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नई दिल्ली,जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ गठबंधन तोड़कर भारतीय जनता पार्टी ने 2019 के लिए चुनाव प्रचार का तेवर तय कर दिया है. भाजपा अच्छे से जानती है कि अल्पसंख्यकों का, खासकर मुसलमानों का वोट उसके हिस्से में आने वाला नहीं है. ऐसे में कबतक कश्मीर में सरकार के बहाने वो अपने गले को बांधे रखती. मुस्लिम बाहुल्य कश्मीर में सरकार में शामिल रहते हुए भाजपा को अक्सर भीतर और बाहर से हमले झेलने पड़ते थे. पीडीपी से नाता तोड़कर भाजपा ने उस मजबूरी से मुक्ति पा ली है. यहां से दो चीज़ें एकदम साफ दिखाई दे रही हैं. पहली यह कि भाजपा को इस बात का आभास है कि केवल विकास के नारे पर 2019 में वोट मिलने वाला नहीं है. दूसरा यह कि क्षेत्रीय दलों के वोट बैंकों को तोड़ने के लिए जातियों को हिंदू पहचान के बुखार तक लाना पड़ेगा. यानी ध्रुवीकरण के ज़रिए ही अपेक्षित वोटों को सुनिश्चित किया जा सकता है. लेकिन कश्मीर में सरकार में रहते हुए हिंदू हित और हिंदू अस्मिता की बात कर पाना आसान नहीं रहता. लिहाजा भाजपा ने बड़े लाभ के लिए छोटे नुकसान को उठाना ज़्यादा फायदेमंद समझा. इसकी पुष्टि इस बात से भी हो जाती है कि इस फैसले के लिए भाजपा ने न तो राज्य में पिछले दिनों अपने तेवर बदले, न विरोध जताया, न महबूबा मुफ्ती को इसकी आहट लगने दी और न ही राज्य स्तर पर भाजपा के पास रूठने के लिए कोई बड़े तर्क हैं. अचानक ही सुरक्षा सलाहकार से परामर्श लेकर जनादेश को राज्यपाल शासन के हवाले कर दिया गया. ऐसा करने वाली यह वही भाजपा है जिसने महीनों मान मुनौवल के बाद महबूबा को गठबंधन के लिए राजी किया था और राज्य में भाजपा-पीडीपी गठबंधन की सरकार बनी थी. तीन साल तक भाजपा इस गठबंधन के साथ सत्ता में बनी रही. विरोध के स्वर कुछ भीतर भी थे और कई बाहर भी. लेकिन भाजपा ने सत्ता में बने रहना मुनासिब समझा और धीरे-धीरे जम्मू क्षेत्र में अपने वर्चस्व और सांगठनिक प्रभाव को और व्यापक करने का काम जारी रखा. जब 2019 के चुनाव की दस्तक पार्टी को अपने दरवाजे पर सुनाई देने लगी तो उसने इस गठबंधन को हवन कुंड में डालकर कश्मीरियों और अल्पसंख्यकों के प्रति अपनी नरमी की मजबूरी से मुक्ति पा ली. अब भाजपा खुलकर खेलने के लिए तैयार है. भाजपा की भाषा आने वाले दिनों में बदली हुई सुनाई दे सकती है. दूसरा बड़ा लाभ यह है कि लगातार सीमा पार से गोलीबारी और कश्मीर में बिगड़ते हालात के लिए घेरी जा रही सरकार अब राज्यपाल शासन के बहाने सेना, अर्धसैनिक बलों और विशेषाधिकार कानूनों का मनमाने ढंग से इस्तेमाल कर सकेगी. इससे कश्मीर की स्थिति और बिगड़ेगी. लेकिन उस स्थिति को संभालने के लिए संभावित अतिरिक्त बल प्रयोग सरकार के सख्त और कड़े कदम के तौर पर देशभर में देखा और प्रचारित किया जाएगा. हालांकि यह कश्मीर और भारत के बीच की परिस्थितियों के लिए बुरी खबर है लेकिन इसका बड़ा लाभ भाजपा को देश के अन्य राज्यों में मिलता नज़र आएगा. सेना और सुरक्षाबलों के ज़रिए सरकार की दमनकारी रणनीति को देश के अन्य राज्यों में बहादुरी और कठोर निर्णय के रूप में देखा जाएगा. साथ ही यह ध्रुवीकरण में भी एक अहम भूमिका निभाएगा. भाजपा ने पीडीपी के साथ गठबंधन तोड़कर तुष्टिकरण का पर्दा उतार फेंका है. अब उसे प्रचार में कूदना है और ध्रुवीकरण की धुरी पर आधारित प्रचार के लिए महबूबा से मुक्ति भाजपा के लिए एक बड़ी राहत है. इस तरह भाजपा ने चुनाव प्रचार के अपने पैंतरे और भाषा की बानगी दे दी है. ऐसे समय में जबकि बाकी विपक्षी दल सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर भाजपा से जूझते नजर आ रहे हैं, पार्टी हार्ड हिंदुत्व के ज़रिए विपक्ष से भी निपटेगी और जाति आधारित गठबंधनों से भी. जम्मू-कश्मीर में भाजपा और पीडीपी के ट्रिपल तलाक में सबसे ज़्यादा फायदे में भाजपा है और सबसे ज़्यादा नुकसान में पीडीपी. लेकिन भाजपा के लिए यह फायदा राज्य तक सीमित नहीं है, इसे वो पूरे देश में लेकर जाएगी और 2019 का चुनाव सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का खेल देखेगा, कम से कम ताज़ा सूरतेहाल ऐसे ही नजर आ रही है.
नई दिल्ली बीजेपी ने जम्मू-कश्मीर में महबूबा मुफ्ती की पीडीपी सरकार से अचानक समर्थन वापस लेने का जो फैसला किया है, उसकी वजह राज्य की राजनीति नहीं, बल्कि 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले देश के बाकी हिस्सों में अपना वोट बेस संभालने की सोच है। जम्मू-कश्मीर में पत्थरबाजों, अलगाववादियों, पाकिस्तान और कई अन्य मुद्दों को निपटने के तौर-तरीकों पर पीडीपी के साथ हो रहे गंभीर मतभेदों को लेकर बीजेपी रोज-रोज की किचकिच से परेशान थी। वहीं राज्यपाल एनएन वोहरा की सिफारिश के बाद राष्ट्रपति ने राज्य में गवर्नर रूल को मंजूरी दे दी है। बीजेपी कश्मीर घाटी में आतंकवाद से निपटने के लिए कठोर रुख अपनाना चाहती थी। मंगलवार का घटनाक्रम भले ही सबके लिए चौंकाने वाला रहा हो, लेकिन ऐसा लगता है कि बीजेपी आनेवाले महीनों में राज्य के लिए क्लीयर रोडमैप के साथ लैस है। गवर्नर एनएन वोरा जम्मू कश्मीर में राज्यपाल शासन लगाने की सिफारिश कर चुके हैं। सूत्रों ने बताया कि वोरा का कार्यकाल इसी महीने खत्म हो रहा है, लेकिन उन्हें अगस्त में रक्षाबंधन के आस-पास अमरनाथ यात्रा के समापन तक पद पर बने रहने के लिए कहा जा सकता है। केंद्र ने गवर्नर रूल के दौरान प्रशासन में वोरा की मदद के लिए ब्यूरोक्रेट्स और एडवाइजर्स की टीम बनाने की प्रक्रिया पहले ही शुरू कर चुकी है। पत्थरबाजों पर नरम रुख चाहती थींं महबूबा केंद्र के वार्ताकार दिनेश्वर सिंह पहले से ही श्रीनगर में हैं जबकि यूनियन होम मिनिस्ट्री के अफसरों की टीम को वहां भेजा जा रहा है। सूत्रों ने बताया कि वोहरा की जगह जम्मू-कश्मीर के नए राज्यपाल की पोस्ट के लिए संभावित उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट किया जा रहा है। पीडीपी का सपोर्ट बेस घाटी में है, इसलिए महबूबा मुफ्ती चाहती थीं कि पत्थरबाजों और दूसरे मसलों से निपटने में नरम रुख अपनाया जाए। सरकारी सूत्रों ने बताया कि केंद्र ने सेना की कार्रवाई पर लगी रोक हटाए जाने के बाद रविवार से घाटी ही नहीं सीमावर्ती इलाकों में भी आतंकवादियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी थी। सेना की कार्रवाई आनेवाले दिनों में तेज की जाएगी। पीडीपी के साथ गठबंधन टूटने की खबर जम्मू के उन बीजेपी कैडर्स के लिए खुशी वाली बात है जो 2015 में गठबंधन बनने के वक्त से गुस्से में थे। बीजेपी समर्थकों को राष्ट्रवाद की अतिरिक्त खुराक बीजेपी लीडर्स का कहना है कि फंड के बंटवारे और गवर्नेंस के दूसरे मामलों में जम्मू और लद्दाख क्षेत्र के साथ सौतेला व्यवहार हो रहा था। देशभर के बीजेपी काडर के लिए जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक घटनाक्रम के खास मायने हैं। बीजेपी और पीडीपी विचारधारा के मोर्चे पर एक दूसरे से एकदम अलग हैं। गठबंधन टूटने और सेना की कार्रवाई तेज होने से पार्टी समर्थकों को राष्ट्रवाद की अतिरिक्त खुराक मिलने की संभावना है। इससे अगले साल के लोकसभा चुनाव सहित आगामी विधानसभा चुनावों में बीजेपी को बड़ा फायदा हो सकता है। बीजेपी की वैचारिक संरक्षक आरएसएस भी कश्मीर में पीडीपी से गठबंधन तोड़ने और सख्ती करने के पक्ष में थी। बीजेपी इस मसले से निपटने के तौर-तरीकों को स्थानीय और अंतराष्ट्रीय मंच पर सही तरीके से पेश करने की पूरी कोशिश की है।
नई दिल्ली, जम्मू-कश्मीर में पिछले करीब साढ़े तीन साल से चल रही बीजेपी-पीडीपी गठबंधन सरकार गिर गई है. बीजेपी ने महबूबा मुफ्ती सरकार से समर्थन वापस लेकर राज्यपाल शासन की डिमांड की है तो महबूबा ने भी बिना देर किए राज्यपाल को अपना इस्तीफा भेज दिया है. यूं तो जब इस गठबंधन का ऐलान हुआ था तभी से राजनीतिक हलकों में इसे सबसे बेमेल और लंबा न चलने वाला करार दिया जा रहा था लेकिन लोकसभा चुनाव से ठीक एक साल पहले बीजेपी ने जिस झटके के साथ समर्थन वापसी का ऐलान किया है उसे उसके मिशन 2019 के लिए मास्टरस्ट्रोक और मजबूरी दोनों माना जा रहा है. 2014 में जब बीजेपी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आई थी तो यूपीए के भ्रष्टाचार के बाद उसका सबसे बड़ा कारण कश्मीर पर मनमोहन सरकार की विफलता को ही बताया गया. मोदी सरकार के चार साल और गठबंधन सरकार के तीन साल पूरे होने के बाद भी कश्मीर आज वहीं खड़ा है जहां मई 2014 से पहले था. कुछ जानकार तो हालात के और ज्यादा बदतर होने का दावा करते हैं. ऐसे में बीजेपी 2019 में जब फिर से वोट मांगने जनता के बीच जाएगी तो उसे जवाब देना भारी पड़ सकता है. इसे ध्यान में रखते हुए माना जा रहा है कि मोदी सरकार बचे हुए कार्यकाल में कश्मीर में आतंकवाद को कुचलने और अलगाववादी सुरों को कमजोर करने के लिए सख्त रुख अपनाना चाहती है और ऐसे कदमों पर विचार कर सकती है जो राज्य की सत्ता में साझीदार रहते हुए उसके लिए संभव नहीं थे. 2016 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद भाजपा सबसे बड़े दल के तौर पर उभरकर सामने आई थी लेकिन राजनीतिक मजबूरी के चलते जब भाजपा को दूसरे नबंर की पार्टी पीडीपी को मुख्यमंत्री पद देना पड़ा तो पूरा देश आश्चर्यचकित रह गया. भाजपा ने तब दावा किया कि जम्मू-कश्मीर में विकास के जरिए शांति कायम करने की उसकी यह कोशिश है. बीते तीन साल में शांति कायम करने की कोशिशों का क्या हुआ उसका नतीजा सबके सामने है. बीजेपी के सामने इस समय सबसे बड़ा सवाल कश्मीर में सरकार चलाने से ज्यादा 2019 का चुनाव जीतना है. मिशन 2019 के लिए जरूरी है कि मोदी सरकार की छवि आतंकवाद से किसी कीमत पर समझौता न करने और दशकों से देश के सामने चुनौती बनकर खड़ी समस्याओं पर निर्णायक फैसला लेने वाले की बनी रहे. कश्मीर की स्थिति इस छवि के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गई है. बीजेपी महासचिव राम माधव की प्रेसवार्ता में भी पार्टी ने यही संदेश देने की कोशिश की कि कश्मीर में हालात बेहद खराब तो हैं लेकिन उसके लिए वो नहीं बल्कि पीडीपी और उसकी मुखिया राज्य की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती जिम्मेदार हैं. आने वाले दिनों में वो इस बात को और ज्यादा प्रमुखता से उठाएगी और इस दौरान अगर कश्मीर में हालात बदलने में वो कुछ हद तक कामयाब रही तो सरकार कुर्बान करने की उसकी ये मजबूरी 2019 के लिए मास्टरस्ट्रोक में बदल जाएगी.
श्रीनगर जम्मू-कश्मीर में पीडीपी-बीजेपी का गठबंधन टूटने के बाद राज्य में राज्यपाल शासन लगाने की तैयारी शुरू कर दी गई है। राज्यपाल शासन की इस तैयारी के बीच जहां दिल्ली में तमाम उच्च स्तरीय बैठकों का दौर शुरू हो गया है, वहीं जम्मू-कश्मीर में राज्य के भविष्य को लेकर कुछ बड़े फैसलों की तैयारी की जा रही है। जानकारों का कहना है कि जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल शासन लगने के साथ ही आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशंस और पत्थरबाजों पर कार्रवाई में तेजी लाई जा सकती है। उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक कश्मीर में अमरनाथ यात्रा से पहले आतंकियों के खिलाफ कुछ बड़े ऑपरेशंस को अंजाम दिया जा सकता है। इसके लिए सेना की राष्ट्रीय राइफल्स और जम्मू-कश्मीर पुलिस दक्षिण कश्मीर के कुछ जिलों में बड़े स्तर पर अभियान चलाने की तैयारी भी कर रही है। माना जा रहा है कि सेना के जवान औरंगजेब और पत्रकार शुजात बुखारी की हत्या की वारदातों के बाद सेना दक्षिण कश्मीर में कुछ बड़े ऑपरेशंस को अंजाम दे सकती है। इसके अलावा आने वाले दिनों में पैरा स्पेशल फोर्सेज के साथ 'ऑपरेशन किल टॉप कमांडर' और 'ऑपरेशन ऑल आउट' जैसे कुछ नए ऑपरेशंस भी शुरू किए जा सकते हैं। पत्थरबाजों पर कार्रवाई में कोई सियासी दखल नहीं सेना के इन ऑपरेशंस के अलावा दक्षिण कश्मीर में पत्थरबाजों पर बड़ी कार्रवाई भी की जा सकती है। अगर अतीत पर गौर करें तो यह देखने को मिलता है कि 2016 की हिंसा के दौरान कश्मीर में बीजेपी-पीडीपी सरकार के दौरान 9 हजार से अधिक पत्थरबाजों पर केस दर्ज हुए थे। इन सभी पत्थरबाजों में एक बड़ी संख्या उन युवकों की थी, जिन्हें दक्षिण कश्मीर के जिलों से गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी के कुछ महीनों बाद महबूबा सरकार ने सैकड़ों पत्थरबाजों पर से मुकदमे वापस ले लिए थे। सरकार का कहना था कि युवाओं को मुख्यधारा में लाने के लिए यह कदम उठाए गए हैं, जबकि विपक्षी पार्टियों का आरोप था कि महबूबा ने श्रीनगर और अनंतनाग सीटों पर होने वाले उपचुनाव के मद्देनजर लोगों के समर्थन के लिए ऐसा किया था। इस फैसले के बाद बीजेपी सरकार को कई मोर्चों पर विरोध और आलोचना का सामना करना पड़ा था। ऐसे में अब यदि राज्यपाल शासन की स्थितियां बनती हैं तो फिलहाल 2019 के चुनाव तक पत्थरबाजों पर कार्रवाई पर कोई सियासी दखलंदाजी नहीं होगी। इसके साथ-साथ ऐसे फैसले की स्थिति में देशभर में बीजेपी को इससे फायदा भी मिल सकेगा। गृहमंत्री की बैठक में तय होगी रणनीति सूत्रों का कहना है कि दिल्ली में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और गृह सचिव राजीव गौबा की मुलाकात में भी घाटी में सुरक्षा को लेकर एक विस्तृत चर्चा हुई है, ऐसे में आने वाले वक्त में कश्मीर को लेकर कुछ बड़े फैसले किए जा सकते हैं। इन फैसलों पर ब्लूप्रिंट निर्धारित करने के लिए और राज्य की सियासत पर आगे की रणनीति के लिए गृहमंत्री राजनाथ सिंह के आवास पर एक उच्च-स्तरीय बैठक भी हुई है, जिसमें गृह मंत्रालय के कई वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए हैं। राजनाथ के रिपोर्ट पर बीजेपी ने लिया था फैसला सूत्रों के अनुसार महबूबा सरकार से समर्थन वापसी की रणनीति 12 रोज पहले ही बनने लगी थी। दरअसल, अपने दौरे के बीच ही राजनाथ सिंह ने घाटी में सुरक्षा हालातों की समीक्षा की थी। इस दौरान राजनाथ सिंह ने अमरनाथ यात्रा को लेकर सुरक्षा एजेंसियों से रिपोर्ट भी ली थी, साथ ही बीजेपी के मंत्रियों ने भी महबूबा सरकार को लेकर उन्हें अपना फीडबैक दिया था। राज्य की राजनीति को करीब से देखने वाले लोगों का मानना है कि पीएम मोदी ने राजनाथ सिंह को यहां के हालात की ग्राउंड रिपोर्ट जांचने के लिए भेजा था, जिसके क्रम में राजनाथ ने तीनों संभागों जम्मू, श्रीनगर और लद्दाख क्षेत्रों के पार्टी नेताओं से मुलाकात की थी। राजनाथ के इस दौरे के बाद दिल्ली में पीएम मोदी को इसकी रिपोर्ट सौंपी गई थी, जिसके बाद पार्टी ने अपनी राज्य ईकाई से समन्वय कर सरकार से समर्थन वापसी की कवायद शुरू कर दी।
श्रीनगर जम्मू-कश्मीर में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और पीपल्स डेमौक्रैटिक पार्टी (पीडीपी) का गठबंधन टूटने और सरकार गिरने के बाद राज्यपाल शासन लगाए जाने की पूरी संभावनाएं हैं। इस बीच राज्यपाल एनएन वोहरा ने सभी बड़ी पार्टियों से चर्चा के बाद अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को भेज दी है। राज्यपाल ने रिपोर्ट के साथ ही सेक्शन 92 (जम्मू-कश्मीर के संविधान) के तहत राज्य में राज्यपाल शासन की मांग की है। गौरतलब है कि बीजेपी के समर्थन से राज्य में सरकार चला रही पीडीपी को मंगलवार को उस समय बड़ा झटका लगा, जब बीजेपी ने समर्थन वापसी की घोषणा कर दी। समर्थन वापसी के बाद महबूबा मुफ्ती ने राज्यपाल से मुलाकात करके अपना इस्तीफा सौंप दिया। नैशनल कॉन्फ्रेंस नेता उमर अब्दुल्ला ने राज्यपाल से मुलाकात की और नए सिरे से चुनाव की मांग की। उमर अब्दुल्ला ने यह भी स्पष्ट किया कि वह किसी भी प्रकार के गठबंधन से सरकार बनाने की कोशिश नहीं करेंगे। वहीं कांग्रेस के समर्थन की अटकलों के बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस किसी भी कीमत पर पीडीपी को समर्थन नहीं देने वाली है। ऐसी स्थिति में एक ही रास्ता बचता है कि फिलहाल राज्य में राज्यपाल शासन लगा दिया जाए और नए सिरे से विधानसभा चुनाव कराए जाएं। वहीं मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद महबूबा मुफ्ती ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपनी बात रखी। महबूबा मुफ्ती ने कहा कि मुफ्ती साहब ने बड़े विजन के लिए बीजेपी के साथ गठबंधन किया था। उन्होंने कहा, 'मैं बीजेपी के इस फैसले से अचंभित नहीं हूं। हमने पावर के लिए गठबंधन नहीं किया था। इस गठबंधन के कई बड़े मकसद थे। सीजफायर, पीएम का पाकिस्तान दौरा, 11 हजार युवाओं के खिलाफ केस वापस हुए।' इस दौरान मुफ्ती ने बताया कि उन्होंने राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंप दिया है और उन्हें बताया है कि हम किसी गठबंधन की तरफ नहीं बढ़ रहे हैं।
नई दिल्ली जम्मू-कश्मीर में बीजेपी ने महबूबा मुफ्ती सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया है। इसके साथ ही राज्य में तीन सालों से चला आ रहा पीडीपी-बीजेपी गठबंधन खत्म हो गया है। बीजेपी ने राज्य में राज्यपाल शासन की मांग की है। बता दें कि केंद्र सरकार द्वारा राज्य से सीजफायर खत्म करने के फैसले के बाद दोनों दलों में तनातनी काफी बढ़ गई थी। मंगलवार को बीजेपी की कोर ग्रुप की बैठक में इस बारे में फैसला किया गया। बीजेपी चीफ अमित शाह ने जम्मू-कश्मीर के नेताओं के साथ बैठक करने के बाद इस बारे में अंतिम निर्णय लिया। बता दें कि राइजिंग कश्मीर के संपादक शुजात चौधरी की हत्या के बाद राज्य में दोनों दलों के बीच रिश्ते काफी बिगड़ गए थे। बीजेपी के महासचिव राम माधव ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में पीडीपी सरकार से समर्थन वापस लेने की घोषणा की। उन्होंने कहा, 'हमने जनता के समर्थन के बाद पीडीपी के साथ सरकार चलाने का निर्णय लिया गया था।' उन्होंने कहा कि गठबंधन में आगे चलते रहना मुश्किल हो गया है। उन्होंने कहा कि राज्य में आतंकवाद बढ़ गया है। बीजेपी ने राज्य में राज्यपाल शासन की मांग की है। माधव ने कहा, 'पीएम नरेंद्र मोदी और बीजेपी चीफ अमित शाह की सहमति के बाद यह फैसला किया गया। श्रीनगर में एक बड़े पत्रकार की हत्या हो गई। केंद्र ने जम्मू-कश्मीर सरकार को हर तरह से मदद की। उन्होंने कहा, 'तीन साल सरकार चलाने के बाद हम इस सहमति पर पहुंचे हैं कि कश्मीर में जो परिस्थिति उत्पन्न है उसपर नियंत्रण के लिए हम अलग हो रहे हैं। पीडीपी ने अड़चन डालने का काम किया। दायित्व निभाने में महबूबा मुफ्ती नाकाम रही हैं। महबूबा घाटी में हालात संभालने में असफल रहीं।'
श्रीनगर, पाकिस्तान आतंकियों के साथ मिलकर भारत के ख़िलाफ नित नई साज़िश रचने में जुटा रहता है. इन्हीं साजिशों को नाकाम करने के लिए बीएसएफ ने 'अचूक निशानेबाज' तैयार किए हैं. जो 'मार्क्स मैन' के नाम से जाने जाते हैं. ये निशानेबाज घुसपैठ को तो नाकाम करेंगे ही साथ ही इनका अचूक निशाना पाकिस्तान के स्नाइपर्स को भी सटीक जवाब देेंगे. बता दें कि पाकिस्तान की तरफ से सीमा के उस पार से हमेशा गुस्ताखियां की जाती रही हैं. पाकिस्तान छिपकर BSF के जवानों को लाइन ऑफ कंट्रोल और इंटरनेशनल बॉर्डर के उस पार से निशाना बनाता है. इन्हीं तमाम चुनौतियों को देखते हुए BSF ने सभी बीओपी (बॉर्डर ऑउट पोस्ट) में अपने खास ट्रेंड अचूक निशानेबाजों को तैनात करने का प्लान तैयार किया है. पाकिस्तान रेंजर और पाक सेना आतंकियो की घुसपैठ कराने के लिए बॉर्डर के माउंट पर ड्यूटी कर रहे BSF के जवानों को चोरी छिपे निशाना बनाता है. लेकिन BSF अब इस पाकिस्तान की हरकतों का जवाब देने के लिए निशानेबाजों की टोली तैयार की है. यह टोली अलग-अलग बीओपी में जम्मू-कश्मीर के उन खतरनाक इलाकों में तैनात होगी जहां से आतंकी घुसपैठ और स्नायपिंग का सबसे ज्यादा खतरा रहता है. बीएसएफ़ ने इन अचूक निशानेबाजों को खास ट्रेनिंग देकर बॉर्डर पर तैनात करने जा रही है. इंदौर के ट्रेनिंग स्कूल में इन निशानेबाजों की ख़ास तैयारी का हिस्सा बना ' बीएसएफ़ अपने ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट 'CENTRAL SCHOOL OF WEAPONS AND TACTICS' (CSWT) में सरहद पर 8 सप्ताह की ट्रेनिंग देकर निशानेबाजों की 60 जाबांजों की एक टोली को भेज रहा है. 'आजतक' जानकारी के मुताबिक, पाकिस्तान स्नायपिंग के जरिए BSF के जवानों को इंटरनेशनल बॉर्डर और लाइन ऑफ कंट्रोल पर निशाना बनाने की कोशिश करती रहती है. इसके लिए खासतौर पर पाकिस्तान अपने अलग-अलग बीओपी पर ट्रेन स्नाइपर को तैनात किया हुआ है. पाकिस्तान आर्मी और आईएसआई ने लाइन ऑफ़ कंट्रोल और इंटरनेशनल बॉर्डर पर 150 से ज़्यादा स्नाइपर्स को तैनात किए है. इन शार्प शूटर स्नाइपर के जरिए पाकिस्तान समय-समय पर भारतीय सुरक्षा बलों को निशाना बनाने की कोशिश करता रहता है. एलओसी के उस पार PAK अधिकृत कश्मीर में पाकिस्तान आर्मी ने मछल (Machhal), उरी (Uri), तंगधार(Tangdhar) पुंछ(Poochh )बिंबर गली(Bimber Gali),रामपुर( Rampur), कृष्णा घाटी (Krishna Ghati), और मेंढर के सामने अपने खूंखार स्नाइपर्स को तैनात किया हुआ है. यही नहीं पाकिस्तान ने इंटरनेशनल बॉर्डर के उस पार मसरूर बड़ा भाई, सुकमल, चपराल और लूनी में भी पाकिस्तान ने अपने शार्प शूटर को तैनात किया है. जो भारतीय सुरक्षा बलों को निशाना बनाने की फ़िराक में हमेशा रहते हैं. सूत्रों के मुताबिक, इन स्नाइपर्स को पीओके में मौजूद ट्रेनिंग कैंप में पाकिस्तान की 'स्पेशल ऑपरेशन टीम' के साथ ट्रेंड किया गया है. स्नाइपर्स के तौर पर पाकिस्तान की रेगुलर आर्मी तो रहती ही है इसके साथ ही आतंकी संगठन लश्कर जैश, और हिजबुल के आतंकियों को भी स्नाइपर्स के तौर पर भर्ती किया गया है. इन स्नाइपर्स को पाकिस्तान की मुजाहिद बटालियन के साथ कई जगहों पर तैनात किया गया है. पाकिस्तान की आर्मी इन आतंकियों को स्नाइपर शूटिंग के बदले में 50 हज़ार से एक लाख तक की रकम भी देता है. बीएसएफ की टेक्निकल टीम भी कर रही खास तैयार सरहद पर पाकिस्तान के भेजे गए लश्कर और जैश के आतंकियों पर नजर रखने के लिए बीएसएफ की टेक्निकल टीम भी इंदौर के इंस्टीट्यूट में खास तैयारी कर रही है. हाल ही में BSF ने पाकिस्तान की जिन पोस्टों को अपने मोर्टार के जरिए ध्वस्त किया था उनकी निगरानी सीधे तौर पर इन खास किस्म के 'लॉरस' कैमरों के जरिए की जा रही थी. इन्हीं कैमरों का इस्तेमाल कर BSF करीब 20 किलोमीटर दूर तक इंटरनेशनल बॉर्डर के उस पार हरकतों पर नजर रख रही है. 'आजतक' की टीम ने BSF की टेक्निकल टीम से यह जानने की कोशिश की कि आखिर किस तरीके से सरहद पर इस समय आतंकियों की घुसपैठ को रोकने के लिए इन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जा रहा है. जानकारी के मुताबिक, सीमा के उस पार पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और इंटरनेशनल बॉर्डर से सटे इलाकों में 450 से ज्यादा आतंकी अलग-अलग लॉन्चिंग पैड पर मौजूद हैं. जिनको अमरनाथ यात्रा के दौरान खलल डालने के लिए पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई भारत के अंदर दाखिल कराने की फिराक में है. 'अचूक निशानेबाज़' की खूबियां अचूक निशानेबाज़ एक 'मार्क्स मैन' होता है. अचूक निशानेबाज़ में 8 हफ्तों की कठिन ट्रेनिंग लेने की क्षमता होती है. बता दें कि ट्रेनिंग के बाद 100 में से एक ही अचूक निशानेबाज़ बनता है. एक अचूक निशानेबाज को 72 घंटे से ज्यादा बिना खाए-पिए माइनस 40 और प्लस 40 के तापमान में डटे रहना पड़ता है. अचूक निशानेबाज़ में धैर्य बनाकर एक जगह एक पोजीशन में बने रहने की क़ाबलियत होनी चाहिए. अचूक निशानेबाज़ को एक गोली एक दुश्मन के वाक्य पर काम करना होता है. BSF के मार्क्स मैन को SSG रायफल (स्नाइपर रायफल), इंसास रायफल, X95(इजराइल के हथियार), बरेटा(इटली का हथियार) पिस्टल फ़ायर में निपुण होना चाहिए. अचूक निशानेबाज़ में ऑपरेशन के दौरान जंगली खाने और पीने के सामान से ही अपनी रक्षा करने का हुनर होता है.
नई दिल्ली, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेशी दौरे काफी चर्चा में बने रहते हैं. अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विदेश भ्रमण अब अपग्रेड होने वाला है. एअर इंडिया ने सिएटल स्थित विमान निर्माता से प्राप्त दो बिल्कुल नए बोइंग 777 विमानों को वापस अमेरिका भेजकर 1,100 करोड़ रु. के खर्च से उसे वीवीआईपी के अनुरूप बनाने के लिए कहा है. इनमें मिसाइल हमले से बचने का सिस्टम और सुरक्षित संचार प्रणाली लगाई जाएगी. प्रधानमंत्री के मौजूदा बोइंग 747 विमानों में ये सुविधाएं नहीं हैं. एअर इंडिया के अधिकारी हालांकि दो विमानों के कम होने से खुश नहीं हैं. उन्हें इन बदलावों के लिए न केवल 1,100 करोड़ रु. चुकाने पड़ रहे हैं, बल्कि सालाना 100 करोड़ रु. की कमाई का भी नुकसान हो रहा है. अभी तक यह भी स्पष्ट नहीं है कि ये विमान जब आएंगे तो इनका संचालन कौन करेगा. गौरतलब है कि एअर इंडिया को बेचा जा रहा है और वायु सेना का वीवीआईपी स्कवाड्रन जो बोइंग बिजनेस जेट और एंब्रेयर चलाता है, उसके पास बड़े साइज के विमान चलाने वाले दक्ष पायलट नहीं हैं. आपको बता दें कि अमूमन जिस प्लेन में राष्ट्राध्यक्ष सफर करते हैं उनमें कॉन्फ्रेंस हॉल, मीटिंग करने के लिए जगह, आराम करने के लिए जगह, छोटा ऑफिस जैसी सभी सुविधाएं होती हैं. इनके अलावा प्लेन से ही किसी भी देश के राष्ट्राध्यक्ष, अपने कार्यालय से संपर्क की भी सुविधा रहती हैं. इसके अलावा भी मेडिकल, सुरक्षा तथा अन्य जरूरी सामान हमेशा राष्ट्राध्यक्ष के विमान में होते हैं. अगर बोइंग की बात करें तो एक बोइंग 777-300 ईआर विमान में अमूमन 342 सीटें होती हैं, जिनमें चार फर्स्ट क्लास, 35 बिजनेस क्लास और 303 इकोनॉमी क्लास की सीटें हैं.
मॉस्को रूस में चल रहे फीफा वर्ल्ड कप के लिए पहुंची सऊदी अरब की टीम सोमवार को बाल-बाल बच गई। टीम को सेंट पीटर्सबर्ग से रोस्तोव लेकर जा रहे विमान के इंजन में बीच आसमान में आग लग गई। हालांकि, रशन एयरलाइंस के एयरबस जेट ने सुरक्षित लैंडिंग की और किसी खिलाड़ी को भी नुकसान पहुंचने की जानकारी नहीं मिली है। एयरलाइंस ने बताया कि विमान के इंजन में शायद पक्षी फंस गया था, जिसकी वजह से यह खराबी आई। हालांकि, एयरलाइंस ने विमान में आग की खबर को नकार दिया। लेकिन सोशल मीडिया पर शेयर किए गए विडियो में दिख रहा है कि विमान में आग लगी थी। सऊदी नैशनल टीम ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से भी खिलाड़ियों के सुरक्षित होने की जानकारी दी। ट्वीट में लिखा गया. 'सऊदी अरब फुटबॉल फेडरशन सबको आश्वस्त करना चाहता है कि विमान में तकनीकी खराबी आने के बाद सऊदी नैशनल टीम के सभी खिलाड़ी सुरक्षित हैं।'
नई दिल्ली एशिया की तीन बड़ी सैन्‍य शक्तियों चीन, भारत और पाकिस्‍तान ने पिछले एक साल में अपने परमाणु हथियारों के जखीरे में पर्याप्‍त इजाफा किया है। स्टॉकहोम इंटरनैशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीपरी) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार एशिया के इन तीनों देशों ने न केवल अपने न्‍यूक्लियर वेपन डिलिवरी सिस्‍टम को पुख्‍ता किया है बल्कि अपने परमाणु हथियारों की संख्‍या भी बढ़ाई है। इन देशों में अब उन्‍नत और छोटे परमाणु हथियारों के विकास पर जोर दिया जा रहा है। परमाणु हथियारों की कुल संख्‍या के मामले में पाकिस्‍तान अभी भी भारत से आगे है। सीपरी के मुताबिक एशिया महाद्वीप में यह तेजी ऐसे समय पर आई है जब पश्चिमी देशों में परमाणु हथियारों को लेकर स्थिरता है। सोमवार को जारी इस वार्षिक रिपोर्ट में कहा गया है कि चीन के परमाणु हथियारों की संख्‍या इस साल बढ़कर 280 हो गई है जो पिछले वर्ष 270 थी। बता दें कि चीन ने पिछले साल अपनी सेना पर 228 अरब डालर खर्च किया था जो अमेरिका के 610 अरब डालर के बाद सबसे ज्‍यादा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि दो धुर विरोधी राष्‍ट्रों भारत और पाकिस्‍तान ने पिछले साल अपने परमाणु हथियारों की संख्‍या में वृद्धि की है। इन दोनों ही देशों ने परमाणु हथियारों के लिए जमीन, हवा तथा समुद्र से दागे जाने वाले मिसाइलों का विकास तेज कर दिया है। भारत और पाकिस्‍तान ने पिछले एक साल में अपने जखीरे में 10-10 परमाणु हथियार बढ़ाए हैं। रूस और अमेरिका ने घटाए परमाणु हथियार सीपरी के मुताबिक भारत के पास इस समय 130 से 140 और पाकिस्‍तान के पास 140 से 150 परमाणु हथियार हैं। हालांकि कोई भी परमाणु हथियार मिसाइलों में लगाया नहीं गया है। गौरतलब है कि भारत पहले परमाणु हथियार के इस्‍तेमाल नहीं करने की नीति का पालन करता है। इन सबके विपरीत अन्‍य परमाणु हथियार संपन्‍न राष्‍टों ने या तो वारहेड की संख्‍या घटाई है या उन्‍हें स्थिर रखा है। अमेरिका ने अपने परमाणु हथियारों की संख्‍या 6800 से घटाकर 6480 कर दिया है। इसी तरह से रूस ने भी परमाणु हथियारों की संख्‍या को 7000 से कम करके 6850 कर दिया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि पूरी दुनिया के नौ परमाणु हथियार संपन्‍न देशों के पास में इस समय 14465 वारहेड हैं। यह आंकड़ा पिछले साल 14935 था। इनमें से 92 फीसदी हथियार रूस और अमेरिका के पास हैं। हाल ही में अमेरिका के साथ बातचीत की टेबल पर आने वाले उत्‍तर कोरिया के पास 10 से 20 न्‍यूक्लियर वेपन होने का अनुमान है। सीपरी के गवर्निंग बोर्ड के चेयरमैन जेन इलिसन कहते हैं, 'परमाणु प्रतिरोधक क्षमता हासिल करने के प्रति बढ़ता फोकस बहुत ही चिंताजनक ट्रेंड है। आज दुनिया को परमाणु हथियार संपन्‍न राष्‍ट्र से परमाणु हथियार निरस्‍त्रीकरण की ओर बढ़ने के लिए एक प्रभावकारी, कानूनी रूप से बाध्‍यकारी प्रक्रिया की जरूरत है।' भारत के बारे में सिपरी ने कहा कि हथियारों की खरीद के मामले में यह देश अभी भी शीर्ष पर बना हुआ है। बता दें कि भारत रक्षा पर खर्च करने वाला दुनिया का 5वां सबसे बड़ा देश है। 'परमाणु बम बनाने के अलावा भारत के पास कोई विकल्‍प नहीं' उधर, रक्षा सूत्रों ने टाइम्‍स ऑफ इंडिया को बताया कि चीन और पाकिस्‍तान के खतरे को देखते हुए भारत के पास ऐसी परमाणु प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने के अलावा और कोई चारा नहीं है जो विश्‍वसनीय हो और जवाबी कार्रवाई में दुश्‍मन को व्‍यापक क्षति पहुंचाने में सक्षम हो। उन्‍होंने कहा कि वारहेड की संख्‍या मायने नहीं रखती है। पहले परमाणु हथियार नहीं इस्‍तेमाल करने की भारत की घोषित नीति के कारण भारत अपने हथियारों की विश्‍वसनीयता को सुनिश्चित करना चाहता है। इसके अलावा भारत सेकंड स्‍ट्राइक क्षमता के लिए न्‍यूक्लियर कमांड, कंट्रोल और कम्‍यूनिकेशन प्रणाली को मजबूत कर रहा है। पाकिस्‍तान की परमाणु नीति अस्‍पष्‍ट भारत के विपरीत पाकिस्‍तान ने जानबूझकर अपनी परमाणु नीति को अस्‍पष्‍ट रखा है। पाकिस्‍तान का उद्देश्‍य परमाणु धमकी देकर भारत को किसी भी तरह के परंपरागत सैन्‍य कदम को उठाने से रोकना है। जबकि वह भारत को लगातार उकसाता रहता है। पाकिस्‍तान अपने खुशाब परमाणु परिसर को चीन की मदद से विकसित कर रहा है। सूत्र ने कहा कि भारत के लिए परमाणु हथियार युद्ध लड़ने का हथियार नहीं है। लेकिन हमें न्‍यूनतम परमाणु प्रतिरोधक क्षमता की जरूरत है ताकि हमला करने पर दुश्‍मन को व्‍यापक क्षति पहुंचायी जा सके। ऐसा अनुमान है कि भारत के परमाणु हथियारों की संख्‍या अगले दशक तक 200 पहुंच जाएगी। भारत जल्‍द ही अपनी पहली अंतरमहाद्वीपीय मिसाइल अग्नि पांच को सेना में शामिल करने जा रहा है जिसकी मारक क्षमता 5000 किमी है। यह चीन के किसी भी शहर को निशाना बनाने में सक्षम है।

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