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नई दिल्ली मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस-बीएसपी और कांग्रेस-एसपी के ब्रेकअप को भले ही पार्टी के लिए झटका माना जा रहा हो। लेकिन कांग्रेस इसमें भी रणनीति देख रही है। कांग्रेस के रणनीतिकार ट्विन प्लान पर काम कर रहे हैं, पहला एकजुट होकर बीजेपी के दुर्गों को घेरने का काम करना और दूसरा क्षेत्रीय दलों को कम स्पेस देना। कांग्रेस ने अपनी ओर से एमपी में बीएसपी को अधिकतम 10 सीटें और समाजवादी पार्टी को 3 सीटें देने का फैसला लिया था। चुनावी राज्यों में कांग्रेस की रणनीति तैयार करने में जुटे नेताओं का कहना है कि यदि एसपी और बीएसपी अपने आधार वाले राज्य उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को जगह देने में कोताही बरतते हैं तो फिर उन्हें भी उसकी मजबूती वाले इलाकों में उदारता की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। कांग्रेस को लगता है कि यदि वह राज्यों में एसपी और बीएसपी को बड़ी हिस्सेदारी देती है तो फिर लोकसभा चुनाव में इनकी मांग और बढ़ जाएगी। यहां तक कि दोनों पार्टियां उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को खासी कम जगह दे सकती हैं। राज्यों में बेहतर कर आम चुनाव में ताकत दिखाएगी कांग्रेस मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में अकेले चुनाव लड़ने में कांग्रेस लंबे वक्त के लिए अपना फायदा देख रही है। कांग्रेस इन चुनावी राज्यों में अपनी ताकत को बढ़ाना चाहती है ताकि वह लोकसभा चुनाव से पहले खुद को मजबूती के साथ विपक्ष का नेता साबित कर सके। यही वजह है कि कांग्रेस गठबंधन न करने के रिस्क को भी फायदे के तौर पर देख रही है। जहां डायरेक्ट मुकाबले में कांग्रेस, वहां नहीं देगी एंट्री एक कांग्रेस लीडर ने कहा, 'हम जानते हैं कि बीएसपी, एसपी, तृणमूल और एनसीपी जैसे दल चाहते हैं कि विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस कमजोर होकर उभरे ताकि 2019 में वह बढ़त में रहें। लेकिन, हमें अपने हितों की रक्षा करनी होगी।' भले ही कांग्रेस मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य से सत्ता से बाहर है, लेकिन वह यहां बीजेपी के साथ खुद को ही मुख्य मुकाबले में मानती है। इसके अलावा कांग्रेस राजस्थान, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, हिमाचल, गोवा और असम में खुद को बीजेपी के साथ मुख्य मुकाबले में मानती है। उसकी रणनीति यह है कि यहां किसी अन्य तीसरे या चौथे प्लेयर को एंट्री क्यों दी जाए। अपने आधार में सेंध से आशंकित है कांग्रेस मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में ओबीसी-एससी-एसटी वोटरों की बड़ी संख्या है। कांग्रेस मानती है कि यदि इन राज्यों में वह एसपी और बीएसपी को स्पेस देती है तो उसे भविष्य में अपने जनाधार को खोना पड़ सकता है। यूपी और बिहार में ऐसा ही हुआ है, जहां क्षेत्रीय दलों के मजबूत होने के बाद से कांग्रेस वापसी नहीं कर सकी है।
नई दिल्ली, 07 अक्टूबर 2018, 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले अगले महीने हो रहे पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव को आखिरी सेमीफाइनल की तरह देखा जा रहा है. चुनाव आयोग ने शनिवार को मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, मिजोरम और तेलंगाना विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान किया है. बीजेपी के लिए ये विधानसभा चुनाव करो या मरो जैसे हैं. इसमें राजस्थान की सियासी बाजी जीतना बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती नजर आ रही है. ऐसे में चुनाव आयोग का आखिरी दौर में राजस्थान में मतदान कराना कहीं बीजेपी के लिए फायदे का सौदा तो साबित नहीं होगा? चुनाव आयोग ने जिन पांच राज्यों की तारीखों का ऐलान किया है, उनमें से मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में बीजेपी की सरकारें हैं. बीजेपी के लिए इन तीनों राज्यों में सत्ता को बरकरार रखना एक बड़ी चुनौती है. छत्तीसगढ़ में सबसे पहले मतदान होंगे. राज्य में 12 और 20 नवंबर को दो चरणों में वोटिंग होगी. वहीं, मध्य प्रदेश में 28 नवंबर को मतदान किया जाएगा. जबकि राजस्थान में 7 दिसंबर को वोटिंग की तारीख तय की गई है. 2013 विधानसभा चुनाव के बाद राजस्थान में जितने भी उपचुनाव हुए हैं उसमें से एक भी बीजेपी जीत नहीं सकी है. इसी साल फरवरी में अजमेर, अलवर लोकसभा और मांडलगढ़ विधानसभा सीट के उपचुनाव में कांग्रेस ने रिकॉर्ड जीत दर्ज की है. ये तीनों सीटें पहले बीजेपी के पास थीं. वसंधुरा राजे के खिलाफ राज्य में एंटी-इनकमबेंसी और बीजेपी की अंदरूनी गुजबाजी व जातीय समीकरण बीजेपी के खेल को लगातार बिगाड़ रहे हैं. ऐसे में आखिरी में विधानसभा चुनाव होना बीजेपी के लिए एक तरह से संजीवनी बन सकता है. दरअसल, राजस्थान में जब विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होंगे, उससे करीब 10 से 11 दिन पहले मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 20 दिन पहले चुनाव हो चुके होंगे. बीजेपी के सारे नेता इन राज्यों से खाली हो चुके होंगे. इन राज्यों से फ्री होने के बाद वे सभी राजस्थान में लगाए जा सकते हैं. इससे पार्टी को प्रचार के लिए अच्छी खासी टीम मिल जाएगी. दूसरा सबसे बड़ा फायदा ये होगा कि राजस्थान में मौजूदा समय में जिस तरह की एंटी-इनकमबेंसी वसुंधरा राजे के खिलाफ है. उसके लिए मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ का माहौल का भी फायदा मिल सकता है. ऐसे में सवाल उठता है कि चुनाव आयोग का आखिरी में राजस्थान चुनाव कराना वसुंधरा राजे के लिए कहीं संजीवनी तो नहीं है.
नई दिल्ली, राजस्थान की राजनीति में हमेशा से जाट सियासत का बड़ा महत्व रहा है. लेकिन अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे के सियासी संघर्ष के चलते सूबे की जाट राजनीति में सियासी शून्य कायम हो गया. ताकतवर कौम होने के चलते भी इस समुदाय को वो महत्व नहीं मिला जिसकी ये उम्मीद लगाए बैठें थें. अब जाट राजनीति में आए इस शून्य को भरने के लिए जाट नेता और खींवसर से निर्दलीय विधायक हनुमान बेनिवाल ने पूरी बिरादरी को इकट्ठा करने की कवायद शुरू की है. आजादी के बाद राजतंत्र समाप्त हुआ और लोकतंत्र की स्थापना हुई. सामंती-जमींदारी खत्म होने के बाद राजपूत कांग्रेस के खिलाफ हो गए तो किसान वर्ग या जाट समुदाय अपनी जमीन वापस मिलने पर कांग्रेस के साथ खड़े हो गया. राजस्थान के शेखावाटी, मारवाड़ अंचल में कांग्रेस की सरकारों में जाटों ने अपनी राजनीति खूब चमकाई. समूचे शेखावाटी, मारवाड़ इलाके में कांग्रेस पार्टी के टिकट पर जाट विधायक और सांसद का चुनाव जीतते रहे. मिर्धा, मदेरणा और ओला कांग्रेस के जाट दिग्गज राजस्थान में जाट समाज को राजनीतिक और सामाजिक पहचान दिलाने में बलदेव राम मिर्धा को बड़ा श्रेय जाता है. 50 के दशक में मारवाड़ किसान सभा बना कर मिर्धा ने कांग्रेस के समानांतर संगठन खड़ा करने का प्रयास किया. लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू ने बलदेव राम मिर्धा से मध्यस्थता कर भूमि सुधार से जुड़े अहम निर्णय लिए. जिसके बाद मारवाड़ किसान सभा और कांग्रेस की राह एक हो गई और सामंती-जमींदारी प्रथा के खिलाफ राजस्थान में जाट या किसान वर्ग कांग्रेस के झंडे तले लामबंद हुए. बलदेव राम मिर्धा परिवार के दो सदस्य रामनिवास मिर्धा और नाथूराम मिर्धा के समय जाट राजनीति शिखर पर पहुंचा. राजस्थान का नागौर जिला इन्हीं के चलते जाट राजनीति का सियासी केंद्र बना. मिर्धा परिवार की राजनीतिक हनक का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आपातकाल के बाद जब कांग्रेस का उत्तर भारत से सफाया हो गया, तब विधानसभा चुनाव में मारवाड़ की 42 सीटों में से कांग्रेस ने 26 सीटें जीत लीं. मिर्धा परिवार के अलावा परमराम मदेरणा और शीशराम ओला कांग्रेस के बड़े नेता रहें. जिन्होंने केंद्र से लेकर राज्य में अहम भूमिका निभाई. जाट समुदाय के अन्य नेताओं में विश्वेन्द्र सिंह, बाणमेर से बीजेपी सांसद कर्नल सोना राम, रिछपाल मिर्धा, ज्योति मिर्धा, रामरारायण डूडी, महीपाल मदेरणा सरीखे नामी गिरामी नेता रहे. गहलोत-राजे के सियासी संघर्ष में जाटों ने खोई पहचान कांग्रेस के अशोक गहलोत और बाद में 2003 में वसुंधरा राजे के राजस्थान की राजनीति में उतरते ही चाहे जाट हो या राजपूत या ब्राह्मण इन प्रभावशाली जातियों के राजनीतिक वजूद को नियंत्रित कर दिया. जो नेता वसुंधरा राजे और अशोक गहलोत के लिए चुनौती बना उनका राजनीतिक वजूद या तो खत्म कर दिया गया या फिर वे हाशिये पर चले गए. मिर्धा परिवार, मदेरणा परिवार, ओला, घनश्याम तिवाड़ी हो या जसवंत सिंह जसोल के उदाहरण प्रत्यक्ष मौजूद हैं. जाट समुदाय के दिग्गज नेताओं की धमक राज्य और केंद्र में तो थी लेकिन ये कभी अपना मुख्यमंत्री नहीं बनवा पाए. ऐसे में मुख्य रूप से किसानी करने वाले जाट समुदाय का महत्वकांक्षी युवा वर्ग जो खेती किसानी के फायदेमंद नहीं होने कारण नौकरी में अपना भविष्य देखता है, नाराज हो गया. गौरतलब है कि गहलोत सरकार के खिलाफ युवाओं के गुस्से की लहर पर सवार होकर वसुंधरा राजे मुख्यमंत्री तो बन गईं, लेकिन 50 लाख नौकरी देने का वादा पूरा नहीं कर पाईं. अब इन युवाओं विशेषकर जाट समुदाय को इकट्ठा करने के लिए खींवसर के निर्दलीय विधायक हनुमान बेनीवाल पूरे प्रदेश का दौरा कर रहे हैं. राजस्थान में तीसरे मोर्चे की धमक राजस्थान की राजनीति में नागौर, सीकर, झुंझनू, भरतपुर और जोधपुर को एक तरह से जाट बेल्ट कहा जाता है. जाट समुदाय का लगभग 60 सीटों पर प्रभाव है. हनुमान बेनीवाल को जिस तरह से जाट युवाओं का समर्थन मिल रहा है. ये समाज बेनीवाल को राजस्थान के पहले जाट सीएम के तौर पर देखना चाहता है. बेनीवाल की बढ़ती सियासी ताकत को देखते हुए ही बीजेपी के अलग होकर नई पार्टी बनाने वाले घनश्याम तिवाड़ी ने बेनीवाल को समर्थन देने की बात कही है. उन्होंने कहा है कि भारत वाहिनी पार्टी राजस्थान की सभी सीटों पर चुनाव लड़ेगी. लेकिन जिन सीटों पर बेनीवाल के प्रत्याशी की जीत सुनिश्चित होगी उन सीटों पर उनका समर्थन किया जाएगा. तिवाड़ी ने यह भी कहा है कि बेनिवाल से बात चीत के बाद ही वे अपनी पार्टी के उम्मीदवार तय करेंगे. इधर अपने मेवाड़ दौरे पर विधायक हनुमान बेनीवाल ने कहा है कि राजस्थान में कांग्रेस-बीजेपी के खिलाफ तीसरे मोर्चे का गठन किया जाएगा. साथ ही जयपुर की विशाल रैली में नई पार्टी की घोषणा भी की जाएगी. बेनीवाल ने युवाओं को 5000 रुपया बेरोजगारी भत्ता देने की बात कही है. जो कांग्रेस द्वारा घोषित 3500 रुपये के बेरोजगारी भत्ते के जवाब में है. बेनीवाल का दावा है कि तीसरे मोर्चे के समर्थन के बिना किसी की सरकार नहीं बनेगी. बहरहाल अब देखना होगा कि दशकों से कायम सियासी शून्य को खत्म करने के लिए हनुमान बेनीवाल की अपील पर जाट सियासत का ऊंट किस करवट बैठता है.
मुंबई, मुंबई कांग्रेस की गुटबाजी का मसला अब पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी के दरवाजे तक पहुंच गया है. सूत्रों के मुताबिक मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी पर संजय निरूपम आगे भी बने रहेंगे या नहीं, ये फैसला राहुल गांधी ही लेंगे. महाराष्ट्र के लिए पार्टी के प्रभारी महासचिव मल्लिकार्जुन खरगे 16 सितंबर को मुंबई में थे तो निरूपम के विरोधी खेमे के नेता उनसे मिले. सूत्रों के मुताबिक उन्होंने खरगे से निरूपम को मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाने की मांग की. खड़गे जल्दी ही राहुल गांधी को इस मामले की अपनी रिपोर्ट सौंप देंगे. अंतिम फैसला राहुल गांधी को करना है. मुंबई कांग्रेस के तीन खेमे दरअसल, अरसे से मुंबई कांग्रेस के तीन खेमों में बंटे होने के कयास लगाए जाते रहे हैं. एक खेमा खुद संजय निरूपम का बताया जाता रहा है. दूसरा खेमा मिलिंद देवड़ा का, और तीसरा मुंबई कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष गुरुदास कामत से जुड़े होने की अटकलें लगती रही हैं. बताया जाता है कि गुरुदास कामत के निधन के बाद उनसे जुड़े खेमे ने भी मिलिंद देवड़ा के खेमे से हाथ मिला लिया. इसके बाद निरूपम के खिलाफ विरोध के सुर और तेज हो गए. मुंबई के नेताओं ने राहुल गांधी से मिलने का वक्‍त मांगा हाल में मुंबई कांग्रेस के कई नेताओं, विधायकों, सांसदों, पूर्व विधायकों और पूर्व सांसदों ने राहुल गांधी से मिलने का वक़्त मांगा. सूत्रों के मुताबिक, राहुल के दफ्तर ने सभी को पहले राज्य प्रभारी खरगे से मिलने को कहा. सूत्रों के मुताबिक खरगे रविवार को मुंबई गए तो निरूपम के विरोधी खेमे के नेताओं ने उनसे निरूपम को हटाने की मांग की. साथ ही आरोप लगाया कि निरूपम 'एकला चलो' की नीति पर चलते हैं, सबको साथ लेकर नहीं. इसके बाद खरगे ने सभी को यही कहा कि वो पूरे मामले की रिपोर्ट दिल्ली जाकर राहुल गांधी देंगे और आखिरी फैसला राहुल गांधी ही करेंगे. बताया जा रहा है कि खरगे जल्द ही अपनी रिपोर्ट राहुल गांधी को सौंप देंगे. कुल मिलाकर निरूपम रहेंगे या जाएंगे, ये तो राहुल गांधी तय करेंगे, फिलहाल मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष की उनकी कुर्सी पर जरूर तलवार लटक रही है.
नई दिल्ली, दिल्ली की सत्ता पर काबिज आम आदमी पार्टी को मंगलवार को बड़ा झटका लगा है. चुनाव आयोग की तरफ से आम आदमी पार्टी को नोटिस भेजा गया है. इस नोटिस में पार्टी के आयकर विवरण और आयोग को दिए गए दस्तावेज़ों में अंतर बताया गया है. आयोग की ओर से कहा गया है कि पार्टी को चंदे में मिली रकम का हिसाब अलग-अलग बताया गया है. इन सभी बातों पर चुनाव आयोग ने आम आदमी पार्टी से स्पष्टीकरण मांगा है. क्या है मामला? आपको बता दें कि आम आदमी पार्टी को चंदे को लेकर पिछले साल आयकर विभाग का नोटिस गया था. जिसके बाद IT ने इस मामले को चुनाव आयोग के पास बढ़ा दिया था. आयकर विभाग की ओर से AAP को ये नोटिस साल 2014-15 के दौरान पार्टी द्वारा लिए गए चंदे के लिए भेजा गया था. इसमें अप्रैल 2014 के दौरान 2 करोड़ रुपये का चंदा भी शामिल है जिस पर काफी लंबे समय से विवाद था.
नई दिल्ली, छत्तीसगढ़ में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों में हलचलें तेज हो गई हैं. इस बार बहुजन समाज पार्टी (बसपा) पूरे दमखम के साथ चुनाव मैदान में उतरने को तैयार है. यही वजह है कि पार्टी प्रमुख मायावती ने सूबे की जिताऊ विधानसभा सीटों का गुप्त सर्वे कराना शुरू कर दिया है. समाचार एजेंसी IANS की खबर के अनुसार, मायावती सूबे की सभी 90 विधानसभा सीटों पर अपने स्तर पर गुप्त सर्वे करा रही हैं. बसपा के प्रदेश अध्यक्ष ओ.पी. बाजपेयी का कहना है कि पार्टी सुप्रीमो छत्तीसगढ़ में चुनाव को लेकर खुद नजर रखे हुई हैं. उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ की हर सीट पर बसपा मजबूती से चुनाव लड़ेगी. सूत्रों की मानें तो छत्तीसगढ़ में मायावती की उन्हीं सीटों पर नजरें हैं जो उन्हें चुनाव में जीत दिला सकें और साथ ही राजनीतिक समीकरण ऐसा बना सकें, जिससे उनके बिना किसी दूसरे राजनीतिक दल की सरकार सत्ता पर काबिज न हो सके. प्रदेश अध्यक्ष बाजपेयी के मुताबिक, सूबे में बसपा इस बार के विधानसभा चुनाव में अपने कार्यकर्ताओं की फौज तैयार कर चुनावी मैदान में ताल ठोकने की तैयारी में जुटी हैं. इसलिए बसपा ने अभी तक कांग्रेस के साथ गठबंधन को लेकर अपने पत्ते नहीं खोले हैं और सूबे की सभी 90 सीटों पर अपनी किस्मत आजमाने की तैयारी में है. बहरहाल, प्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए बसपा प्रमुख ने अपनी पार्टी का सर्वे शुरू करवाया है. सर्वे का कितना लाभ बसपा को मिलता है, ये चुनाव परिणाम आने पर ही पता चल पाएगा.
भोपाल,मध्यप्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव के पहले कांग्रेस के एक फैसले ने पार्टी की किरकिरी करा दी है. दरअसल, बीते 2 सितंबर को कांग्रेस के उपाध्यक्ष संगठन प्रभारी चंद्रप्रकाश शेखर ने एक आदेश जारी किया था. इस आदेश के मुताबिक पार्टी टिकट के दावेदारों की सोशल मीडिया पर सक्रियता अनिवार्य थी. इसके अलावा दावेदारों के फेसबुक पेज पर 15000 लाइक्स, ट्विटर पर 5000 फॉलोवर होने जरूरी थे. वहीं बूथ स्तर पर लोगों के व्हाट्सएप ग्रुप बने होना अनिवार्य किया गया था. लेकिन इस फैसले का जमकर विरोध हुआ और महज 6 दिन के बाद ही कांग्रेस को आदेश पर यू-टर्न लेना पड़ा. यानी टिकट के दावेदारों पर से सोशल मीडिया वाली शर्त हटा ली गई है. प्रदेश कांग्रेस के मीडिया कॉर्डिनेटर नरेंद्र सलूजा ने बताया, ''पार्टी कार्यकर्ताओं ने कहा था कि ये फैसला व्यवहारिक नहीं है और इसमें कई पेचीदगियां हैं. ऐसे में उनकी मांग पर फैसले को वापस लिया गया है." दरअसल, टिकट के लिए सोशल मीडिया की अनिवार्यता के चलते पार्टी के कई बड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं के नाम टिकट की दौड़ से बाहर हो जाते. इससे ग्रामीण और आदिवासी सीटों का गणित बिगड़ जाता और यही वजह रही कि कार्यकर्ताओं की नाराजगी के बाद आदेश वापस लिया गया. वहीं बीजेपी के नेता इस मुद्दे पर कांग्रेस की चुटकी ले रहे हैं. सूबे के सहकारिता मंत्री विश्वास सारंग ने कहा कि कांग्रेस जमीनी हकीकत वाली पार्टी नहीं बल्कि हवा हवाई पार्टी है. पार्टी पर सामंतों का राज है. उन्होंने आगे कहा कि जो हाई फाई बातें करते हैं उन्हें ना जमीन अच्छी लगती है ना जमीनी कार्यकर्ता अच्छे लगते हैं.
नई दिल्ली, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पिछले दिनों पार्टी में तमाम नई नियुक्तियां कीं. महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्य और बड़े सहयोगी नेता शरद पवार के चलते राहुल ने लोकसभा में पार्टी के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को प्रभारी महासचिव नियुक्त कर दिया. साथ ही खड़गे के सहयोग के लिए 5 राष्ट्रीय सचिवों की नियुक्ति भी की. मगर मल्लिकार्जुन खड़गे ने पांच में से तीन सचिवों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. उन्होंने साफ कहा है, 'पांच में से तीन राष्ट्रीय सचिव अनुभवहीन हैं, गंभीर नहीं हैं, और मेरे साथ सहयोग के नाम पर बेकार हैं.' गौरतलब है कि खड़गे के साथ राहुल ने ही इन सचिवों की नियुक्ति की थी. सूत्रों के मुताबिक खड़गे के सहयोग के लिए नियुक्त इन सचिवों के खिलाफ रिपोर्ट दे दी गई है. पूरा मामला राहुल के दरबार में है, लेकिन खड़गे ने राहुल की गैरमौजूदगी में अहमद पटेल और अशोक गहलोत को पूरा मामला भरी मीटिंग में बता डाला. खड़गे ने अपने साथ जुड़े 5 राष्ट्रीय सचिवों में से तीन को नकारा बता दिया, जिनकी नियुक्ति खुद राहुल ने की थी. पांच राष्ट्रीय सचिवों पर खड़गे की राय बी.एम. संदीप बी.एम. संदीप से खड़गे खासे नाराज हैं. संदीप कर्नाटक से आते हैं और खड़गे भी कर्नाटक से नाता रखते हैं. बिना सलाह के इनकी नियुक्ति हुई जिससे खड़गे नाखुश हैं. संदीप इससे पहले राजीव गांधी पंचायती राज संगठन में काम करते थे. उसके बाद यूथ कांग्रेस के चुनाव कराते थे. इन्हें महाराष्ट्र के लिए समय नहीं मिल पा रहा है. संपत कुमार और वश्मी रेड्डी ये दोनों नेता तेलंगाना से आते हैं. अजीब बात है कि दोनों एक ही ज़िले महबूबनगर से हैं. राज्य में चुनाव हैं, दोनों किसी बैठक में नहीं आते, दोनों कह चुके हैं कि उनके पास वक़्त नहीं. अव्वल अब तो राज्य विधानसभा भी भंग हो चुकी है. आशीष दुआ और सोनल पटेल तीन सचिवों से खफा खड़गे ने दो सचिवों के साथ काम करने पर सहमति दे दी है. एक हैं, सोनल पटेल जो गुजरात महिला कांग्रेस की अध्यक्ष रही हैं और खड़गे के कार्यक्रम में समय दे रही हैं. दूसरे हैं आशीष दुआ जो पिछले कई सालों से, यूपीए के वक़्त में संगठन और सरकार का काम बारीकी से देखते रहे हैं. दुआ हाल में मीडिया के नेशनल कॉर्डिनेटर और उससे पहले कर्नाटक चुनाव में अहम जिम्मेदारी निभा चुके हैं. कुल मिलाकर खड़गे ने कांग्रेस अध्यक्ष की बनाई टीम पर सवाल उठाकर संकेत दे दिया कि राहुल को बुजुर्गों की और ज़्यादा सुननी होगी.
मेरठ भारतीय जनता पार्टी विपक्ष के उन आरोपों की हवा निकालने की तैयारी में है, जिसमें कहा गया कि वह उधार के कामों पर वाहवाही लूट रही है। पार्टी ने तय किया है कि जिन योजनाओं को मोदी सरकार ने खुद प्लान किया, शिलान्यास किया और रेकॉर्ड वक्त में पूरा होने पर शुभारंभ भी किया, उनका गुणगान बड़े पैमाने पर गांव, गली और शहरों में किया जाएगा। बीजेपी पीएम मोदी की महत्वाकांक्षी सौभाग्य योजना के जरिए यूपी में संभावित गठबंधन को 'सियासी अंधेरा' देने की तैयारी में है। बताया जा रहा है कि इस योजना से लाभान्वित गांवों में बीजेपी 'हटाया अंधियारा-मोदी लाए उजियारा' के नारे संग जश्न मनाएगी। यूपी के करीब 1800 गांवों के 45 लाख घरों में पीएम मोदी की 2014 में बनी सरकार के बाद हर घर बिजली पहुंचाई गई है। इसी के साथ योजनाओं की लंबी फेहरिस्त है, जो भगवा टीम हर गांव-हर घर तक लेकर जाएगी। विरोधियों के हमलों से परेशान भगवा ब्रिगेड का नया प्लान बीजेपी के एक सीनियर नेता के मुताबिक, कांग्रेस और एसपी समेत दूसरे राजनीतिक दल अक्सर एनडीए की सरकार पर यह आरोप लगता हैं कि मोदी और योगी सरकार यूपीए की सरकार में शुरू की गई योजनाओं का शुभारंभ करने के इंतजार में रहती है। उन्होंने कहा, 'विपक्षी यह भूल गए कि एनडीए और यूपी सरकार ने तेजी से काम कराकर उन योजनाओं को गुणवत्तापरक पूरा किया। सरकार और पार्टी में अब एक राय बनी है कि 2014 में मोदी सरकार बनने के बाद जितनी योजनाओं को शुरू किया गया, उनको पूरा करके जनता को समर्पित करके जनता को लाभ पहुंचाया गया और उनके बल पर आगे बढ़ा जाए।' नेता ने आगे कहा, 'जिस प्रदेश में जो योजना लागू है, उसको वहां चुनाव में उठाकर मोदी सरकार के विकास मॉडल को पेश किया जाए। जैसे यूपी में प्रधानमंत्री सहज बिजली हर घर योजना (सौभाग्य) के तहत 1800 गांवों के 45 लाख घरों में 2014 के बाद हर घर बिजली पहुंचाकर रोशनी की गई। उसका बड़े पैमाने पर प्रचार किया जाएगा। इन गांवों में दीपोत्सव सरीखा आयोजन पार्टी और सरकार की तरफ से कराने का फैसला हुआ है। पार्टी का प्लान है कि इन गांवों की रोशनी से विरोधी दलों (संभावित महागठबंधन) में सियासी अंधेरा भरा जाएगा।' क्या है 'सौभाग्य' योजना की हकीकत? देश के हर घर में रोशनी (बिजली) पहुंचाने की योजना के तहत यूपी के 1800 गांवों के हर घर में बिजली पहुंचाने का दावा किया जा रहा है। वेस्ट यूपी के तीन जिलों के हर गांव में हर घर रोशनी पहुचाकर 'सौभाग्यशाली' घोषित किया गया है। योजना में वेस्ट यूपी के बाकी 11 जिलों में भी जल्द काम पूरा करके इन्हें सौभाग्यशाली घोषित किया जाएगा। पश्चिमांचल बिजली निगम की तरफ से योजना को परवान चढ़ाने के लिए एक सप्ताह पहले ही एक दिन में 364 मेगा कैंप लगाकर 4789 लोगों को लाभान्वित किया गया। गरीब हाउसहोल्ड उपभोक्ताओं को 599 नए कनेक्शन दिए। गरीब उपभोक्ताओं को छोड़कर अन्य 4190 उपभोक्ताओं को फायदा पहुंचाया गया। कैंपों में बुलंदशहर, मेरठ, हापुड़, नोएडा और बागपत के 119 कैंपों में 787,सहारनपुर, मुजफ्फनगर और शामली जिले के 94 कैंपों में 480, बिजनौर और रामपुर जिले के 74 कैंपों में 877, मुरादाबाद, संभल और अमरोहा जिले के 77 कैपों में 2645 कनैक्शन दिए गए थे। वेस्ट यूपी के इन जिलों का एक-एक गांव जल्द होगा रोशन पश्चिमांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड मेरठ के प्रबंध निदेशक आशुतोष निरंजन का कहना है कि सरकार की योजना प्राथमिकता के आधार पर जल्द हर जिले में लक्ष्य को पूरा कर लिया जाएगा। पश्चिमांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड मेरठ के अंतर्गत मेरठ, बागपत, गाजियाबाद, बुलंदशहर, गौतमबुद्धनगर, हापुड़, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, शामली, मुरादाबाद, सम्भल, अमरोहा, रामपुर और बिजनौर आते हैं। इन में हर घर रोशन करने का काम तेजी से चल रहा हैं। 31 सितंबर तक काम निपटाने को लेकर सीएम योगी सख्त सीएम योगी आदित्यनाथ ने सौभाग्य योजना के तहत हर घर बिजली पहुंचाने का लक्ष्य 31 अक्टूबर तक तय किया है। सीएम की तरफ से बिजली निगम को निर्देश मिले हैं कि इस प्रॉजेक्ट में तेजी लाई जाए। कोशिश हो कि 31 अक्टूबर तक किसी गरीब का घर अंधेरे में न रहे। इसके लिए अफसरों से सघन अभियान चलाने के निर्देश भी दिए गए हैं। सीएम की सख्ती के बाद एमडी पावर कॉर्पोरेशन पश्चिमांचल आशुतोष निरंजन ने इस काम में लगी संस्थाओं को माइक्रोप्लान तैयार करके लक्ष्य पूरा करने और हर दिन शिविर लगाकर हर घर बिजली पहुंचाने के निर्देश दिए हैं। इस मामले पर पश्चिमी यूपी के बीजेपी अध्यक्ष अश्विनी त्यागी का कहना है, 'पार्टी ने खुद की योजनाओं के सहारे विकास का असल मॉडल जनता को दिखाना तय किया है ताकि जनता यह तय कर सके कि हम अपने वादे पर खरे उतरे या नहीं। सौभाग्य समेत योजनाओं की लंबी फेहरिश्त बीजेपी के पास है।'
नई दिल्ली, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने मंगलवार को दिल्ली में बीजेपी शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और उपमुख्यमंत्रियों के साथ पूरे दिन राजनीतिक मंथन किया. इस बैठक में बीजेपी ने अगले साल 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव को फतह करने का मास्टरप्लान बनाया. गांव के जरिए बीजेपी ने सत्ता में वापसी का प्लान बनाया है. इसके अलावा सवर्ण मतदाताओं की नाराजगी को दूर का के लिए अपने सिपहसलारों को जिम्मेदारी सौंपी है. 2019 की जंग के लिए बीजेपी ने पूरी तरह से कमर कस लिया है. मुख्यमंत्रियों के साथ पीएम मोदी और अमित शाह की बैठक में जीत का रोडमैप तैयार किया गया. बीजेपी शासित राज्यों को अपनी-अपनी जीती हुई संसदीय सीटों को सिर्फ बरकरार ही नहीं रखना बल्कि उनमें बढ़ोत्तरी करने का भी मूल मंत्र दिया है. विपक्षी दलों की एकजुटता के बाद भी बीजेपी की शहरी मतदाताओं पर पकड़ ढीली नहीं हुई, लेकिन गांवों का समीकरण बिगड़ता नजर आ रहा है. इसी के मद्देनजर बीजेपी ने 2019 में गांवों के जरिए सत्ता में वापसी की रणनीति बनाई है. मोदी-शाह ने मुख्यमंत्रियों को गांवों पर ज्यादा से ज्यादा फोकस करने को कहा है. बीजेपी गांवों पर फोकस करते हुए केंद्र की 12 योजनाओं को गांव-गांव घर-घर तक पहुंचाने पर जोर दे रही है. 2019 के लिए गांवों पर बीजेपी का फोकस होगा. केंद्र की 12 योजनाओं को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने पर पार्टी जोर दे रही है. इतना ही नहीं बीजेपी केंद्र और राज्य सरकार के लाभार्थियों का डाटा बैंक तैयार करेगी. इसके बाद बीजेपी ने कार्यकर्ता लाभार्थियों के साथ महासंपर्क का मेगा प्लान बनाया है. Ads by ZINC मोदी सरकार द्वारा एससी/एसटी एक्ट को मूल स्वरूप में बहाल करने और दलित समुदाय के लिए प्रमोशन में रिजर्वेशन के पक्ष में खड़े होने के चलते सवर्ण मतदाता नाराज माना जा रहा है. सवर्ण समुदाय बीजेपी का मूल वोटबैंक है. मुख्यमंत्रियों की पीएम के साथ हुई बैठक में सवर्ण समुदाय की नाराजगी पर चर्चा हुई. इसके बाद मोदी-शाह ने मुख्यमंत्रियों को सवर्ण जातीय की नाराजगी को दूर करने की जिम्मेदारी सौंपी है. बीजेपी इस बात को बखूबी समझती है कि सवर्ण मतदाता उससे छिटक गए तो फिर 2019 में सत्ता में वापसी किसी भी सूरत में संभव नहीं है. बीजेपी एमएसपी में बढ़ोत्तरी और आयुष्मान भारत राष्ट्रीय स्वास्थ्य सुरक्षा योजना का फायदा उठाने की तैयारी में है. मुख्यमंत्रियों की बैठक में इस योजना को ज्यादा से ज्यादा लोगों के बीच पहुंचाने का लक्ष्य दिया है. सरकार इसे 2019 का गेमचेंजर मानकर चल रही है.

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