठक में चर्चा हो। विशेषकर इसलिए कि इसने लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी को कमजोर किया है।' सिद्धू इस समय राजस्थान में प्रचार में व्यस्त हैं और यह साफ नहीं है कि वह कैबिनेट की बैठक में भाग लेने के लिए चंडीगढ़ आएंगे या नहीं। राज्‍य के एक अन्‍य मंत्री ने कहा, 'अमरिंदर सिंह के ज्‍यादातर वफादार मंत्री इस मुद्दे को कैबिनेट में उठाने के लिए उत्‍सुक हैं।' रविवार को पंजाब सरकार में मंत्री साधु सिंह धर्मसोत ने भी कहा था, 'मैं यह सुनकर थोड़ा नाराज हूं (नवजोत सिंह सिद्धू का बयान), बिल्‍कुल राहुल गांधी हमारे इंडियन कैप्टन हैं लेकिन सिद्धू यह भूल गए कि अमरिंदरजी हमारे सीएम हैं। उन्हें सम्मान करना चाहिए, यह कपिल शर्मा का शो नहीं है।' बता दें कि पंजाब कांग्रेस के नेताओं के खुलकर नाराजगी जताने के बाद विवाद बढ़ता देख सिद्धू की पत्नी नवजोत कौर ने रविवार को उनके बचाव में सफाई दी थी। कौर ने यह कहकर विवाद थामने की कोशिश की है कि उनके पति हमेशा कहते हैं कि कैप्टन साहब उनके पिता के समान हैं। नवजोत कौर सिद्धू ने कहा, 'नवजोतजी हमेशा कहते हैं कि कैप्टन साहब उनके पिता की तरह हैं। हम यह बात हमेशा स्पष्ट रखते हैं कि कैप्टन साहब का सम्मान सभी चीजों से ऊपर है। सिद्धू का आधा-अधूरा नहीं बल्कि पूरा बयान पढ़ा जाना चाहिए।'
चंडीगढ़ करतारपुर साहिब कॉरिडोर मुद्दे को लेकर एकबार फिर से पंजाब कांग्रेस में दोफाड़ की स्थिति देखने को मिल रही है। दरअसल, बुधवार को पाकिस्तान में शिलान्यास का कार्यक्रम आयोजित किया गया है। इसमें जाने को लेकर पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और कैबिनेट मिनिस्टर नवजोत सिंह सिद्धू का अलग-अलग मत हैं। बता दें कि न्योता मिलने के बावजूद समारोह से कैप्टन अमरिंदर सिंह ने दूरी बनाए रखने का फैसला किया, जिसकी सोमवार को कांग्रेस नेताओं ने सराहना भी की। हालांकि, उन्होंने सिद्धू के फैसले पर चुप्पी साधे रखी। कुछ लोगों का मानना है कि यदि अमरिंदर सिंह खुद ही तय कर लेते कि उन्हें पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े होना है तो यह मुद्दा ही न बनता। किसे चुनें? कांग्रेस में नेताओं के सामने चुनौती पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, 'अपनी पिछली यात्रा के दौरान कॉरिडोर को लेकर वह सोशल मीडिया पर चर्चा में आ गए थे, कहीं न पाकिस्तान जाकर फिर से लाइमलाइट में आने की कोशिश उनकी प्रवृत्ति के अनुरूप है। उनके लिए यह उसी कार्यक्रम में आगे की पहल है। बात की जाए अमरिंदर सिंह की तो वह राज्य के मुखिया के साथ-साथ एक पूर्व सैनिक वाला भी रवैया रखते हैं।' कांग्रेस नेताओं में भी असमंजस की स्थिति थी कि वे अमरिंदर द्वारा पाकिस्तान के न्योते को अस्वीकार करने के निर्णय के साथ जाएं या फिर कॉरिडोर की दिशा में हुई पहल के लिए सिद्धू के साथ खड़े हों। अमृतसर हादसे के बाद विपक्ष के निशाने पर सिद्धू पार्टी के एक नेता ने बताया, 'पिछली बार, सिद्धू ने कहा था कि वह अपने निजी व्यवहार के चलते पाकिस्तान जा रहे हैं क्योंकि इमरान उनके दोस्त हैं। हालांकि, पार्टी ने उन्हें पाकिस्तान न जाने के लिए कहा था। केंद्रीय नेतृत्व से सिद्धू के करीबी रिश्ते, खासतौर पर राहुल और प्रियंका गांधी के साथ होने की वजह से वह अपने मुताबिक फैसले लेते हैं, जबकि उनके लिए राज्य के मुखिया का निर्देश उतनी अहमियत नहीं रखता है।' कॉरिडोर मुद्दा ऐसे वक्त में सामने आया है जब सिद्धू और उनकी पूर्व विधायक पत्नी नवजोत कौर अमृतसर रेल हादसे को लेकर विपक्ष के निशाने पर थे। गौरतलब है कि अमृतसर रेल हादसे में दशहरा पर्व के दौरान 61 लोगों की मौत होने का दावा किया गया था। पंजाब कांग्रेस प्रेजिडेंट सुनील जाखड़ ने रविवार को प्रॉजेक्ट के मद्देनजर सिद्धू की तारीफ की थी। अगले ही दिन उन्हें एक आधिकारिक बयान जारी करना पड़ा, जिसमें उन्होंने पंजाब और संपूर्ण राष्ट्र के लिए कैप्टन अमरिंदर सिंह द्वारा पाकिस्तान के न्योते को अस्वीकार करने के फैसले की जमकर सराहना की। दरअसल, पार्टी ऐसा कोई संदेश नहीं देना चाहती है कि उसके अंदरखाने में किसी भी तरह के विरोध की स्थिति बनी हुई है। बता दें कि इससे पहले पाकिस्तानी आर्मी चीफ जनरल कमर जावेद बाजवा के साथ सिद्धू का गले मिलना पार्टी की राज्य इकाई में तनाव की स्थिति पैदा कर गया था। '...तो कैप्टन अमरिंदर सिंह पर होता मेन फोकस' एक अन्य वरिष्ठ कांग्रेसी नेता का दावा है, 'अकाली दल की केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल की मौजूदगी के बावजूद यदि अमरिंदर सिंह कार्यक्रम में शिरकत करते तो लोगों का पूरा ध्यान पंजाब के मुख्यमंत्री पर ही होता। यही नहीं, लोगों की कॉरिडोर के प्रति इतनी प्रबल भावनाएं जुड़ी हुई थीं कि उनके लिए भारत और पाकिस्तान के बीच के रिश्ते कोई मायने ही नहीं रखते। ऐसे में मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने नैतिकता के लिहाज से बहुत महत्वपूर्ण फैसला किया है।' पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने सोमवार को अपने मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू के पाकिस्तान दौरे को उनके 'सोचने का तरीका' बताया। कैप्टन करतारपुर कॉरिडोर की आधारशिला रखे जाने के मौके पर बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि जिस समय पर सीमा पार की गोलियों से हमारे सैनिक और आम नागरिक मारे जा रहे हों, ऐसे समय पर वह ऐसा (पाकिस्तान जाने) करने के बारे में सोच भी नहीं सकते।
नई दिल्ली, 26 नवंबर 2018,भारत-पाकिस्तान बॉर्डर पर बन रहे करतारपुर साहिब कॉरिडोर की नींव आज रखी जानी है. ये कॉरिडोर ऐलान के साथ ही राजनीतिक जंग का हिस्सा बन गया है. ऐलान के बाद श्रेय लेने की होड़ मची और अब नींव रखी जाने के दौरान भी राजनीतिक बयानबाजी तेज हो रही है. पंजाब सरकार में मंत्री एसएस रंधावा ने नींव रखने से पहले शिलापट पर अपने, मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और पंजाब के अन्य मंत्रियों के नाम के आगे काली टेप लगाई. उन्होंने कहा कि इस पर अकाली-बीजेपी वाले नेताओं का नाम क्यों हैं. वह इसका विरोध कर रहे हैं. नहीं पता, कहां बनना है कॉरिडोर' पंजाब सरकार के मंत्रियों का कहना है कि कॉरिडोर बनाने का फैसला आनन-फानन में लिया गया है, केंद्र सरकार को अभी ये भी नहीं पता है कि कॉरिडोर कहां बनाना है. पंजाब सरकार के कैबिनेट मंत्री तृप्त राजिंदर सिंह बाजवा और सुखजिंदर रंधावा ने कहा कि पाकिस्तान ने 28 नवंबर को आधारशिला रखने का कार्यक्रम तय कर दिया है. उन्होंने कहा कि इसी वजह से आनन-फानन में केंद्र सरकार ने 26 नवंबर को ही पंजाब सरकार को आधारशिला का कार्यक्रम आयोजित करने का निर्देश दे दिया. जबकि नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया जिसे इस कॉरिडोर को बनाना है, उसे अब तक ये ही नहीं पता कि ये कॉरिडोर कहां से निकाला जाएगा और इस कॉरिडोर की आधारशिला कहां रखी जाएगी. राज्य सरकार में मंत्री सुखविंदर सिंह रंधावा ने कहा कि हरसिमरत कौर बादल ने नवजोत सिद्धू को कौम का गद्दार बताया था, अब वो खुद पाकिस्तान जा रही हैं. वह क्या मुंह लेकर वहां जाएंगी. अकाली दल ने आजतक इस मुद्दे को नहीं उठाया था. कांग्रेस नेताओं की हो रही अनदेखी इसके अलावा उन्होंने आधारशिला के कार्यक्रम के दौरान हो रही अनदेखी पर भी सवाल उठाया. ग्रामीण और शहरी विकास मंत्री बाजवा ने केंद्र द्वारा समारोह के लिए व्यवस्था का विरोध करते हुए कहा कि "पंजाब के नेताओं और मंत्रियों को वक्ताओं और मंच साझा करने वालों की सूची में कोई स्थान नहीं दिया गया है." हो चुकी है क्रेडिट को लेकर रार बता दें कि मोदी सरकार द्वारा कॉरिडोर का ऐलान करने के साथ ही इस पर क्रेडिट की जंग छिड़ गई थी. केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने इसे अकाली दल की अपील पर लिया गया सरकार का फैसला बताया था, तो वहीं नवजोत सिंह सिद्धू ने उनकी तरफ से बनाए गए दबाव में लिया गया निर्णय बताया था.

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