taaja khabar....अपग्रेड होगा PM मोदी का विमान, लगेगा मिसाइल से बचने का सिस्टम.....पाकिस्तान में चुनाव नजदीक, अंतरराष्ट्रीय सीमा पर फायरिंग 400% बढ़ी....भारत, पाकिस्‍तान और चीन ने बढ़ाया परमाणु हथियारों का जखीरा....अगले चीफ जस्टिस कौन? कानून मंत्री बोले, सरकार की नीयत पर संदेह न करें....बातचीत को तैयार आप सरकार और आईएएस अफसर, अब उप राज्यपाल के पाले में गेंद....लखनऊ रेलवे स्टेशन के पास बने होटेल में भीषण आग, 5 लोगों की मौत, कई गंभीर....बिहार: रोहतास में डीजे में बजाया- हम पाकिस्तानी, 8 गिरफ्तार....प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राहुल गांधी को जन्मदिन पर दी बधाई.....भीमा कोरेगांव हिंसा: हथियार के लिए नेपाली माओवादियों के संपर्क में थे नक्सली....केजरीवाल के धरने का नौंवा दिन, क्या अफसरों-LG से बनेगी बात?....
नई दिल्ली मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का एलजी ऑफिस में धरना राजनीतिक गलियारों में न केवल चर्चा का विषय बना हुआ है, बल्कि चार राज्यों के मुख्यमंत्री खुलकर उनके समर्थन में एक साथ खड़े हो गए। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, कर्नाटक के मुख्यमंत्री एच.डी. कुमारस्वामी, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्र बाबू नायडू और केरल के मुख्यमंत्री पी. विजयन ने शनिवार को दिल्ली पहुंचकर केजरीवाल के मांगों को जायज ठहराया। इसे एक तरह से आगामी लोकसभा चुनाव की रणनीति से भी जोड़ा जा रहा है, जिसमें कांग्रेस पीछे छूटती दिख रही है। तेलंगाना के सीएम के चंद्रशेखर राव के गैर बीजेपी-गैर कांग्रेस गठबंधन की कवायद को तृणमूल की तरफ से भी समर्थन मिलता दिखता रहा है। ऐसे में केजरीवाल के समर्थन में ममता सहित इन चार सीएम की उपस्थिति एक तरह से गैर बीजेपी-गैर कांग्रेस गठबंधन की झलक देती भी दिखती है। आपको बता दें कि पिछले दिनों दिल्ली की राजनीति में लोकसभा चुनाव को लेकर आप और कांग्रेस में गठबंधन के कयास जोर-शोर से सुर्खियां बने थे। हालांकि कांग्रेस इसे नकारती रही। इसके बावजूद आम आदमी पार्टी की चुप्पी से कहीं न कहीं गठबंधन की बात झलक रही थी। इस बीच चारों नेताओं ने शनिवार शाम दिल्ली के आंध्र भवन में मुलाकात की। मुलाकात को 2019 के चुनावों के लिए गैर कांग्रेसी मोर्चे के गठन की तैयारियों से भी जोड़कर भी देखा जा रहा है। हालांकि इस बारे में औपचारिक तौर कोई पुष्टि तो नहीं हुई, लेकिन दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के नेता पहले दिन से ही मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के धरने का विरोध कर रहे हैं। इसे देखते हुए गैर कांग्रेसी मोर्चे के कयासों को बल मिला रहा है। प्रदेश कांग्रेस की तरफ से अजय माकन और पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने भी केजरीवाल के धरने को गलत बताया है। आप नेताओं ने भी कांग्रेस पर तंज कसते हुए बीजेपी की बी टीम करार दिया है। आप का प्रदर्शन, मेट्रो स्टेशनों पर एंट्री हो सकती है बंद इस बीच आम आदमी पार्टी आज बड़ा प्रोटेस्ट मार्च निकालने जा रही है। पार्टी नेताओं के मुताबिक, सभी लोग रविवार शाम 4 बजे मंडी हाउस पर जमा होंगे। वहां से लोक कल्याण मार्ग स्थित प्रधानमंत्री के आवास तक मार्च निकालेंगे। पुलिस के कुछ सीनियर अधिकारियों ने बताया कि प्रोटेस्ट मार्च निकालने के लिए उनसे लिखित इजाजत नहीं ली गई है। ट्रैफिक पुलिस के अनुसार, दोपहर 3 से शाम 6-7 बजे तक तिलक मार्ग, सिकंदरा रोड, आईटीओ, मथुरा रोड, मंडी हाउस, फिरोजशाह रोड, बाराखंभा रोड, अशोक रोड, भगवानदास रोड, जनपथ, टॉलस्टॉय मार्ग, जंतर मंतर और उसके आसपास के इलाकों में ट्रैफिक हैवी रह सकता है। जरूरत पड़ने पर प्रगति मैदान, आईटीओ, मंडी हाउस, जनपथ, केंद्रीय सचिवालय, पटेल चौक, उद्योग भवन, लोक कल्याण मार्ग समेत कुछ मेट्रो स्टेशनों पर एंट्री एग्जिट को भी कुछ देर के लिए बंद किया जा सकता है।
नई दिल्ली एक तरफ कांग्रेस आगामी चुनाव के मद्देनजर देशभर में बीजेपी विरोधी ताकतों को इकट्ठा करने में जुटी है, तो दूसरी तरफ उसने पार्टी को जमीनी स्तर मजबूत करना शुरू कर दिया है। ऐसी ही कोशिश बिहार में चल रही है, जहां पिछले साल तक कांग्रेस महागठबंधन की सरकार में थी। कांग्रेस वहां आने वाले समय में आरजेडी के साथ मिलकर चुनाव में उतरने पर विचार कर रही है। इन दिनों दिल्ली में प्रदेश अध्यक्ष को लेकर मंथन चल रहा है। पहले से ही बिहार में कमजोरी से जूझ रही कांग्रेस को उस समय झटका लगा था, जब महागठबंधन टूटने पर उसके कई विधायकों और नेताओं में असंतोष उपजा था। तब पूर्व अध्यक्ष अशोक चौधरी जैसे नेता अलग हो गए थे। वहां पिछले कई महीनों से एक कार्यकारी अध्यक्ष प्रदेश की जिम्मदारी संभाल रहा है। हाइकमान की योजना है कि अगले कुछ हफ्तों में उन तमाम राज्यों में टीम बना दी जाए, जहां अब तक टीम नहीं बनी है। इनमें बिहार भी शामिल है। बिहार में प्रदेश अध्यक्ष को लेकर 13 जून को एक मीटिंग दिल्ली में हुई, जिसमें संभावित नामों पर चर्चा हुई। अध्यक्ष पद के लिए जिन नामों की चर्चा चल रही है, उनमें मौजूदा कार्यकारी अध्यक्ष कौकब कादरी से लेकर भूमिहार नेता अखिलेश कुमार सिंह, प्रेम मिश्रा और कांग्रेस में हरियाण और पंजाब जैसे राज्यों के प्रभारी रह चुके शकील अहमद तक शामिल हैं। सूत्रों के मुताबिक, इस सिलसिले में अब अगली मीटिंग आगामी 18 जून को दिल्ली में होनी है। अपने 'पुरानों' से संपर्क अपना जमीनी आधार बढ़ाने के लिए कांग्रेस ने अपने पुराने नेताओं, समर्थकों और कांग्रेस के साथ सहानुभूति रखने वाले लोगों से संपर्क कर, उनका सहयोग लेने की योजना पर अमल शुरू किया है। प्रदेश के एक अहम रणनीतिकार का कहना था कि इस योजना के तहत हम अपने उन तमाम नेताओं और समथकों से संपर्क कर रहे हैं, जो कभी कांग्रेस में काफी सक्रिय हुआ करते थे या कांग्रेस में अहम पदों पर थे, लेकिन अब वक्त व हालात के चलते ये लोग या तो हाशिए पर चले गए हैं या पार्टी से कटकर अलग अपने घरों पर रह कर जिंदगी जी रहे हैं।
पटना अपनी पार्टी के खिलाफ बयानबाजी को लेकर अक्सर चर्चा में रहने वाले बीजेपी सांसद शत्रुघ्न सिन्हा को राष्ट्रीय जनता दल में शामिल होने का खुला एक तरह से निमंत्रण मिला है। कई मौकों पर लालू यादव और उनके परिवार से नजदीकी के स्पष्ट संकेत दे चुके शत्रुघ्न सिन्हा को आरजेडी में शामिल होने का निमंत्रण इस बार तेजस्वी यादव की ओर मिला है। तेजस्वी ने कहा, 'अगर सिन्हा पार्टी में शामिल होते हैं तो हम इसका स्वागत करेंगे।' बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने कहा कि हमने पहले ही कहा है कि शत्रुघ्न सिन्हा बिहार का गौरव हैं। कई सालों से पटना साहेब के सांसद के रूप में चुने जा रहे हैं। हालांकि, यह फैसला उनको करना है कि वह आरजेडी में शामिल होना चाहते हैं या नहीं।’ उन्होंने कहा, 'अगर वह पार्टी में शामिल होते हैं तो हम इसका स्वागत करेंगे।’ सिन्हा बुधवार को पटना में आयोजित जेडीयू की इफ्तार में शामिल होने की बजाय आरजेडी नेता तेजस्वी यादव की आयोजित इफ्तार में पहुंचे थे। शत्रुघ्न सिन्हा पहले ही 2019 का लोकसभा चुनाव एक बार फिर पटना साहिब सीट से लड़ने की बात कह चूके हैं। लेकिन वह किस पार्टी की टिकट पर लड़ेंगे यह अभी तक साफ नहीं किया है। बिहार के राजनीतिक गलियारों में सिन्हा के पटना साहिब सीट से अगला लोकसभा चुनाव बीजेपी के बजाए किसी अन्य पार्टी से लड़ने की चर्चा जोरों पर है। लेकिन इस कार्यक्रम ने उनके भविष्य के राजनीतिक कदम का संकेत दे दिए हैं। हालांकि, पटना साहिब लोकसभा सीट से सांसद शत्रुघ्न सिन्हा ने यह साफ कर दिया था कि पारिवारिक मित्रों के बीच उनकी मौजूदगी का कोई राजनीतिक अर्थ नहीं निकाला जाए। वहीं, इफ्तार पार्टी में मीडिया से बातचीत में सिन्हा के आरजेडी में शामिल होने पर तेजस्वी ने कहा था, 'कौन सी ऐसी पार्टी होगी जो शत्रुघ्न सिन्हा को अपनी ओर नहीं चाहेगी। वह बिहार के गौरव हैं।' अपने पिता लालू यादव की गैरमौजूदगी में आरजेडी का कामकाज देख रहे तेजस्वी की यह टिप्पणी कई मायनों में महत्वपूर्ण है।
नई दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी 13 जून को इफ्तार पार्टी का आयोजन करने वाले हैं। माना जा रहा है कि राहुल की इफ्तार पार्टी में कांग्रेस के नेताओं के अलावा विपक्षी दलों के भी कई नेता शिरकत करेंगे। इसे विपक्षी दलों को एक मंच पर लाने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है। बता दें कि कांग्रेस दो साल के अंतराल के बाद इफ्तार का आयोजन करने जा रही है। पार्टी के अल्पसंख्यक विभाग को इफ्तार के आयोजन की जिम्मेदारी दी गई है। राहुल के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद पार्टी की ओर से पहली बार इफ्तार का आयोजन किया जा रहा है। कांग्रेस अल्पसंख्यक विभाग के अध्यक्ष नदीम जावेद ने बताया, 'कांग्रेस अध्यक्ष राहुल की मेजबानी में 13 जून को इफ्तार का आयोजन किया जाएगा। यह आयोजन ताज पैलेस होटल में होगा।' कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस गठबंधन की सरकार बनने के बाद देश के अलग-अलग राज्यों में स्थानीय स्तर पर बीजेपी के खिलाफ गठबंधन बनाने की कोशिश चल रही हैं। वहीं, 2019 लोकसभा चुनाव से पहले राष्ट्रव्यापी स्तर पर एनडीए के खिलाफ महागठबंधन बनाने की कवायद तेज हो गई है। कांग्रेस के साथ पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश तथा तेलंगाना के सीएम और यूपी में मायावती और अखिलेश यादव भी महागठबंधन की कवायद में अहम भूमिका निभा रहे हैं। इससे पहले कांग्रेस अध्यक्ष रहने के दौरान सोनिया गांधी ने 2015 में इफ्तार का आयोजन किया था। कांग्रेस अध्यक्ष की ओर से इफ्तार का आयोजन उस वक्त किया जा रहा है जब राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने राष्ट्रपति भवन में होने वाली इफ्तार का आयोजन नहीं करने का फैसला किया है। उनका मानना है कि करदाताओं के पैसों से भवन में किसी भी धार्मिक कार्यक्रम का आयोजन नहीं होगा। बता दें कि 11 साल बाद यह पहला मौका होगा जब राष्ट्रपति भवन में इफ्तार पार्टी का आयोजन नहीं होगा। इससे पहले पूर्व राष्ट्रपति एपीजे कलाम के कार्यकाल (2002-2007) में इफ्तार पार्टी का आयोजन नहीं होता था।
बेंगलुरु कर्नाटक में कुमारस्वामी सरकार में अपने मंत्रियों को कांग्रेस दो साल के बाद नए चेहरे से रिप्लेस करेगी ताकि वेटिंग लाइन में लगे अन्य लोगों को भी मौका दिया जा सके। इतना ही नहीं, कांग्रेस अपनी नॉन परफॉर्मर्स को छमाही होने वाले असेसमेंट के आधार पर पहले भी पद से हटा सकती है। कांग्रेस इस 'रोटेशन प्लान' के जरिए यह संदेश भी देना चाहती है कि वह वेटिंग लाइन में लगे और असंतुष्ट कार्यकर्ताओं के लिए भी प्रतिबद्ध है। पीसीसी यानी कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमिटी के प्रेजिडेंट जी परमेश्वरा ने इससे पहले सिद्धारमैया सरकार में भी परफॉर्मेंस असेसमेंट की घोषणा की थी लेकिन यह मूर्त रूप नहीं ले सकी थी। आॅल इंडिया कांग्रेस कमिटी के जनरल सेक्रेटरी और कर्नाटक प्रभारी केसी वेणुगोपाल ने टीओआई को बताया कि किन नए मंत्रियों को हटाना है और किन्हें लाना है, इसपर पार्टी हाई कमान ने थ्री पॉइंट फॉर्म्यूला निकाला है। उन्होंने कहा, ''मौजूदा कैबिनेट को अंतिम कैबिनेट मानकर नहीं चलना चाहिए। मिनिस्टर्स की परफॉर्मेंस का हर छमाही रिव्यू होगा और जो भी अपने टार्गेट्स को पूरा नहीं करते पाए जाएंगे, उनको हटा दिया जाएगा। फिलहाल, पहली बार एमएलए बने किसी शख्स को कैबिनेट में जगह नहीं दी जाएगी। मंत्रियों का कार्यकाल दो साल के रोटेशन बेसिस पर होगा।' केपीसीसी के कार्यकारी मुखिया दिनेश गुंडू राव ने कहा कि दो साल बाद होने वाले मंत्रियों के फेरबदल के बाद नए मंत्रियों का कार्यकाल तीन साल का होगा। हालांकि, इनमें जो अच्छा परफॉर्म नहीं कर सकेंगे उनको छमाही असेसमेंट के आधार पर बाहर का रास्ता दिखाया जाएगा। बता दें कि कैबिनेट में जगह नहीं पाने वाले कांग्रेस के कुछ सदस्यों ने वेणुगोपाल और परमेश्वरा पर सही फैसला ले पाने के मामले में फेल करार दिया था। एक सोर्स ने बताया कि जो लोग पार्टी नेतृत्व के खिलाफ बोल रहे हैं उनको भविष्य में मंत्री नहीं बनाया जाएगा। सोर्सेज के मुताबिक, बेंगलुरु में गुरुवार को हुई एक मीटिंग में कांग्रेस के कुछ नेता नाराज थे। इनका मानना है कि पार्टी को राज्य में मजबूत करने के बावजूद इन्हें मंत्री पद नहीं दिया गया।
लखनऊ यूपी में कैराना और नूरपुर उपचुनाव के नतीजों से उत्साहित समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा है कि वह 'एक देश, एक चुनाव' के लिए तैयार हैं। यदि चुनाव आयोग 2019 के लोकसभा चुनाव के साथ ही यूपी में विधानसभा चुनाव भी करवाना चाहता है तो उनकी पार्टी इस पहल का स्वागत करेगी और पार्टी के कार्यकर्ता इसके लिए तैयार हैं। कैराना और नूरपुर उपचुनाव में जीतने वाले उम्मीदवारों से मुलाकात के बाद बुधवार को अखिलेश ने एसपी के प्रदेश कार्यालय में प्रेस कॉन्फ्रेंस किया। पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले कोई और चुनाव नहीं था। जिन सीटों पर उपचुनाव हुए हैं, उससे साफ है गया है कि लोग भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की नीतियों से परेशान हो गए हैं। अखिलेश ने कैराना उपचुनाव में विजयी सांसद तबस्सुम और नूरपुर से जीते विधायक नईमुल हसन को बधाई भी दी। उन्होंने कहा कि कैराना और नूरपुर उपचुनाव बहुत ही महत्वपूर्ण थे। इसमें जनता, किसान और गरीबों के फैसले ने समाजिकता, एकता और भाईचारे का संदेश दिया है। किसान जो मौजूदा सरकार में सबसे ज्यादा परेशान है, उसने संगठित होकर बीजेपी को जवाब दिया। अब सत्ता में बैठे लोगों को सोचना है कि किसान और गरीबों का जीवन कितना बेहतर हुआ है। योगी सरकार पर तीखा तंज अखिलेश ने कहा कि वह किसान, गरीब, नौजवान, मजदूरों को भी धन्यवाद देते हैं। समजावादी पार्टी के साथ ही सारी पार्टियां इनकी अभारी हैं। किसान जो सबसे ज्यादा परेशान है संकट में है उसने भी एक होकर भारतीय जनता पार्टी की गलत नीतियों के खिलाफ वोट किया। उपचुनावों में करारी शिकस्त के बाद सत्ताधारी पार्टी (बीजेपी) कई सारी समीक्षाएं कर रही है, लेकिन पार्टी को मुद्दे पर आना होगा। गरीब, किसानों और गांव में रहने वालों का जीवन स्तर कितना बेहतर हो यह बीजेपी को सोचना होगा। योगी सरकार पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा कि हमने 19 महीने में एक्सप्रेस-वे बनाया, लेकिन इनका तो समय फाइलों में निकल गया।
बेंगलुरु कर्नाटक में बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के लिए कांग्रेस ने जेडी (एस) के साथ गठबंधन कर सरकार तो बना ली है लेकिन आने वाले चुनावों खासकर 2019 (लोकसभा चुनाव) में इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता है। पार्टी के स्थानीय नेता और राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले चुनाव में सबसे अधिक फायदा जेडीएस को होना है जबकि कांग्रेस को इस गठबंधन से कोई खास फायदा नहीं होगा। बल्कि पार्टी के स्थानीय नेताओं को इस बात का अधिक डर है कि कहीं इस गठबंधन के कारण 2019 चुनाव पर उल्टा असर न पड़ जाए। दरअसल, कांग्रेस के स्थानीय नेताओं की यह चिंता बेवजह नहीं है। कारण यह कि जेडीएस का अभी तक मजबूत जनाधार सूबे में सिर्फ पूराने मैसुरु क्षेत्र में ही रहा है। यही नहीं पिछले करीब दो दशक से कांग्रेस और जेडीएस एक-दूसरे के बड़े प्रतिद्वंदी भी रहे हैं। ऐसे में अब कांग्रेस के साथ सरकार में शामिल होने के बाद जेडीएस निश्चित रूप से उसके वोट बैंक को भुनाने में कामयाब होगी। इसके अलावा अगर पुराने मैसुरु को छोड़ दें तो कांग्रेस को सूबे में कहीं और जेडी (एस) से कोई खास मदद मिलती नहीं दिखती है। इसके पीछे बड़ा कारण यह है कि ज्यादातर जगहों पर या तो पार्टी बेहद कमजोर है या फिर उसकी उपस्थिति ही नहीं है। ऐसे में इन जगहों पर गठबंधन के बावजूद कांग्रेस को बीजेपी के खिलाफ अकेले ही मोर्चा संभालना होगा। सूबे के ज्यादातर हिस्सों में जेडीएस कमजोर आंकड़े भी इस बात की तस्दीक करते हैं कि जेडी (एस) के साथ गठबंधन का कोई खास फायदा 2019 में कांग्रेस के लिए नहीं है। दरअसल, 2009 लोकसभा चुनाव में जेडी (एस) का वोट शेयर 13 फीसदी रहा वहीं 2014 में यह 11 फीसदी पर पहुंच गया। इसमें से भी करीब 75 फीसदी आंकड़ा पुराने मैसुरु क्षेत्र का है, जहां जेडीएस मजबूत स्थिति में है। ऐसे में अगर देखें तो सूबे के अन्य हिस्सों में जेडी (एस) का वोट शेयर लगभग न के बराबर है। कई जिलों मे यह 1 फीसदी से भी कम है। राजनीतिक विश्लेषक महादेव प्रकाश कहते हैं, 'यह आंकड़े दिखाते हैं कि जेडी (एस) के साथ इस गठबंधन से कांग्रेस को कोई खास फायदा नहीं पहुंचने जा रहा है।' पुराने मैसुरु क्षेत्र से बाहर जेडीएस कमजोर सबसे महत्पूर्ण तथ्य यह है उत्तर, मध्य और तटीय इलाकों में बीजेपी की मजबूत स्थिति के बाद 2019 में बेहतर प्रदर्शन के लिए कांग्रेस और जेडीएस का प्रदर्शन पुराने मैसुरु पर अधिक निर्भर है। इस क्षेत्र की बात करें तो यहां 2014 में कांग्रेस ने 9 सीटों में से 5 सीटें जीती थीं जबकि 2009 में अकेले 4 सीटें उसके खाते में आई थीं। वहीं गठबंधन सहयोगी जेडीएस की बात करें तो उसने पिछले तीन लोकसभा चुनावों में पुराने मैसुरु क्षेत्र के बाहर एक भी सीट पर जीत हासिल नहीं की है। सीट बंटवारे पर फंसेगी पेच यही वजह है कि फिलहाल यह माना जा रहा है कि 2019 लोकसभा चुनाव से पहले सीट बंटवारे को लेकर भी दोनों पार्टियों में मुश्किलें खड़ी होनी तय हैं। दरअसल, कांग्रेस के पास इस क्षेत्र में फिलहाल 5 सीटे हैं, जिसे वह छोड़ना नहीं चाहेगी लेकिन इस क्षेत्र की सिर्फ 2 सीटों पर (जो अभी जेडीएस के खाते में हैं) जेडीएस समझौता कर लेगी इसकी उम्मीद कम है। प्रकाश कहते हैं, 'सीटों के बंटवारे को लेकर मुश्किलें खड़ी होंगी। ऐसे में कांग्रेस को समझौता करना पड़ेगा और जेडीएस के लिए कुछ सीटें छोड़नी पड़ेंगी। खासकर मैसुरु, तुमकुरु और चिक्कबल्लापुर को जेडीएस मांग सकती है।' 'गठबंधन दोनों के लिए बेहतर' उधर, कांग्रेस एमएलसी वीएस उगरप्पा इस गठबंधन को दोनों पार्टियों के लिए बेहतर मान रहे हैं। उनका मानना है कि दोनों के लिए आने वाले चुनाव में यह भागीदारी बेहतर साबित होगी। उगरप्पा कहते हैं, 'मैं पूरी तरह से आश्वस्त हूं कि जेडीएस लोकसभा चुनाव में अधिक सीटें नहीं मांगेगी। अगर पुराने मैसुरु की कुछ सीटों पर हमें समझौता भी करना पड़ा तो भी गठबंधन इसका सही संकेत सूबे के अन्य हिस्सों में लोगों तक पहुंचाएगा और गैर बीजेपी वोटर्स को कांग्रेस से जोड़ने की कोशिश रहेगी।'
नई दिल्ली 2019 के लोकसभा चुनाव में दिल्ली की 7 सीटों पर आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन के कयासों के बीच शनिवार को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सामने आए और उन्होंने साफ कह दिया कि आम आदमी पार्टी के साथ कोई चुनावी समझौता नहीं किया जाएगा। आम आदमी पार्टी ने माकन के इस बयान पर कोई आधिकारिक टिप्पणी तो नहीं की, लेकिन मुख्यमंत्री के सलाहकार नागेंद्र शर्मा ने माकन पर जोरदार हमला बोल दिया। उन्होंने एक के बाद एक कई ट्वीट कर कहा कि एक जोकर एक दिन पहले लोकसभा की तीन सीट के ऑफर का सपना देखता है और अगले ही दिन उसे यह अहसास हो जाता है कि इस धरती पर एक ऐसी पार्टी को कोई एक भी सीट नहीं देगा, जो 2014 के लोकसभा चुनाव में सभी सात सीटों पर तीसरे नंबर पर रही है और चार सीटों पर जमानत जब्त हो गई हो। उन्होंने माकन को अपनी सीट घोषित करने की चुनौती भी दे डाली। पढ़ें: माकन बोले, केजरीवाल ने खड़ा किया मोदी जैसा राक्षस माकन के इनकार के बााद आम आदमी पार्टी ने उन्हें नजरअंदाज करने की ठानी। आप के दिल्ली प्रवक्ता सौरभ भारद्वाज ने माकन की टिप्पणी पर कहा कि मैं इस पर टिप्पणी नहीं करना चाहता तो एक अन्य वरिष्ठ ने कहा, 'हमें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि माकन क्या कहते हैं और हमें लगता है कि कांग्रेस को भी इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह क्या कहते हैं।' बता दें कि शनिवार को माकन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में चार से पांच बार पीएम मोदी को राक्षस कहा था। उन्होंने कहा कि 2012-13 अन्ना आंदोलन में किरण बेदी, बाबा रामदेव, जनरल वी. के. सिंह के साथ, आरएसएस और बीजेपी की बैकिंग के साथ मोदी नाम के इस राक्षस को खड़ा किसी ने किया है तो उसका नाम अरविंद केजरीवाल है। उन्होंने कहा कि वे लोग सेक्युलर अलायंस कर सकते हैं, लेकिन उन लोगों के साथ अलायंस कैसे कर सकते हैं, जिनके बारे में दिल्ली कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का कहना है कि इन्होंने मोदी जैसे राक्षस को खड़ा किया है। शुक्रवार को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष माकन ने मीडिया में कांग्रेस और आप के 2019 के संसदीय चुनाव के लिए समझौता करने की खबरों को नकारते हुए कहा था कि आम आदमी पार्टी से चुनावी गंठबंधन न करने के दो कारण है। पहला यह है कि केजरीवाल सरकार दिल्ली में विकास के काम बिल्कुल नहीं कर रही है और दूसरा केजरीवाल की लोकप्रियता बड़ी तेजी से गिर रही है। इसके बाद मुख्यमंत्री के सलाहकार ने ट्वीट कर कहा कि पॉलिटिक्स में रिजेक्ट हो चुके माकन अब अपने हिसाब से चुनावी विश्लेषण कर रहे हैं, जिनकी पार्टी के कैंडिडेट की दिल्ली विधानसभा चुनाव में ज्यादातर सीटों पर जमानत जब्त हो गई थी। एक और ट्वीट में उन्होंने माकन का नाम लिए बिना कहा कि दिल्ली का कौन सा कांग्रेसी नेता बीजेपी में शामिल होने के लिए अमित शाह से मिला था? दरअसल आम आम आदमी ने लोकसभा की पांच सीटों पर प्रभारियों के नामों की घोषणा कर दी और उसके बाद राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई। कांग्रेस और आप के लीडर्स के बीच मिलकर चुनाव लड़ने के कयास भी लगाए जाने लगे और इस पर आप के एक सीनियर लीडर की ओर से कहा गया कि कांग्रेस की टॉप लीडरशिप के साथ बातचीत चल रही है। उसके बाद शनिवार को अजय माकन सामने आए और उन्होंने कहा कि दिल्ली में कांग्रेस नेता आप के साथ गठबंधन के पक्ष में नहीं है।
नई दिल्ली देशभर में 4 लोकसभा और 10 विधानसभा सीटों पर हुए उपचुनावों में कई सीटों पर विपक्षी दलों के गठबंधन से हुई बीजेपी की हार में अब आम आदमी पार्टी और कांग्रेस को भी संभावना दिख रही है। राजनीति संकेतों का खेल है और फिलहाल दोनों पार्टी के नेता आपस में संकेतों का खेल खेल रहे हैं। अरविंद केजरीवाल ने हाल में जहां पूर्व पीएम डॉ मनमोहन सिंह की तारीफ की है तो आप नेता दिलीप पांडे ने साफ कहा है कि कांग्रेस के नेता पार्टी से संपर्क में है। यानी इतना तो तय है कि 2019 में बीजेपी को साधने के लिए आप और कांग्रेस में कुछ न कुछ जरूर पक रहा है। उपचुनावों ने जताई उम्मीद उपचुनावों में गठबंधन की जीत से सभी विपक्षी दलों में एक उम्मीद जगी है। इस उम्मीद से दिल्ली में कांग्रेस और आप के बीच भी गठबंधन के कयास लगाए जा रहे हैं। शुक्रवार को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय माकन और आम आदमी पार्टी के नेता दिलीप पांडेय के ट्वीट ने इन अटकलों को और मजबूती दी। हालांकि, माकन के ट्वीट का दिलीप पांडेय की ओर से दिए गए जवाब से इतना तो साफ हो गया कि फिलहाल स्थिति क्लियर नहीं है। खासकर सीटों के बंटवारे को लेकर दोनों पार्टियां एक-दूसरे को कम आंक रही हैं। मगर, दोनों पार्टियों के बीच गठबंधन की बात जरूर हो रही है। कांग्रेस के स्थानीय नेता इस गठबंधन को स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं। उन्होंने एक सुर से इसे खारिज कर दिया। कांग्रेस 3 सीटों के कथित ऑफर की बात कर रही है तो ‘आप’ नेता कांग्रेस को एक सीट दे रहे हैं। समझौते किस तरह होगा यह तो समय बताएगा, लेकिन जानकारों का कहना है कि बीजेपी को हराना है तो गठबंधन करना ही होगा। इस बारे में अजय माकन ने कहा कि ‘आप’ की लोकप्रियता गिर रही है। एमसीडी और उपचुनाव में यह साफ हो गया है कि उनका वोट तेजी से कम हो रहा है और कांग्रेस का बढ़ रहा है। इस बारे में दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने ‘आप’ के साथ गठबंधन पर कहा कि अभी यह बहुत जल्दी है। गठबंधन की बात हाइकमान को तय करनी है। उन्होंने कहा कि दूसरी पार्टी कौन होती है सीटें तय करने वाली। जो भी होगा कांग्रेस के आलाकमान की इच्छा से होगा। पूर्व सांसद जयप्रकाश अग्रवाल ने कहा कि समझौता बिल्कुल नहीं होना चाहिए। कांग्रेस दिल्ली में काफी मजबूत है। ‘आप’ का कांग्रेस से कोई मुकाबला नहीं है। अरविंदर सिंह लवली का कहना है कि राष्ट्रीय स्तर पर सेकुलर पार्टियों का महागठबंधन बन रहा है। अरविंद केजरीवाल का इसमें कोई योगदान नहीं है, उन्होंने तो मोदी जैसे लोगों को आगे बढ़ाने के लिए आंदोलन किया। लवली ने कहा कि शीला दीक्षित के कामों की चर्चा आज भी होती है, लेकिन केजरीवाल ने झूठे करप्शन के आरोप लगाकर बीजेपी को आगे बढ़ाया, ऐसे लोगों से कांग्रेस का गठबंधन नहीं हो सकता। हारुन यूसुफ ने कहा कि गठबंधन हो ही नहीं सकता। 3 सीटों का ऑफर मानने को तैयार नहीं कांग्रेस आप और कांग्रेस के बीच दिल्ली के सातों लोकसभा सीटों पर एकसाथ चुनाव लड़ने की बात पिछले महीने उठी थी। उस समय कांग्रेस ने इस बात से इनकार किया था। मगर, पर्दे के पीछे की कहानी यह है कि काफी समय से दोनों दलों के बीच गठबंधन की बातें हो रही हैं, जो सीटों के बंटवारे की लड़ाई की वजह से सामने आ गई है। कांग्रेस के शीर्ष नेता, नरेंद्र मोदी को केंद्र से हटाने के लिए हर कुछ भी करने के लिए तैयार हैं, वहीं प्रदेश कांग्रेस के नेताओं को गठबंधन की वजह से अपना राजनीतिक करियर डूबता नजर आ रहा है। कांग्रेस के संभावित उम्मीदवारों और नेताओं में हलचल मच गई है। सभी नेताओं ने इसका विरोध किया। किसी ने भी समझौते को सही नहीं बताया, लेकिन किसी के पास इस बात का जवाब नहीं था कि क्या वे अकेले बीजेपी को हराने में सक्षम हैं। पुराना इतिहास अब बीती बात हो गई है। कांग्रेस और बीजेपी में सीधी टक्कर होती थी, लेकिन अब त्रिकोणीय मुकाबला हो गया है, जिससे बीजेपी को फायदा होता दिख रहा है। सर्वे में 'आप' की स्थिति खराब कांग्रेस नेताओं का कहना है कि ‘आप’ की उल्टी गिनती शुरू हो गई है। एक नेता ने कहा कि कांग्रेस और ‘आप’ दोनों ने इंटरनल सर्वे कराया है। ‘आप’ की स्थिति खराब होती जा रही है। लोग पानी के लिए तरस रहे हैं। 12वीं और 10वीं के रिजल्ट अब किसी से छिपे नहीं हैं। इससे उनका एजुकेशन पर काम करने का दावा भी गलत साबित हुआ है। सूत्रों का कहना है कि सच तो यह है कि ‘आप’ अपनी जमीन दिल्ली में बचाना चाह रही है, इसलिए उनकी तरफ से बार-बार ऐसी कोशिश की जा रही है। पंजाब उपचुनाव में भी उनकी हालत खराब ही रही। 2019 की तैयारी 2019 के लोकसभा चुनावों के लिए आप ने अभी से तैयारी शुरू कर दी है। पार्टी ने शुक्रवार सुबह दिल्ली की 5 लोकसभा सीटों के लिए इंचार्ज बना दिए हैं। इनकी जिम्मेदारी होगी कि वे इन लोकसभा सीटों में कार्यकर्ताओं के साथ जमीनी स्तर पर काम करके बूथ लेवल पर पार्टी को मजबूत करें और नए लोगों को पार्टी के साथ जोड़ें। इसे लोकसभा चुनावों की तैयारियों के लिए बड़ा कदम बताया जा रहा है। पार्टी की तरफ से बताया गया कि 5 सीनियर नेताओं को 5 लोकसभा सीटों में संगठन को मजबूत करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। पार्टी के दिल्ली प्रभारी गोपाल राय ने कहा कि लोकसभा चुनावों को देखते हुए बूथ लेवल पर पार्टी को मजबूत करने के लिए प्रभारियों की नियुक्ति की गई है। वे चुनाव की तैयारियों की रणनीति बनाने का काम करेंगे। जिन 5 नेताओं के नामों की घोषणा की गई है, उनमें से कुछ के नाम संभावित उम्मीदवारों के रूप में भी सामने आए थे। माना जा रहा है कि ये पांचों नेता इन सीटों से लोकसभा चुनाव भी लड़ सकते हैं। इनमें से कुछ नेताओं ने पिछले दिनों में इन सीटों में अपनी गतिविधियां भी बढ़ा ली हैं। पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता और नॉर्थ-ईस्ट लोकसभा सीट के इंचार्ज बनाए गए दिलीप पांडे ने कहा कि अभी कहना जल्दबाजी होगा कि जिन्हें इंचार्ज बनाया गया है, उनमें से कौन चुनाव लड़ेगा। अगर कोई इंचार्ज चुनाव लड़ने के लिए फिट है तो कोई पाबंदी नहीं है। हालांकि उन्होंने कहा कि कैंडिडेट पार्टी की पॉलिटिकल अफेयर्स कमिटी ही तय करेगी। बाकी 2 सीटों को खाली छोड़ने को लेकर कहा जा रहा है कि कांग्रेस के साथ संभावित गठबंधन के लिए 2 सीटों पर किसी को इंचार्ज नहीं बनाया है। हालांकि दिलीप पांडे का कहना था कि ऐसा कुछ नहीं है और जल्द ही इन सीटों के लिए भी प्रभारियों के नामों की घोषणा कर दी जाएगी। अभी अपने सारे पत्ते नहीं खोलेगी 'आप' आम आदमी पार्टी के 5 सीटों पर ही प्रभारियों के नामों की घोषणा किए जाने के बाद अचानक राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई है। सवाल उठ रहा है कि क्या अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों में बीजेपी को रोकने के लिए पार्टी दिल्ली में कांग्रेस के साथ गठबंधन करेगी। यह सवाल इसलिए भी उठ रहा है, क्योंकि खुद आप नेताओं ने माना है कि कांग्रेस के साथ संभावित गठबंधन को लेकर उनके वरिष्ठ नेताओं और कांग्रेस की टॉप लीडरशिप के बीच बातचीत हुई है। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि पिछले कुछ दिनों से कांग्रेस और आप की टॉप लीडरशिप के बीच दिल्ली में मिलकर चुनाव लड़ने को लेकर बातचीत चल रही है, क्योंकि हमारा मुख्य एजेंडा हर हाल में बीजेपी को रोकने का है। इस नेता का यह भी दावा है कि यह सारा डिवेलपमेंट कर्नाटक में कुमारस्वामी के शपथ लेने के बाद पिछले एक हफ्ते के दौरान हुआ है। साथ ही प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय माकन को बाईपास करके सीधे पार्टी के टॉप नेतृत्व के साथ यह बातचीत चल रही है। कहा जा रहा है कि पिछले दिनों इसी सिलसिले में आप के सर्वोच्च नेता और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बीच भी सीटों के बंटवारे पर एक मीटिंग हुई थी। कांग्रेस और आप का यह गठबंधन सिर्फ दिल्ली तक सीमित रहेगा या पंजाब और हरियाणा जैसे उन दूसरे राज्यों में होगा, इसे लेकर भी आप नेताओं ने अभी अपने सारे पत्ते नहीं खोले हैं। हालांकि आप नेता दावा कर रहे हैं कि इन राज्यों में भी गठबंधन के लिए कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी से सहयोग मांगा है। जहां तक दिल्ली का सवाल है, तो यहां सीटों के बंटवारे को लेकर अभी आप नेता कुछ भी बोलने के लिए तैयार नहीं है। हालांकि उन्होंने इतना जरूर माना है कि कांग्रेस को दिल्ली में एक सीट देने को लेकर बातचीत जरूर हुई है, लेकिन उस पर अभी कोई फैसला नहीं हुआ है और ना ही यह तय हुआ है कि कौन सी सीट कांग्रेस को दी जाएगी। इस बीच आप विधायक अलका लांबा ने अपने ट्वीट में दावा किया है कि कांग्रेस दो सीटें मांग रही थीं, जबकि आम आदमी पार्टी के कुछ सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस दिल्ली में तीन सीटों पर चुनाव लड़ना चाहती है, मगर आम आदमी पार्टी उसे इतनी सीटों पर समर्थन देने के लिए तैयार नहीं है।
बेंगलुरु कर्नाटक में कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने और मुख्यमंत्री बनने वाले एचडी कुमारस्वामी शुरुआत से ही ज्यादातर कामों के लिए राहुल गांधी की अनुमति ले रहे हैं। चाहे वह कैबिनेट मंत्रियों का सवाल हो या फिर किसानों का लोन माफ करने की बात हो। हाल ही में उन्होंने अपने बयान से भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा को हवा दे दी थी। कुमारस्वामी ने कहा था कि वह कांग्रेस के प्रति बाध्य हैं, 6.5 करोड़ लोगों के प्रति नहीं। उन्होंने यह भी कहा था कि वह सीएम की कुर्सी पर पुण्यात्मा (राहुल गांधी) की कृपा से बैठे हैं। कुमारस्वामी के इस तरह के बयानों से कई राजनीतिक पंडितों ने कुछ अलग तरह के कयास लगाने शुरू कर दिए हैं। कहा जा रहा है कि कुमारस्वामी इसलिए ऐसा कर रहे हैं कि अगर आगे चलकर चीजें ठीक ना हों तो वह सारा का सारा दोष कांग्रेस पर मढ़ सकें और खुद की गर्दन बचा सकें। गड़बड़ी का दोष हमपर डाल सकते हैं कुमारस्वामी' कांग्रेस नेता भी कुमारस्वामी के इस रवैये पर खुलकर बोलने से नहीं चूक रहे हैं। कैबिनेट में मंत्रीपद के लिए जोर लगा रहे एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, 'कुमारस्वामी काफी स्मार्ट गेम खेल रहे हैं। वह पूरा का पूरा भार राहुल गांधी पर डाल रहे हैं। अगर कहीं मंत्रिमंडल को लेकर असंतोष होता है या फिर कर्जमाफी को लकर कुछ गड़बड़ होती है तो वह इसका दोष भी हमपर ही डाल देंगे।' एक और कांग्रेस नेता कहते हैं, 'यह गलत है। वह राज्य के मुखिया हैं और ट्रस्ट वोट हासिल कर चुके हैं तो वह किसी भी जिम्मेदारी से कैसे भाग सकते हैं? उन्हें अपना गला बचाने की कोशिश करने की बजाय खुद पर जिम्मेदारी लेनी चाहिए।' राहुल की तारीफ में गलत क्या है: उगारप्पा वहीं कांग्रेस के प्रवक्ता वी एस उगारप्पा कहते हैं, 'राहुल गांधी की तारीफ करने में गलत क्या है? जबकि सांप्रदायिक ताकतों को दूर रखने के लिए कांग्रेस ने सीएम की सीट का बलिदान दिया है। सीएम की इज्जत और बढ़ी ही है। राहुल गांधी की तारीफ करके कुमारस्वामी अपनी पार्टी के लोगों में संदेश देना चाहते हैं कि वे भी शांति बनाए रखें।' 'कुमारस्वामी को जिम्मेदारी तो लेनी ही होगी' राजनीतिक विश्लेषक संदीप शास्त्री कहते हैं, 'कुमारस्वामी के बयानों को देखने के दो तरीके हैं। पहला कि वह कांग्रेस के सपॉर्ट से सरकार चलाने में खुद को असहाय और परेशान महसूस कर रहे हैं और उसी की ईमानदार अभिव्यक्ति कर रहे हैं। इसका असर आम लोगों और उनसे जुड़े कामों पर होगा। दूसरा है कि वह खुद को मजबूत स्थिति में नहीं देख पा रहे हैं क्योंकि उनकी पार्टी के लोग सीमित हैं और कांग्रेस गठबंधन में हावी है।' वह आगे कहते हैं, 'शुरुआत में भले ही उन्हें सहानुभूति मिले लेकिन समय के साथ उन्हें राज्य का मुखिया होने के नाते जिम्मेदारी लेनी ही पड़ेगी। वह हर बार किसी और को जिम्मेदार ठहराकर खुद को बचा नहीं सकते हैं।'

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