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नई दिल्ली, 08 जनवरी 2019,लोकसभा चुनाव 2019 से पहले मोदी सरकार ने सवर्ण आरक्षण का बड़ा दांव चला है, जिससे विपक्ष पसोपेश में है. सियासी नजरिये से देखा जाए तो गरीब सवर्णों के लिए घोषित आरक्षण इस वर्ग की नाराजगी को दूर करने की बीजेपी की एक कोशिश मानी जा रही है. मोदी सरकार 10 प्रतिशत सवर्ण आरक्षण देने के लिए मंगलवार को लोकसभा में संविधान संशोधन विधेयक पेश करेगी. आरक्षण को लेकर एक बार फिर सियासी बिसात बिछाई जाने लगी है. संविधान में आर्थिक आधार पर आरक्षण की बात नहीं कही गई है. और आर्थिक आधार पर आरक्षण देने के लिए संविधान संशोधन करना जरूरी होगा. इस प्रस्ताव पर दलों के रुख से भाजपा चुनाव मैदान में अपनी रणनीति को धार देगी. मोदी सरकार के सवर्ण आरक्षण दांव को लेकर अभी तक विपक्ष की ओर से आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने ही विरोध जताया है. इसके अलावा बाकी दल कहीं न कहीं सवर्ण आरक्षण के पक्ष में खड़े नजर आ रहे हैं. दरअसल कांग्रेस से लेकर सपा, बसपा, एलजेपी जैसे राजनीतिक दल गरीब सवर्ण को आरक्षण देने की वकालत करते रहे हैं. ऐसे में ये पार्टियां खुलकर विरोध नहीं करेंगी, लेकिन लोकसभा में इसे लाने की टाइमिंग और प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर मोदी सरकार को घेर सकती हैं. स्टैंडिंग कमेटी को भेजने की मांग मोदी सरकार सवर्ण आरक्षण विधेयक को लोकसभा में पेश करेगी. लोकसभा चुनाव के मद्देनजर कोई भी राजनीतिक पार्टी इसका विरोध करके सवर्णों की नाराजगी मोल लेना नहीं चाहेगी. ऐसे में संविधान संशोधन विधेयक को स्टैंडिंग कमेटी के पास भेजने की सिफारिश विपक्षी दलों की ओर से की जा सकती है. हालांकि मोदी सरकार इसे स्वीकार नहीं करेगी. सदन में चर्चा सवर्ण आरक्षण को लेकर सत्ता पक्ष लोकसभा में चर्चा की बात करेगा, ताकि इस पर सभी की राय सामने आए. जबकि विपक्ष इसे स्वीकार करे, ये कहना मुश्किल है. हालांकि मोदी सरकार की पूरी कोशिश होगी कि चर्चा के जरिए सवर्ण आरक्षण पर सभी राजनीतिक दलों की राय सामने लाई जा सके. क्षेत्रीय दल कर सकते हैं विरोध सवर्ण आरक्षण को लेकर मोदी सरकार को सदन में क्षेत्रीय दलों के विरोध का सामना करना भी पड़ सकता है. आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने इसका विरोध करके अपने मंसूबे जाहिर कर दिए हैं. इतना ही नहीं एनडीए की सहयोगी पार्टी अपना दल ने सवर्ण आरक्षण आने के बाद ओबीसी के दायरे को 27 प्रतिशत से और आगे बढ़ाने की बात करने लगी है. इसके अलावा सपा और बसपा भी आबादी के लिहाज से आरक्षण की मांग उठा सकती है. इसके अलावा जातिगत जनगणना की रिपोर्ट जारी करने की बात सामने आ सकती है. कोर्ट से अड़ंगा सवर्ण आरक्षण को लेकर कुछ लोग सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकते हैं. इससे पहले भी नरसिम्हा राव सरकार में जब 10 फीसदी सवर्ण आरक्षण देने की सिफारिश की गई थी तो कोर्ट ने रोक लगा दी थी. इसके अलावा अल्पसंख्यकों, जाटों, मराठों और राजस्थान में ब्राह्मणों के आरक्षण की सिफारिश को कोर्ट से झटका लग चुका है. ऐसे में मोदी सरकार के इस दांव को कोर्ट से भी झटका लग सकता है. दरअसल देश में अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को मिलाकर 49.5 फीसदी आरक्षण है. सुप्रीम कोर्ट 1992 के इंदिरा साहनी के अपने फैसले में साफ कर चुका है कि कुल आरक्षण 50 फीसदी से ज्यादा नहीं हो सकता. इसके बावजूद कुछ राज्यों जैसे तमिलनाडु में आरक्षण इस सीमा से ज्यादा है जिसका केस सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है. ऐसे में ये मामला भी सुप्रीम कोर्ट की भेंट चढ़ सकता है.
लखनऊ: भारतीय जनता पार्टी इस बार लोकसभा चुनाव में दोबारा जीत हासिल करने के लिए बूथ स्तर पर ही दूसरे दलों के कार्यकर्ताओं को रिझाने की योजना पर काम कर रही है. भारतीय जनता पार्टी के थिंक टैंक ने जो बूथ स्तर की योजना बनाई है उसके तहत सभी बूथ कार्यकर्ताओं को यह कहा जा रहा है कि वो दूसरे दल के कार्यकर्ताओं से संपर्क स्थापित करें. बीजेपी की बूथ स्तर योजना जिसको 'बूथ कार्य योजना' नाम दिया गया है. इसके अनुसार हर बूथ कार्यकर्ता को दूसरे दल के कार्यकर्ता से संपर्क स्थापित करके उसे भाजपा का सदस्य बनाने के लिए प्रेरित करने की योजना पर कार्य करना है. इससे पहले लोकसभा चुनाव 2014 और 2017 विधानसभा चुनावों में पार्टी ने ऐसे जीताऊ उम्मीदवारों पर डोरे डाले थे और चुनाव से चंद महीने पहले उन्हे पार्टी में शामिल किया था. इस स्ट्रेटजी के तहत पार्टी में बीएसपी के दिग्गज नेता जैसे स्वामी प्रसाद मौर्य और बृजेश पाठक को पार्टी न केवल सदस्य बनाया था बल्कि उन्हे विधानसभा चुनावों में टिकट भी दिया था. इसी तरह उत्तर प्रदेश कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष रहीं रीता बहुगुणा जोशी को भी बीजेपी में शामिल किया गया था और मैदान में उतारार गया था. वर्तमान में तीनों योगी सरकार में कैबिनेट स्तर के मंत्री हैं. ऐसे नामों की लिस्ट बहुत लंबी है. इसी तरह कई अन्य दलों के बड़े नेताओं को भी बीजेपी ने लोकसभा चुनाव के पहले भी न सिर्फ सदस्य बनाया था बल्कि टिकट दिया था. इस लिस्ट में कांग्रेस के वारिष्ठ नेता जगदंबिका पाल का नाम शामिल है. मोदी लहर में बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में 80 में से 71 सीटों पर जीत दर्ज की थी. लेकिन, बदले हुए परिस्थिति में पार्टी ने जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं को मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है. बूथ लेवल कार्यकर्ताओं से कहा जा रहा है कि वे जनता के बीच जाएं और उनसे संपर्क करें. दूसरे पार्टी के कार्यकर्ताओं को अपने पाले में करने की कोशिश करें. इसके अलावा, मंदिर, मठ और आश्रम जाकर भी संपर्क स्थापित करें. इसके अलावा सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों की लिस्ट भी तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं.
नई दिल्ली लोकसभा चुनावों में बीजेपी और कांग्रेस दोनों के लिए ही कई राज्यों में गठबंधन का फैसला बहुत मुश्किल होता जा रहा है। सहयोगी दल 2019 आम चुनावों को 2014 के अंदाज में लेने के लिए तैयार नहीं हैं और ऐसे हालात में दोनों पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व के लिए सबको साथ लेकर चलना आसान नहीं होगा। 2019 लोकसभा चुनावों + के साथ राज्यों के चुनाव में भी बीजेपी-कांग्रेस के सामने कई चुनौतियां हैं। बिहार में पहले जैसे हालात नहीं बिहार में बीजेपी और जेडीयू 50:50 पार्टनरशिप पर चुनाव लड़ने जा रही हैं। 2014 में बिहार की स्थिति पूरी तरह से अलग थी। एनडीए के अन्य सहयोगियों को कितनी सीटें मिलेंगी, इसको लेकर अगले सप्ताह घोषणा हो सकती है। 2014 में बीजेपी ने 22 सीटों पर जीत हासिल की थी और सहयोगियों को 9 सीटें मिली थीं। उस वक्त जेडीयू सिर्फ 2 सीट जीतने में ही कामयाब रही। महाराष्ट्र में एनसीपी-कांग्रेस की चुनौती नैशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी के प्रमुख शरद पवार + ने पिछले सप्ताह घोषणा की थी कि कांग्रेस के साथ मिलकर उनकी पार्टी चुनाव लड़ेगी। 48 में से 40 सीट पर बंटवारे को लेकर सहमति बनने की बात एनसीपी चीफ ने की थी। एनसीपी भी कांग्रेस से महाराष्ट्र में समान सीट बंटवारे की मांग कर रही है। 2014 में एनसीपी को 4 सीटों पर जीत मिली थी, जबकि कांग्रेस पार्टी ने 2 सीटों पर जीत हासिल की थी। छत्तीसगढ़ में इस बार त्रिकोणीय मुकाबला छत्तीसगढ़ में अब तक बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला रहा है। इस बार वहां विधानसभा चुनावों में मुकाबल त्रिकोणीय होने जा रहा है। अजीत जोगी की कांग्रेस, बीएसपी, सीपीआई का गठबंधन तीसरी पार्टी के तौर पर हुआ है। यह क्षेत्रीय गठजोड़ 2019 लोकसभा चुनाव में विपक्षी एकता के लिहाज से महत्वपूर्ण है। कांग्रेस बार-बार विपक्षी एकता + की बात कर रही है और ऐसे वक्त में बीएसपी सुप्रीमो सम्मनाजनक सीट बंटवारे की बात मजबूती से कर रही हैं। इस लिहाज से कांग्रेस के लिए विपक्षी एकता के लिए सबको मनाना इतना आसान नहीं होगा। विपक्षी गठजोड़ के लिए अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी विपक्ष के सभी प्रमुख दल खुलकर बीजेपी को हराने के लिए एकजुट होने की बात करते रहे हैं। हालांकि, 2019 चुनावों से पहले एक संयुक्त विपक्ष बन सकेगा, इस बारे में अभी कुछ कहना जल्दबाजी ही होगी। हालांकि, विपक्षी दलों की बैठक के बाद नए फॉर्म्युले के साथ बीजेपी को हराने के कॉमन वादे की बात होती रहती है। एनसीपी प्रमुख शरद पवार लगातार राज्यों की स्थिति के अनुसार गठबंधन का फॉर्म्युला दे रहे हैं। पवार का कहना है कि राज्यों में पार्टी की स्थिति के आधार पर गठबंधन के पार्टनर तय हों। तमिलनाडु में डीएमके, गुजरात-कर्नाटक में कांग्रेस तो यूपी में एसपी-बीएसपी प्रमुख चेहरा हो सकते हैं।
नई दिल्ली मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस-बीएसपी और कांग्रेस-एसपी के ब्रेकअप को भले ही पार्टी के लिए झटका माना जा रहा हो। लेकिन कांग्रेस इसमें भी रणनीति देख रही है। कांग्रेस के रणनीतिकार ट्विन प्लान पर काम कर रहे हैं, पहला एकजुट होकर बीजेपी के दुर्गों को घेरने का काम करना और दूसरा क्षेत्रीय दलों को कम स्पेस देना। कांग्रेस ने अपनी ओर से एमपी में बीएसपी को अधिकतम 10 सीटें और समाजवादी पार्टी को 3 सीटें देने का फैसला लिया था। चुनावी राज्यों में कांग्रेस की रणनीति तैयार करने में जुटे नेताओं का कहना है कि यदि एसपी और बीएसपी अपने आधार वाले राज्य उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को जगह देने में कोताही बरतते हैं तो फिर उन्हें भी उसकी मजबूती वाले इलाकों में उदारता की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। कांग्रेस को लगता है कि यदि वह राज्यों में एसपी और बीएसपी को बड़ी हिस्सेदारी देती है तो फिर लोकसभा चुनाव में इनकी मांग और बढ़ जाएगी। यहां तक कि दोनों पार्टियां उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को खासी कम जगह दे सकती हैं। राज्यों में बेहतर कर आम चुनाव में ताकत दिखाएगी कांग्रेस मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में अकेले चुनाव लड़ने में कांग्रेस लंबे वक्त के लिए अपना फायदा देख रही है। कांग्रेस इन चुनावी राज्यों में अपनी ताकत को बढ़ाना चाहती है ताकि वह लोकसभा चुनाव से पहले खुद को मजबूती के साथ विपक्ष का नेता साबित कर सके। यही वजह है कि कांग्रेस गठबंधन न करने के रिस्क को भी फायदे के तौर पर देख रही है। जहां डायरेक्ट मुकाबले में कांग्रेस, वहां नहीं देगी एंट्री एक कांग्रेस लीडर ने कहा, 'हम जानते हैं कि बीएसपी, एसपी, तृणमूल और एनसीपी जैसे दल चाहते हैं कि विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस कमजोर होकर उभरे ताकि 2019 में वह बढ़त में रहें। लेकिन, हमें अपने हितों की रक्षा करनी होगी।' भले ही कांग्रेस मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य से सत्ता से बाहर है, लेकिन वह यहां बीजेपी के साथ खुद को ही मुख्य मुकाबले में मानती है। इसके अलावा कांग्रेस राजस्थान, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, हिमाचल, गोवा और असम में खुद को बीजेपी के साथ मुख्य मुकाबले में मानती है। उसकी रणनीति यह है कि यहां किसी अन्य तीसरे या चौथे प्लेयर को एंट्री क्यों दी जाए। अपने आधार में सेंध से आशंकित है कांग्रेस मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में ओबीसी-एससी-एसटी वोटरों की बड़ी संख्या है। कांग्रेस मानती है कि यदि इन राज्यों में वह एसपी और बीएसपी को स्पेस देती है तो उसे भविष्य में अपने जनाधार को खोना पड़ सकता है। यूपी और बिहार में ऐसा ही हुआ है, जहां क्षेत्रीय दलों के मजबूत होने के बाद से कांग्रेस वापसी नहीं कर सकी है।
नई दिल्ली, 07 अक्टूबर 2018, 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले अगले महीने हो रहे पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव को आखिरी सेमीफाइनल की तरह देखा जा रहा है. चुनाव आयोग ने शनिवार को मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, मिजोरम और तेलंगाना विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान किया है. बीजेपी के लिए ये विधानसभा चुनाव करो या मरो जैसे हैं. इसमें राजस्थान की सियासी बाजी जीतना बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती नजर आ रही है. ऐसे में चुनाव आयोग का आखिरी दौर में राजस्थान में मतदान कराना कहीं बीजेपी के लिए फायदे का सौदा तो साबित नहीं होगा? चुनाव आयोग ने जिन पांच राज्यों की तारीखों का ऐलान किया है, उनमें से मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में बीजेपी की सरकारें हैं. बीजेपी के लिए इन तीनों राज्यों में सत्ता को बरकरार रखना एक बड़ी चुनौती है. छत्तीसगढ़ में सबसे पहले मतदान होंगे. राज्य में 12 और 20 नवंबर को दो चरणों में वोटिंग होगी. वहीं, मध्य प्रदेश में 28 नवंबर को मतदान किया जाएगा. जबकि राजस्थान में 7 दिसंबर को वोटिंग की तारीख तय की गई है. 2013 विधानसभा चुनाव के बाद राजस्थान में जितने भी उपचुनाव हुए हैं उसमें से एक भी बीजेपी जीत नहीं सकी है. इसी साल फरवरी में अजमेर, अलवर लोकसभा और मांडलगढ़ विधानसभा सीट के उपचुनाव में कांग्रेस ने रिकॉर्ड जीत दर्ज की है. ये तीनों सीटें पहले बीजेपी के पास थीं. वसंधुरा राजे के खिलाफ राज्य में एंटी-इनकमबेंसी और बीजेपी की अंदरूनी गुजबाजी व जातीय समीकरण बीजेपी के खेल को लगातार बिगाड़ रहे हैं. ऐसे में आखिरी में विधानसभा चुनाव होना बीजेपी के लिए एक तरह से संजीवनी बन सकता है. दरअसल, राजस्थान में जब विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होंगे, उससे करीब 10 से 11 दिन पहले मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 20 दिन पहले चुनाव हो चुके होंगे. बीजेपी के सारे नेता इन राज्यों से खाली हो चुके होंगे. इन राज्यों से फ्री होने के बाद वे सभी राजस्थान में लगाए जा सकते हैं. इससे पार्टी को प्रचार के लिए अच्छी खासी टीम मिल जाएगी. दूसरा सबसे बड़ा फायदा ये होगा कि राजस्थान में मौजूदा समय में जिस तरह की एंटी-इनकमबेंसी वसुंधरा राजे के खिलाफ है. उसके लिए मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ का माहौल का भी फायदा मिल सकता है. ऐसे में सवाल उठता है कि चुनाव आयोग का आखिरी में राजस्थान चुनाव कराना वसुंधरा राजे के लिए कहीं संजीवनी तो नहीं है.
नई दिल्ली, राजस्थान की राजनीति में हमेशा से जाट सियासत का बड़ा महत्व रहा है. लेकिन अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे के सियासी संघर्ष के चलते सूबे की जाट राजनीति में सियासी शून्य कायम हो गया. ताकतवर कौम होने के चलते भी इस समुदाय को वो महत्व नहीं मिला जिसकी ये उम्मीद लगाए बैठें थें. अब जाट राजनीति में आए इस शून्य को भरने के लिए जाट नेता और खींवसर से निर्दलीय विधायक हनुमान बेनिवाल ने पूरी बिरादरी को इकट्ठा करने की कवायद शुरू की है. आजादी के बाद राजतंत्र समाप्त हुआ और लोकतंत्र की स्थापना हुई. सामंती-जमींदारी खत्म होने के बाद राजपूत कांग्रेस के खिलाफ हो गए तो किसान वर्ग या जाट समुदाय अपनी जमीन वापस मिलने पर कांग्रेस के साथ खड़े हो गया. राजस्थान के शेखावाटी, मारवाड़ अंचल में कांग्रेस की सरकारों में जाटों ने अपनी राजनीति खूब चमकाई. समूचे शेखावाटी, मारवाड़ इलाके में कांग्रेस पार्टी के टिकट पर जाट विधायक और सांसद का चुनाव जीतते रहे. मिर्धा, मदेरणा और ओला कांग्रेस के जाट दिग्गज राजस्थान में जाट समाज को राजनीतिक और सामाजिक पहचान दिलाने में बलदेव राम मिर्धा को बड़ा श्रेय जाता है. 50 के दशक में मारवाड़ किसान सभा बना कर मिर्धा ने कांग्रेस के समानांतर संगठन खड़ा करने का प्रयास किया. लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने बलदेव राम मिर्धा से मध्यस्थता कर भूमि सुधार से जुड़े अहम निर्णय लिए. जिसके बाद मारवाड़ किसान सभा और कांग्रेस की राह एक हो गई और सामंती-जमींदारी प्रथा के खिलाफ राजस्थान में जाट या किसान वर्ग कांग्रेस के झंडे तले लामबंद हुए. बलदेव राम मिर्धा परिवार के दो सदस्य रामनिवास मिर्धा और नाथूराम मिर्धा के समय जाट राजनीति शिखर पर पहुंचा. राजस्थान का नागौर जिला इन्हीं के चलते जाट राजनीति का सियासी केंद्र बना. मिर्धा परिवार की राजनीतिक हनक का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आपातकाल के बाद जब कांग्रेस का उत्तर भारत से सफाया हो गया, तब विधानसभा चुनाव में मारवाड़ की 42 सीटों में से कांग्रेस ने 26 सीटें जीत लीं. मिर्धा परिवार के अलावा परमराम मदेरणा और शीशराम ओला कांग्रेस के बड़े नेता रहें. जिन्होंने केंद्र से लेकर राज्य में अहम भूमिका निभाई. जाट समुदाय के अन्य नेताओं में विश्वेन्द्र सिंह, बाणमेर से बीजेपी सांसद कर्नल सोना राम, रिछपाल मिर्धा, ज्योति मिर्धा, रामरारायण डूडी, महीपाल मदेरणा सरीखे नामी गिरामी नेता रहे. गहलोत-राजे के सियासी संघर्ष में जाटों ने खोई पहचान कांग्रेस के अशोक गहलोत और बाद में 2003 में वसुंधरा राजे के राजस्थान की राजनीति में उतरते ही चाहे जाट हो या राजपूत या ब्राह्मण इन प्रभावशाली जातियों के राजनीतिक वजूद को नियंत्रित कर दिया. जो नेता वसुंधरा राजे और अशोक गहलोत के लिए चुनौती बना उनका राजनीतिक वजूद या तो खत्म कर दिया गया या फिर वे हाशिये पर चले गए. मिर्धा परिवार, मदेरणा परिवार, ओला, घनश्याम तिवाड़ी हो या जसवंत सिंह जसोल के उदाहरण प्रत्यक्ष मौजूद हैं. जाट समुदाय के दिग्गज नेताओं की धमक राज्य और केंद्र में तो थी लेकिन ये कभी अपना मुख्यमंत्री नहीं बनवा पाए. ऐसे में मुख्य रूप से किसानी करने वाले जाट समुदाय का महत्वकांक्षी युवा वर्ग जो खेती किसानी के फायदेमंद नहीं होने कारण नौकरी में अपना भविष्य देखता है, नाराज हो गया. गौरतलब है कि गहलोत सरकार के खिलाफ युवाओं के गुस्से की लहर पर सवार होकर वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री तो बन गईं, लेकिन 50 लाख नौकरी देने का वादा पूरा नहीं कर पाईं. अब इन युवाओं विशेषकर जाट समुदाय को इकट्ठा करने के लिए खींवसर के निर्दलीय विधायक हनुमान बेनीवाल पूरे प्रदेश का दौरा कर रहे हैं. राजस्थान में तीसरे मोर्चे की धमक राजस्थान की राजनीति में नागौर, सीकर, झुंझनू, भरतपुर और जोधपुर को एक तरह से जाट बेल्ट कहा जाता है. जाट समुदाय का लगभग 60 सीटों पर प्रभाव है. हनुमान बेनीवाल को जिस तरह से जाट युवाओं का समर्थन मिल रहा है. ये समाज बेनीवाल को राजस्थान के पहले जाट सीएम के तौर पर देखना चाहता है. बेनीवाल की बढ़ती सियासी ताकत को देखते हुए ही बीजेपी के अलग होकर नई पार्टी बनाने वाले घनश्याम तिवाड़ी ने बेनीवाल को समर्थन देने की बात कही है. उन्होंने कहा है कि भारत वाहिनी पार्टी राजस्थान की सभी सीटों पर चुनाव लड़ेगी. लेकिन जिन सीटों पर बेनीवाल के प्रत्याशी की जीत सुनिश्चित होगी उन सीटों पर उनका समर्थन किया जाएगा. तिवाड़ी ने यह भी कहा है कि बेनिवाल से बात चीत के बाद ही वे अपनी पार्टी के उम्मीदवार तय करेंगे. इधर अपने मेवाड़ दौरे पर विधायक हनुमान बेनीवाल ने कहा है कि राजस्थान में कांग्रेस-बीजेपी के खिलाफ तीसरे मोर्चे का गठन किया जाएगा. साथ ही जयपुर की विशाल रैली में नई पार्टी की घोषणा भी की जाएगी. बेनीवाल ने युवाओं को 5000 रुपया बेरोजगारी भत्ता देने की बात कही है. जो कांग्रेस द्वारा घोषित 3500 रुपये के बेरोजगारी भत्ते के जवाब में है. बेनीवाल का दावा है कि तीसरे मोर्चे के समर्थन के बिना किसी की सरकार नहीं बनेगी. बहरहाल अब देखना होगा कि दशकों से कायम सियासी शून्य को खत्म करने के लिए हनुमान बेनीवाल की अपील पर जाट सियासत का ऊंट किस करवट बैठता है.
मुंबई, मुंबई कांग्रेस की गुटबाजी का मसला अब पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के दरवाजे तक पहुंच गया है. सूत्रों के मुताबिक मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी पर संजय निरूपम आगे भी बने रहेंगे या नहीं, ये फैसला राहुल गांधी ही लेंगे. महाराष्ट्र के लिए पार्टी के प्रभारी महासचिव मल्लिकार्जुन खरगे 16 सितंबर को मुंबई में थे तो निरूपम के विरोधी खेमे के नेता उनसे मिले. सूत्रों के मुताबिक उन्होंने खरगे से निरूपम को मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाने की मांग की. खड़गे जल्दी ही राहुल गांधी को इस मामले की अपनी रिपोर्ट सौंप देंगे. अंतिम फैसला राहुल गांधी को करना है. मुंबई कांग्रेस के तीन खेमे दरअसल, अरसे से मुंबई कांग्रेस के तीन खेमों में बंटे होने के कयास लगाए जाते रहे हैं. एक खेमा खुद संजय निरूपम का बताया जाता रहा है. दूसरा खेमा मिलिंद देवड़ा का, और तीसरा मुंबई कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष गुरुदास कामत से जुड़े होने की अटकलें लगती रही हैं. बताया जाता है कि गुरुदास कामत के निधन के बाद उनसे जुड़े खेमे ने भी मिलिंद देवड़ा के खेमे से हाथ मिला लिया. इसके बाद निरूपम के खिलाफ विरोध के सुर और तेज हो गए. मुंबई के नेताओं ने राहुल गांधी से मिलने का वक्‍त मांगा हाल में मुंबई कांग्रेस के कई नेताओं, विधायकों, सांसदों, पूर्व विधायकों और पूर्व सांसदों ने राहुल गांधी से मिलने का वक़्त मांगा. सूत्रों के मुताबिक, राहुल के दफ्तर ने सभी को पहले राज्य प्रभारी खरगे से मिलने को कहा. सूत्रों के मुताबिक खरगे रविवार को मुंबई गए तो निरूपम के विरोधी खेमे के नेताओं ने उनसे निरूपम को हटाने की मांग की. साथ ही आरोप लगाया कि निरूपम 'एकला चलो' की नीति पर चलते हैं, सबको साथ लेकर नहीं. इसके बाद खरगे ने सभी को यही कहा कि वो पूरे मामले की रिपोर्ट दिल्ली जाकर राहुल गांधी देंगे और आखिरी फैसला राहुल गांधी ही करेंगे. बताया जा रहा है कि खरगे जल्द ही अपनी रिपोर्ट राहुल गांधी को सौंप देंगे. कुल मिलाकर निरूपम रहेंगे या जाएंगे, ये तो राहुल गांधी तय करेंगे, फिलहाल मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष की उनकी कुर्सी पर जरूर तलवार लटक रही है.
नई दिल्ली, दिल्ली की सत्ता पर काबिज आम आदमी पार्टी को मंगलवार को बड़ा झटका लगा है. चुनाव आयोग की तरफ से आम आदमी पार्टी को नोटिस भेजा गया है. इस नोटिस में पार्टी के आयकर विवरण और आयोग को दिए गए दस्तावेज़ों में अंतर बताया गया है. आयोग की ओर से कहा गया है कि पार्टी को चंदे में मिली रकम का हिसाब अलग-अलग बताया गया है. इन सभी बातों पर चुनाव आयोग ने आम आदमी पार्टी से स्पष्टीकरण मांगा है. क्या है मामला? आपको बता दें कि आम आदमी पार्टी को चंदे को लेकर पिछले साल आयकर विभाग का नोटिस गया था. जिसके बाद IT ने इस मामले को चुनाव आयोग के पास बढ़ा दिया था. आयकर विभाग की ओर से AAP को ये नोटिस साल 2014-15 के दौरान पार्टी द्वारा लिए गए चंदे के लिए भेजा गया था. इसमें अप्रैल 2014 के दौरान 2 करोड़ रुपये का चंदा भी शामिल है जिस पर काफी लंबे समय से विवाद था.
नई दिल्ली, छत्तीसगढ़ में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों में हलचलें तेज हो गई हैं. इस बार बहुजन समाज पार्टी (बसपा) पूरे दमखम के साथ चुनाव मैदान में उतरने को तैयार है. यही वजह है कि पार्टी प्रमुख मायावती ने सूबे की जिताऊ विधानसभा सीटों का गुप्त सर्वे कराना शुरू कर दिया है. समाचार एजेंसी IANS की खबर के अनुसार, मायावती सूबे की सभी 90 विधानसभा सीटों पर अपने स्तर पर गुप्त सर्वे करा रही हैं. बसपा के प्रदेश अध्यक्ष ओ.पी. बाजपेयी का कहना है कि पार्टी सुप्रीमो छत्तीसगढ़ में चुनाव को लेकर खुद नजर रखे हुई हैं. उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की हर सीट पर बसपा मजबूती से चुनाव लड़ेगी. सूत्रों की मानें तो छत्तीसगढ़ में मायावती की उन्हीं सीटों पर नजरें हैं जो उन्हें चुनाव में जीत दिला सकें और साथ ही राजनीतिक समीकरण ऐसा बना सकें, जिससे उनके बिना किसी दूसरे राजनीतिक दल की सरकार सत्ता पर काबिज न हो सके. प्रदेश अध्यक्ष बाजपेयी के मुताबिक, सूबे में बसपा इस बार के विधानसभा चुनाव में अपने कार्यकर्ताओं की फौज तैयार कर चुनावी मैदान में ताल ठोकने की तैयारी में जुटी हैं. इसलिए बसपा ने अभी तक कांग्रेस के साथ गठबंधन को लेकर अपने पत्ते नहीं खोले हैं और सूबे की सभी 90 सीटों पर अपनी किस्मत आजमाने की तैयारी में है. बहरहाल, प्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए बसपा प्रमुख ने अपनी पार्टी का सर्वे शुरू करवाया है. सर्वे का कितना लाभ बसपा को मिलता है, ये चुनाव परिणाम आने पर ही पता चल पाएगा.
भोपाल,मध्यप्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव के पहले कांग्रेस के एक फैसले ने पार्टी की किरकिरी करा दी है. दरअसल, बीते 2 सितंबर को कांग्रेस के उपाध्यक्ष संगठन प्रभारी चंद्रप्रकाश शेखर ने एक आदेश जारी किया था. इस आदेश के मुताबिक पार्टी टिकट के दावेदारों की सोशल मीडिया पर सक्रियता अनिवार्य थी. इसके अलावा दावेदारों के फेसबुक पेज पर 15000 लाइक्स, ट्विटर पर 5000 फॉलोवर होने जरूरी थे. वहीं बूथ स्तर पर लोगों के व्हाट्सएप ग्रुप बने होना अनिवार्य किया गया था. लेकिन इस फैसले का जमकर विरोध हुआ और महज 6 दिन के बाद ही कांग्रेस को आदेश पर यू-टर्न लेना पड़ा. यानी टिकट के दावेदारों पर से सोशल मीडिया वाली शर्त हटा ली गई है. प्रदेश कांग्रेस के मीडिया कॉर्डिनेटर नरेंद्र सलूजा ने बताया, ''पार्टी कार्यकर्ताओं ने कहा था कि ये फैसला व्यवहारिक नहीं है और इसमें कई पेचीदगियां हैं. ऐसे में उनकी मांग पर फैसले को वापस लिया गया है." दरअसल, टिकट के लिए सोशल मीडिया की अनिवार्यता के चलते पार्टी के कई बड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं के नाम टिकट की दौड़ से बाहर हो जाते. इससे ग्रामीण और आदिवासी सीटों का गणित बिगड़ जाता और यही वजह रही कि कार्यकर्ताओं की नाराजगी के बाद आदेश वापस लिया गया. वहीं बीजेपी के नेता इस मुद्दे पर कांग्रेस की चुटकी ले रहे हैं. सूबे के सहकारिता मंत्री विश्वास सारंग ने कहा कि कांग्रेस जमीनी हकीकत वाली पार्टी नहीं बल्कि हवा हवाई पार्टी है. पार्टी पर सामंतों का राज है. उन्होंने आगे कहा कि जो हाई फाई बातें करते हैं उन्हें ना जमीन अच्छी लगती है ना जमीनी कार्यकर्ता अच्छे लगते हैं.

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