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नई दिल्ली आम आदमी पार्टी (आप) ने बीजेपी के खिलाफ लोकसभा चुनाव से पहले महागठबंधन का हिस्सा बनने से क्यों इनकार कर दिया है? यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि कुछ दिन पहले आप नेता अरविंद केजरीवाल ने हरियाणा में कहा कि हमारा गठबंधन आम जनता और विकास के साथ है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि जो पार्टियां महागठबंधन में शामिल हो रही हैं, उनकी देश के विकास में कोई भूमिका नहीं है। कांग्रेस पर है निशाना? केजरीवाल और आम आदमी पार्टी के कई नेता राज्यसभा में उपसभापति के चुनाव के दौरान कांग्रेस पर निशाना साधते भी नजर आए। केजरीवाल ने दावा किया कि पहले राष्ट्रपति चुनाव और फिर अविश्वास प्रस्ताव में उन्होंने बिना मांगे कांग्रेस को समर्थन दिया, लेकिन कांग्रेस ने कभी सम्मानजनक बात नहीं की। सूत्रों के मुताबिक, महागठबंधन से दूरी की बात करने के पीछे आप नेताओं का मकसद कांग्रेस से दूरी दिखाना है। पार्टी नेताओं को लग रहा है कि कांग्रेस के साथ दिखने का माहौल बनना पार्टी के पक्ष में नहीं जा रहा है। साथ ही पार्टी के कोर कैडर को यह पसंद नहीं आ रहा है। सूत्रों की मानें तो कांग्रेस पर लगातार अटैक इसी माहौल को काउंटर करने की कोशिश है ताकि पार्टी अपने समर्थकों तक यह संदेश पहुंचा सके कि वह कांग्रेस के साथ हाथ नहीं मिलाने जा रही है। तीन राज्यों में कांग्रेस से मुकाबला? आम आदमी पार्टी लोकसभा चुनाव में अपना मुख्य फोकस दिल्ली, पंजाब और हरियाणा में ही रखेगी। इसके अलावा यूपी की दिल्ली से लगी कुछ सीटों के अलावा मध्य प्रदेश की चंद सीटों पर चुनाव लड़ सकती है। पार्टी का मानना है कि दिल्ली, पंजाब और हरियाणा में उसका मुकाबला कांग्रेस से ही है, इसलिए कांग्रेस से दूरी बनाना जरूरी है। पार्टी के एक नेता ने कहा, 'हम हरियाणा में बीजेपी का विकल्प बन सकते हैं और पंजाब में तो कांग्रेस से मुकाबला ही है। ऐसे में कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का सवाल नहीं है।' रीजनल पार्टियों का साथ पार्टी सूत्रों के मुताबिक, आप जिस महागठबंधन से दूरी की बात कर रही है वह कांग्रेस या उसके नेतृत्व वाले गठबंधन से दूरी की बात है। उनका मानना है कि बीजेपी के खिलाफ राज्यवार गठबंधन हो सकते हैं। पार्टी के एक नेता के बताया, 'हमें दिल्ली, पंजाब या हरियाणा में किसी के साथ गठबंधन की जरूरत नहीं लग रही क्योंकि यहां हम सीधे बीजेपी से मुकाबला कर सकते हैं।' उन्होंने कहा कि हम रीजनल पार्टियों का साथ तो दे रहे हैं।
नई दिल्ली, बीजेपी को ये बात बखूबी पता है कि केंद्र की सत्‍ता में बने रहने के लिए यूपी में अपने वर्चस्व को कायम रखना होगा. गोरखपुर-फूलपुर और कैराना में मिली हार ने बीजेपी को चिंता में डाल दिया है. 2019 के लोकसभा चुनाव में 2014 जैसे नतीजे दोहराने के लिए बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने मेरठ में हुई प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक में पार्टी नेताओं को टी-20 फॉर्मूला दिया. अमित शाह ने रविवार को सांसदों और विधायकों के साथ बंद कमरे में बैठक की. इस दौरान जमीनी स्‍तर पर लगातार प्रयास करने पर जोर दिया. शाह ने उनसे कहा कि वे अपने संसदीय क्षेत्रों में जाएं और जनता को सरकारी योजनाओं की जानकारी पहुंचाएं. इसके लिए वह अपने क्षेत्र के प्रत्‍येक गांव में जाएं और कम से कम 20 घरों में जाकर चाय पीएं. इस अभियान के जरिए विधायक अपने विधानसभा क्षेत्र और सांसद अपने संसदीय क्षेत्र के हर गांव में 20-20 घरों में जाने और उनके यहां चाय पीने की रणनीति बनाई हैं. इसका सीधा मतलब जनता से सीधे संवाद स्थापित करना है. नाराज बीजेपी वर्करों को साधने की रणनीति कार्यसमिति बैठक के दौरान पार्टी कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करने की भी भरपूर कोशिश की. दरअसल, पश्चिम यूपी के तमाम कार्यकर्ता लगातार बैठकों में अपनी उपेक्षा के कारण पार्टी से नाराज चल रहे हैं. इसे देखते हुए पार्टी के आला नेताओं ने विश्वास कायम करने का प्रयास किया और यह भी कहा कि बीजेपी का कार्यकर्ता टिकट नहीं बल्कि सम्मान चाहता है. वहीं सीएम योगी आदित्यनाथ ने बैठक के दौरान कहा कि पार्टी कार्यकर्ता ही बीजेपी की रीढ़ हैं और इन्हीं के बल पर पार्टी 2019 में उत्तर प्रदेश के अंदर 73 से ज्यादा सीट जीतने के लिए काम करेगी. अमित शाह ने प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक में इशारा करते हुए कहा कि कार्यकर्ता का सम्मान जरूरी है. लेकिन यह बात जरूर ध्यान रखी जाए कि सरकार और संगठन दोनों अलग अंग है इसलिए संगठन सरकार में और सरकार संगठन में हस्तक्षेप न करे. बीजेपी का डोर-टू-डोर प्लान शाह ने इसी के तहत बीजेपी विधायक और सांसदों को पार्टी कार्यकर्ताओं और मतदाताओं की नाराजगी को दूर करने की नसीहत दी है. इसके साथ ही उन्होंने कहा कि आज हमारे पास उपलब्धियां ज्यादा हैं और कमियां नाम मात्र को हैं. शाह ने कहा कि हम अपनी उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने के बजाय यदि कोई एक कमी निकाल देता है, तो हम चुप्पी साधकर बैठ जाते हैं. जबकि हमें अपनी नौ उपलब्धियों पर फोकस करना चाहिए, न कि एक कमी पर. इसलिए सकारात्मक सोच के साथ केंद्र सरकार और प्रदेश सरकार की उपलब्धियों को जनता के बीच सीधे पहुंचाए ताकि विपक्ष हावी न हो सके. अमित शाह ने पार्टी नेताओं को 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले विवादित बयान देने से बचने की नसीहत भी दी. साथ ही उन्होंने उत्तर प्रदेश में 73 प्लस और देश में 350 प्लस के संकल्प को दोहराते हुए कार्यकर्ताओं से चुनावी तैयारी में जुट जाने के निर्देश दिए.
नई दिल्ली 2019 के आम चुनावों से पहले अबतक मोदी सरकार के खिलाफ महागठबंधन का रूप तैयार हुआ नहीं और एक संभावित पार्टनर ने इससे किनारा कर लिया है। उस संभावित पार्टनर का नाम अरविंद केजरीवाल है। आम आदमी पार्टी के संयोजक ने हरियाणा में ऐलान कर दिया है कि उनकी पार्टी 2019 में बीजेपी के खिलाफ महागठबंधन का हिस्सा नहीं है। केजरीवाल ने इसके पीछे के तर्क भी गिना दिए हैं। राज्यसभा के उपसभापति के चुनाव के लिए AAP से संपर्क नहीं करने को लेकर कल तक पार्टी के नेता राहुल गांधी को ताने कस रहे थे और आज केजरीवाल ने पार्टी का स्टैंड ही एक तरह से क्लियर कर दिया। दिल्ली सीएम केजरीवाल ने इस बात का ऐलान रोहतक में किया है। केजरीवाल ने कहा कि जो पार्टियां संभावित महागठबंधन में शामिल हो रही हैं, उनकी देश के विकास में कोई भूमिका नहीं रही है। हालांकि केजरीवाल का यह ऐलान राजनीतिक गलियारे के लिए थोड़ा अप्रत्याशित जरूर है। ऐसा इसलिए क्योंकि अक्सर AAP ने खुद को एनडीए के खिलाफ विपक्षी एकजुटता के साथ दिखाने की कोशिश की है। ज्यादा पीछे न भी जाएं तो पहले कर्नाटक में कुमारस्वामी की ताजपोशी में केजरीवाल की मौजूदगी और फिर जंतर-मंतर पर तेजस्वी के धरने को समर्थन देकर AAP ने यही संदेश देने की कोशिश की थी कि वह केंद्र सरकार के खिलाफ लड़ाई में साथ हैं। अभी बुधवार तक AAP के नेता संजय सिंह इस बात पर टिप्पणी करते नजर आ रहे थे कि राहुल गांधी राज्यसभा उपसभापति के पद पर विपक्ष के कैंडिटेड बीके हरिप्रसाद के लिए उनसे समर्थन क्यों नहीं मांग रहे हैं। आपको बता दें कि संजय सिंह ने कहा था कि कांग्रेस की तरफ से समर्थन नहीं मांगा गया है इसलिए उनकी पार्टी वोटिंग से बाहर रहेगी। गुरुवार को ऐसा ही देखने को भी मिला। दरअसल राहुल गांधी को AAP की तरफ से निशाना साधने की इस कोशिश के बाद दिल्ली की राजनीति में अचानक तल्खी बढ़ी नजर आई। अजय माकन ने आप पर ज्यादा गुरुर नहीं करने का आरोप लगाते हुए कहा कि अगर 2013 में कांग्रेस ने उनका समर्थन नहीं किया होता तो AAP आज इतिहास हो चुकी होती। तो क्या महज ऐसी तल्खी से केजरीवाल ने इतना बड़ा ऐलान कर दिया? क्या इस नए स्टैंड के पीछे अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की कोशिश है? आम आदमी पार्टी दिल्ली की सत्ता में है और पंजाब के पिछले विधानसभा में एक नई पार्टी के लिहाज से उसका प्रदर्शन अच्छा रहा है। एक सवाल यह उठ रहा है कि क्या अरविंद केजरीवाल ने अपनी राजनीतिक जमीन बचाने के लिए ऐसा ऐलान किया है? दरअसल दिल्ली में AAP का मुकाबला बीजेपी और कांग्रेस, दोनों से है। इसी तरह पंजाब में वह कांग्रेस और अकाली+BJP के मुकाबले खड़ी है। लोकसभा चुनाव अब एक तरह से करीब आ गए हैं। दिल्ली में लोकसभा की सात सीटें हैं और पंजाब की 13 सीटों में से 4 पर उसे जीत मिली थी। AAP ने पिछले दिनों विपक्षी एकजुटता में अपनी जगह बनाने की तमाम कोशिश की पर हर बार कांग्रेस की तरफ से एक तरह से रूखा व्यवहार ही देखने को मिला। पहले राष्ट्रपति चुनाव में AAP ने विपक्षी एकता में जगह पाने की कोशिश की, जो बेनतीजा रही। फिर अब राज्यसभा के उपसभापति चुनाव में भी यही देखने को मिला। कांग्रेस और बीजेपी, दोनों ही पार्टियों ने दिल्ली में AAP सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। उधर, पंजाब में AAP को अपनी ही पार्टी में बगावत का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में दोनों जगह ही जमीन कमजोर होती नजर आ रही है। वैसे तो राजनीति संभावनाओं का खेल है। चुनावी मौसम में कब किसके फेवर में कौन सी बात चली जाए, कहना मुश्किल लेकिन केजरीवाल के इस नए स्टैंड का एक मायने यह भी हो सकता है कि शायद वह अपने कोर वोटर्स को अपने पुराने ऐंटी कांग्रेस और ऐंटी बीजेपी स्टैंड की याद दिला रहे हैं। ऐसा इसलिए भी ताकि नए किले भेदने के चक्कर में कहीं गढ़ ही हाथ से न निकल जाए।
नई दिल्ली,कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने आगामी चार अगस्त को पार्टी की कार्य समिति (CWC) की बैठक बुलाई है. इसमें राफेल विमान सौदे, राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) समेत कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हो सकती है. साथ ही कांग्रेस पार्टी मोदी सरकार के खिलाफ आगे की रणनीति तय कर सकती है. सूत्रों के मुताबिक इस बैठक में राफेल के मुद्दे पर नरेंद्र मोदी सरकार को घेरने और एनआरसी को लेकर नई रणनीति पर विचार किया जा सकता है. दरअसल, कांग्रेस एनआरसी के मुद्दे को बहुत तूल देने के पक्ष में नहीं दिखती है और वह सिर्फ इतना कह रही है कि इसमें प्रक्रियागत खामियां हैं. सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस पार्टी के रणनीतिकारों की कोशिश है कि इस मुद्दे पर ऐसा कोई मौका नहीं दिया जाए, जिससे बीजेपी कांग्रेस पर हमला कर सके और ध्रुवीकरण को बल मिले. कांग्रेस राफेल के मुद्दे को लेकर सरकार पर हमलावर बनी रहना चाहती है. इस संबंध में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और पार्टी सरकार पर लगातार हमले कर रहे हैं. हाल ही में टीडीपी द्वारा मोदी सरकार के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान भी राहुल गांधी ने राफेल मुद्दे पर मोदी सरकार को घेरा था. इस दौरान उन्होंने पीएम मोदी और रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण पर सीधा हमला बोला था.
नई दिल्ली,राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) के अध्यक्ष चौधरी अजित 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ें या नहीं इसी उलझन में फंसे हुए हैं. मंगलवार को बागपत में पार्टी की समीक्षा बैठक में कहा कि अब 80 साल का हो गया हूं, 2019 का लोकसभा चुनाव नहीं लडूंगा. हालांकि कुछ ही घंटे के बाद अजित सिंह अपनी ही बात से पलट गए. उन्होंने कहा कि मैंने कभी नहीं कहा कि मैं चुनाव नहीं लड़ूंगा. गौरतलब है कि अजित सिंह ने अपने पिता चौधरी चरण सिंह की सियासी विरासत को संभाला था. वे 1986 में पहली बार राज्यसभा के सदस्य चुने गए. इसके बाद अपने पिता की परंपरागत सीट बागपत से 1989 में लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. इसके बाद 1991 और 1996 में जीत कर संसद पहुंचे, लेकिन दो साल के बाद जब 1998 में चुनाव हुए तो उन्हें शिकस्त खानी पड़ी. अजित सिंह ने 1998 में राष्ट्रीय लोकदल पार्टी का गठन किया. इसके बाद 1999, 2004 और 2009 में लगातार चुनाव जीते, लेकिन 2014 में मोदी लहर में बीजेपी के उम्मीदवार सतपाल सिंह से हार झेलनी पड़ी. इतना ही नहीं उनकी पार्टी का खाता भी नहीं खुला. अजित सिंह ने मंगलवार को लोकसभा चुनाव के मद्देनजर बागपत में पार्टी की समीक्षा बैठक की. इस दौरान उन्होंने पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि महागठबंधन के तहत 2019 का चुनाव लड़ना हर दल की मजबूरी है. अगर अगला लोकसभा चुनाव कोई दल अकेले लड़ता है तो वह समाप्त हो जाएगा. बीजेपी से गठबंधन के सवाल पर उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी का बीजेपी से गठबंधन का सवाल ही पैदा नहीं होता. आरएलडी मुखिया ने कहा कि उनकी पार्टी बीजेपी के खिलाफ बन रहे महागठबंधन के साथ मिलकर 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ेगी. उन्होंने कहा कि परिवर्तन की बयार बहनी शुरू हो गई है और 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का सूपड़ा साफ हो जाएगा. देश में बीजेपी का नहीं आरएसएस का राज चल रहा है. सिंह ने कहा कि बीजेपी लोगों को बरगलाने और नफरत की सियासत कर रही है. वह हिंदू-मुस्लिम ही नहीं बल्कि हिंदुओं को भी जातिगत आधार पर बांट कर लड़ा रही है. संसद में अविश्वास प्रस्ताव पर विपक्ष नहीं बल्कि पीएम की हार हुई है, क्योंकि राहुल गांधी पीएम मोदी के गले लग यह संदेश देने में सफल रहे कि हम प्यार की सियासत करते हैं और बीजेपी नफरत की राजनीति करती है. केंद्र सरकार के सात हजार करोड़ के गन्ना पैकेज को ढकोसला बताते हुए उन्होंने कहा कि किसानों को इससे रत्तीभर फायदा नहीं मिलने वाला.
नई दिल्ली, 2019 लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कमर कस ली है. वो लगातार कांग्रेस नेताओं के साथ बैठक कर रहे हैं और रणनीति को लेकर बातचीत कर रहे हैं. इसी के तहत राहुल ने कांग्रेस कार्य समिति (CWC) का गठन किया है. जिसके बाद उन्होंने आज CWC की बैठक बुलाई है. बता दें कि CWC कांग्रेस पार्टी की सर्वोच्च नीति निर्धारण इकाई है, जिसमें उन्होंने अनुभवी और युवा नेताओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है. सीडब्ल्यूसी में 23 सदस्य, 18 स्थायी आमंत्रित सदस्य और 10 आमंत्रित सदस्य शामिल किए गए हैं. राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कार्य समिति में कई ऐसे नेताओं को जगह नहीं मिली है जो सोनिया गांधी के अध्यक्ष रहते हुए कार्य समिति के प्रमुख सदस्य हुआ करते थे. जनार्दन द्विवेदी, दिग्विजय सिंह, कर्ण सिंह, मोहसिना किदवई, ऑस्कर फर्नांडीस, मोहन प्रकाश और सीपी जोशी को नई कार्य समिति में जगह नहीं मिली है. सीडब्ल्यूसी के सदस्यों में पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी, वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पार्टी के कोषाध्यक्ष मोती लाल वोरा, अशोक गहलोत, गुलाम नबी आजाद, मल्लिकार्जुन खड़गे, एके एंटनी, अहमद पटेल, अंबिका सोनी और ओमन चांडी को जगह दी गई है. इसके अलावा असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई, कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरमैया, उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, वरिष्ठ नेता आनंद शर्मा, कुमारी शैलजा, मुकुल वासनिक, अविनाश पांडे, केसी वेणुगोपाल, दीपक बाबरिया, ताम्रध्वज साहू, रघुवीर मीणा और गैखनगम भी शामिल हैं. सीडब्ल्यूसी में स्थायी आमंत्रित सदस्यों में दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित, पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम, ज्योतिरादित्य सिंधिया, बालासाहेब थोराट, तारिक हमीद कारा, पी सी चाको, जितेंद्र सिंह, आरपीएन सिंह, पी एल पूनिया, रणदीप सुरजेवाला, आशा कुमारी, रजनी पाटिल, रामचंद्र खूंटिया, अनुग्रह नारायण सिंह, राजीव सातव, शक्तिसिंह गोहिल, गौरव गोगोई और ए. चेल्लाकुमार शामिल हैं. विशेष आमंत्रित सदस्य के तौर पर केएच मुनियप्पा, अरूण यादव, दीपेंद्र हुड्डा, जितिन प्रसाद, कुलदीप विश्नोई, इंटक के अध्यक्ष जी संजीव रेड्डी, भारतीय युवा कांग्रेस के अध्यक्ष केशव चंद यादव, एनएसयूआई के अध्यक्ष फिरोज खान, अखिल भारतीय महिला कांग्रेस की अध्यक्ष सुष्मिता देव और कांग्रेस सेवा दल के मुख्य संगठक लालजीभाई देसाई को शामिल किया गया है. इसी साल मार्च में हुए कांग्रेस महाधिवेशन में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर नयी सीडब्यूसी के गठन के लिए राहुल गांधी को अधिकृत किया गया था. गौरतलब है कि पिछले साल दिसंबर में गुजरात विधानसभा चुनाव के समय राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष चुने गए थे.
नई दिल्ली, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव की तैयारियों में जुट गए लगते हैं क्योंकि उन्होंने कई बड़े और अहम बदलाव करते हुए पार्टी की नई सीडब्ल्यूसी (कांग्रेस कार्यसमिति) का गठन कर दिया है. राहुल गांधी ने आगामी 22 जुलाई को इस नई कार्यसमिति की बैठक भी बुलाई है. राहुल गांधी ने अपनी नई टीम बनाते वक्त इस बात का ख्याल जरूर रखा कि अनुभव और युवा दोनों का सामंजस्य रखा जाए जिसके लिए उन्होंने खासी कोशिश भी की है. लेकिन यह भी लगता है कि सीडब्ल्यूसी के गठन में उनकी खास नहीं चली और ध्यान से देखने पर यह साफ हो जाता है कि समिति में युवा जोश के मुकाबले पलड़ा अनुभव का ही भारी है. गुटबंदी पर लगाम की कोशिश साथ ही उनकी यह कोशिश भी दिख रही है कि कांग्रेस पार्टी की राज्य इकाइयों में जारी गुटबंदी पर अंकुश लगाई जाए. इसके लिए उन्होंने कई पुराने और दिग्गज चेहरों को भी बाहर कर दिया है. पार्टी संगठन महासचिव अशोक गहलोत की ओर से जारी बयान के मुताबिक सीडब्ल्यूसी में 23 सदस्य, 19 स्थायी आमंत्रित सदस्य और 9 आमंत्रित सदस्य शामिल किए गए हैं. इनमें 4 पूर्व मुख्यमंत्रियों को नई सीडब्ल्यूसी टीम में रखा गया है. नई सीडब्ल्यूसी में जनार्दन द्विवेदी, मधुसूदन मिस्त्री, मोहन प्रकाश, सीपी जोशी, कमलनाथ और दिग्विजय सिंह जैसे कद्दावर नेताओं को जगह नहीं मिली है. जनार्दन द्विवेदी सोनिया गांधी के बेहद करीबी रहे हैं और सोनिया राज में उनकी धमक भी दिखती रही है, लेकिन राहुल राज में उन्हें सीडब्ल्यूसी से दूर कर दिया गया. इसी तरह राजस्थान से सीपी जोशी, मध्य प्रदेश से दिग्विजय सिंह तथा कमलनाथ और गुजरात से मधुसूदन मिस्त्री को सीडब्ल्यूसी में नहीं रखते हुए उन्हें केंद्र से दूर करते हुए प्रदेश तक ही सीमित रखने की कोशिश की गई है. उनकी जगह राजस्थान से अशोक गहलोत, मध्य प्रदेश के ज्योतिरादित्य सिंधिया और अहमद पटेल को रखा गया है. इसमें सिंधिया स्थायी आमंत्रित सदस्य के रूप में शामिल किए गए हैं. 6 पूर्व मुख्यमंत्री भी शामिल सीडब्ल्यूसी में 6 पूर्व मुख्यमंत्री शामिल किए गए हैं. सीडब्ल्यूसी में पार्टी अध्यक्ष राहुल, पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के अलावा 6 पूर्व मुख्यमंत्रियों (अशोक गहलोत, गुलाम नबी आजाद, ओमन चांडी, तरुण गोगोई, सिद्धारमैया और हरीश रावत) को रखा गया है. जबकि सीडब्ल्यूसी में स्थायी आमंत्रित सदस्यों में दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के अलावा पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम, ज्योतिरादित्य सिंधिया, बालासाहेब थोराट, तारिक हमीद कारा, पीसी चाको, जितेंद्र सिंह, आरपीएन सिंह, पीएल पूनिया, रणदीप सुरजेवाला, आशा कुमारी, रजनी पाटिल, रामचंद्र खूंटिया, अनुग्रह नारायण सिंह, राजीव सातव, शक्तिसिंह गोहिल, गौरव गोगोई और ए. चेल्लाकुमार शामिल किए गए हैं. राज्य में युवा नेतृत्व 6 राज्यों के पूर्व मुख्यमंत्रियों को लोकसभा चुनाव को देखते हुए केंद्र में लाया गया है जिससे उनके राज्यों में पिछड़ चुकी पार्टी को फिर से तैयार करने की रुपरेखा बनाई जा सके. जबकि राज्य की कमान युवा नेतृत्व को सौंपी जा सके जिससे वहां के युवाओं के बीच पार्टी का जनाधार लौटाया जा सके. राहुल की सीडब्ल्यूसी में कई ऐसे चेहरे भी इस बार नदारद रहेंगे जिन्हें कभी उनका करीबी समझा जाता था. इनमें दिग्विजय सिंह, बीके हरिप्रसाद और कर्ण सिंह शामिल हैं. यह वही हरिप्रसाद हैं जिन्हें कर्नाटक चुनाव में 'राहुल की आवाज' के तौर पर जाना जाता था. मार्च में हुए कांग्रेस महाधिवेशन में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर नई सीडब्ल्यूसी के गठन के लिए राहुल गांधी को अधिकृत किया गया था, जिसके बाद यह टीम गठित की गई है. अब यह वक्त बताएगा कि सीडब्ल्यूसी में बदलाव कांग्रेस के लिए कितना लाभप्रद साबित होगा.
नई दिल्ली कांग्रेस पार्टी के लिए प्रदेश में अपने नए जिला अध्यक्षों के नामों की घोषणा नई मुसीबत बन रही है। पार्टी को डर है कि जिला अध्यक्ष के नामों की घोषणा के बाद मतभेद और बढ़ सकते हैं। इस वजह से एक महीने से नामों की घोषणा को टाला जा रहा है। नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली और ईस्ट दिल्ली लोकसभा इलाके में जिला अध्यक्ष के नामों की घोषणा के बाद बगावत का खतरा ज्यादा है। कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि लोकसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, लेकिन प्रदेश कांग्रेस अभी तक चुनावी मूड में नहीं आ पाई है। स्थिति यह है कि पिछले साल ही प्रदेश कांग्रेस ने ब्लॉक और जिला अध्यक्ष हटा दिए थे, जिसके बाद अब तक नए नामों की घोषणा नहीं हुई है। इस वजह से जमीन पर काम करने वाले नेताओं और प्रदेश पार्टी के नेताओं के बीच काफी गैप है। सूत्रों का दावा है कि अगर इस गैप को जल्द खत्म नहीं किया गया तो परेशानी बढ़ने वाली है। प्रदेश के लिए सबसे बड़ी दिक्कत नॉर्थ-ईस्ट लोकसभा सीट है। इस सीट से प्रदेश के दिग्गज नेता जे. पी. अग्रवाल चुनाव लड़ते रहे हैं। वह यहां से सांसद भी रह चुके हैं। इस इलाके में जिला अध्यक्ष के नामों की घोषणा प्रदेश अध्यक्ष के लिए आसान नहीं होगा। इसी तरह ईस्ट दिल्ली से सांसद रहे संदीप दीक्षित के इलाके में भी बगैर उनकी इच्छा जाने जिला अध्यक्षों के नाम के ऐलान से मुसीबत बढ़ सकती है। इस बारे में जब भी प्रदेश कांग्रेस से सवाल किया गया, तो हर बार उनका कहना था कि लिस्ट तैयार है कुछ दिनों में घोषणा हो जाएगी। इसके बाद पार्टी चुप्पी साध लेती है। बदरपुर से जिला अध्यक्ष रह चुके राम सिंह नेताजी ने पिछले दिनों त्यागपत्र देकर बगावत की पहल झलक दिखा दी है। आने वाले दिनों में और इस्तीफे हो सकते हैं।
रायपुर, लोकसभा चुनाव और छत्तीसगढ़ समेत अन्य राज्यों में होने वाले विधानसभा की तैयारी में जुटी कांग्रेस ने मोदी सरकार और बीजेपी के खिलाफ अभियान तेज कर दिया है. अब कांग्रेस ने बीजेपी के विकास मॉडल का नए अंदाज में चुटीली प्रहार किया है. साथ ही छत्तीसगढ़ में विपक्षी पार्टी के रूप में कांग्रेस ने बीजेपी सरकार के विकास मॉडल के खिलाफ टी-शर्ट वॉर शुरू किया है. कांग्रेस पार्टी ने अपने कार्यकर्ताओं को एक लाख टी-शर्ट बांटने जा रही है, और करीब 35 लाख टी-शर्ट का ऑर्डर दिया है, जिसमें 'उड़ गई विकास की चिड़िया' नारा लिखा हुआ है. इसे बीजेपी द्वारा चुनाव में पेश किए जाने वाले विकास मॉडल पर करारा तंज माना जा है. इसके जरिए कांग्रेस पार्टी ने बीजेपी पर चुटकी भी ली है. बीजेपी के विकास मॉडल का मखौल उड़ाती इन टी-शर्ट को छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ता पहने हुए नजर आ रहे हैं. कांग्रेस की इन सफेद टी-शर्ट को पीले और काले रंग से डिजाइन किया गया है, जो आम लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रही हैं. भीड़भाड़ वाले इलाकों में राहगीर हो या फिर इन कार्यकर्ताओं के अगल-बगल मौजूद लोग, वो टी-शर्ट में लिखे संदेश को बड़े गौर से पढ़ते नजर आते हैं. छत्तीसगढ़ में इस साल के आखिरी में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. राज्य की सत्तारूढ़ बीजेपी के खिलाफ कांग्रेस 'विकास की चिड़िया' नाम से एंटी कंबेंसी कंपेन चला रही है. छत्तीसगढ़ में बीजेपी के खिलाफ कांग्रेस का यह अभियान सफल भी हो रहा है. छत्तीसगढ़ में टी स्टॉल, पान की दुकान और रेस्तरां जैसे सार्वजनिक स्थलों पर कांग्रेस कार्यकर्ता 'उड़ गई विकास की चिड़िया' नारा दिखी टी-शर्ट पहने नजर आ रहे हैं. कांग्रेस पर पलटवार करने का मौका ढूढ़ रही बीजेपी के लिए ये टी-शर्ट मुश्किल बन गई हैं. इन टी-शर्ट पर लिखा नारा कांग्रेस द्वारा बीजेपी पर हमला करने की लाइन पर ही है. वहीं, बीजेपी ने अगले साल होने वाले चुनावों को लेकर व्यापक स्तर पर अभियान शुरू किया है. इसको लेकर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह कई राज्यों में लगातार रैलियां कर रहे हैं. 35 लाख टी-शर्ट का दिया ऑर्डर छत्तीसगढ़ में कांग्रेस 'उड़ गई विकास की चिड़िया' नारा लिखी एक लाख टी-शर्ट अपने कार्यकर्ताओँ में बांटने जा रही है. साथ ही सूबे में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर इस तरह की करीब 35 लाख टी-शर्ट का ऑर्डर दिया है. आने वाले कुछ महीनों में ऐसी टी-शर्ट कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के अलावा कांग्रेस के समर्थक मतदाताओं तक पहुंचाने की भी तैयारी है. वहीं, इस टी-शर्ट को देखकर बीजेपी नाक-कान सिकोड़ रही है. पार्टी की दलील है कि सत्ता पाने के लिए कांग्रेस ओछी हरकतों पर उतर आई है. उसे प्रदेश के गांव-गांव में हुआ विकास नजर नहीं आ रहा है. कांग्रेस ने विकास के कामों को नकाराः बीजेपी टी-शर्ट पहनकर यहां-वहां चहलकदमी करने वाले NSUI के प्रदेश अध्यक्ष आकाश का कहना है कि जब कभी भी वो यह टी-शर्ट पहनकर घर से बाहर निकलते है, तो उन्हें राहगीर बड़े गौर से देखते है. कई तो विकास के मामले में उनसे चर्चा करने के लिए उत्सुक दिखाई देते है. उधर, बीजेपी प्रवक्ता श्रीचंद सुंदरानी इसे कांग्रेस की घटिया सोच बताते है. उनके मुताबिक सस्ती लोकप्रियता पाने के चक्कर में कांग्रेस ने विकास के कामों तक को नकार दिया है. ऐसे में जनता भी उसे चौथी बार नकारने वाली है. विकास के कार्यों को लेकर चुनावी समर में उतरेगी बीजेपी छत्तीसगढ़ में बीजेपी ने अपने कार्यकाल के 15 वर्षों में हुए विकास के कार्यों को मुद्दा बनाया है. बीजेपी विकास के मुद्दे को लेकर चुनावी मैदान में उतरी है. शहरों से लेकर ग्रामीण अंचलों तक और गांव-कस्बों से लेकर गली मोहल्लों तक इन 15 वर्षों में हुए निर्माण कार्यों को बीजेपी ने अपनी उपलब्धि बता रही है. बीजेपी मुख्य रूप से विकास के मुद्दे पर लोगों का ध्यान खींच रही है. लिहाजा कांग्रेस ने इसका तोड़ निकालने के लिए टी-शर्ट वॉर किया है. हालांकि इसे लेकर मुख्यमंत्री रमन सिंह भी कांग्रेस पर पलटवार कर रहे हैं. छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव करीब आते ही बीजेपी और कांग्रेस समेत दूसरे दल एक-दूसरे पर हमला बोलने के लिए नए-नए नुस्खे आजमा रहे हैं. कोई सोशल मीडिया का सहारा ले रहा है, तो कोई धरना प्रदर्शन के जरिए एक-दूसरे की पोल खोलने में जुटा हुआ है. ऐसे में अपने विरोधियों को सबक सिखाने के लिए प्रचार का यह तरीका नहले पे देहला साबित हो रहा है.
नई दिल्ली बिहार में 2019 लोकसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दांवपेच का दौर शुरू हो गया है। खासतौर से बीजेपी, जेडीयू और कांग्रेस ने अपने-अपने हितों को आगे कर रणनीति तैयार करनी शुरू कर दी है। बीजेपी की सहयोगी जेडीयू ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक कर एनडीए के बीच सीटों के बंटवारे के मामले को बीजेपी के पाले में डालने की कोशिश की। दरअसल, पार्टी बिहार में लोकसभा चुनावों के लिए बीजेपी की तरफ से जेडीयू के हिस्से की सीटों को ऑफर किए जाने का इंतजार कर रही है। वहीं, महागठबंधन के दिनों में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव के बीच पुल का काम करने वाली कांग्रेस ने अब सेक्युलर गठजोड़ बनाने की कवायद का हिस्सा नहीं बनने का फैसला किया है जबकि बिहार के मुख्यमंत्री का खेमा बीजेपी के साथ पार्टी की 'नाखुशी' को हवा देने में जुटा है। जैसे दूध का जला छाछ भी फूंक-फूंककर पीता है, उसी तरह पुराने मामले से सबक सीख चुकी कांग्रेस ने प्रदेश के अपने नेताओं के एक धड़े को भी बता दिया है कि वे राजनीतिक दलों के साथ उनकी सौदेबाजी में मोहरा बनने से बचें। बिहार के कांग्रेस प्रभारी शक्ति सिंह गोहिल इस हफ्ते प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात के लिए पटना में रहेंगे। इससे इस बात को बढ़ावा मिल रहा है कि कांग्रेस नीतीश के बजाय आरजेडी लीडरशिप की भावनाओं का सम्मान करेगी। कांग्रेस आरजेडी और जीतन राम मांझी के मौजूदा गठबंधन को टॉप प्राथमिकता दे रही है। फिलहाल कांग्रेस यह हिसाब लगाने में जुटी है कि मौजूदा हालात में नीतीश उनके लिए राजनीतिक तौर पर कितने अहम हो सकते हैं। 2014 में मोदी लहर में बुरी तरह पिटी और रक्षात्मक हुई आरजेडी और जेडीयू ने विजयरथ पर सवार बीजेपी को रोकने के लिए महागठबंधन बनाया था। तब से अगले चार साल में हुए उपचुनावों में मिली जीत से आरजेडी और कांग्रेस अलायंस खुद को एक उभरते हुए मोर्चे के तौर पर देखने लगा है। राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के दौरान जेडीयू ने अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनाव सहित सभी राजनीतिक मुद्दों पर खुद से अपने फैसला लेने का अधिकार दिया। जेडीयू के अलावा राम विलास पासवान की पार्टी- एलजेपी और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी आरएलएसपी भी बिहार में एनडीए की सहयोगी हैं। बिहार में लोकसभा की 40 सीटें हैं। जेडीयू सूत्रों ने बताया कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी की मीटिंग के दौरान कई बार इसके संकेत दिए कि 2019 लोकसभा चुनाव में पार्टी को एनडीए में सम्मानजनक सीटें लड़ने के लिए ऑफर की जाएंगी। उधर, कांग्रेस को लगता कि है दिल्ली और बिहार दोनों जगह एनडीए के शासन और आरएसएस की गतिविधियों ने बिहार के ओबीसी, दलितों और मुसलमानों को आरजेडी की अगुआई वाले मोर्चे के साथ एकजुट कर दिया है। नीतीश के खिलाफ समाज के इस वर्ग की नाराजगी बढ़ती ही जा रही है और उन्हें बिहार में संघ परिवार के एजेंडे में सहयोग करने और उसे बढ़ावा देनेवाले नेता माना जाने लगा है। कांग्रेस हाईकमान को नीतीश कुमार के सीमित राजनीतिक आधार की समझ भी हो गई। उसे लगता है कि उनके लिए नीतीश कुमार से ज्यादा उपयोगी कुशवाहा साबित होंगे। कांग्रेस प्रभारी गोहिल ने कहा, 'कांग्रेस, आरजेडी और मांझी की पार्टी की एक विचारधारा के प्रति समर्पित गठबंधन का हिस्सा है। हमारी प्राथमिकता इस गठबंधन और बीजेपी की अगुआई वाले एनडीए के खिलाफ इसकी विचारधारा की लड़ाई को मजबूत बनाना है। हमारी प्राथमिकता कुछ और नहीं है।' शरद यादव का दल भी औपचारिक तौर पर विपक्षी गठबंधन में शामिल हो सकता है। इसके अलावा कैंपेन मार्केटियर प्रशांत किशोर और जेडीएयू से कांग्रेस में आए मोहन राकेश, जिनके जरिए नीतीश कुमार राजनीतिक चालें चलते थे, दोनों का रुतबा राहुल गांधी के सर्किल में घटा है। इस बीच, बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और नीतीश कुमार के बीच 12 जुलाई को पटना में मुलाकात होने की उम्मीद है। दोनों नेताओं के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर चर्चा होने की संभावना है। जेडीयू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में शामिल होने वाले एक सूत्र ने बताया, 'उनका रुख साफ था। हालांकि, उन्होंने एनडीए के बीच सीटों के बंटवारे पर कुछ नहीं कहा। वह 2019 लोकसभा चुनाव में बीजेपी की तरफ से जेडीयू को सीटें ऑफर किए जाने का इंतजार करेंगे। वह लोकसभा चुनाव में पार्टी के हितों की रक्षा के लिए चिंतित हैं।' सूत्रों ने यह भी बताया कि बैठक के दौरान ने नीतीश कुमार ने पार्टी के शीर्ष नेताओं को यकीन दिलाने की कोशिश की कि पार्टी के लिए सबसे खराब वक्त 2014 लोकसभा का चुनाव था, लेकिन उस वक्त भी पार्टी ने 17 पर्सेंट वोट हासिल किए थे। एक और सूत्र ने बताया, 'उन्होंने यह संदेश दिया कि जेडीयू बिहार में बड़ी राजनीतिक ताकत है और उनकी सरकार की तरफ से बीते एक दशक से किए गए अच्छे कार्यों के चलते इसे समाप्त नहीं किया जा सकता।' नीतीश कुमार ने इस पर भी जोर दिया कि वह बिहार में अपराध, भ्रष्टाचार और सांप्रदायिकता पर कभी भी समझौता नहीं करेंगे। जेडीयू के प्रवक्ता नीरज कुमार ने बताया, 'पार्टी के लिए उनका संदेश यह था कि वह विकास के मुद्दे पर लोकसभा चुनाव लड़ना चाहते हैं। अच्छे शासन के चलते बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर उनकी अलग छवि है इसलिए, उन्होंने विकास की राजनीति पर जोर दिया।' कांग्रेस लीडरशिप को समझ में आ गया है कि लालू की आरजेडी बिहार में बड़ी एनडीए विरोधी ताकत बन गई है और उनके बेटे तेजस्वी ने खुद को राजनीति के माहिर खिलाड़ी के तौर पर स्थापित कर लिया है, जो लालू को सजा होने के बाद गठबंधन को लीड करने में कामयाब रहे हैं। कांग्रेस यह भी जान गई है कि महागठबंधन से विश्वासघात और लालू के परिवार के खिलाफ खोले गए नए मामलों के चलते नीतीश से उनका विरोध बढ़ा है।

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