taaja khabar....राफेल डील पर नई रिपोर्ट का दावा, नियमों के तहत रिलायंस को मिला ठेका.....सीबीआई को पहली कामयाबी, भारत लाया गया विदेश भागा भगोड़ा मोहम्मद याह्या.....राजस्थान विधानसभा चुनाव की बाजी पलट कर लोकसभा के लिए बढ़त की तैयारी में BJP.......GST के बाद एक और बड़े सुधार की ओर सरकार, पूरे देश में समान स्टैंप ड्यूटी के लिए बदलेगी कानून....UNHRC में भारत की बड़ी जीत, सुषमा स्वराज ने जताई खुशी....PM मोदी के लिखे गाने पर दृष्टिबाधित लड़कियों ने किया गरबा.....मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव: कांग्रेस के साथ नहीं एसपी-बीएसपी, बीजेपी को हो सकता है फायदा....गुरुग्रामः जज की सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मी ने उनकी पत्नी, बेटे को बीच सड़क गोली मारी, अरेस्ट....बेंगलुरु में HAL कर्मचारियों से मिले राहुल गांधी, बोले- राफेल आपका अधिकार....कैलाश गहलोत के घर से टैक्स चोरी के सबूत मिलेः आईटी विभाग.....मेरे लिए पाकिस्तान की यात्रा दक्षिण भारत की यात्रा से बेहतर: सिद्धू....घायल रहते 2 उग्रावादियों को किया ढेर, शहादत के बाद इंस्पेक्टर को मिलेगा कीर्ति चक्र....छत्तीसगढ़: कांग्रेस को तगड़ा झटका, रामदयाल उइके BJP में शामिल....
राफेल डील पर जारी विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से खरीद प्रक्रिया की पूरी जानकारी मांगी है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से सीलबंद लिफाफे में उस फैसले की प्रक्रिया की डीटेल देने को कहा है, जिसके बाद राफेल जेट की खरीद को लेकर फ्रांस की कंपनी दैसॉ एविएशन से डील हुई। कोर्ट ने कहा कि केंद्र 29 अक्टूबर तक सूचनाएं सौंपे। मामले की अगली सुनवाई 31 अक्टूबर को होगी। आपको बता दें कि विपक्ष राफेल जेट की कीमतों को लेकर सरकार पर गंभीर आरोप लगा रहा है और इसी के तहत मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। हालांकि बेंच ने स्पष्ट किया है कि वह याचिकाओं में लगाए गए आरोपों को ध्यान में नहीं रख रहा है। वहीं, केंद्र सरकार ने राफेल डील पर दायर की गई याचिकाओं को रद्द करने की मांग की। केंद्र ने दलील दी कि राजनीतिक फायदे के लिए राफेल पर PILs दायर की गई हैं। अटर्नी जनरल ने कोर्ट से कहा कि राफेल सौदा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है और ऐसे मुद्दों की न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती है। मुख्य न्यायाधीश ने अटॉर्नी जनरल से कहा कि सरकार से कहिए कि इस बारे में कोर्ट सूचित किया जाए कि राफेल डील कैसे हुई. हम यह साफ कर दें कि हमने याचिका में लगाए गए आरोपों का संज्ञान नहीं लिया है. यह आदेश केवल यह सुनिश्चित करने के लिए है कि फैसला लेने में समुचित प्रक्रिया का पालन किया गया. हम राफेल विमान की कीमत या एयरफोर्स के लिए इसकी उपयोगिता के बारे में नहीं पूछ रहे हैं. इस पर मुख्य न्यायाधीश ने पूछा कि अगर हम डील की जानकारी को छोड़कर इसमें फैसले लेने की प्रक्रिया की जानकारी मांगें तो क्या आप यह उपलब्ध करा सकते हैं? इस पर अटॉर्नी जनरल ने कहा कि रक्षा सौदों में प्रोटोकॉल होता है. यह बताया जा सकता है. वहीं, कांग्रेस नेता और आरटीआई कार्यकर्ता तहसीन पूनावाला ने राफेल सौदे के संबंध में दायर अपनी जनहित याचिका वापस ले ली है। आपको बता दें कि पीठ राफेल सौदे को लेकर दायर कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। बता दें कि कोर्ट ने सरकार से राफेल विमान की कीमतों का खुलासा या तकनीकी जानकारी उपलब्ध कराने को नहीं कहा है. कोर्ट की ओर से डील की प्रक्रिया की जानकारी मांगी गई है. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को औपचारिक आदेश नहीं दिया है, बल्कि अटॉर्नी जनरल को सीलबंद लिफाफे में जानकारी उपलब्ध कराने को कहा है. बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेरिस में 10 अप्रैल 2015 को तत्कालीन फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के साथ बातचीत के बाद 36 राफेल जेट विमानों की खरीद की घोषणा की थी। 23 सितंबर 2016 को अंतिम रूप से यह सौदा पक्का हुआ। कांग्रेस का आरोप कांग्रेस इस सौदे में बड़ी अनियमितता का आरोप लगा रही है। मुख्य विपक्षी पार्टी का आरोप है कि सरकार 1670 करोड़ रुपये प्रति राफेल की दर से यह विमान खरीद रही है जबकि UPA की पिछली सरकार के दौरान इसका दाम 526 करोड़ रुपये तय किया गया था। बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेरिस में 10 अप्रैल 2015 को तत्कालीन फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के साथ बातचीत के बाद 36 राफेल जेट विमानों की खरीद की घोषणा की थी। 23 सितंबर 2016 को अंतिम रूप से यह सौदा पक्का हुआ। कांग्रेस का गंभीर आरोप कांग्रेस इस सौदे में बड़ी अनियमितता का आरोप लगा रही है। मुख्य विपक्षी पार्टी का आरोप है कि सरकार 1670 करोड़ रुपये प्रति राफेल की दर से यह विमान खरीद रही है जबकि UPA की पिछली सरकार के दौरान इसका दाम 526 करोड़ रुपये तय किया गया था। बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेरिस में 10 अप्रैल 2015 को तत्कालीन फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के साथ बातचीत के बाद 36 राफेल जेट विमानों की खरीद की घोषणा की थी। 23 सितंबर 2016 को अंतिम रूप से यह सौदा पक्का हुआ। कांग्रेस का गंभीर आरोप कांग्रेस इस सौदे में बड़ी अनियमितता का आरोप लगा रही है। मुख्य विपक्षी पार्टी का आरोप है कि सरकार 1670 करोड़ रुपये प्रति राफेल की दर से यह विमान खरीद रही है जबकि UPA की पिछली सरकार के दौरान इसका दाम 526 करोड़ रुपये तय किया गया था। मदन अरोड़ा, स्वतंत्र पत्रकार
अमेरिका के दबाव को दरकिनार करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस के साथ जिस s 400 वायु रक्षा प्रणाली का 39000 करोड़ रुपये का सौदा किया है ,उसमें भी राहुल गांधी को घोटाला मुद्दा मिल सकता है।आज की तारीख में 5 अरब डॉलर केहुए इस सौदे में रिलाएंस भी भारत में s400 बनाने वाली कंपनी आत्माज ऐंटी के साथ साझेदार है। रिलाएंस ने 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मास्को यात्रा के दौरान यह साझेदारी की थी।24 दिसम्बर 2015 को रिलाएंस इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड ने अपनी एक प्रेस रिलीज में इसका जिक्र किया था।इसमें लिखा था कि डीएसी ने s400 वायु रक्षा मिसाइल सिस्टम के अधिग्रहण को मंजूरी देकर 6 अरब डॉलर के व्यापार का मौका दिया है। भारत की रिलाएंस डिफेंस लिमिटेड और रूस की वायु रक्षा मिसाइल सिस्टम की प्रमुख निर्माता कंपनी आत्माज एंटी ने भारत के साथ संयुक्त रूप से काम करने का फैसला किया है।आत्माज एंटी के उपाध्यक्ष ने इस अवसर पर कहा था कि रिलाएंस डिफेंस।के साथ काम करने से भविष्य में भारत की सुरक्षा बलों की जरूरतों को पूरा करने के लिए दोनों कंपनियों को नई दिशा मिलेगी। अब इस डील में भी रिलायंस का नाम आने से राहुल गांधी और कांग्रेस को घोटाले का आरोप लगाने का सुनहरी मौका मिल सकता है और आरोप लगाया जा सकता है कि अंबानी को 6 अरब डॉलर का फायदा पहुंचाया गया।हालांकि डील 5 अरब डॉलर की है। पर इसमें एक पेंच है कि रिलाएंस ने डील के तुरंत बाद ही भारत में प्रेस रिलीज कर इसकी जानकारी दे दी थी इसलिये आरोप लगाने वालों से ये तो पूछा ही जायेगा कि उस वक्त इस पर सवाल खड़े क्यों नहीं किये गए। मदन अरोड़ा, स्वतंत्र पत्रकार
जैसे जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं आरोप लगाने की गंदी राजनीति भी शुरू हो गई है। चिन्ताजनक बात यह है कि अपने सियासी फायदे के लिए देशकी सुरक्षा और प्रतिष्ठा को दांव पर लगाया जा रहा है। राफेल को लेकर आरोप लगाये जा रहे हैं पर हकीकत को छुपाया जा रहा है। कांग्रेस कुछ बयानों के आधार पर राफेल सौदे पर सवाल उठा रही है, पर एक भी सबूत अभी तक सामने लाने में विफल रही है। विडंबना यह है कि जब कोई जिम्मेदार पद पर बैठा व्यक्ति सच्चाई रखने की कोशिश करता है तो उसी पर सवाल खड़े कर दिए जाते हैं । राफेल की कीमत को लेकर शर्मनाक गंदा सियासी खेल खेला जा रहा है। ऑफसेट के तहत दसॉल्ट के रिलायंस डिफेंस की साझेदारी पर सवाल खड़े कर सबसे बड़ा घोटाला बताया जा रहा । सवाल उठाया जा रहा है कि सरकारी उपक्रम एचएएल के बजाये अनुभवहीन अनिल अंबानी की कंपनी को विमान बनाने का ठेका कैसे दे दिया गया, जबकि हकीकत में अंबानी के साथ दसॉल्ट करार केवल विमान के पुर्जे बनाने के लिए हुआ है। इस तथ्य को अंबानी और रक्षा मंत्रालय लगातार सामने लाते रहे हैं कि अंबानी की कंपनी केवल पुर्जे बनाने का काम करेगी और इस तरह का करार देश की अन्य कंपनियों के साथ भी किया गया है, पर कांग्रेस अंबानी की कंपनी को अनुभवहीन बताते हुए इसे लगातार नकारती आ रही है । इस बयानबाजी के बीच अब एक नया खुलासा किया जा रहा है कि अंबानी को रा फेल की अप्रेल 2015 को हुई डील के 6 महीने बाद विमान के पुर्जे बनाने का लाईसेंस दिया गया और इसे भी घोटाले की संज्ञा दी जा रही है। यक्ष सवाल यह है कि दो कंपनियों के बीच करार होने के बाद लाईसेंस लेना क्या कानूनन अपराध अथवा घोटाला है। यह अगर घोटाला है तो इसे जनता को समझाया जाना चाहिए कि यह किस तरह से घोटाला हुआ, पर इस खुलासे के साथ तो यह स्थापित हो गया कि अंबानी को विमान नहीं पुर्जे बनाने का ठेका मिला है, जो कांग्रेस के पूर्व के विमान बनाने के आरापों को झुठलाता है। अब तक यही बात भाजपा और अनिल अंबानी कह रहे थे। लेकिन राहुल गांधी इस बात को स्वीकार ही नहीं कर रहे थे। घोटाला घोटाला का विलाप करने वालों को समझाया गया, भाई जब डील में 36 राफेल रेडी टू फ्लाई कंडीशन में आ एंगे जिनमें एक पैसे का कोई काम भारत में नहीं होना है तो इस डील में अंबानी की कंपनी को राफेल बनाने का ठेका कैसे मिल गया पर वे लोग मान ही नहीं रहे थे । चलो अब मान लिया कि डील के 6 महीने बाद नवम्बर 2015 में अंबानी को राफेल के पुर्जे बनाने का लाइसेन्स मिला, ये अलग बात है कि डील 23 सितम्बर2016 को पूरी हुई थी। अब सवाल रिलाएंस के अनुभव और देश की सुरक्षा को खतरे में डालने का तो इस पर प्रबुद्ध कांग्रेस बताये, जब यूपीए सरकार के समय इसी दसॉल्ट ने मुकेश अंबानी की रिलाएंस ऐरोस्पेस को ठेका देने का समझौता किया था तब क्या अम्बानी की कंपनी को कोई अनुभव था। तब यह घोटाला नहीं था तो आज कैसे हो गया। तब देश की सुरक्षा खतरे में नहीं थी तो आज कैसे खतरे में आ गई।देश की कई कंपनी जो दूसरे क्षेत्रों में काम कर रही हैं आज डिफेंस क्षेत्र में अपना हाथ आजमा रही हैं ,उनको डिफेंस का कौनसा अनुभव है। पिछले दिनों ही अमेरिका की लड़ाकू विमान एफ१६ बनाने वाली कंपनी ने अपने लड़ाकू विमान के विंग्स बनाने का करार टाटा की कंपनी के साथ किया है , टाटा को क्या एफ१६ विमान बनाने का अनुभव है ।अंबानी जब पेट्रो इंडस्ट्रीज में आये तो क्या उन्हें इसका अनुभव था।अनुभव पैसे से रखे गए कार्मिकों का होता है न कि केवल मालिकों का। जब टाटा को विमान के पुर्जे बनाने का ठेका मिल सकता है ,महेंद्रा को मिल सकता है ,रशिया अडानी को आमंत्रित कर सकता है तो अंबानी को मिले ठेके पर सवाल क्यों और यह घोटाला कैसे। एचएएल को लेकर भी सवाल खड़े किये जा रहे हैं । इसे लेकर रक्षामंत्री निर्मला सीतारमण स्थिति साफ कर चुकी हैं। रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस संबंध में कहा था कि एचएएल के पास फ्रांसीसी कंपनी दसॉ एविएशन के साथ मिल कर भारत में इस लड़ाकू विमान के विनिर्माण के लिए जरूरी क्षमता ही नहीं थी और सार्वजनिक क्षेत्र की यह कंपनी काम की गारंटी देने की स्थिति में नहीं थी. सीतारमण ने ये भी बताया था कि एचएएल के साथ कई दौर की बातचीत के बाद फ्रांसीसी कंपनी दसॉ एविएशन को महसूस हुआ कि यदि राफेल जेट का उत्पादन भारत में किया जाता है तो इसकी लागत काफी अधिक बढ़ जाएगी.। सीतारमण के बाद अब , वायुसेना प्रमुख सामने आये हैं, और एचएएल की क्षमता पर सवाल खड़े किये हैं । हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के साथ राफेल विमान का सौदा न होने पर भी वायुसेना प्रमुख ने टिप्पणी की. उन्होंने बताया कि एचएएल के साथ सुखोई के निर्माण में हम पहले से ही तीन साल पीछे चल रहे हैं, जबकि जगुआर में 6 साल की देरी हुई है. उन्होंने ये भी बताया कि एलएसी और मिराज में 5 और 2 साल की देरी हो रही है. वायुसेना प्रमुख का यह बयान अंग्रेजी अखबार की उस रिपोर्ट के बाद आया है, जिसमें दावा किया है कि सुखोई -30 युद्धक एयरक्राफ्ट के निर्माण में तीन साल की देरी होगी. यह विमान एचएएल ही बना रहा है. राफेल डील के सवाल पर धनोआ ने कहा, 'हम कठिन स्थिति में थे। हमारे पास तीन विकल्प थे, पहला या तो कुछ घटने का इंतजार करें, आरपीएफ को विद्ड्रॉ कर लें या फिर आपात खरीदारी करें। हमने इमर्जेंसी खरीदारी की। राफेल डील हमारे लिए बूस्टर के समान है।' धनोआ ने कहा, 'सरकार ने बोल्ड कदम उठाते हुए 36 राफेल फाइटर विमान खरीदा। एक उच्च प्रदर्शन वाला और उच्च तकनीक से सुसज्जित लड़ाकू विमान भारतीय वायुसेना को दिया गया है। ताकि हम अपनी क्षमता को बढ़ा सके।' क्या हैं कांग्रेस के आरोप कांग्रेस राफेल डील को रक्षा क्षेत्र का सबसे बड़ा घोटाला करार दे रही है. कांग्रेस का आरोप है कि मोदी सरकार इस विमान की खरीद 1670 करोड़ रुपये प्रति विमान की दर पर कर रही है जबकि यूपीए सरकार ने इसके लिए 526 करोड़ रुपये की कीमत को अंतिम रूप दिया था. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कीमत को आधार बनाकर नरेंद्र मोदी पर अपने उद्योगपति दोस्तों को लाभ पहुंचाने का आरोप लगा रहे हैं. कैग की खरी खरी, कहा बिना सबूत नहीं बनेगी बात राफेल को घोटाला बनाने में जुटी कांग्रेस और राहुल गांधी को कैग नेदो टूक कह दिया है कि सिर्फ आरोप लगाने और बयान देने से बात नहीं बनेगी। कांग्रेस नेताओं से 4 अक्टूबर को हुई मुलाकात में कैग ने साफ-साफ कह दिया कि जो आरोप सरकार पर लगा रहे हैं,उसके सबूत भी दें वरना इस मामले में आगे बढऩा मुश्किल होगा। मदन अरोड़ा, स्वतंत्र पत्रकार
राफेल विमानों का सौदा एक सियासी मुद्दा बन गया है, जैसा कि देश में अक्सर हथियार सौदों के साथ होता है। राहुल गांधी और उनकी पार्टी ने 36 राफेल विमानों के सौदे में अधिक कीमत देकर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है। इस शोर शराबे में चीन और पाकिस्तान जैसे आक्रामक पड़ोसियों से निपटने के लिए भारतीय वायुसेना की जरूरतों को पूरा करने का मुद्दा दब गया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारतीय वायुसेना की सिफारिश पर 2015 में जेट के इस सौदे को अंजाम दिया था। जिसमें से प्रत् येक दस्ते में 18 विमान होंगे और इनमें से एक दस्ते का ेपूर्वी सीमा पर और एक को पश्चिमी सीमा पर तैनात किया जाना है। इस सौदे के आलोचक आरोप लगा रहे हैं कि इन विमानों का अंतिम सौदा यूपीए सरकार के समय हुई बातचीत से अधिक में किया गया है। अपनी बेबाक विचारों के लिए जाने,जाने वाले सामरिक विशेषज्ञ मारूफ रजा ने देश के सामने इस सौदे को लेकर अपने विचार सांझा किए हैं। रजा के अनुसार सौदे की सच्चाई आरोपों से बिलकुल अलग है और मोदी सरकार का अंतिम सौदा जिस पर हस्ताक्षर किए गए अपेक्षाकृत सस्ता है। वायुसेना का कोई भी अधिकारी इस बात की पुष्टि कर देगा कि किसी लड़ाकू विमान की कीमत पूरी तरह से हथियारों से लैस विमान की पूरी कीमत का एक हिस्सा होती है। क्योंकि इसमें लैस होने वाले अस्त्र-शस्त्र विमान को युद्ध के योग्य बनाते हैं। कांग्रेस नेता इससे वाकिफ हैं, क्योंकि वायुसेना ने अपने पुराने मिग विमानों को बदलने के लिए 2001 में लड़ाकू विमानों की तलाश शुरू कर दी थी। यूपीए के समय राफेल और यूरो फाइटर को छांटा गया था। उसके बाद कीमत पर बातचीत शुरू हुई। मौजूदा एनडीए सरकार का कहना है कि विमान की कीमत यूपीए सरकार के समय हुई बातचीत से नौ फीसदी कम है, लेकिन यह संस्करण सिर्फ एयरक्राफ्ट प्लेटफार्म(विमान का ढांचा, जिसमें हथियार और उपकरण न लगे हों)के लिए है। रजा के अनुसार यूपीए ने सौदा पक्का नहीं किया और एनडीए ने तो सिर्फ पहले हुई बातचीत को ही आगे बढ़ाया। आज जो शोर मच रहा है, उसकी वजह यह है कि बताई गई कुल कीमत 91 लाख यूरो प्रति एयरक्राफट प्लेटफार्म है और 78.7 अरब यूरो पूरी तरह से हथियारों से लैस 36 राफेल की कीमत है, जिसमें अतिरिक्त हथियार और प्रौद्योगिकी शामिल है, जिन्हें राफेल लड़ाकू विमानों के दस्ते से जोड़ा जाना है। इनमें राफेल में लगाई जाने वाली आधुनिक मिसाइल शामिल हैं, जिनकी मारक क्षमता हमारे सबसे अच्छे लड़ाकू विमान सुखोई एमकेआई की मारक क्षमता से अधिक है। इसके अलावा रजा के अनुसार डसाल्ट ने आश्वस्त किया है कि हर समय राफेल के बेड़े के 75 फीसदी विमान उड़ान की स्थिति में रहेंगे जो यूपीए डील में नहीं था। इसकी मौजूदा सुखाई से तुलना करें तो उसके बेड़े के 60 फीसदी विमान उड़ान की स्थिति में रहते हैं। रजा के अनुसार विमानों से जुड़ी अतिरिक्त प्रोद्योगिकी और क्षमता को सार्वजनिक करने की मांग सियासी दबाव बनाने के लिए है। ऐसा करने से भारत के लिए जोड़ी गई विशेष क्षमताओं का सबको पता चल जाएगा जो देश हित में नहीं है। रजा ने पूछा है आखिर विपक्षी दल किस बात पर शोर मचा रहे हैं। क्या हथियारों का कोई डीलर या निर्माता और राजनीतिकों का गठजोड़ विपक्ष को शह दे रहा है। या फिर यह सिर्फ बोफोर्स घोटाले के प्रेत से छुटकारा पाने की कोशिश हैं,जो कि कांग्रेस का पीछा कर रहा है और जिसके कारण 1980 के बाद से किसी बड़े हथियार सौदे को अंजाम नहीं दिया जा सका है और एनडीए विपक्षी दलों को विश्वास में नहीं ले सका। इन विमानों को भारतीय वायुसेना से जोड़े जाने में देरी सिर्फ भारत के हवाई खतरों को और बढ़ाएगी। रजा के अनुसार लोकतंत्र में विपक्षी दलों की भूमिका वाचडॉग की होती है, लेकिन जब सौदा जी टू जी यानी सरकार और सरकार के बीच का होता है तो फिर दलालों के लिए कोई अवसर नहीं रह जाता। एनडीए सरकार यह समझाने में शायद नाकाम रही है, इसलिए उसे मुश्किल का सामना करना पड़ रहा है,जबकि इसके विपरीत यूपीए सरकार सीधे राफेल निर्माता कम्पनी से बातचीत कर रही थी, जिसमें दलालों की प्रमुख भूमिका रहती है। रजा के अनुसार जहां तक अनिल अंबानी की कंपनी को फायदा पहुंचाने का सवाल है, इन विमानों को भारत में जोडऩे या उनके निर्माण करने के बारे में अब तक कोई समझौता ही नहीं किया गया है। जब ऐसी नौबत आएगी, तो यह निर्माता कंपनी का विशेषाधिकार है कि वह अपना सहयोगी चुनेऔर तब यह अंबानी की कंपनी होगी या कोईऔर यह समय बताएगा। मौजूदा दोनों सरकारों के बीच हुए सौदे में किसी भारतीय सहयोगी के शामिल होने का सवाल ही नहीं उठता। रजा कहते हैं कि निश्चित रूप से यूपीए और इस सौदे के आलोचक सही तर्क देते हैं कि अंबानी की कंपनी को विमान निर्माण या जोडऩे का एचएएल की तरह कोई अनुभव नहीं है, लेकिन इस मुद्दे पर बाद में बात हो सकती है। 36 राफेल विमानों की जी टू जी खरीद में इसकी कोई गुंजाइश नहीं है। इसकेअलावा आज के दौर में क्या रिलायंस के लिए प्रभावी एसेंबली लाइन खड़ी करना कोई कठिन काम है?आखिर आज पैसे से क्या नहीं खरीदा जा सकता। आज ज्ञान और तकनीकी योग्यता कारोबार में पहलेसे स्थापित लोगों का एकाधिकार नहीं है। सामरिक विशेषज्ञ मारूफ रजा से इतर कुछ सवाल ऐसे हैं जिनका जवाब देश की सुरक्षा और वायुसेना की मजबूती के मद्देनजर राफेल सौदे के आलोचकों की ओर से दिया जाना जरूरी है। यक्ष सवाल यह है कि आखिर वह क्या वजह थी जिसके चलते पांच साल की कसरत के बाद सौदे को रद्द कर दिया गया, जबकि वायुसेना को इन विमानों की बेहद जरूरत थी। क्या ये सही है कि सौदा करवाने के लिए मध्यस्थ के रूप में राहुल गांधी के जीजा रॉबर्ट वाड्रा के करीबी हथियार दलाल संजय भंडारी की ओर से दबाव बनाया गया था? यूपीए सरकार की बातचीत के दौरान ही राफेल निर्माता कंपनी डसॉल्ट ने एचएएल को साईड लाईन कर दिया था, क्योंकि 108 विमानों के विनिर्माण के लिए डसॉल्ट तीन करोड़ घंटे की समय सीमा चाहती थी, जबकि एचएएल ने इससे दुगने घंटों की जरूरत जताईथी, ये बात कहां तक सही है। क्या यह सही है कि सौदे की बातचीत में विमानों की कीमत में हर साल 3.5 फीसदी मंहगाई दर लागू करने की शर्त थी, जिससे प्रति विमान की कीमत में हर साल इसी दर से बढोतरी होनी थीऔर इससे विमान की कीमत बढ़ती, जिसे मोदी सरकार ने घटा कर 2 फीसदी करवाया। क्या यह सही है कि एयरक्राफ्ट प्लेटफार्म विमान यानी बिना हथियार और उपकरण के राफेल की कीमत सौदे की बातचीत शुरू किए जाते समय 2007 में 79 मिलियन यूरो और 2012 में बढक़र 100 मिलियन यूरो हो गई थी और अगर सौदा सिरे चढ़ता तो विमानों की खरीदी इसी कीमत 100 मिलियन यूरो में की जाती,जबकि मोदी सरकार ने सौदा यूपीए से सस्ते में 91 मिलियन यूरो में किया?क्यों राहुल गांधी और सौदे के दूसरे आलोचक 2007 के बिना हथियार व उपकरण वाले विमान की कीमत की तुलना हथियार,उपकरण व अत्याधुनिक तकनीकी वाले रेडी टू फ्लाई विमान की कीमत से कर रहे हैं जो हथियार, उपकरण और तकनीकी के अनुरूप बढ़ती है। क्या यह सही नहीं है कि डसॉल्ट को भारत में राफेल के विनिर्माण के लिए अपने साझीदार को चुनने का विशेषाधिकार है और इसमें भारत सरकार का कोई दखल नहीं है। क्या ये सही नहीं कि टीएमटी यानी प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर कभी बात ही नहीं हुई, सिर्फ भारत में एसेंबलिंग की बात हुई थी। आलोचकों को यह भी बताना चाहिए कि जब राफेल पूरी तरह फ्रांस में ही रेडी टू फ्लाई की हालत में बन कर आएंगे तो उसमें अंबानी की कंपनी की साझेदारी कैसे मुमकिन हो सकती है। मदन अरोड़ा, स्वतंत्र पत्रकार
राफेल डील को लेकर लगातार मोदी विरोधी जिसमें राहुल और कांग्रेस शामिल हैं अपने सियासी फायदे और हथियारों के दलालों,दुश्मन देशों को इससे फायदा पहुंचाने का काम कर रहे हैं। रिटायर्ड ब्रिगेडियर हर्ष कक्कड़ के अनुसार राफेल डील को लेकर झूठ फैला वायुसेना को कमजोर करने का कुत्सित प्रयास किया जा रहा है।कक्कड़ ने अपनी रिपोर्ट मेंद्धड्डद्य से डसाल्ट कंपनी की बातचीत खत्म होने, अबांनी को लेकर किये जा रहे झूठे आरोपों सभी का बिंदुवार बताते हुए डील को पारदर्शी और यूपीए की तुलना में सस्ता बताया था।अब बेबाक राय रखने वाले एक और सामरिक विशेषज्ञ मारूफ रजा की रिपोर्ट सामने आई है।रजा ने राफेल को लेकर लगाए जा रहे आरोपों को पूरी तरह नकारते हुए कहा है कि डील के आलोचक आरोप लगा रहे हैं कि इन विमानों का अंतिम सौदा यूपीए सरकार के समय हुई बातचीत से अधिक में किया गया है जबकि वास्तव में ठ्ठस्रड्ड का अंतिम सौदा जिस पर हस्ताक्षर किए गए, यूपीए की अपेक्षा सस्ता है। वायुसेना का कोई भी अधिकारी इस बात की पुष्टि कर देगा कि किसी लड़ाकू विमान की कीमत पूरी तरह से हथियारों से लैस विमान की पूरी कीमत का एक हिस्सा होती है।क्योंकि इसमें लैस होने वाले अस्त्र शस्त्र विमान को युद्ध के योग्य बनाते हैं।कांग्रेस नेता इससे वाकिफ हैं ।रजा के अनुसार कांग्रेस एयरक्राफ्ट प्लेटफार्म विमान का ढांचा जिसमें हथियार और उपकरण न लगे हों की शुरुवाती कीमत द्मद्ब तुलना ठ्ठस्रड्ड के हथियारों और उपकरणों से लैस रेडी टू फ्लाई विमानों से कर रही है जो पूरी तरह से गलत और लोगों को दिग्भर्मित करने वाली है।हकीकत यह है कि ठ्ठस्रड्ड ने जो एयरक्राफ्ट प्लेटफार्म की खरीद की है वह यूपीए से सस्ते हैं।रजा के अनुसार डसाल्ट ने आश्वस्त किया है कि हर समय राफेल के बेड़े के७५ फीसदी विमान उड़ान की स्थिति में रहेंगे जो यूपीए डील में नहीं था।इसकी मौजूदा सुखाई से करें तो उसके बेड़े के६० फीसदी विमान उड़ान की स्थिति में रहते हैं।रजा के अनुसार विमानों से जुड़ी अतिरिक्त प्रोधोगिकी और क्षमता को सार्वजनिक करने की मांग सियासी दबाव बनाने के लिए है।ऐसा करने से भारत के लिए जोड़ी गई विशेष क्षमताओं का सबको पता चल जाएगा जो देश हित में नहीं है।रजा ने पूछा है आखिर विपक्षी दल किस बात पर शोर मचा रहे हैं।क्या हथियारों का कोई डीलर या निर्माता और राजनीतिकों का गठजोड़ विपक्ष को शह दे रहा है।या फिर यह सिर्फ बोफोर्स घोटाले के प्रेत से छुटकारा पाने की कुत्सिस कोशिश हैं। रजा के अनुसार जहां तक अंबानी की कंपनी की बात हैउसे फायदा पहुंचाने की बात है इन विमानों को भारत में जोड़ने या उनके निर्माण करने के बारे में अब तक कोई समझौता नहीं हुआ है।जब ऐसी नौबत आएगी तो यह निर्माता कंपनी का विशेषाधिकार है कि वह अपना सहयोगी चुने और तब यह अम्बानी की कंपनी होगी या कोई और समय बताएगा।रजा के अनुसार मौजूदा दोनों सरकारों के बीच हुए सौदे में किसी भारतीय या दलाल के होने का तो सवाल ही नहीं होता।रजा के अनुसार जो अंबानी के विमान बनाने को लेकर सवाल उठा रहे हैं आज के दौर में क्या रिलाएंस के लिए प्रभावी असेम्बली लाइन खड़ी करना कोई कठिन काम नहीं है।आखिर आज पैसे से क्या नहीं बनाया जा सकता।रजा के अनुसार जब दो सरकारों के बीच सौदा होता है तो दलालोंके लिए कोई अवसर नहीं रह जाता।यहां गौर तलब है कि राफेल से जुड़ी ऑफसेट डील के लिए२००७ से पार्टनर की खोज के लिए यूपीए सरकार के दौरान मध्यस्थों के साथ बातचीत की गई थी।इसमें शद्बह्य नाम की दागी फर्म भी शामिल थी।इसके प्रमोटर संजय भंडारी के राहुल गांधी के जीजा रॉबर्ट वाड्रा के साथ संपर्क थे।इकोनॉमिक्स टाइम्स के अनुसार भंडारी ने डील हासिल करने के लिए दबाव भी डलवाया था।भंडारी हथियारों का दलाल है और हथियार तस्करी में नाम आने के बाद वह देश छोड़ कर भाग गया था।डसाल्ट के पास अपना पार्टनर चुनने का अधिकार था।इसलिए इस आशंका को नकारा नहीं जा सकता कि मोदी की हथियारों में दलालों की भूमिका खत्म कर दिए जाने से खफा हथियार दलालों की लॉबी इस दुष्प्रचार के पीछे काम कर रही है मदन अरोड़ा, स्वतंत्र पत्रकार
ऐसा क्या होगया जो कर्नाटक विधानसभा चुनाव के समय आस्था और धर्म को नीजि मामला बताने वाले राहुल गांधी और कांग्रेस को नीजि धार्मिक कैलाश यात्रा की मार्केटिंग करनी पड़ रही है। राहुल ने धर्म और आस्था को नीजि मामला बताते हुए कहा था कि वे पक्के शिव भक्त हैं और उनकी दादी व पिता जी भी शिव भक्त थे, पर वे इसका प्रचार नहीं करते। अपने कथन के विपरित उन्होंने न केवल अपनी कैलाश यात्रा को लेकर लगातार ट्वीट किए , कांग्रेस ने यात्रा के वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर करते हुए यहां तक दावा किया कि राहुल ने 13 घंटे लगातार पैदल चल करीब 35 किलोमीटर की यात्रा तय की। यात्रा के दौरान काठमांडू के एक होटल वूटू में मांसाहारी खाना खाने की नेपाली मीडिया में खबरें आने के बाद जब इस पर विवाद खड़ा हुआ तो कांग्रेस ने भाजपा की निंदा करते हुए कह डाला कि भाजपा राहुल गांधी की कैलाश मान सरोवर यात्रा में विघ्न पैदा करना चाहती है. ये देव और दानवों की लड़ाई है. एबीपी न्यूज चैनल ने राहुल और उनकी टीम को खाना परोसने वाले वेटर से बात कर खबर की पुष्टि की थी। वेटर ने एबीपी न्यूज को बताया, राहुल ने नॉनवेज ऑर्डर किया । रेस्टोरेंट में उन्होंने नेवारी डिश खाई जिसके तहत उन्होंने चिकन मोमो, चिकन कुरकुरे और बंदेल की डिश ऑडर की थी. हालांकि विवाद बढ़ने के बाद रेस्टोरेंट ने इस खबर को गलत बताया । कांग्रेस को लगा कि यात्रा के दौरान मांसाहारी खाना खाने को लेकर अगर विवाद बढ ग़या तो राहुल गांधी को हिन्दू और पक्का शिव भक्त साबित करने की कोशिशों को पलीता लग सकता है। इसलिए उसने विवाद खड़ा करने के नाम पर राहुल को देव और भाजपा को दानव बता डैमेज कंट्रोल की कोशिश की। आखिर चुनाव आने पर ही क्यों नेताओं को भगवान और मंदिर की याद आती है। भाजपा पर आरोप लगाया जाता है कि उसे चुनाव आने पर ही राम मंदिर याद आता है। भाजपा पर कांग्रेस धर्म के नाम पर ध्रूवीकरण की राजनीति करने और लोगों को बांटने का आरोप भी लगाती है। सवाल उठ रहा है कि क्या कांग्रेस भाजपा के नक्शेकदम पर चल राहुल की ताजपोशी करवाना चाहती है। कैलाश यात्रा की मार्केटिंग से तो कम से कम यही लग रहा है। कांग्रेस के बयानों से लग रहा है कि वह राहुल गांधी को मोदी से बड़ा भक्त और हिन्दू साबित करना चाह रही है। रणदीप सुरजेवाला का राजीव गांधी और राहुल गांधी को पक्का शिव भक्त व ब्राह्मण बता कांग्रेस को ब्राह्मण पार्टी साबित करने की कवायद से तो यही संदेश जा रहा है। यक्ष सवाल है कि क्या राहुल हिन्दू चरित्र से 2019 का चुनाव जीतेंगे? ऐसे में बंद कमरे में मुस्लिम बुद्धिजीवियों को दिलाए गए भरोसे और मुस्लिम पार्टी बता उनका दिल जीतने के प्रयासों का क्या होगा । कहीं पेट वाले की आस में बाहर वाला ही हाथ से न निकल जाए। मुस्लिम नेताओ की आ रही प्रतिक्रियाओं से तो यही लग रहा है कि कहीं कांग्रेस की हालत न माया मिली न राम वाली न हो जाये। कांग्रेस को ब्राह्मणवादी पार्टी बताने से मुस्लिमों का भरोसा राहुल से उठने लगा है और हिन्दू उन पर कितना भरोसा करेगा भविष्य के गर्भ में है। हिन्दुओं के मन में उनके हिन्दू प्रेम को लेकर आशंकाएं हैं। सब से बड़ा सवाल तो यही है कि लोकसभा चुनाव हारने और एके एंटोनी की रिर्पोट आने के बाद हिन्दू बने राहुल पर भरोसा किया जा सकता है? ये सवाल इसलिए उठ रहा है कि कुछ दिनों पूर्व ही राहुल अपने को मुस्लिमों का शुभचिंतक और कांग्रेस को मुस्लिम पार्टी बता चुके हैं। सवाल ये भी है कि राहुल हिन्दू हैं पर परिवार में कभी हिन्दू पर्व मनाते नहीं दिखे। वे शिव भक्त और ब्राह्मण हैं पर उनके घर में हिन्दू उपासना स्थल यानि मंदिर नहीं है। वे जनेऊधारी ब्राह्मण पर मांसाहारी हैं। सोशल मीडिया पर पूछा जा रहा है कि वे अपने दादा और पिता का श्राद्ध क्यों नहीं मनाते। आस्था और धर्म दो अलग -अलग विषय हैं। राम केसाथ रहीम का स्मरण किया जाता है। रहीम मुसलमान थे पर हिन्दू धर्म के प्रति उनकी आस्था थी। बड़ी संख्या में हिन्दू अजमेर की दरगाह जाते हैं, इससे वे मुसलमान नहीं बन जाते। राहुल गांधी की हिन्दू धर्म और शिव के प्रति आस्था पर सवाल नहीं उठाया जा सकता पर पारसी फिरोज जहांगीर के पोते के हिन्दू और ब्राह्मण होने पर तो लोग और विपक्षी सवाल उठाएंगे ही । यक्ष सवाल यही है कि राजनीतिक पार्टियां चुनाव आने पर ही धर्म को चुनावी मुद्दा क्यों बनाती हैं। क्यों भाजपा को चुनाव के समय राम मंदिर की याद आती है। मदन अरोड़ा,स्वतंत्र पत्रकार
इंजिनियरिंग के छात्रों ने 2013 में बनाया था इसका प्रोजेक्ट नाले की गैस पर चाय बनाने को लेकर मोदी विरोधी लगातार उन पर निशाना साधते आ रहे हैं और कई यह सवाल भी उठा रहे हैं कि यदि ऐसा संभव है तो मोदी इसे बड़े स्तर पर लागू क्यों नहीं कर रहे । मुझे नहीं लगता कि नई जानकारी सामने आने के बाद मोदी को निशाना बनाना बंद कर दिया जाएगा और इसका मजाक बनाने वाले देश से माफी मांगेगे। इसे बनाने वाले हैं साहिबाबाद के रामू चायवाला। नाले की गैस से चाय बनाकर रामू फेमस हो रहे हैं तो दूसरी ओर उनके पास ग्राहकों की भीड़ भी बढ़ रही है। इंद्रप्रस्थ इंजिनियरिंग कॉलेज, साहिबाबाद के सामने से सूर्य नगर का नाला निकल रहा है। कड़कड़ मॉडल निवासी रामू बताते हैं कि रोज सुबह ७ बजे वह अपनी साइकल पर घर से चूल्हा और अन्य सामान लेकर निकलते हैं। रेहड़ी पर पहुंचते ही चाय बनाने का सिलसिला शुरू होता है। उन्होंने कहा कि वह इस जगह पर पहले से चाय बनाते आ रहे हैं। पहले महीने में ५ हजार रुपये तक कमाई होती थी, जिसमें से १२०० रुपये सिलेंडर पर ही खर्च हो जाते थे। कॉलेज के छात्रों की मदद से उन्होंने यहां नाले की गैस से चाय बनाना शुरू किया। इससे उनका एलपीजी का १२०० रुपये का खर्च तो बचा ही। १० दिन में ही ५ हजार रुपये की कमाई भी हो गई है। पहले नाले की गैस की चाय सुनकर लोग यहां आने में कतराते थे, लेकिन पीएम के भाषण के बाद यहां लोग आने लगे हैं। साथ ही उनकी प्रसिद्धि भी मिल रही है। ऐसे बनी नाले से गैस इसकी कहानी शुरू होती है इंद्रप्रस्थ इंजिनियरिंग कॉलेज से, जहां बी.टेक के दो छात्र अभिषेक वर्मा और अभिनेंद्र पटेल हॉस्टल की छत से रोज सूर्यनगर के नाले में गैस के बुलबुले उठते देखते थे। उन्होंने सोचा कि इस गैस को कुकिंग में प्रयोग कर सकते हैं। अभिषेक ने बताया कि गैस क्रोमोटॉग्रफी से पता चला कि नाला करीब ६० से ७५ प्रतिशत मिथेन गैस उगलता है। इसे इकट्ठा करने के लिए लोहे के केस में छह बड़े ड्रम लगाए गए। इन सभी से जुड़ी एक पाइपलाइन गैस स्टोव तक आती है और कुकिंग के लिए ईंधन का काम करती है। छात्रों ने यह प्रॉजेक्ट साल २०१३ में तैयार कर लिया था और बाकायदा कुकिंग में इस गैस के प्रयोग की प्रदर्शनी भी लगाई थी। इस दौरान यहां मौजूद एक चाय विक्रेता शिव प्रसाद ने चाय बनाकर भी दिखाई थी, हालांकि कुछ दिन बाद जीडीए टीम ने इस प्रॉजेक्ट को खतरा बताकर यहां से हटवा दिया था। पहले कहा कबाड़, अब मदद की बहार साल २०१४ में जीडीए ने इस प्रॉजेक्ट को कबाड़-यूजलेस बताकर हटवा दिया था, लेकिन अब मामला सुर्खियों में आने के बाद छात्रों को इसके लिए सराहना मिल रही है। कॉलेज प्रशासन के अनुसार इसे बड़े स्तर पर तैयार करने के लिए एमएसएमई की ओर से मदद मिल रही है व वर्कशॉप प्लान करने की तैयारी की जा रही है। एसडीएम प्रशांत तिवारी ने भी छात्रों की सराहना की है। छात्र अब अगला प्रॉजेक्ट वसुंधरा मेन नाले पर तैयार करने की योजना बना रहे हैं और गैस के व्यापक प्रयोग के लिए भी जागरूक करेंगे। यह जानकारी आने के बाद भी अगर कोई मोदी को इस मुद्दे पर निशाना बना उनका मजाक उडा़ता है तो जाहिर है कि उसे सच्चाई से कोई लेना देना नहीं केवल देश के प्रधानमंत्री का मजाक उड़ाना ही मकसद है। मदन अरोड़ा, स्वतंत्र पत्रकार
आगामी लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मात देने के लिए महागठबंधन बनाने की कोशिश को करारा झटका लगा है. यह महागठबंधन बनने से पहले ही बिखर गया है. जहां एक ओर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने महागठबंधन से अलग चुनाव लड़ने का ऐलान किया, तो दूसरी ओर राज्यसभा के उपसभापति चुनाव में विपक्षी दलों का बिखराव साफ देखने को मिला.; यही नजारा सोकसभा में मोदी सरकार के खिलाफ पेश अविश्वास प्रस्ताव के समय देखने को मिला था, जब कई प्रमुख विरोधी दलों ने प्रस्ताव के विरोध में खड़े हो कांग्रेस के साथ नहीं जाने के साफ संकेत दिए। कई विपक्षी दल महागठबंधन में शामिल होकर साल2019 का लोकसभा चुनाव लड़ने के मूड में नजर नहीं आ रहे हैं. आम आदमी पार्टी के अलावा एआईएडीएमके, टीआरएस और बीजेडी जैसे दल भी कांग्रेस के साथ आते नहीं दिख रहे हैं. एआईएडीएमके, टीआरएस और बीजेडी ने राज्यसभा उपसभापति चुनाव में एनडीए के हरिवंश नारायण सिंह के पक्ष में वोट करके एक बार फिर यह साबित भी कर दिया है. इतना ही नहीं, आम आदमी पार्टी, वाईएसआर कांग्रेस, पीडीपी ने राज्यसभा उपसभापति चुनाव की वोटिंग से खुद को अलग रखा. इन दलों के सदन के वॉक आउट करने से साफ संकेत है कि वे विपक्ष में रहते हुए भी कांग्रेस के साथ नहीं है. मालूम हो कि साल 2019 के लोकसभा चुनाव में पीएम मोदी को हराने के लिए सभी विपक्षी दलों को एकजुट करने की कोशिश पिछले कुछ समय से चल रही है. कर्नाटक चुनाव के बाद मुख्यमंत्री कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में सभी विपक्षी पार्टियां एक मंच पर आई थीं. यह पहली बार था, जब मोदी सरकार के खिलाफ सभी विपक्षी दल एकजुट नजर आए थे. कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में आम आदमी पार्टी के संयोजक केजरीवाल भी शामिल हुए थे. इसके बाद जब आरजेडी नेता और बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने दिल्ली के जंतर मंतर में मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड के खिलाफ धरना प्रदर्शन किया, तब भी ज्यादातर विपक्षी पार्टियां एक साथ नजर आए. इसमें कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, केजरीवाल, सीताराम येचुरी समेत तमाम विपक्षी नेता शामिल रहे. हालांकि राहुल गांधी और केजरीवाल ने एक साथ मंच साझा नहीं किया था. इन घटनाओं के बाद से माना जा रहा था कि आगामी चुनाव में सभी राजनीतिक पार्टियां मिलकर पीएम मोदी और बीजेपी के सामने कड़ी चुनौती पेश करेंगे, लेकिन अब यह महागठबंधन बनने से पहले ही बिखर गया है. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ऐलान कर दिया है कि वे साल २०१९ में होने वाले लोकसभा चुनाव में किसी भी तरीके के गठबंधन का हिस्सा नहीं होंगे.केजरीवाल ने हरियाणा के जींद जिले में कहा कि आम आदमी पार्टी हरियाणा में विधानसभा चुनाव के साथ ही लोकसभा चुनाव की सभी सीटों पर चुनाव लड़ेगी. यह तर्क पहली नजर में आकर्षित करता है कि अगर भाजपा एवं राजग के खिलाफ हर क्षेत्र में विपक्ष का एक ही उम्मीदवार उतारा जाये, तो विजय प्राप्त की जा सकती है। उसी तरह इस तर्क को काटना भी मुश्किल है कि अगर भाजपा और राजग से परे सारे दल एक साथ आ जाएं तो, वाकई 2019 का किला फतह हो जाएगा। किंतु क्या यह इतना ही आसान है। इसका उतर पाने के लिए ममता बनर्जी और उनके जैसे कुछ नेताओं के उत्साह को राजनीतिक हकीकत के आईने में देखना होगा। कोलकाता में ममता ने स्वयं कहा है कि पश्चिम बंगाल में टीएमसी अकेले चुनाव लड़ेगी। अगर अपने प्रदेश में उनका रवैया ऐसा है तो फिर अन्य प्रदेशों के नेतृत्व को वे कैसे तैयार कर पाएंगी। केवल भाजपा ही नहीं, कांग्रेस और वामदल भी ममता पर पश्चिम बंगाल में राजनीतिक आतंक पैदा कर लोकतंत्र का गला घोंटने का आरोप लगाते हैं। ऐसे माहौल में इनके साथ गठबंधन की कितनी संभावना बन सकती है, इसका अंदाजा सहज लगाया जा सकता है। साफ है कि सिर्फ मोदी विरोध के आधार पर निर्मित होने वाली छोटी मोटी एकता बहुत ज्यादा असरकारक नहीं हो सकती। अपना अस्तित्व बचाने के लिए भले ही कुछ दल किसी राज्य विशेष में एक साथ जरूर आ सकते हैं, लेकिन चुनाव पूर्व महागठबंधन बनना मुश्किल है। मदन अरोड़ा, स्वतंत्र पत्रकार
असम में नैशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (एनआरसी) के फाइनल ड्राफ्ट में 40 लाख लोगों के नाम शामिल न किए जाने पर सड़क से लेकर संसद तक संग्राम मचा है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुआई में विपक्षी दल जहां सरकार पर हमलावर हैं, वहीं बीजेपी इसे एक बड़ा कदम बता रही है। 1971 में बांग्लादेश की स्थापना के बाद भारत और बांग्लादेश के तत्कालीन प्रधानमंत्रियों के बीच फरवरी 1972 में एक समझौता हुआ था. जिसके तहत भारत सरकार ने 30 सितंबर 1972 को एक सर्कुलर जारी कर कहा था कि 25 मार्च 1971 से पहले वे बांग्लादेशी नागरिक जो भारत आए थे उनकी पहचान की जाएगी. लेकिन वे बांग्लादेशी नागरिक जो इसके बाद आए थे उन्हें अपने मुल्क वापस भेजा जाएगा. 15 अगस्त 1985 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने असम अकॉर्ड को डिक्लेयर किया, लेकिन इसके बाद इसे लागू करने की हिम्मत नहीं जुटाई जा सकी। 1985 में राजीव सरकार द्वारा साइन किए गए असम अकॉर्ड में आखिर था क्या और एनआरसी से इसका क्या कनेक्शन है... देश में असम ही एक मात्र राज्य है जहां सिटिजनशिप रजिस्टर की व्यवस्था लागू है। असम में सिटिजनशिप रजिस्टर देश में लागू नागरिकता कानून से थोड़ा अलग है। प्रदेश में 1985 से लागू असम समझौते के अनुसार, 24 मार्च 1971 की आधी रात तक असम में प्रवेश करने वाले लोग और उनकी अगली पीढ़ी को भारतीय नागरिक माना जाएगा । बांग्लादेशी घुसपैठ को लेकर राजीव गांधी ने एजीपी से समझौता किया था । असम में 1980 में बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा हावी था। पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश बनने के बाद से असम में बांग्लादेशी घुसपैठियों का अवैध प्रवेश चल रहा था। घुसपैठ के मुद्दे ने राज्य की राजनीति में भी जोर पकड़ा और सिटिजनशिप रजिस्टर अपडेट करने को लेकर आंदोलन खड़ा हो गया। इसका नेतृत्व अखिल असम छात्र संघ (आसू) और असम गण परिषद ने किया था। आंदोलन की आंच राष्ट्रीय राजनीति तक भी पहुंच गई और 1985 में केंद्र की तत्कालीन राजीव गांधी सरकार और असम गण परिषद और अन्य आंदोलनकारी नेताओं के बीच असम समझौता हुआ । राजीव ने अवैध बांग्लादेशियों को बाहर करने का आश्वासन दिया था । जिसमें स्पष्ट तौर पर कहा गया कि 1 जनवरी 1966 से पहले आने वाले शरणार्थी मतदाता सूची में बने रहेंगे. वहीं 1 जनवरी 1966 के बाद और 24 मार्च 1971 से पहले आने वाले सभी विदेशी नागरिकों को फॉरेनर्स एक्ट और फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ऑर्डर 1964 से गुजरना होगा. यदि वे पकड़े जाते हैं तो मतदाता सूची से उनके नाम हटा दिए जाएंगे और उन्हे विदेशी नागरिक के तौर पर रजिस्टर किया जाएगा. वहीं 25 मार्च 1971 के बाद आने वालों की पहचान कर उनके नामों को मतदाता सूची से हटाने के बाद इन्हे देश से वापस भेजा जाएगा. बाद के सालों में यह मामला लटकता चला गया। इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। असम पब्लिक वर्क नाम के एनजीओ सहित कई अन्य संगठनों ने 2013 में इस मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। असम के विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी ने इसे एक बड़ा मुद्दा बनाया था। 2015 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और निगरानी में यह काम शुरू हुआ और 2018 जुलाई में फाइनल ड्राफ्ट पेश किया गया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने, जिन 40 लाख लोगों के नाम लिस्ट में नहीं हैं, उन पर किसी तरह की सख्ती बरतने पर फिलहाल के लिए रोक लगाई है। इस मसौदे में जिन लोगों के नाम नहीं आये हैं उन्हें लिस्ट में नाम जुड़वाने के लिये एक मौका और दिया गया है। वे 30 सितंबर तक निवासी होने का प्रमाण पत्र जमा करवा कर अपने नाम लिस्ट में जुड़वा सकते हैं। इसकी अंतिम लिस्ट दिसंबर 2018 मेंप्रकाशित की जायेगी। इसके बाद भी उन्हें एक अवसर और उपलब्ध होगा। वे फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में मामले को ले जा सकते हैं। मदन अरोड़ा, स्वतंत्र पत्रकार
सुप्रीम कोर्ट की सख्त हिदायत और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चेतावनी के बाद भी देश में मॉब लिंचिंग की घटनायें रूकने का नाम नहीं ले रही हैं जो चिंता की बात है। 20 जुलाई की रात को अलवर जिले में हरियाणा के एक युवक की गो तस्करी के शक में पीट पीट कर हत्या कर दी गई। मॉब लिचिंग के पिछले दो माह में 17 मामले हो चुके हैं, जिनमें 23 लोगों को पीट-पीट कर मार डाला गया। देश के विभिन्न हिस्सों में संदेह के आधार पर अनेक लोगों को पीट- पीट कर मार डालने की घटनाओं में व्हाट्सएप के जरिये अफवाह फैलाने की बात समान रूप से सामने आई हैं। इससे पहले सांप्रदायिक तनाव की घटनाओं में सोशल मीडिया के दुरूपयोग की बातें सामने आ चुकी हैं। ऐसी घटनाओं में तेजी आने के बाद केंद्रीय सूचना प्रोद्योगिकी मंत्री रवि शंकर प्रशाद ने व्हाट्सएप को चेतावनी दी है कि वह जवाबदेही के साथ पेश आये और सुरक्षा के पहलू पर ध्यान दे। इसके जवाब में व्हाट्सएप ने आश्वस्त किया है कि वह कुछ नये फीचर ला रहा है, जिनसे पता चल सकेगा कि जो संदेश प्राप्त हुआ है, उसे भेजने वाले ने तैयार किया है या उसे सिर्फ फॉरवर्ड किया गया है। तकनीक का दुरूपयोग नया नहीं है, पर चूंकि व्हाट्सएप के जरिये किसी व्यक्ति या समूह को सीधे ही सूचनाएं, संदेश, तस्वीरें यहां तक कि वीडियो भी भेजे जा सकते हैं, तो इसका असर भी व्यापक होता है। इस माध्यम की एक बड़ी खामी यह भी है कि इसमें कोई व्यक्ति या पक्ष किसी दूसरे व्यक्ति या पक्ष के बारे में बिना उसका पक्ष जाने गलत जानकारियां प्रसारित कर सकता है। यह कितना खतरनाक हो सकता है, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि एक याचिका पर जल्द सुनवाई से इंकार करने पर व्हाट्सएप पर प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ ही अभियान छेड़ दिया गया। इस पर न्यायाधीश खानविलकर को कहना पड़ा कि फैसले किसी के पक्ष में आते हैं और किसी के खिलाफ, ऐसे में यदि जिसे राहत न मिले और वह प्रधान न्यायाधीश को निशाना बनाने लगे, तो यह न्यायपालिका के लिए अच्छा नहीं होगा। यदि झूठी खबरों और अफवाहों पर देश की सर्वोच्च अदालत को अपना पक्ष रखना पड़े, तो समझा जा सकता है कि मामला कितना गंभीर है। यह समझने की भी जरूरत है कि फेसबुक या व्हाट्सएप संदेश भेजने के सिर्फ माध्यम हैं, स्त्रोत नहीं। असल मामला स्त्रोत का है, जहां से ऐसी अफवाहें, फर्जी खबरें या सूचनाएं तैयार की जाती हैं और फैलाई जाती हैं। जाहिर है, व्हाट्सएप में सिर्फ तकनीकी बदलाव करने भर से काम नहीं चलेगा, इसके लिए व्यापक जागरूकता की भी जरूरत है। आखिर धुले की घटना में खुद पुलिस मान रही है कि गिरफ्तार किए गए अनेकों लोग तो बिना कुछ जाने ही दूसरे लोगों के साथ हिंसा में शामिल हो गये थे। सबसे हैरान करने वाली बात है कि आंध्र प्रदेश से लेकर त्रिपुरा, झारखंड से लेकर महाराष्ट्र तक, सभी ऐसी हत्याओं के पीछे न सिर्फ कारण एक ही थे बल्कि वॉट्सऐप से ऐसी अफवाह भी एक ही तरीके से फैलाई भी गई। मतलब इन सभी हत्याओं के पीछे मॉडस-ऑपरेंडी एक ही रहा। ऐसे में सबसे बड़ी चिंता इस बात को लेकर है कि वॉट्सऐप संदेश को अफवाह के रूप में देश के अलग-अलग हिस्सों में खास साजिश के तरह फैलाया जा रहा है। इसके लिए खास नेटवर्क है। हालांकि अभी तक जांच में कड़ी जुड़ने के संकेत नहीं मिले हैं। अब तक आए तमाम मर्डर में अफवाह का पैटर्न एक ही तरह का दिखा है। इलाके में एक वॉट्सऐप मेसेज फॉरवर्ड कर वायरल होता है, जिसमें कहा जाता है कि उनके इलाके में दूसरे प्रदेश से आया एक बच्चा चुराने वाला गिरोह सक्रिय है। वह बच्चों की चोरी कर उसके अंग को बेचता है। विपक्ष इसे लेकर लगातार मोदी सरकार पर हमलावर है और संसद में इस मुद्दे पर सरकार को घेर इसके खिलाफ सख्त कदम उठाये जाने की मांग भी की। अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने भी इन पर चिंता जताते हुए राज्य सरकारों से ऐसी घटनाओं को गंभीरता से लेने और रोकने की अपील की है। पर क्या इनको रोक पाना इतना आसान है। दरअसल मॉब लिंचिंग के इस तरह के मामलों को केवल कानून व्यवस्था के जरिये नहीं रोका जा सकता । इसके लिये जरूरत है लोगों को जागरूक कर यह समझाने की है कि अफवाहों के चलते वे कानून को अपने हाथ में न लें । किसी तरह का मामला सामने आने पर संदिग्ध लोगों को पकड़ कर पुलिस के हवाले करें, उनको पकड़ पीट पीट कर मारने से बचें। जरूरत इस बात की भी है कि सियासी पार्टियां अपने राजनीतिक फायदे के लिए इन्हें हवा देने से बचें। सोशल मीडिया पर सक्रिय लोग ऐसे मेसेज फॉरवर्ड करने से बचें। मदन अरोड़ा, स्वतंत्र पत्रकार

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