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लखनऊ मध्य प्रदेश में सरकार बनाने के लिए बीएसपी प्रमुख मायावती ने कांग्रेस को समर्थन देने का फैसला किया है। बता दें कि मध्य प्रदेश में बीएसपी के दो विधायक जीते हैं और वहां सरकार बनाने के लिए कांग्रेस को 2 विधायक की ही जरूरत है। ऐसे में अब कांग्रेस की सरकार बनती दिख रही है। उधर, अखिलेश ने भी कांग्रेस को अपना समर्थन देने की पेशकश कर दी है। बता दें कि छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में बीएसपी ने कांग्रेस के संभावित गठबंधन से अलग होकर चुनाव लड़ा था। मायावती ने लखनऊ में प्रेस कॉन्फ्रेस आयोजित कर स्पष्ट किया कि कांग्रेस से विचारधारा मेल न खाने के बावजूद वह बीजेपी को रोकने के लिए समर्थन दे सकती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अगर राजस्थान में भी जरूरत हुई तो वह अपने विधायकों को कांग्रेस को समर्थन देने के लिए कहेंगी। 'बीजेपी को रोकना हमारी प्राथमिकता' मायावती ने कहा, 'जैसा कि मध्य प्रदेश में बीजेपी अभी भी सरकार बनाने में जुटी है। चूंकि बीजेपी को रोकना ही हमारी प्राथमकिता है इसलिए उसे सत्ता से बाहर करने के लिए कांग्रेस से विचारों में सहमति न होने के बावजूद हमने कांग्रेस को समर्थन देने का फैसला किया है। यही नहीं अगर राजस्थान में भी जरूरत हुई तो हम वहां भी कांग्रेस पार्टी को समर्थन देंगे।' बता दें कि मंगलवार को नतीजे आने के बाद कांग्रेस के अशोक गहलोत और सचिन पायलट ने बहुमत मिलने के बाद भी सभी गैर-बीजेपी दलों को साथ आने को कहा था। 'जनता आखिर जनता है' मायावती ने आगे कहा कि छत्तीसगढ़ में हमारे सहयोगी अजीत जोगी जी के एक बयान के चलते हमारे सारे वोट कांग्रेस को ट्रांसफर हो गए जबकि वो वोट गठबंधन के खाते में जा सकते थे। बाद में उन्होंने सफाई दी, 'हालांकि अजीत जोगी ने उसे सभी पार्टियों के संदर्भ में कहा था लेकिन मीडिया ने उसे एक सोची समझी रणनीति के तहत सिर्फ बीजेपी के खिलाफ दिखाया। फिर जनता तो जनता ही होती है एक बार बहक गई तो लाइन पर जल्दी आती नहीं है जिसका फायदा कांग्रेस ने उठा लिया है।' इस जीत को 2019 में भुनाएगी कांग्रेस मायावती ने कहा, 'बीजेपी की गलत नीतियों और गलत प्रणाली से जनता त्रस्त हो गई थी इसलिए दिल में पत्थर रखकर तीनों राज्यों की जनता ने न चाहते हुए भी वहां पूर्व में रही कांग्रेस को अपना विकल्प समझकर वोट दे दिया।' उन्होंने आगे कहा कि कांग्रेस 2019 लोकसभा चुनाव में भी इसे भुनाने की कोशिश करेगी। उन्होंने कहा, 'हालांकि हमारी पार्टी के लोगों ने कांग्रेस-बीजेपी से कड़ा मुकाबला किया फिर भी ज्यादा सीट जीतने मे कामयाब नहीं हो सके हैं और परिणाम उम्मीद के हिसाब से नहीं आए हैं।' उधर कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह ने मायावती को समर्थन देने के लिए आभार जताया है। दिग्विजय सिंह ने ट्वीट किया, 'आदरणीय बहन जी को मध्य प्रदेश में कांग्रेस को समर्थन देने के लिए हार्दिक धन्यवाद। कांग्रेस ने सदैव श्रद्धेय बाबा साहेब और मान्यवर काशीराम जी के सपनों को पूरा करने का प्रयास किया है।'
भोपाल. छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस को बेशक स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है।, लेकिन जनता ने भाजपा की नीतियों से नाराज होकर उसे सत्ता से बहुत दूर खड़ा कर दिया है। भास्कर ने मतदाताओं की नाराजगी का विश्लेषण किया... ओबीसी/एससी: 51% वोटर ओबीसी हैं। कांग्रेस ने साफ कर दिया था कि सीएम ओबीसी से ही होगा। दूसरी ओर, रमन सिंह थे। एससी सीटों पर भाजपा 9 से 1 पर सिमटी। रिजर्व 10 सीटों में से कांग्रेस ने 9 जीतीं। रमन सरकार ने एससी वर्ग को 4% आरक्षण दिया, जबकि इनकी आबादी 13% है। 8 सामान्य सीटों पर भी एससी वोटर 15% तक हैं। ग्रामीण इलाकों में कांग्रेस 42 सीटें लाई: 53 ग्रामीण सीटों में से कांग्रेस ने 42 सीटें जीतीं। वजह दो घोषणाएं- किसानों की कर्जमाफी और धान का समर्थन मूल्य 2500 रुपए करना। किसान चुनाव तक धान बेचने नहीं पहुंचे। महिलाएं जहां वोटिंग में आगे, वहां भाजपा साफ: राज्य में शराबबंदी के वादे ने खासतौर पर महिलाओं का ध्यान खींचा। जिन 24 सीटों पर महिलाओं का वोटिंग प्रतिशत पुरुषों से ज्यादा रहा, उनमें से कांग्रेस ने 22 सीटें जीत लीं। भूपेश बघेल: ओबीसी चेहरा। 50 सभाएं कीं। 70% टिकट तय किए। टीएस सिंहदेव: नेता प्रतिपक्ष। 60 सभाएं, 90 बैठकें कीं। 15% टिकट तय किए। चरणदास महंत: पार्टी के वरिष्ठ नेता होने के नाते महंत की भी मजबूत दावेदारी। ढूंढाड़-मारवाड़ में भाजपा ने 60 सीटें हारीं : इन दो इलाकों में भाजपा की 91 सीटें थीं। अब सिर्फ 31 हैं। आनंदपाल एनकाउंटर और पद्मावत प्रकरण से शेखावाटी में भाजपा की 12 सीटें कम हुईं। ढूंढाड़ में सचिन पायलट का असर दिखा। मारवाड़ में अशोक गहलोत का। मत्स्य क्षेत्र में योगी ने हनुमान जी को दलित बताया था। राजपूत इसके विरोध में आए। फायदा कांग्रेस को हुआ। एससी/एसटी भाजपा की 29 सीटें कम हुईं : 2013 में भाजपा ने एससी/एसटी के लिए तय 58 सीटों में से 49 सीटें जीती थीं। इस बार कांग्रेस ने 31 जीतीं। एससी/एसटी एक्ट में केंद्र द्वारा लाए गए बिल से सवर्ण वोटर नाराज हैं। इस पर हिंसा हुई थी। इससे भाजपा को ही नुकसान हुआ। गांवों में कांग्रेस 63 सीटों से आगे : 153 ग्रामीण सीटों में से भाजपा के पास 123 सीटें थीं। इस बार कांग्रेस 63 सीटों से आगे हो गई है। किसान आंदोलन से ग्रामीण नाराज हैं। कांग्रेस के कर्ज माफी का वादा भी काम आया।
मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ का 2014 के लोकसभा चुनाव में अहम रोल रहा था. केंद्र में बीजेपी की सरकार बनाने में इन तीनों राज्यों की जनता ने दिल खोलकर नरेंद्र मोदी के समर्थन में वोट किए. इन तीनों राज्यों के कुल 65 लोकसभा सीटों में से 62 पर से 2014 में कमल खिला था. लेकिन आखिर पिछले 4 साल में ऐसा क्या हो गया जो जनता ने अब विधानसभा चुनाव में बीजेपी को नकार दिया है. हिंदी बेल्ट के इन तीनों राज्यों में बीजेपी की हार 2019 चुनाव के लिए खतरे की घंटी है. क्योंकि हिंदी भाषी इलाकों में बीजेपी की पकड़ मजबूत मानी जाती है. जानकारों का कहना है कि लोगों में राज्य सरकार के साथ-साथ मोदी सरकार से भी उम्मीदें काफी थीं, लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी. जानकार इस हार के पीछे एक नहीं कई वजह बता रहे हैं. 1. किसानों की नाराजगी मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में शहरी के मुकाबले ग्रामीण आबादी ज्यादा है. यहां अब भी 70 से 80 फीसदी ग्रामीण पूर्ण रूप से कृषि पर निर्भर हैं. पिछले साल मध्य प्रदेश के मंदसौर में विरोध-प्रदर्शन के दौरान गोली लगने से किसानों की मौत ने किसानों को बीजेपी से दूर कर दिया. साथ ही पिछले महीने देशभर से किसान अपनी मांगों को लेकर दिल्ली पहुंचे, पहले तो उन्हें दिल्ली की सीमाओं पर रोक दिया गया और फिर उनकी मांगों को गंभीरता से नहीं लिया गया. जिससे किसानों में मोदी सरकार के खिलाफ नाराजगी साफ दिखी. 2. नोटबंदी-GST का असर हमेशा से व्यापारी वर्गों का समर्थन बीजेपी को रहा है. लेकिन पहले नोटबंदी और फिर GST ने इस वर्ग को खासे नाराज कर दिया. कुछ व्यापारियों का कहना है कि GST को लेकर उनके मन में अभी भी कई सवाल हैं. वहीं नोटबंदी की वजह से किसानों की जमापूंजी पर ग्रहण लग गया. कांग्रेस ने पांचों राज्यों के विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान नोटबंदी और GST के मुद्दे को जमकर उछाला, और नाराज लोगों को अपने पाले में करने में सफल भी रहा. 3. बेरोजगारी देश में बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है और अब लोगों में इसके खिलाफ गुस्सा भी दिखने लगा है. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में पिछले 15 साल बीजेपी की सरकार थी, यहां के युवाओं में रोजगार को लेकर राज्य सरकार से लेकर मोदी सरकार से उम्मीदें थीं. लेकिन अब तक पूरी नहीं हुई. दरअसल, लोकसभा चुनाव 2014 से पहले नरेंद्र मोदी ने हर साल 2 करोड़ लोगों को रोजगार देने का वादा किया था, लोगों ने चार साल तक रोजगार का इंतजार किया. लेकिन अब लोगों के सब्र का बांध टूट रहा है और नतीजा सामने है. 4. केंद्र-राज्य में तालमेल में कमी कुछ लोगों का मानना है कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 15 साल से बीजेपी का एकछत्र राज्य था. मध्य प्रदेश में शिवराज सबसे बड़े नेता हैं तो छत्तीसगढ़ में रमन सिंह. वहीं राजस्थान में वसुंधरा राजे सिंधिया से बीजेपी की शुरुआत होती है उन्हीं पर आकर खत्म हो जाती है. दूसरा ऐसा कोई चेहरा नहीं है जो वसुंधरा का मुकाबला करे. इन तीनों में राज्यों केंद्रीय नेतृत्व की पकड़ बेहद कमजोर मानी जाती है. राज्य और केंद्र में भले की बीजेपी की सरकार हो, लेकिन तालमेल की कमी वक्त-वक्त पर साफ दिखा है. सूत्रों की मानें तो राजस्थान में चुनाव से कुछ महीने पहले ही बीजेपी वसुंधरा को हटाना चाहती है, लेकिन पार्टी में बगावत के डर से आलाकमान ये कदम नहीं उठा पाए. 5. एंटी इनकंबेंसी मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में पिछले 15 साल से बीजेपी सत्ता में थी. एक तरह यहां की एक पीढ़ी ने जन्म से लेकर अब तक बीजेपी की सरकार ही देखी. जिससे वो अब बदलाव चाहते थे. ऐसे में सरकार के खिलाफ नाराजगी नहीं होने के बावजूद बड़े तादाद में लोगों बदलाव के लिए वोट किए. जानकारों की मानें तो लोग बीजेपी सरकार के कामकाज से खुश हैं, लेकिन वो एक बार बदलाव के लिए कांग्रेस को वोट किए. जबकि राजस्थान में वसुंधरा के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी जोरों पर था. लोग वसुंधरा के काम करने के अंदाज से नाराज थे और आज उन्होंने अपनी ताकत दिखा दी.
नई दिल्ली कांग्रेस ने राहुल गांधी के नेतृत्व में बीजेपी को हिंदी पट्टी के तीन अहम राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में सत्ता से बाहर कर दिया है। लोकसभा से महज 4 महीने पहले सामने आए इन विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद 2019 के चुनाव को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। सबसे अहम सवाल है कि अगर अभी के हिसाब से 2019 में भी वोटिंग हो गई तो इन तीन राज्यों में क्या होगा? इन राज्यों की विधानसभा सीटों की मैपिंग अगर लोकसभा सीटों से की जाए तो बीजेपी को भारी नुकसान होता दिख रहा है। हालांकि बीजेपी मध्य प्रदेश और राजस्थान में अपनी होल्ड बनाए रख सकती है लेकिन ऐसे ही वोटिंग हुई तो वह लोकसभा चुनावों में छत्तीसगढ़ से करीब साफ हो सकती है। विधानसभा चुनावों के परिणाम के लिहाज से बीजेपी को मध्य प्रदेश की 29 में से 17, राजस्थान में 25 में से 13 और छत्तीसगढ़ की 11 सीटों में से एक सीट मिलती दिख रही है। पहले के चुनावों में भी कुछ ऐसे ही बने हैं संयोग विधानसभा चुनावों के परिणाम के आधार पर लोकसभा चुनावों का आकलन करने पर एक सवाल खड़ा होता है कि क्या इस तरह की तुलना का कोई सेंस बनता है? पहले के चुनावी अनुभव को आधार बनाएं तो निश्चित तौर पर सेंस बनता दिखता है। इन राज्यों में 2004, 2009 और 2014 में भी आम चुनावों से 6 महीने या उससे कम समय पहले विधानसभा चुनाव हुए थे। आंकड़े बताते हैं कि तब भी लोकसभा चुनावों में कमोबेश विधानसभा चुनावों का ही रिफ्लेक्शन देखने को मिला था। 2004 में केवल राजस्थान अपवाद के तौर पर दिखा था, जहां दिसंबर 2003 में विधानसभा चुनावों में जनता ने बीजेपी को नकार दिया था लेकिन लोकसभा चुनावों में 25 में से 20 सीटों पर जिताया था। बीजेपी के लिए इसलिए है बड़ा झटका अगर विधानसभा चुनावों के लोकसभा चुनावों पर असर का पैटर्न जारी रहा तो यह बीजेपी के लिए 2019 के चुनावों में भारी नुकसान का सबब बनेगा। बीजेपी ने 2014 के चुनाव में राजस्थान की 25 में से 25 सीटें, एमपी की 29 में से 27 सीटें और छत्तीसगढ़ की 11 में 10 सीटों पर जीत हासिल की थी। यानी इन तीनों राज्यों से आने वाली 65 लोकसभा सीटों में से बीजेपी को 62 पर जीत मिली थी। विधानसभा चुनावों का असर लोकसभा पर पड़ा तो बीजेपी की यह टैली घटकर 31 सीटों पर पहुंच सकती है। यानी बीजेपी को साफ तौर पर आधी लोकसभा सीटों का नुकसान होता दिख रहा है। 2014 के आम चुनावों में हिंदी पट्टी के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में बीजेपी ने 80 में से 72 लोकसभा सीटों पर जीत दर्ज की थी। अब यूपी में एसपी, बीएसपी, कांग्रेस और आरएलडी के बीच महागठबंधन की कवायद चल रही है। बीजेपी के लिए यहां भी 2014 का प्रदर्शन दोहरा पाना मुमकिन नजर नहीं आ रहा है। ऐसे में बीजेपी को हिंदी हर्टलैंड में मिलने वाली यह चोट भारी भी पड़ सकती है।
नई दिल्ली पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों से पता चलता है कि इस बार मतदाताओं ने धार्मिक गोलबंदी की कोशिशों को नकार दिया। इसका सबसे ज्यादा नुकसान बीजेपी को उठाना पड़ा है। पार्टी ने पहली बार इस चुनाव में उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ को अपना पोस्टर बॉय बनाया था। उन्होंने पांचों राज्यों में 70 से अधिक रैलियां कीं। पूरा फोकस धार्मिक ध्रुवीकरण पर रखा। अली और बंजरगबली की तुलना कर हिंदू कार्ड खेला। मध्य प्रदेश से लेकर तेलंगाना तक, योगी ने चुनाव को इसी धारा में मोड़ने की कोशिश की। उनकी रैलियों में भीड़ भी आई, लेकिन परिणाम उस अनुरूप नहीं आए। अमित शाह ने भी राष्ट्रवाद और शहरी नक्सली के मुद्दे को खूब हवा दी थी। कांग्रेस ने भी राहुल गांधी को हिंदू साबित करने में अधिक उर्जा लगाई। वह कई मंदिरों में गए और आखिर में अपना गोत्र तक बता दिया। कांग्रेस के अंदर नेताओं के एक वर्ग का मानना है कि अगर पार्टी किसान और नौजवान के मुद्दों पर और आक्रामक होती तो यह जीत बड़ी हो सकती थी। ऐसे नेता छत्तीसगढ़ की मिसाल देते हैं, जहां कांग्रेस बस इन्हीं मुद्दों पर लड़ी और पूर्ण बहुमत हासिल कर लिया। किसान, नौजवान तय कर रहे मुद्दे नतीजों से साफ है कि अब किसान और युवा जनादेश तय कर रहे हैं। वे अपने हिसाब से मुद्दे भी निर्धारित कर रहे हैं। गुजरात और कर्नाटक विधानसभा चुनावों में भी यही ट्रेंड सामने आया था। यह दोनों वर्ग चुनाव की दिशा तय करने वाला सबसे निर्णायक फैक्टर बन गया है। ऐसे में सभी दलों को संकेत मिल चुका है कि उन्हें अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में किस तरह उतरना है। काउंटर अटैक में हुई देरी सूत्रों के अनुसार, बीजेपी को चुनाव प्रचार के अंतिम दौर में अपनी गलती का अहसास हुआ था। उस समय तक बीजेपी नेता केवल भावनात्मक मुद्दे उछाल रहे थे, जबकि कांग्रेस ने किसानों की कर्ज माफी और युवाओं को बेरोजगारी भत्ता का कार्ड खेला था। ग्राउंड रिपोर्ट मिलने के बाद बीजेपी ने काउंटर भी करना शुरू किया, लेकिन पार्टी के ही कई नेताओं का ऑफ रिकॉर्ड कहना है कि तब तक बहुत देर हो गई थी। फेल हुई धार्मिक गोलबंदी योगी ने मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में 63 विधानसभा क्षेत्रों में चुनावी सभाएं कीं। इनमें से केवल 26 सीटों पर बीजेपी को बढ़त हासिल थी। योगी की सफलता दर 41 फीसदी रही। पिछली बार पार्टी इनमें से 47 सीटों पर जीती थी।
भोपाल मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के मुकाबले में बीजेपी को लगभग बराबरी पर लाने में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की बड़ी भूमिका रही है। राज्य के राजनीतिक हलकों में कहा जा रहा है कि बीजेपी की सीटें घटने का कारण केंद्र सरकार की नीतियों से जनता की नाराजगी है। इसके पीछे जल्दबाजी में GST लागू करने, नोटबंदी और चुनाव से पहले फ्यूल की कीमतें बढ़ने जैसे कारण हैं। बता दें कि इस बार के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को 114 और बीजेपी को 109 सीटों पर जीत मिली है। वहीं, पिछले चुनाव में बीजेपी को रेकॉर्ड 165 सीटें मिली थीं। चौहान के नजदीकी माने जाने वाले बीजेपी के एक नेता ने इकनॉमिक टाइम्स को बताया, 'राज्य में चौहान से वास्तव में नाराजगी नहीं थी। लोग भले ही उनके चेहरे से थक गए हों, लेकिन उनसे नफरत नहीं थी। बीजेपी के इस बार के चुनाव में कांग्रेस को बराबरी की टक्कर देने का बड़ा कारण भी राज्य में चौहान की लोकप्रियता है। विशेषतौर पर महिला मतदाता उन्हें पसंद करती हैं।' हालांकि, चौहान को अपनी कुछ टिप्पणियों से नुकसान भी उठाना पड़ा है। उनकी एक टिप्पणी से बीजेपी का परंपरागत वोट बैंक रही ऊपरी जातियां और ओबीसी गुस्से में थे। चुनाव प्रचार से जुड़े रहे बीजेपी के एक नेता ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले का प्रभाव समाप्त करने के लिए एससी/एसटी ऐक्ट ऑर्डिनेंस को लाने को लेकर भी ये जातियां नाराज थी। उनका कहना था, 'राम मंदिर को लेकर बीजेपी कहती है कि हम सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करेंगे। लेकिन एससी/एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को वह एक ऑर्डिनेंस के जरिए पलट देती है। लोगों ने इसी को लेकर सवाल उठाया था।' हालांकि, चौहान ने अपनी ओर से इस नाराजगी को कम करने की कोशिश की थी और चुनाव प्रचार के दौरान लोगों को आश्वासन दिया था कि उपयुक्त जांच के बिना एससी/एसटी मामलों में कोई गिरफ्तारी नहीं की जाएगी। बीजेपी नेता ने कहा, 'चौहान ने अपनी पूरी कोशिश की थी। हमने जो सीटें जीती हैं वे उनकी वजह से हैं।' प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मध्य प्रदेश में केवल 10 रैलियां की थी और चुनाव प्रचार चौहान के चेहरे पर ही केंद्रित था। चौहान ने चार महीने के प्रचार के दौरान पूरे राज्य का दौरा किया था और अपनी जन आशीर्वाद यात्रा और रैलियों के दौरान प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में लगभग दो बार गए थे। बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि तीन बार के मुख्यमंत्री के तौर पर चौहान के प्रदर्शन और उनकी ओर से शुरू की गई योजनाओं और कार्यक्रमों की बराबरी करना कांग्रेस की सरकार बनने की स्थिति में नए मुख्यमंत्री के लिए मुश्किल होगा। हालांकि, कांग्रेस ने चौहान की लगातार आलोचना करते हुए उन्हें केवल घोषणाएं करने वाला मुख्यमंत्री बताया था। कांग्रेस का कहना था कि चौहान की योजनाएं केवल कागजों पर रहती हैं और उन्हें वास्तव में लागू नहीं किया जाता।
नई दिल्ली मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में मिलाकर लोकसभा की 65 सीटें हैं। 2014 में इनमें से 62 सीटें बीजेपी ने जीती थीं। बीजेपी को मध्य प्रदेश में 29 में से 27, राजस्थान में सभी 25 और छत्तीसगढ़ में 11 में से 10 सीटें मिली थीं। हालांकि, मंगलवार को इन राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणामों में प्रत्येक दल की ओर से जीती गई सीटों की संख्या के अनुसार अगले लोकसभा चुनाव के लिए दिलचस्प पूर्वानुमान सामने आ रहा है। विधानसभा चुनाव के परिणाम के अनुसार अभी लोकसभा चुनाव कराने पर मध्य प्रदेश में बीजेपी को 29 में से 13 सीटें मिलेंगी और कांग्रेस के पास 16 सीटें जाएंगी। कांग्रेस ग्वालियर की लोकसभा सीट बीजेपी से छीन सकती है और उज्जैन में भी वह जीत हासिल करने की स्थिति में है। कांग्रेस ने उज्जैन लोकसभा क्षेत्र के तहत आने वाले 8 विधानसभा क्षेत्रों में से 5 में जीत दर्ज की है। राजस्थान में 2014 में सभी लोकसभा सीटें जीतने वाली बीजेपी को अब आधी सीटें मिलने का अनुमान है। अभी लोकसभा चुनाव होने पर राज्य में बीजेपी को 12 और कांग्रेस को 13 सीटों पर जीत मिलेगी। पिछले वर्ष हुए उप चुनावों में कांग्रेस ने अजमेर और अलवर की दो सीटें जीती थी। हालांकि, मौजूदा आंकड़ों के अनुसार अगर लोकसभा चुनाव के नजरिए से देखा जाए तो कांग्रेस अजमेर और अलवर की दोनों सीटें बीजेपी से हार रही है। कांग्रेस के दोनों सांसद अजमेर से रघु शर्मा और अलवर से करण सिंह यादव इस बार विधानसभा चुनाव में उतरे थे। रघु शर्मा केकरी विधानसभा सीट जीतने में सफल रहे, लेकिन करण सिंह यादव को किशनगढ़ बास विधानसभा सीट पर हार देखनी पड़ी है। यह सीट बीएसपी ने जीती है। राजस्थान में कांग्रेस जिन 13 लोकसभा सीटों को जीत सकती है उनमें जयपुर लोकसभा सीट शामिल है जिसमें कांग्रेस ने 8 विधानसभा क्षेत्रों में से 4 में जीत हासिल की है। कांग्रेस जयपुर ग्रामीण सीट भी अपने कब्जे में कर सकती है जो अभी केंद्रीय मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौर के पास है। कांग्रेस ने जयपुर ग्रामीण लोकसभा सीट के तहत आने वाले 7 विधानसभा क्षेत्रों में से 4 पर जीत दर्ज की है। छत्तीसगढ़ से सबसे हैरान करने वाले परिणाम आए हैं। राज्य में कांग्रेस ने बीजेपी को लगभग हाशिए पर ला दिया है। छत्तीसगढ़ में 90 विधानसभा सीटों में से कांग्रेस ने 68 जीती हैं। इन परिणामों को लोकसभा चुनाव के नजरिए से देखने पर कांग्रेस राज्य में 10 सीटों पर जीत हासिल कर सकती है। जांजगीर चांपा लोकसभा सीट पर कांग्रेस और बीएसपी के बीच कड़ी टक्कर है। अभी तक बीजेपी के दबदबे वाले राज्य माने जा रहे मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ की 65 लोकसभा सीटों पर कांग्रेस 39 सीटों के साथ वापसी करती दिख रही है, जबकि बीजेपी 2014 के लोकसभा चुनाव की तुलना में 37 सीटों के नुकसान के साथ केवल 25 पर जीत हासिल कर सकती है।
भोपाल पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के नतीजों में सबसे दिलचस्प लड़ाई मध्य प्रदेश में रही। यहां आखिरी तक बीजेपी-कांग्रेस के बीच जंग की तस्वीर साफ नहीं हो पाई थी। बुधवार सुबह परिणाम स्पष्ट हुआ तो उसमें किसी को बहुमत नहीं मिला। हालांकि 114 सीटों के साथ कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। लेकिन दिलचस्प आंकड़ा यह है कि बीजेपी को कांग्रेस से ज्यादा वोट मिले। इस मामले में बीजेपी भले ही कांग्रेस से पीछे रह गई हो लेकिन वोट शेयरिंग के मामले में बीजेपी कांग्रेस से आगे रही। बीजेपी को मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में 41.0 फीसदी वोट मिले जबकि कांग्रेस को 40.9 फीसदी वोट। मध्य प्रदेश में बीजेपी को 1 करोड़ 56 लाख 42 हजार 980 वोट मिले जबकि कांग्रेस को 1 करोड़ 55 लाख 95 हजार 153 वोट। इस तरह ज्यादा वोट मिलने के बाद भी बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी नहीं बन पाई। पिछले चुनाव से तुलना करें तो बीजेपी ने यहां 165 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत के साथ सरकार बनाई थी। जबकि कांग्रेस को महज 58 सीटें ही मिली थीं। 2013 के चुनाव में बीजेपी को 44.88 फीसदी वोट शेयर मिले थे जबकि कांग्रेस को 36.38 फीसदी। उस हिसाब से इस बार बीजेपी का वोट फीसदी कम हुआ है वहीं कांग्रेस को वोट शेयर में बढ़त मिली है। कुछ ऐसा ही हाल इसी साल संपन्न हुए कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भी हुआ था जहां सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी ही रही लेकिन वोट सबसे ज्यादा कांग्रेस के लिए पड़े। बीजेपी का वोट शेयर 36.2 फीसदी रहा जबकि कांग्रेस का 38 फीसदी। फिर भी कांग्रेस के हिस्से में कम सीटें आईं। कांग्रेस को 104 सीटें मिली थीं जबकि कांग्रेस को 78 सीटें। हालांकि बाद में जेडी (एस) के साथ गठबंधन करके कांग्रेस ने कर्नाटक में सरकार बना ली थी।
नई दिल्ली मनी लॉन्ड्रिंग को लेकर अपने सहयोगियों के यहां प्रवर्तन निदेशालय (ED) के छापों पर रॉबर्ट वाड्रा ने बुधवार को कहा कि उनके खिलाफ लगे आरोप पूरी तरह बेबुनियाद और राजनीति से प्रेरित हैं। उन्होंने कहा कि वह राजनीतिक ब्लैकमेलिंग के लिए अपने नाम का इस्तेमाल नहीं होने देंगे। वाड्रा ने कहा, 'मेरे खिलाफ लगे आरोप पूरी तरह झूठे और राजनीति से प्रेरित हैं। हमने हर नोटिस का जवाब दिया है। लेकिन मेरा परिवार तनाव में है, मां की सेहत खराब है। मेरे परिसरों में तोड़फोड़ की गई और ताले तोड़े गए हैं। हर काम कानूनी तरीके से किया जाना चाहिए, हमने हमेशा सहयोग किया है।' ईडी के छापों पर उन्होंने आगे कहा, 'मैं अपने नाम का इस्तेमाल राजनीतिक ब्लैकमेल के लिए नहीं होने दूंगा। मैंने हमेशा कहा है कि हम जांच में सहयोग करेंगे, लेकिन प्रक्रिया निष्पक्ष और कानूनी होनी चाहिए। मैं कहीं भाग नहीं रहा हूं या किसी दूसरे देश में नहीं बसने जा रहा हूं।' रॉबर्ट वाड्रा कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के बहनोई हैं। बता दें कि पिछले हफ्ते ईडी ने रॉबर्ट वाड्रा के 3 सहयोगियों के ठिकानों पर लगातार 2 दिनों तक छापेमारी की थी। सूत्रों के मुताबिक ये छापे राजस्थान के बीकानेर भूमि घोटाला मामले और लापता हथियार सौदागर संजय भंडारी से जुड़े मामले में दायर मनी लॉन्ड्रिंग एफआईआर के सिलसिले में मारे गए हैं। एजेंसी ने ये छापे एफआईआर की प्रवर्तन मामला सूचना रिपोर्ट यानी ईसीआईआर के तहत मारे हैं। बीकानेर भूमि घोटाले में ईडी ने वाड्रा से जुड़ी कंपनी स्काईलाइट हास्पिटलिटी और इसके अधिकारियों से पूछताछ की है। वहीं वाड्रा को पेश होने के लिए 2 बार समन भेजा है। विवादित हथियार सौदागर भंडारी के खिलाफ ईडी ने 2016 में मामला दर्ज किया था। भंडारी का मामला पहली बार तब प्रकाश में आया जब आयकर विभाग ने उसके खिलाफ अप्रैल 2016 में तलाशी अभियान चलाया। इस दौरान उसके परिसरों से 'संवेदनशील' आधिकारिक रक्षा दस्तावेज बरामद किए गए। तलाशी के दौरान कुछ ईमेल भी आयकर विभाग के हाथ लगे जिनमें 2010 में लंदन में एक कीमती अपार्टमेंट की रिपेयर के काम का जिक्र है।
रायपुर छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने पिछले 15 साल से सत्ता पर काबिज बीजेपी को करारी शिकस्त दी है। रुझानों और नतीजों में कांग्रेस को यहां दो तिहाई बहुमत मिलता नजर आ रहा है। इस बीच राज्य के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंप दिया है। चुनाव परिणामों को लेकर मीडिया को अपनी पहली प्रतिक्रिया देते हुए रमन सिंह ने कहा, 'मैं विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार की नैतिक जिम्मेदारी लेता हूं क्योंकि यह चुनाव मेरे नेतृत्व में लड़ा गया था। उम्मीद है कि चुनाव में जनता से किए गए वादे कांग्रेस निभाएगी।' रमन ने कांग्रेस को जीत की बधाई देते हुए कहा, 'राज्य में हम एक सशक्त विपक्ष की भूमिका निभाएंगे और प्रदेश के विकास के लिए कार्य करेंगे। कांग्रेस को जीत की बधाई। हमारी ओर से चुनाव के दौरान कहां कमी रह गई इस पर आगे देखेंगे।' हालांकि रमन ने इसे केंद्र सरकार के कामकाज पर जनमत संग्रह मानने से इनकार कर दिया। रमन ने इस दौरान बताया कि उन्होंने राज्यपाल आनंदीबेन पटेल को अपना इस्तीफा सौंप दिया है। इस बीच चुनाव आयोग से मिले आंकड़ों के मुताबिक राज्य की 90 में से 65 विधानसभा सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवार या तो जीत चुके हैं या बढ़त बना रखी है। वहीं, बीजेपी 16 सीटों पर बढ़त बनाए है। बीएसपी समेत अन्य पार्टियों के कैंडिडेट 9 सीटों पर आगे चल रहे हैं।

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