taaja khabar....पोखरण में एक और कामयाबी, मिसाइल 'हेलिना' का सफल परीक्षण.....अगले 10 साल में बाढ़ से 16000 मौतें, 47000 करोड़ की बर्बादी: एनडीएमए....बड़े प्लान पर काम कर रही भारतीय फौज, जानिए क्या होंगे बदलाव...शूटर दीपक कुमार ने सिल्वर पर किया कब्जा....शेयर बाजार की तेज शुरुआत, सेंसेक्स 155 और न‍िफ्टी 41 अंक बढ़कर खुला....राम मंदिर पर बोले केशव मौर्य- संसद में लाया जा सकता है कानून...'खालिस्तान की मांग करने वालों के दस्तावेजों की हो जांच, निकाला जाए देश से बाहर'....
आगामी लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मात देने के लिए महागठबंधन बनाने की कोशिश को करारा झटका लगा है. यह महागठबंधन बनने से पहले ही बिखर गया है. जहां एक ओर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने महागठबंधन से अलग चुनाव लड़ने का ऐलान किया, तो दूसरी ओर राज्यसभा के उपसभापति चुनाव में विपक्षी दलों का बिखराव साफ देखने को मिला.; यही नजारा सोकसभा में मोदी सरकार के खिलाफ पेश अविश्वास प्रस्ताव के समय देखने को मिला था, जब कई प्रमुख विरोधी दलों ने प्रस्ताव के विरोध में खड़े हो कांग्रेस के साथ नहीं जाने के साफ संकेत दिए। कई विपक्षी दल महागठबंधन में शामिल होकर साल2019 का लोकसभा चुनाव लड़ने के मूड में नजर नहीं आ रहे हैं. आम आदमी पार्टी के अलावा एआईएडीएमके, टीआरएस और बीजेडी जैसे दल भी कांग्रेस के साथ आते नहीं दिख रहे हैं. एआईएडीएमके, टीआरएस और बीजेडी ने राज्यसभा उपसभापति चुनाव में एनडीए के हरिवंश नारायण सिंह के पक्ष में वोट करके एक बार फिर यह साबित भी कर दिया है. इतना ही नहीं, आम आदमी पार्टी, वाईएसआर कांग्रेस, पीडीपी ने राज्यसभा उपसभापति चुनाव की वोटिंग से खुद को अलग रखा. इन दलों के सदन के वॉक आउट करने से साफ संकेत है कि वे विपक्ष में रहते हुए भी कांग्रेस के साथ नहीं है. मालूम हो कि साल 2019 के लोकसभा चुनाव में पीएम मोदी को हराने के लिए सभी विपक्षी दलों को एकजुट करने की कोशिश पिछले कुछ समय से चल रही है. कर्नाटक चुनाव के बाद मुख्यमंत्री कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में सभी विपक्षी पार्टियां एक मंच पर आई थीं. यह पहली बार था, जब मोदी सरकार के खिलाफ सभी विपक्षी दल एकजुट नजर आए थे. कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह में आम आदमी पार्टी के संयोजक केजरीवाल भी शामिल हुए थे. इसके बाद जब आरजेडी नेता और बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने दिल्ली के जंतर मंतर में मुजफ्फरपुर बालिका गृह कांड के खिलाफ धरना प्रदर्शन किया, तब भी ज्यादातर विपक्षी पार्टियां एक साथ नजर आए. इसमें कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, केजरीवाल, सीताराम येचुरी समेत तमाम विपक्षी नेता शामिल रहे. हालांकि राहुल गांधी और केजरीवाल ने एक साथ मंच साझा नहीं किया था. इन घटनाओं के बाद से माना जा रहा था कि आगामी चुनाव में सभी राजनीतिक पार्टियां मिलकर पीएम मोदी और बीजेपी के सामने कड़ी चुनौती पेश करेंगे, लेकिन अब यह महागठबंधन बनने से पहले ही बिखर गया है. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ऐलान कर दिया है कि वे साल २०१९ में होने वाले लोकसभा चुनाव में किसी भी तरीके के गठबंधन का हिस्सा नहीं होंगे.केजरीवाल ने हरियाणा के जींद जिले में कहा कि आम आदमी पार्टी हरियाणा में विधानसभा चुनाव के साथ ही लोकसभा चुनाव की सभी सीटों पर चुनाव लड़ेगी. यह तर्क पहली नजर में आकर्षित करता है कि अगर भाजपा एवं राजग के खिलाफ हर क्षेत्र में विपक्ष का एक ही उम्मीदवार उतारा जाये, तो विजय प्राप्त की जा सकती है। उसी तरह इस तर्क को काटना भी मुश्किल है कि अगर भाजपा और राजग से परे सारे दल एक साथ आ जाएं तो, वाकई 2019 का किला फतह हो जाएगा। किंतु क्या यह इतना ही आसान है। इसका उतर पाने के लिए ममता बनर्जी और उनके जैसे कुछ नेताओं के उत्साह को राजनीतिक हकीकत के आईने में देखना होगा। कोलकाता में ममता ने स्वयं कहा है कि पश्चिम बंगाल में टीएमसी अकेले चुनाव लड़ेगी। अगर अपने प्रदेश में उनका रवैया ऐसा है तो फिर अन्य प्रदेशों के नेतृत्व को वे कैसे तैयार कर पाएंगी। केवल भाजपा ही नहीं, कांग्रेस और वामदल भी ममता पर पश्चिम बंगाल में राजनीतिक आतंक पैदा कर लोकतंत्र का गला घोंटने का आरोप लगाते हैं। ऐसे माहौल में इनके साथ गठबंधन की कितनी संभावना बन सकती है, इसका अंदाजा सहज लगाया जा सकता है। साफ है कि सिर्फ मोदी विरोध के आधार पर निर्मित होने वाली छोटी मोटी एकता बहुत ज्यादा असरकारक नहीं हो सकती। अपना अस्तित्व बचाने के लिए भले ही कुछ दल किसी राज्य विशेष में एक साथ जरूर आ सकते हैं, लेकिन चुनाव पूर्व महागठबंधन बनना मुश्किल है। मदन अरोड़ा, स्वतंत्र पत्रकार
असम में नैशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (एनआरसी) के फाइनल ड्राफ्ट में 40 लाख लोगों के नाम शामिल न किए जाने पर सड़क से लेकर संसद तक संग्राम मचा है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुआई में विपक्षी दल जहां सरकार पर हमलावर हैं, वहीं बीजेपी इसे एक बड़ा कदम बता रही है। 1971 में बांग्लादेश की स्थापना के बाद भारत और बांग्लादेश के तत्कालीन प्रधानमंत्रियों के बीच फरवरी 1972 में एक समझौता हुआ था. जिसके तहत भारत सरकार ने 30 सितंबर 1972 को एक सर्कुलर जारी कर कहा था कि 25 मार्च 1971 से पहले वे बांग्लादेशी नागरिक जो भारत आए थे उनकी पहचान की जाएगी. लेकिन वे बांग्लादेशी नागरिक जो इसके बाद आए थे उन्हें अपने मुल्क वापस भेजा जाएगा. 15 अगस्त 1985 को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने असम अकॉर्ड को डिक्लेयर किया, लेकिन इसके बाद इसे लागू करने की हिम्मत नहीं जुटाई जा सकी। 1985 में राजीव सरकार द्वारा साइन किए गए असम अकॉर्ड में आखिर था क्या और एनआरसी से इसका क्या कनेक्शन है... देश में असम ही एक मात्र राज्य है जहां सिटिजनशिप रजिस्टर की व्यवस्था लागू है। असम में सिटिजनशिप रजिस्टर देश में लागू नागरिकता कानून से थोड़ा अलग है। प्रदेश में 1985 से लागू असम समझौते के अनुसार, 24 मार्च 1971 की आधी रात तक असम में प्रवेश करने वाले लोग और उनकी अगली पीढ़ी को भारतीय नागरिक माना जाएगा । बांग्लादेशी घुसपैठ को लेकर राजीव गांधी ने एजीपी से समझौता किया था । असम में 1980 में बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा हावी था। पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश बनने के बाद से असम में बांग्लादेशी घुसपैठियों का अवैध प्रवेश चल रहा था। घुसपैठ के मुद्दे ने राज्य की राजनीति में भी जोर पकड़ा और सिटिजनशिप रजिस्टर अपडेट करने को लेकर आंदोलन खड़ा हो गया। इसका नेतृत्व अखिल असम छात्र संघ (आसू) और असम गण परिषद ने किया था। आंदोलन की आंच राष्ट्रीय राजनीति तक भी पहुंच गई और 1985 में केंद्र की तत्कालीन राजीव गांधी सरकार और असम गण परिषद और अन्य आंदोलनकारी नेताओं के बीच असम समझौता हुआ । राजीव ने अवैध बांग्लादेशियों को बाहर करने का आश्वासन दिया था । जिसमें स्पष्ट तौर पर कहा गया कि 1 जनवरी 1966 से पहले आने वाले शरणार्थी मतदाता सूची में बने रहेंगे. वहीं 1 जनवरी 1966 के बाद और 24 मार्च 1971 से पहले आने वाले सभी विदेशी नागरिकों को फॉरेनर्स एक्ट और फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल ऑर्डर 1964 से गुजरना होगा. यदि वे पकड़े जाते हैं तो मतदाता सूची से उनके नाम हटा दिए जाएंगे और उन्हे विदेशी नागरिक के तौर पर रजिस्टर किया जाएगा. वहीं 25 मार्च 1971 के बाद आने वालों की पहचान कर उनके नामों को मतदाता सूची से हटाने के बाद इन्हे देश से वापस भेजा जाएगा. बाद के सालों में यह मामला लटकता चला गया। इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। असम पब्लिक वर्क नाम के एनजीओ सहित कई अन्य संगठनों ने 2013 में इस मुद्दे को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। असम के विधानसभा चुनाव में भी बीजेपी ने इसे एक बड़ा मुद्दा बनाया था। 2015 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और निगरानी में यह काम शुरू हुआ और 2018 जुलाई में फाइनल ड्राफ्ट पेश किया गया। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने, जिन 40 लाख लोगों के नाम लिस्ट में नहीं हैं, उन पर किसी तरह की सख्ती बरतने पर फिलहाल के लिए रोक लगाई है। इस मसौदे में जिन लोगों के नाम नहीं आये हैं उन्हें लिस्ट में नाम जुड़वाने के लिये एक मौका और दिया गया है। वे 30 सितंबर तक निवासी होने का प्रमाण पत्र जमा करवा कर अपने नाम लिस्ट में जुड़वा सकते हैं। इसकी अंतिम लिस्ट दिसंबर 2018 मेंप्रकाशित की जायेगी। इसके बाद भी उन्हें एक अवसर और उपलब्ध होगा। वे फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में मामले को ले जा सकते हैं। मदन अरोड़ा, स्वतंत्र पत्रकार
सुप्रीम कोर्ट की सख्त हिदायत और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चेतावनी के बाद भी देश में मॉब लिंचिंग की घटनायें रूकने का नाम नहीं ले रही हैं जो चिंता की बात है। 20 जुलाई की रात को अलवर जिले में हरियाणा के एक युवक की गो तस्करी के शक में पीट पीट कर हत्या कर दी गई। मॉब लिचिंग के पिछले दो माह में 17 मामले हो चुके हैं, जिनमें 23 लोगों को पीट-पीट कर मार डाला गया। देश के विभिन्न हिस्सों में संदेह के आधार पर अनेक लोगों को पीट- पीट कर मार डालने की घटनाओं में व्हाट्सएप के जरिये अफवाह फैलाने की बात समान रूप से सामने आई हैं। इससे पहले सांप्रदायिक तनाव की घटनाओं में सोशल मीडिया के दुरूपयोग की बातें सामने आ चुकी हैं। ऐसी घटनाओं में तेजी आने के बाद केंद्रीय सूचना प्रोद्योगिकी मंत्री रवि शंकर प्रशाद ने व्हाट्सएप को चेतावनी दी है कि वह जवाबदेही के साथ पेश आये और सुरक्षा के पहलू पर ध्यान दे। इसके जवाब में व्हाट्सएप ने आश्वस्त किया है कि वह कुछ नये फीचर ला रहा है, जिनसे पता चल सकेगा कि जो संदेश प्राप्त हुआ है, उसे भेजने वाले ने तैयार किया है या उसे सिर्फ फॉरवर्ड किया गया है। तकनीक का दुरूपयोग नया नहीं है, पर चूंकि व्हाट्सएप के जरिये किसी व्यक्ति या समूह को सीधे ही सूचनाएं, संदेश, तस्वीरें यहां तक कि वीडियो भी भेजे जा सकते हैं, तो इसका असर भी व्यापक होता है। इस माध्यम की एक बड़ी खामी यह भी है कि इसमें कोई व्यक्ति या पक्ष किसी दूसरे व्यक्ति या पक्ष के बारे में बिना उसका पक्ष जाने गलत जानकारियां प्रसारित कर सकता है। यह कितना खतरनाक हो सकता है, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि एक याचिका पर जल्द सुनवाई से इंकार करने पर व्हाट्सएप पर प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ ही अभियान छेड़ दिया गया। इस पर न्यायाधीश खानविलकर को कहना पड़ा कि फैसले किसी के पक्ष में आते हैं और किसी के खिलाफ, ऐसे में यदि जिसे राहत न मिले और वह प्रधान न्यायाधीश को निशाना बनाने लगे, तो यह न्यायपालिका के लिए अच्छा नहीं होगा। यदि झूठी खबरों और अफवाहों पर देश की सर्वोच्च अदालत को अपना पक्ष रखना पड़े, तो समझा जा सकता है कि मामला कितना गंभीर है। यह समझने की भी जरूरत है कि फेसबुक या व्हाट्सएप संदेश भेजने के सिर्फ माध्यम हैं, स्त्रोत नहीं। असल मामला स्त्रोत का है, जहां से ऐसी अफवाहें, फर्जी खबरें या सूचनाएं तैयार की जाती हैं और फैलाई जाती हैं। जाहिर है, व्हाट्सएप में सिर्फ तकनीकी बदलाव करने भर से काम नहीं चलेगा, इसके लिए व्यापक जागरूकता की भी जरूरत है। आखिर धुले की घटना में खुद पुलिस मान रही है कि गिरफ्तार किए गए अनेकों लोग तो बिना कुछ जाने ही दूसरे लोगों के साथ हिंसा में शामिल हो गये थे। सबसे हैरान करने वाली बात है कि आंध्र प्रदेश से लेकर त्रिपुरा, झारखंड से लेकर महाराष्ट्र तक, सभी ऐसी हत्याओं के पीछे न सिर्फ कारण एक ही थे बल्कि वॉट्सऐप से ऐसी अफवाह भी एक ही तरीके से फैलाई भी गई। मतलब इन सभी हत्याओं के पीछे मॉडस-ऑपरेंडी एक ही रहा। ऐसे में सबसे बड़ी चिंता इस बात को लेकर है कि वॉट्सऐप संदेश को अफवाह के रूप में देश के अलग-अलग हिस्सों में खास साजिश के तरह फैलाया जा रहा है। इसके लिए खास नेटवर्क है। हालांकि अभी तक जांच में कड़ी जुड़ने के संकेत नहीं मिले हैं। अब तक आए तमाम मर्डर में अफवाह का पैटर्न एक ही तरह का दिखा है। इलाके में एक वॉट्सऐप मेसेज फॉरवर्ड कर वायरल होता है, जिसमें कहा जाता है कि उनके इलाके में दूसरे प्रदेश से आया एक बच्चा चुराने वाला गिरोह सक्रिय है। वह बच्चों की चोरी कर उसके अंग को बेचता है। विपक्ष इसे लेकर लगातार मोदी सरकार पर हमलावर है और संसद में इस मुद्दे पर सरकार को घेर इसके खिलाफ सख्त कदम उठाये जाने की मांग भी की। अविश्वास प्रस्ताव पर बहस के दौरान प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने भी इन पर चिंता जताते हुए राज्य सरकारों से ऐसी घटनाओं को गंभीरता से लेने और रोकने की अपील की है। पर क्या इनको रोक पाना इतना आसान है। दरअसल मॉब लिंचिंग के इस तरह के मामलों को केवल कानून व्यवस्था के जरिये नहीं रोका जा सकता । इसके लिये जरूरत है लोगों को जागरूक कर यह समझाने की है कि अफवाहों के चलते वे कानून को अपने हाथ में न लें । किसी तरह का मामला सामने आने पर संदिग्ध लोगों को पकड़ कर पुलिस के हवाले करें, उनको पकड़ पीट पीट कर मारने से बचें। जरूरत इस बात की भी है कि सियासी पार्टियां अपने राजनीतिक फायदे के लिए इन्हें हवा देने से बचें। सोशल मीडिया पर सक्रिय लोग ऐसे मेसेज फॉरवर्ड करने से बचें। मदन अरोड़ा, स्वतंत्र पत्रकार
आजादी आसानी से नहीं मिलती, इसे हासिल करना पड़ता है। हमारे पूर्वजों ने इसके लिए लड़ाई लड़ी और हमारी पीढ़ी को एक स्वतंत्र राष्ट्र के नागरिक होने का अधिकार दिलाया। इसके लिए हमारे नेताओं और लोगों ने महान बलिदान दिए। ऐसे में, हम सभी के लिए यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि देश की क्षेत्रीय अखंडता को अक्षुण्ण रखा जाए। संविधान ने हमें कुछ निश्चित मौलिक अधिकार और आजादी दी है। चूंकि ये संविधान के मूलभूत ढांचे का हिस्सा हैं, इसलिए उन्हें संशोधित या बदला नहीं जा सकता। संविधान के अनुच्छेद 13 से लेकर अनुच्छेद 32 तक हमें बोलने, जीने, स्वतंत्रता और समानता सरीखे अधिकारों और आजादी की गारंटी दी गई है। हमारा संविधान नैतिक और वैधानिक तौर पर पवित्र है। इस उदार संविधान की रक्षा करना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है, जिसने हमें ये अधिकार दिए हैं। भारतीय संदर्भ में अगर खतरे की बात करें तो खतरा बाहर से है, खासकर हमारे पश्चिमी पड़ोसी से। जम्मू और कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है लेकिन इस पड़ोसी ने कभी भी इस हकीकत को स्वीकार नहीं किया और उसने पारंपरिक युद्ध का भी दुस्साहस किया। इसमें नाकाम होने के बाद वह भारत को अस्थिर करने के लिए राज्य प्रायोजित आतंकवाद का सहारा ले रहा है। स्वाभाविक है कि भारत की स्थिरता और अखंडता को सुनिश्चित करने की भावना देशभक्ति कहलानी चाहिए। क्या इसे लेकर दूसरा भी मत है? हालांकि, हाल के समय में एक परेशान करने वाला ट्रेंड देखने को मिल रहा है। वे जो देश की क्षेत्रीय अखंडता की हर हाल में रक्षा करना चाहते हैं और इसकी राह में आनेवाली हर चुनौतियों को दूर करना चाहते हैं, उन्हें कुछ खास तबकों द्वारा दकियानूस और कट्टरपंथी की संज्ञा दी जा रही है, उन्हें दक्षिणपंथी के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है। इसके विपरीत, जो लोग भारत की क्षेत्रीय अखंडता को कमजोर करना चाहते हैं और भारत को बांटने के लिए हिंसा को औजार के तौर पर इस्तेमाल करते हैं, लगातार देश को नीचा दिखाने की बातें करते हैं; उन्हें ऐक्टिविस्ट, प्रगतिशील और उदारवादी के तौर पर बताया जा रहा है। इस तरह का ठप्पा लगाना भ्रामक और गलत है। इसे देश की मौन दिखने वाली अधिसंख्य आबादी ने भी खारिज किया है। मिसाल के तौर पर, अपने देश के 2 तरह के लोगों को देखिए। एक तबका उन आतंकियों का है जो जम्मू और कश्मीर राज्य में हिंसा करते हैं, राज्य को नष्ट करना चाहते हैं और बेगुनाहों की हत्या करते हैं। वे राज्य के आर्थिक विकास को कुंद करते हैं। एक ऐसा क्षेत्र जिसे सबसे ज्यादा प्रति व्यक्ति आय के लिए जाना जाना चाहिए था, जिसे अनगित बादशाहों और कवियों द्वारा धरती का स्वर्ग बताया गया, उसे ये उग्र कट्टरपंथी बर्बाद कर रहे हैं। अब दूसरे तबके को देखिए। ये तबका मध्य भारत के माओवादियों/नक्सलवादियों का है जो राज्य को उखाड़ फेंकना चाहते हैं और जो क्षेत्र के आदिवासियों को आर्थिक विकास से लगातार वंचित कर रहे हैं। भारत आदिवासियों को जो मौके उपलब्ध करा रहा है, ये उन मौकों से उन्हें वंचित कर रहे हैं। क्या संवैधानिक आजादी ऐसे तत्वों पर भी लागू हो सकती है? क्या हमें हिंसा का इस्तेमाल करके देश को टुकड़ों में तोड़ने की आजादी है? सोचिए, भारत देश को मिटाने का दिवास्वप्न पालने वाले इन नफरत फैलाने वाले समूहों ने क्या विकल्प रखा है? ये दोनों समूह जिस राजनीतिक विकल्प को पेश करते हैं, उसमें समानता, धार्मिक सहिष्णुता, बोलने और जीने की आजादी के लिए कोई जगह नहीं है। यह सिर्फ बंदूक का शासन है। एक समूह मजहबी तानाशाही वाले देश का निर्माण चाहता है तो दूसरा समूह विचारधारा पर आधारित तानाशाही चाहता है। ये अतिवादी समूह संविधान के दायरे में बातचीत तक के इच्छुक नहीं हैं। इस परेशान करने वाले ट्रेंड को कुछ निहित स्वार्थों के लिए आम जनमानस में फैलाया जा रहा है कि इन आतंकियों का जो लोग विरोध कर रहे हैं वे वास्तव में अलोकतांत्रिक और दक्षिणपंथी हैं। यह हकीकत से बहुत दूर है, सत्य से परे है। कैसी विडंबना है कि हमारे राष्ट्रवादियों के खून, पसीने और बलिदान से ही जो लोग सुरक्षित हैं, वे राष्ट्रवाद से पहचाने जाने पर खुद को शर्मिंदा मसहूस करते हैं। उन्हें खुद से पूछने की जरूरत है कि जिन समूहों का ये तीव्र बचाव करते हैं, अगर किसी दिन इन्होंने भारत देश को तोड़ दिया तो क्या तब भी उनके बोलने की करीब-करीब ‘निरपेक्ष आजादी’ अस्तित्व में रहेगी। अधिकारों और स्वतंत्रता की सुरक्षा सिर्फ वही कर सकते हैं, जिनकी संविधान में आस्था है। इसे खुद की सेवा में लगे इन समूहों द्वारा हासिल नहीं किया जा सकता जो भूमिगत हिंसक अभियानों के सार्वजनिक चेहरा हैं और इन हिंसक समूहों के बचाव में खड़े हो जाते हैं। उनके ‘गुमराह’ विरोध-प्रदर्शन आमतौर पर सशस्त्र बलों और दूसरे सुरक्षा बलों के खिलाफ होते हैं। अपने जीवन का ज्यादातर हिस्सा सशस्त्र बलों में गुजारने की वजह से, मैं उनके बलिदानों से गहराई से वाकिफ हूं। वे भारत की आजादी की रक्षा करते हैं, कई बार इसके लिए अपना जीवन कुर्बान कर देते हैं। यह निराशाजनक है कि हमारे सशस्त्र बल भारत को जिन विघटनकारी समूहों से रक्षा करते हैं उन्हीं समूहों को छद्म मानवाधिकारवादी संगठनों का समर्थन मिलता है। क्या इन संगठनों ने कभी लेफ्टिनेंट उमर फयाज, जम्मू कश्मीर पुलिस के कॉन्स्टेबल जाविद अहमद डार या औरंगजेब के अधिकारों के पक्ष में कुछ किया? इन तीनों, इनके जैसे पहले कई, का अपहरण किया गया और अफजल गुरु के चाहने वालों ने उनकी हत्या कर दी, जिन्हें फर्जी उदारवादी गौरवान्वित कर रहे हैं। कुछ राजनीतिक दलों ने इस फर्जी उदारवाद को चमकाने का फैसला किया और मोदी सरकार के कार्यकाल में लगातार आजादी पर खतरे की बातें कही गईं। उनका ‘डर बेचना’ पूरी तरह आधारहीन है और जिस तरह उन्होंने ढोंग किया, उस पर हंसी आती है। साल 1986 में यही कांग्रेस पार्टी राजीव गांधी के कार्यकाल में भारतीय डाकघर (संशोधन) बिल को पास कराना चाहती थी जिससे देश के नागरिकों के खत पढ़ने की स्वीकृति मिल जाती लेकिन तत्कालीन राष्ट्रपति का बेहद शुक्रिया कि उन्होंने इस बिल पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। एक और उदाहरण है जब कांग्रेस ने अभिव्यक्ति की आजादी को दबाने की कोशिश की और लोकसभा में ऐंटी डेफमेशन बिल पास किया गया। दरअसल, राजीव गांधी ने 4 सितंबर, 1988 को कहा था- हम भी बिल पढ़ने के लिए उन (प्रेस) की तरह होंगे। हमें पूरा विश्वास है कि इस बिल की काफी जरूरत है। मैं खुद यकीन करता हूं कि हम सही दिशा में जा रहे हैं।’ 15 सितंबर को उन्होंने फिर कहा- प्रेस को मुझे इस बात पर यकीन कराना होगा कि यह बिल बकवास है। प्रेस को अपने विचार रखने चाहिए। बिल में कुछ समस्याएं हो सकती हैं लेकिन प्रेस हमसे बात करने को राजी नहीं है।’ प्रेस ने हालांकि इस मामले में कड़ा रुख अपनाया और राजीव गांधी का पुरजोर विरोध किया जिसके बाद यह बिल अंतिम चरण में पास नहीं हो सका। उस समय प्रेस की आवाज दबाने की कोशिश मामूली से अंतर से नाकाम हो गई। यह मीडिया की सतर्कता और स्वतंत्रता के प्रति अपनी अविश्वसनीय प्रतिबद्धता ही थी, जिसने लगभग तीस साल पहले इसे बचाया था। आज हमारी स्वतंत्रता की रक्षा और हमारे सामाजिक तानेबाने को बचाने के लिए सतर्कता बेहद अहम है- न केवल मीडिया से, बल्कि हम सभी से। भारत जैसे विशाल, विविध, जटिल देश में आज लोगों या किसी समूह में डर पैदा करना या उन्हें एक मामूली से वॉट्सऐप मेसेज के जरिए हिंसा करने को भड़काना बेहद आसान है। केवल एक मेसेज फॉरवर्ड करना ही भीड़ के उन्माद के लिए काफी है। इन्सटेंट मेसेज, सोशल मीडिया और बिना जांचे-परखे अफवाहों को फॉरवर्ड करने के इस दौर में नागरिकों को भी राष्ट्रीय एकता की रक्षा और सामाजिक तानेबाने को बचाने के लिए अपनी जिम्मेदारी समझने की जरूरत है। अपने परिवार की रक्षा किसी बाहरी स्रोत के जरिए नहीं की जा सकती है। ठीक उसी तरह, अपने देश की रक्षा, समाज को सुरक्षित रखना भी किसी और की जिम्मेदारी नहीं हो सकती है। हमें हमेशा सतर्क रहने की जरूरत है। तभी हम उस आजादी की रक्षा कर सकते हैं, जो हमें प्रिय है। लेखक: कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौर (रिटायर्ड) केंद्रीय सूचना प्रसारण राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) एवं युवा मामले और खेल मंत्री
आपातकाल में मीसा बंदी बनने का सौभाग्य मुझे नहीं मिला पर उस दौर को करीब से देखा ही नहीं उसके दंश को झेला भी। उस समय मैं एसजीएन लॉ कालेज श्री गंगानगर में एल एलबी प्रथम वर्ष का छात्र होने के साथ ही दैनिक सीमावर्ती नामक अखबार का पहला संपादक भी था। खालसा लॉ कालेज का हमारा प्रथम बैच था। यह इतफाक रहा कि जब 25जून1975 की रात को आपातकाल लगाया गया जिसकी घोषणा अगले दिन सुबह आठ बजे खुद इंदिरा गांधी ने की मैं लॉ प्रथम वर्ष का छात्र था और जब 21मार्च 1977 को आपातकाल खत्म करने की घोषणा की गयी तो उस समय मैं एलएलबी अंतिम वर्ष की परीक्षा दे रहा था।मेरा राष्ट्रीय पत्रकारिता से जुड़ाव 1980 से न्यूज एजेंसी हिन्दुस्तान समाचार से हुआ। उसके बाद न्यूज एजेंसी वार्ता, टाईम्स ऑफ इंडिया ग्रुप, दैनिक जागरण, दैनिक जनसता, दैनिक भास्कर और इंडिया टीवी से जुड़ा। मेरा सौभाग्य रहा कि सभी संस्थानों में शुरूवात जिला प्रभारी के रूप में हुई और जिले के कई दिग्गज पत्रकारों को इन संस्थाओं से जोडऩे का अवसर मिला। मेरी पुरानीपृष्टभूमि जिसे पत्रकारिता में आगाज करते समय पीछे छोड़ आया था आपातकाल में मेरा पीछा कर रही थी। मेरा सदैव मानना रहा है कि किसी विचार धारा से जुड़े रह कर निष्पक्ष पत्रकारिता नहीं की जा सकती। इसलिए मैंने अपने वैचारिक संगठनों और उनसे जुड़े लोगों से दूरी बना ली थी। मैं पत्रकारिता में आने से पहले गंगानगर में आरएसएस की प्रताप शाखा का मुख्य शिक्षक था। मेरी शाखा में राजस्थान के पीडब्ल्यूडी मंत्री रहे स्व. श्री ललित किशोर चतुर्वेदी, संघ के जोधपुर प्रांत देख रहे भ्राताश्री श्री कैलाश भसीन और राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार भाई श्री लोकपाल सेठी जैसी हस्तियां शाखा में आया करती थीं। श्रीगंगानगर जिले में तत्कालीन जिला प्रचारक भाई स्व. श्री अशोक काम्बोज के साथ मिलकर एबीवीपी की स्थापना की थी और मैं संगठन का संस्थापक जिला महामंत्री रहा। मेरे इसी जुड़ाव की वजह से जिसे मैं पत्रकारिता में आते समय नाता तोड़ चुका था आपातकाल के दौरान आई बी का एक अधिकारी मेरे पीछे पड़ा रहा। आते जाते बीच रास्ते में उक्त अधिकारी मेरे पुराने संपर्कों और जिला प्रचारक अशोक काम्बोज को लेकर पूछताछ करता और मीसा में बंद करने की धमकी देता। अशोक काम्बोज भूमिगत रह आपातकाल के खिलाफ संघर्ष कर रहे थे। खुफिया एजेंसियों और पुलिस के लिए वे बड़ी चुनौती बने हुए थे। एजेंसियों का मानना था कि अशोक जी मुझसे संपर्क में है जो सही भी था। उनकी गिरफ्तारी के लिए ही आईबी लगातार मुझ पर दबाव बना और मीसा में बंद करने की धमकी दी जा रही थी पर मेरा एक ही जवाब होता कि मैं लम्बे समय से संघ और एबीवीपी से नाता तोड़ पत्रकारिता कर रहा हूं। मुझे न अशोक काम्बोज के बारे में कोई जानकारी है और न ही संघ की गतिविधियों के बारे में। संघ ही वह संगठन था जो आपातकाल के संघर्ष में मुख्य भूमिका निभा रहा था और इसके करीब एक लाख से ज्यादा कार्यकर्ता बंदी बना लिये गये थे। उधर अखबारों पर सेंसरशिप लगा दिये जाने से इनका प्रकाशन मुश्किल हो गया था। पहले जिलाधिकारी को अखबार दिखा उसकी अनुमति के बाद ही अखबार प्रकाशित करने का नियम बनाया गया और बाद सेल्फ सेंसरशिप लागू कर दी गयी। यानि पहले अखबार दिखाने की बाध्यता खत्म कर दी गई पर न इंदिरा गांधी संजय गांधी कांग्रेस के खिलाफ कुछ प्रकाशित किया जा सकता था और न ही सरकार और सरकारी तंत्र के खिलाफ कुछ छापा जा सकता था। जो थोड़ा सी प्रकाशित कर देता उसके कार्यालय पर ताला लगा दिया जाता था। जबरन नसबंदी का अभियान शुरू कर दिया गया। अधिकारियों को लक्ष्य दे दिये गये। कुवांरे युवकों की धड़पकड़ कर बड़े स्तर पर उनकी नसबंदी कर आंकड़े पूरे किये जाने लगे थे। लोगों में इतनी दहशत हो गई थी कि नसबंदी टीम की भनक मिलते ही लोग खेतोंऔर जंगलों में जाकर छिप जाते थे पर अखबार ऐसी खबरें छाप नहीं पाते थे। मैं देर रात तक अपने सहयोगी के साथ अपराधिक खबरें लाता और अखबार में कुछ मसाला डालता ताकि पाठक केवल सरकारी और दूसरी विज्ञप्ति नुमा उबाऊसमाचार ही नहीं कुछ दुसरे समाचार पढ़ सकें पर यह प्रशासन को नागवार गुजरता था बार बार मुझे ऐसे समाचार प्रकाशित नहीं करने की चेतावनियां दी जाती पर मैं उन्हें अनसुना कर देता क्योंकि मुझे लगता था कि ऐसी खबरें प्रकाशित कर मैं सेंसरशिप की गाईड लाईन का उल्लंघन नहीं कर रहा था। इसमें अखबार के मालिक स्व. श्री प्रदुमन भाटिया का मुझे पूरा सहयोग मिल रहा था और इस नैतिक सहयोग की वजह से जो मुझे बल मिल रहा था उसके चलते प्रशासन की मनाही के बावजूद मैं अपराधिक समाचारों का लगातार प्रकाशन करता रहा। आपातकाल के वे घुटन और बेचैनी के भयावह 21 महा सदैव स्मृतियों में बने रहेंगे।मदन अरोड़ा, स्वतंत्र पत्रकार
जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ गठबंधन तोड़कर भारतीय जनता पार्टी ने 2019 के लिए चुनाव प्रचार का तेवर तय कर दिया है. भाजपा अच्छे से जानती है कि अल्पसंख्यकों का, खासकर मुसलमानों का वोट उसके हिस्से में आने वाला नहीं है. ऐसे में कबतक कश्मीर में सरकार के बहाने वो अपने गले को बांधे रखती. मुस्लिम बाहुल्य कश्मीर में सरकार में शामिल रहते हुए भाजपा को अक्सर भीतर और बाहर से हमले झेलने पड़ते थे. पीडीपी से नाता तोड़कर भाजपा ने उस मजबूरी से मुक्ति पा ली है. यहां से दो चीज़ें एकदम साफ दिखाई दे रही हैं. पहली यह कि भाजपा को इस बात का आभास है कि केवल विकास के नारे पर 2019 में वोट मिलने वाला नहीं है. दूसरा यह कि क्षेत्रीय दलों के वोट बैंकों को तोड़ने के लिए जातियों को हिंदू पहचान के बुखार तक लाना पड़ेगा. यानी ध्रुवीकरण के ज़रिए ही अपेक्षित वोटों को सुनिश्चित किया जा सकता है. लेकिन कश्मीर में सरकार में रहते हुए हिंदू हित और हिंदू अस्मिता की बात कर पाना आसान नहीं रहता. लिहाजा भाजपा ने बड़े लाभ के लिए छोटे नुकसान को उठाना ज़्यादा फायदेमंद समझा. इसकी पुष्टि इस बात से भी हो जाती है कि इस फैसले के लिए भाजपा ने न तो राज्य में पिछले दिनों अपने तेवर बदले, न विरोध जताया, न महबूबा मुफ्ती को इसकी आहट लगने दी और न ही राज्य स्तर पर भाजपा के पास रूठने के लिए कोई बड़े तर्क हैं. अचानक ही सुरक्षा सलाहकार से परामर्श लेकर जनादेश को राज्यपाल शासन के हवाले कर दिया गया. ऐसा करने वाली यह वही भाजपा है जिसने महीनों मान मुनौवल के बाद महबूबा को गठबंधन के लिए राजी किया था और राज्य में भाजपा-पीडीपी गठबंधन की सरकार बनी थी. तीन साल तक भाजपा इस गठबंधन के साथ सत्ता में बनी रही. विरोध के स्वर कुछ भीतर भी थे और कई बाहर भी. लेकिन भाजपा ने सत्ता में बने रहना मुनासिब समझा और धीरे-धीरे जम्मू क्षेत्र में अपने वर्चस्व और सांगठनिक प्रभाव को और व्यापक करने का काम जारी रखा. जब 2019 के चुनाव की दस्तक पार्टी को अपने दरवाजे पर सुनाई देने लगी तो उसने इस गठबंधन को हवन कुंड में डालकर कश्मीरियों और अल्पसंख्यकों के प्रति अपनी नरमी की मजबूरी से मुक्ति पा ली. अब भाजपा खुलकर खेलने के लिए तैयार है. भाजपा की भाषा आने वाले दिनों में बदली हुई सुनाई दे सकती है. दूसरा बड़ा लाभ यह है कि लगातार सीमा पार से गोलीबारी और कश्मीर में बिगड़ते हालात के लिए घेरी जा रही सरकार अब राज्यपाल शासन के बहाने सेना, अर्धसैनिक बलों और विशेषाधिकार कानूनों का मनमाने ढंग से इस्तेमाल कर सकेगी. भाजपा ने पीडीपी के साथ गठबंधन तोड़कर तुष्टिकरण का पर्दा उतार फेंका है. अब उसे प्रचार में कूदना है और ध्रुवीकरण की धुरी पर आधारित प्रचार के लिए महबूबा से मुक्ति भाजपा के लिए एक बड़ी राहत है. इस तरह भाजपा ने चुनाव प्रचार के अपने पैंतरे और भाषा की बानगी दे दी है. ऐसे समय में जबकि बाकी विपक्षी दल सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर भाजपा से जूझते नजर आ रहे हैं, पार्टी हार्ड हिंदुत्व के ज़रिए विपक्ष से भी निपटेगी और जाति आधारित गठबंधनों से भी. भाजपा के लिए गले की फांस बन रहा था पीडीपी का साथ, इसलिए तोड़ा नाता! जम्मू-कश्मीर में एक बार फिर राजनीतिक हालात उफान पर हैं. भारतीय जनता पार्टी ने महबूबा मुफ्ती सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया, इसी के साथ राज्य में राज्यपाल शासन लागू हो गया. कश्मीर में पीडीपी का साथ भारतीय जनता पार्टी के लिए लगातार गले की फांस बनता जा रहा था. कश्मीर के हालातों को लेकर लगातार बीजेपी निशाने पर आ रही थी, ऐसे में बीजेपी के सामने इसके अलावा कोई चारा नहीं बचता था. सरकार बनने के बाद से ही पीडीपी ने अलगाववादियों और पत्थरबाजों की तरफ नरम रुख अपनाया, जिसने कई बार बीजेपी को बैकफुट पर धकेला महबूबा ने अपना अधिकतर फोकस घाटी पर ही रखा, ऐसे में जम्मू-लद्दाख के साथ लगातार भेदभाव हो रहा था. महबूबा अपना किला तो मजबूत कर रही थीं, लेकिन बीजेपी लगातार अपने इलाके में पिछड़ती जा रही थी, 2019 लोकसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी एक बार फिर ये संदेश देना चाहती है कि वह अभी भी आतंकवादियों के खिलाफ सख्त है. इसके लिए पीडीपी का साथ छोड़ना जरूरी था. लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव कराने के लिए बीजेपी ने गिराई जम्मू-कश्मीर सरकार? जम्मू-कश्मीर में बीजेपी के सरकार से समर्थन वापस लेने की टाइमिंग को लेकर भी काफी चर्चा हो रही है। दरअसल, बीजेपी ने यह सुनिश्चित करते हुए सरकार से समर्थन वापस लिया कि जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनाव से पहले नहीं होंगे। जम्मू-कश्मीर में 6 महीने राज्यपाल शासन का प्रावधान है। बीजेपी नेतृत्व चाहता है कि ये 6 महीने ऐसे ही निकाले जाएं। इसके पीछे रणनीति यह है कि ये 6 महीने दिसंबर तक पूरे होंगे। इसके बाद लोकसभा चुनाव के लिए मंच सज जाएगा, ऐसे में जम्मू-कश्मीर के चुनाव भी लोकसभा के साथ ही हो सकते हैं। लोकसभा चुनाव की तैयारी 2019 के मार्च में शुरू होने की संभावना है। अब आगे क्या राज्यपाल शासन लागू होने से आतंक के खिलाफ सेना को होगी खुली छूट जम्मू-कश्मीर में रमजान सीजफायर खत्म करने और गठबंधन राजनीति की बाध्यता खत्म होने के बाद राज्यपाल शासन लागू होने से सुरक्षा बलों के पास आतंकियों के खिलाफ मोर्चा खोलने की पूरी छूट होगी। इसके अलावा जम्मू-कश्मीर पुलिस पर भी स्थानीय नेताओं के दबाव में अलगाववादियों के प्रति नरम रवैया अपनाने का दबाव होता है, ऐसे में स्थानीय पुलिस भी स्वतंत्रता के साथ काम कर सकती है। साथ ही सुरक्षा बल और पुलिस इंटेलिजेंस इनपुट्स साझा कर बेहतर ढंग से काम करेंगे। यह जानकारी टाइम्स ऑफ इंडिया को केंद्र सरकार के सीनियर अधिकारी ने दी है। CASO, SADO फिर से लागू सेना को उम्मीद है कि स्थानीय नेताओं का दबाव खत्म होने से स्थानीय पुलिस ज्यादा सक्रियता के साथ आतंक विरोधी गतिविधि में सेना का साथ दे सकती है। सेना ने अपने अति सक्रिया CASO (कार्डन ऐंड सर्च) और SADO (सीक ऐंड डेस्ट्रॉय) ऑपरेशन को जम्मू कश्मीर में फिर से लागू कर दिया है। सुरक्षा बलों को उम्मीद है कि अब इंटेलिजेंस इनपुट्स बेहतर तरीके से साझा हो सकेंगे। इसके अलावा घनी आबादी वाली जगहों पर सुरक्षा बलों की सक्रियता बढ़ाई जाएगी। अक्रामक ऑफिसर आएंगे आगे 'कुछ राजनेताओं की तरफ से पत्थरबाजों, अलगाववादियों और कट्टरपंथियों को समर्थन मिलता है। कोई राजनीतिक दबाव न होने से सुरक्षा बल ज्यादा अक्रामकता से काम करेंगे।' माना जा रहा है कि अति संवेदनशील वाली जगहों पर 'समर्थ' ब्यूरोक्रेट्स और सुप्रींटेंडेंट्स ऑफ पुलिस की तैनाती की जाएगी, ताकि वे बगैर दबाव में आए आतंक विरोधी गतिविधियों का नेतृत्व कर सकें। अधिकारी ने बताया, 'फिलहाल कई ऐसे काबिल ऑफिसर हैं, जो साइड लाइन कर दिए गए हैं। आतंकी बुराहन वानी की मौत के बाद घाटी में स्थिति और खराब हो गई थी। ऐसे में अब उन ऑफिसरों को आगे लाकर आतंकियों को काउंटर करने की रणनीति पर काम हो सकता है।' पत्थरबाजों पर और सख्ती सेना के ऑपरेशंस के अलावा दक्षिण कश्मीर में पत्थरबाजों पर बड़ी कार्रवाई भी की जा सकती है। अगर अतीत पर गौर करें तो यह देखने को मिलता है कि 2016 की हिंसा के दौरान कश्मीर में बीजेपी-पीडीपी सरकार के दौरान 9 हजार से अधिक पत्थरबाजों पर केस दर्ज हुए थे। गिरफ्तारी के कुछ महीनों बाद महबूबा सरकार ने सैकड़ों पत्थरबाजों पर से मुकदमे वापस ले लिए थे। सरकार का कहना था कि युवाओं को मुख्यधारा में लाने के लिए यह कदम उठाए गए हैं, जबकि विपक्षी पार्टियों का आरोप था कि महबूबा ने श्रीनगर और अनंतनाग सीटों पर होने वाले उपचुनाव के मद्देनजर लोगों के समर्थन के लिए ऐसा किया था। इस फैसले के बाद बीजेपी सरकार को कई मोर्चों पर विरोध और आलोचना का सामना करना पड़ा था। ऐसे में अब यदि राज्यपाल शासन की स्थितियां बनती हैं तो फिलहाल 2019 के चुनाव तक पत्थरबाजों पर कार्रवाई पर कोई सियासी दखलंदाजी नहीं होगी। इसके साथ-साथ ऐसे फैसले की स्थिति में देशभर में बीजेपी को इससे फायदा भी मिल सकेगा। बीजेपी समर्थकों को राष्ट्रवाद की अतिरिक्त खुराक फंड के बंटवारे और गवर्नेंस के दूसरे मामलों में जम्मू और लद्दाख क्षेत्र के साथ सौतेला व्यवहार हो रहा था। देशभर के बीजेपी काडर के लिए जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक घटनाक्रम के खास मायने हैं। बीजेपी और पीडीपी विचारधारा के मोर्चे पर एक दूसरे से एकदम अलग हैं। गठबंधन टूटने और सेना की कार्रवाई तेज होने से पार्टी समर्थकों को राष्ट्रवाद की अतिरिक्त खुराक मिलने की संभावना है। इससे अगले साल के लोकसभा चुनाव सहित आगामी विधानसभा चुनावों में बीजेपी को बड़ा फायदा हो सकता है। बीजेपी की वैचारिक संरक्षक आरएसएस भी कश्मीर में पीडीपी से गठबंधन तोड़ने और सख्ती करने के पक्ष में थी। बीजेपी इस मसले से निपटने के तौर-तरीकों को स्थानीय और अंतराष्ट्रीय मंच पर सही तरीके से पेश करने की पूरी कोशिश की है। मदन अरोड़ा,स्वतंत्र पत्रकार
उपराष्ट्रपति वैंकया नायडू ने कांग्रेस सहित सात विपक्षी दलों के सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा को हटाये जाने संबंधी प्रस्ताव को खारिज कर दिया है, जो कि अप्रत्याशित नहीं है। महाभियोग के प्रस्ताव को खारिज करने से पहले उन्होंने इसको लेकर अटॉर्नी जनरल के. के. वेणुगोपाल,संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप, पूर्व विधि सचिव पी.के. मल्होत्रा सहित संविधानविदों और कानूनी विशेषज्ञों के साथ प्रस्ताव पर विचार-विमर्श करने के बाद ये फैसला लिया । कांग्रेस के नेतृत्व में सात दलों ने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव उपराष्ट्रपति को दिया था। यह एक अभूतपूर्व कदम था। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के खिलाफ कभी भी महाभियोग का प्रस्ताव नहीं आया था। कानून के कई जानकार इसे अभूतपूर्व कदम बता रहे थे। वरिष्ठ वकील फाली नरीमन ने इसे काला दिन बताया था। देश के अनेक शीर्ष संविधानविदों और पूर्व न्यायमूर्तियों ने पहले ही इस प्रस्ताव की वैधता पर सवाल खड़े किये थे। इसके बावजूद शीर्ष न्यायपालिका अभूतपूर्वस संकट से गुजर रही है, क्योंकि देश के न्यायिक इतिहास में पहली बार चीफ जस्टिस को हटाने के लिए ऐसी मुहिम चलाई गई है। कांग्रेस ने अब सुप्रीम कोर्ट में जाने की घोषणा की है,जिससे उसकी बेताबी ही झलकती है, जबकि इस प्रस्ताव में पार्टी के भीतर तो विभाजन था ही, तृणमूल कांग्रेस ,बीजेउी, द्रमूक और राजद जैसे विपक्षी दलों ने भी खुद को इससे अलग रखा है। सच्चाई यह भी है कि यह प्रस्ताव संसद मेंआ भी जाता, तो इसका पारित होना संभव नहीं था,क्योंकि इसके पक्ष में सांसदों की पर्याप्त संख्या नहीं है। फिर ऐसे में इस प्रस्ताव के जरिये कांग्रेस और दूसरे दल आखिर क्या दिखाना चाहते हैं?विपक्ष ने जो आरोप लगाये हैं, वे महाभियोग के स्तर पर खरे नहीं उतरते, जिसके चलते उपराष्ट्रपति वैंकया नायडू ने प्रस्ताव को खारिज किया। आरोप अकाट्य सबूतों के साथ होने चाहिए,पर सांसदों ने अपने प्रस्ताव में हो सकता है, ऐसा प्रतीत होता है के साथ प्रस्ताव में आरोप लगाये हैं जिन्हें निराधार माना गया।। जो आरोप लगाये गये हैं उनमें से एक मेडिकल कॉलेज के घोटाले से संबंधित है और एक मामला तब कि जमीन खरीद से संबंधित है, जब न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा जज भी नहीं बने थे। प्रस्ताव को लेकर इस लिए भी सवाल उठ रहे हैं क्योंकि इनमें कई 32 साल पुराने हैं और इन्हें कांग्रेस ने पूर्व में कभी भी नहीं उठाया। न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा को कांग्रेस ने ही जज बनाया और वे कांग्रेस सरकार के दौरान ही सुप्रीम कोर्ट के भी जज बने। चीफ जस्टिस के खिलाफ महाभियोग का सीधा मतलब तो न्यायपालिका की निष्पक्षता पर संदेह करने से है, जोकि और भी खतरनाक है, क्योंकि अब भी लोगों का अगर किसी संस्था पर सर्वाधिक विश्वास कायम है, तो वह न्यायपालिका ही है। मगर दुर्भाग्य से कुछ दिनों पहले ही सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जजों ने बाकायदा प्रेस कांफ्रेस कर चीफ जस्टिस के मामलों को आवंटित करने के अधिकार पर सवाल खड़े किये थे, जिससे यह संदेश गया कि न्यायपालिका में सब कुछ ठीकठाक नहीं है। इससे उन जजों के साथ ही संपूर्ण न्यायपालिका को ही सियासी चश्में से देखा जाने लगा है, फिर चाहे कितनी भी सफाई क्यों न दी जाये। यह वाकई चिंता की बात है कि न्यायपालिका को राजनैतिक टकराव का मुद्दा बना दिया गया है, जिसमें कांग्रेस और भाजपा के बीच यह बताने की होड़ मच गई है कि किसने न्यायपालिका का कितना दुरूपयोग किया। निस्संदेह न्यायपालिका के भीतर भी विसंगतियां हैं, लेकिन उन्हें दूर करने की जिम्मेदारी उसी पर छोड़ दी जानी चाहिए, यही संवैधानिक संस्थाओं को निष्पक्ष बनाये रखने का तकाजा है,पर दुर्भाग्य से राजनैतिक दल देश की सर्वोच्च कोर्ट को अपने तरीके से हांकने की कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस के महाभियोग को जज लोया और कोर्ट में चल रहे राम मंदिर के मामले की सुनवाई को टालने की कवायद के रूप में देखा जा रहा है। मदन अरोड़ा स्वतंत्र पत्रकार
- श्रीबालाजी भजन मंडल ने किया महामंडेलश्वर स्वामी कृष्णानंद महाराज का अभिनंदन श्रीगंगानगर। रामनाम संकीर्तन से सुख-समृद्धि के साथ-साथ मानसिक शांति भी मिलती हैं, जिससे मनुष्य जीवन सफल होता हैं ओर जो मनुष्य प्रतिदिन रामनाम जाप करता हैं उसका जीवन भवसागर से पार हो जाता हैं। यह बात आज पुरानी आबादी स्थित सिद्धपीठ श्रीझांकीवाले श्रीबालाजी मंदिर में पधारे महामंडलेश्वर स्वामी कृष्णानंद महाराज ने कहीं। इस दौरान उन्होंने कहा कि मंदिर में कई वर्षों से चल रहे रामनाम संकीर्तन से मंदिर एक पवित्र धाम बन गया हैं, जहां आकर एक नई शक्ति का संचार होता हैं ओर मानसिक शांति मिलती हैं। वहीं कार्यक्रम के दौरान श्रीबालाजी भजन मंडल के मुख्य सेवादार प्रेम अग्रवाल गुरूजी, प्रधान सुरेन्द्र चौधरी, शंकरलाल अग्रवाल, राजकुमार सिंगल, सुरेन्द्र पुजारी, मदनलाल खुराना ने महामंडलेश्वर स्वामी कृष्णानंद महाराज का शॉल ओढ़ाकर व बाबा के दरबार का चित्र भेंटकर अभिनंदन किया। वहीं अभिनंदन कार्यक्रम के बाद महामंडलेश्वर स्वामी कृष्णानंद महाराज ने श्रीबालाजी बगीची का भी अवलोकन किया ओर मंडल द्वारा किये जा रहे सामाजिक कार्यो की प्रंशसा की। इस मौके पर केके सोनी, पवन राजपाल, योगेश वधवा सहित काफी संख्या में श्रीबालाजी भजन मंडल के सेवादार मौजूद थे।
राजनीति में एक वर्ष का समय काफी होता है। लेकिन 2019 के आम चुनाव से पूर्व उतरप्रदेश और बिहार की तीन लोकसभा सीटों पर हुए उपचुनावों में भाजपा को मिली हार पार्टी के लिए बड़ा झटका है, गोरखपुर और फूलपुर सीटों के नतीजे इस मायने में अहम हैं क्योंकि ये सीटें योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री और केशवप्रसाद मौर्य के उपमुख्यमंत्री बनने के बाद खाली हुई थी। योगी खुद पांच बार से गोरखपुर से चुनाव जीतते आ रहे थे और 1991 से वहां भाजपा का कब्जा रहा है। नतीजे बता रहे हैं कि भाजपा के चुनावी प्रबंधकों ने सपा को मिले बसपा के समर्थन को कम आंका और यह समझ नहीं सके कि यूपी की इन दो बड़ी पार्टियों का सांझा मत भाजपा के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं। नतीजे बताते हैं कि सपा अपने उम्मीदवारों के पक्ष में बसपा के मतों का स्थानांतरण करवान में सफल रही है। नतीजों में यह संदेश भी साफ है कि कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं की भावनाओं का निरादर कर उम्मीदार थोप चुनाव कभी भी नहीं जीता जा सकता। भाजपा हाईकमान ने योगी आदित्यनाथ और केशवप्रसाद मौर्य से बाहर जाकर उम्मीदवार थोपा और कार्यकर्ताओं ने मतदान में हिस्सा नहीं लेकर हाईकमान को आईना दिखा दिया। आमतौर पर माना जाता है कि ज्यादा मतदान सता विरोधी रूख को दिखाता है लेकिन इन उपचुनाव में यह मिथक भी धरासाई हो गया। बिहार में राजद ने तसलीमुद्दीन के निधन से रिक्त हुई अपने कब्जे वाली अररिया लोकसभा सीट पर फिर से कब्जा किया है और जहानाबाद में भी अपना कब्जा बरकरार रखने में कामयाब हुई है। यह बिहार के राजनीतिक गणित की पुनरावृति तो है ही भाजपा के साथ ही नीतीश कुमार के लिए भी झटका है क्योंकि राजद से रिश्ता तोडक़र उन्होंने भाजपा का दामन थामा था। इन चुनावों में कांग्रेस की स्थिति कोई अच्छी नहीं रही। यूपी में कांग्रेस के उम्मीदवारों की जमानत जब्त होने से पार्टी के 2019 में सता में आने की उम्मीदों पर पूरी तरह से पानी फिरता लग रहा है। हालांकि उपचुनावों के आधार पर राष्ट्रीय परिदृश्य के बारे में कोई राय बनाना आसान नहीं है, लेकिन इन नतीजों के दो स्पष्ट संदेश हैं। पहला यह कि अब गैर भाजपा विपक्ष को एक जुट करने की मुहिम तेज हो सकती है, जैसा कि ममता बनर्जी से लेकर चन्द्र बाबू नायडू और अखिलेश की प्रतिक्रियाओं में देखा जा सकता है। दूसरा,इन नतीजों को प्रधानमंत्री मोदी की छवि से जोड़ कर भले ही न देखा जाये, लेकिन ये भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की चुनावी रणनीति और आदित्यनाथ सरकार की छवि पर सवाल तो खड़े करते ही हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं , वहां उसे सता विरोधी रूझान का सामना करना पड़ रहा है। यह चुनावी हार पार्टी के अति आत्मविश्वास का खामियाजा भी है।नतीजों ने अटलबिहारी वाजपेयी की कविता टूटता तिलिस्म आज सच में भय खाता हूं की याद दिला दी है। नतीजों से भाजपा की रणनीति और नेताओं का तिलिस्म टूट गया है। भाजपा के बूथ मैनेजमेंट व जनता से लगातार संवाद टूट गया लगता है, जिसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ा है। जाहिर है ये नतीजे भाजपा संगठन व सरकार दोनो के लिए कई सबक और संदेश लेकर आये हैं। भाजपा के रणनीतिकार अब गंभीरता से विचार कर रहे हैं कि एक साल पहले तक जिन मतदाताओं ने समर्थन दिया वे उससे छिटक कर उसके खिलाफ क्यों चले गये। सपा को मिली जीत आगे भी विरोधियों को मिलकर भाजपा के खिलाफ लडऩे की ताकत देगी। इससे राजस्थान के लिए भी साफ संदेश है सुधरो या फिर सता से बाहर जाने के लिए तैयार रहो। मदन अरोड़ा, स्वतंत्र पत्रकार
आगामी लोकसभा और इस साल होनेजा रहे कर्नाटक सहित आठ राज्य विधान सभाओं के चुनाव राहुल गांधी और उनकी कांग्रेस पार्टी केअस्तित्व को बचाने और प्रतिष्ठा का सवाल बन गये हैं। लिहाजा राहुल और पार्टी हर उस चीज पर सवाल खड़े कर रही है जिससे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को घेरा जा सके। बिना इस बात को समझे कि देश के सामने आरोपोंकी सच्चाई सामने आने पर इसका खामियाजा उन्हें ही भुगतना होगा । शायद राहुल इस बात को नहीं समझ पा रहेहैं कि न तोसच्चाई ज्यादा दिनों तक छिपाई जा सकती है और न ही पुख्ता सबूत के जनता को बरगलाया जा सकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर पीएनबी केफर्जीवाड़े और राफेल सौदे को लेकर सवाल उठाये जा रहे हैं। राहुल गांधी इनमें सीधे प्रधानमंत्री की संलिप्तता का आरोप लगा जवाब मांग रहे हैं। राहुल जानते हैं की अपनी आदत के अनुसार मोदी उनके सवालों का जवाब ट्वीटर या सभाओं में नहीं देंगे। पीएनबी फर्जीवाड़ेको लेकर सीबीआई न्यायालय में मुख्य आरोपी गोकुल शेट्टी के प्रारम्भिक ब्यान पेश कर चुकी है जिसमें फर्जीवाड़े केयूपीए के शासनकाल के दौरान साल 2008 में शुरू होने की बात कही गईहै। इस फर्जीवाड़े का बड़ा हिस्सा यूपीए के शासन काल में अंजाम दिए जाने के बाद इसका ठीकरा अगर केवल मोदी पर फोड़ा जाएगा तोदेश उस पर कैसे विश्वास करेगा। वैसे भी यह किसी सरकार का फर्जीवाड़ा न होकर बैंक अधिकारियों, नीरव मोदी और मेहुल चौकसी का फर्जीवाड़ा हैऔर बैंक के भ्रष्ट अधिकारी ऐसे फर्जीवाड़ेदेश की आजादी के बाद पहले प्रधानमंत्री पं.जवाहरलाल नेहरू के समय से करते आ रहे हैं। राहुल राफेल सौदे कोलेकर सवाल उठा रहे हैं। मैं कोई रक्षा विशेषज्ञ नहीं हूंलेकिन मेरा मानना हैकि यह केवल मात्र भाजपा द्वारा यूपीए शासन के दौरान हुए घोटालोंके आरोप का कांग्रेस का जवाब हैऔर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को घेरने का एक असफल प्रयास है। जो लोग राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्देपर नजर रखते हैं, वे जानते हैंकि यूपीए के दस साल के शासन के दौरान सैन्य क्षमताओं के विकास में ठहराव आ गया था। यूपीए शासन के दौरान एके एंटनी के अधीन रक्षा मंत्रालय विभिन्न रक्षा प्रस्तावों पर कुंडली मार कर बैठा रहा और उसने किसी भी रक्षा सौदेको मंजूरी नहीं दी। जिसका एकमात्र कारण एंटनी का अपनी साफ सुथरी छवि को लेकर फिक्रमंद होना था। खरीद के हर सौदे पर बोफोर्स का भूत मंडराने लगता था। गोला बारूद केभंडार न्यूनतम स्तर पर पहुंच गऐ थेऔर जरूरी साजो सम्मान की कमी हो गईथी। रक्षा तैयारी की कमजोर स्थिति ने लगभग हर क्षेत्र में सैन्य बलों को अत्यंत कमजोर स्थिति में पहुंचा दिया था। जाने माने रक्षा विशेषज्ञ रिटायर्ड मेजर जनरल हर्ष कक्कडक़े अनुसार यदि दो मोर्चों पर युद्ध की नौबत आती ,तो वायुसेना के लिए मुश्किल हो सकती थी। तौपखानेने बोफोर्स के बाद कोई और सौदा नहीं देखा जबकि एक नौसेना प्रमुख ने खराब उपकरणों,बदइंतजामी और कईदुर्घटनाओं,जिनमें कई मौतें तक हो गई, के बाद इस्तीफा देदिया। जनरल कक्कड़ के अनुसार तत्कालीन थल सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह को सैन्यबल की कमियों को लेकर सरकार को खुला पत्र लिखना पड़ा। मगर सरकार बेफिक्र सोती रही और सिर्फ इस बात की चिंता करती रही कि उसकी बची खुची प्रतिष्ठा पर कोई और आंच न आए। जनरल कक्कड़ के अनुसार ऐसे हालात में मौजूदा सरकार के लिए जरूरी होगया कि वह सैन्य बलों की जिन क्षमताओंऔर कौशल की जरूरत है,उन पर ध्यान दे। इनमें राफेल सौदा सबसे पहला है, जिसे सरकार ने मंजूरी दी है। जनरल कक्कड़ राफेल सौदे को लेकर राहुल गांधी और कांग्रेस के अन्य नेताओं की ओर से लगाए जा रहे आरोपों सेबिलकुल भी इतेफाक नहीं रखते हुए कहते हैं कि इन आरोपों को लगाने से पूर्व तथ्यों पर परखा जाना जरूरी है। जनरल कक्कड़ के अनुसार वे सेना के पूर्व अधिकारी हैं और किसी राजनीतिक दल की ओर उनका कोई झुकाव नहीं है,और इसलिए मैं निष्पक्ष रूप से इस सौदे को देख रहा हूं। वायुसेना नेयूपीए सरकार से126 विमानोंकी जरूरत बताई थी,ताकि आने वाले वर्षों मेंपुराने पड़ चुके विमानों की जगह उनकी भरपाई हो सके और उसके पास किसी भी दो मोर्चोंवाले युद्ध के लिए आवश्यक विमान मौजूद हों। जनरल कक्कड़ के अनुसार विमानोंकीे खरीद से संबंधित प्रस्ताव 2007 में जारी किया गया। उसके बाद से 2011 तक वायु सेना नेविमान के चयन के लिए कई चरणों मेंपरीक्षण किये। अंत में राफेल और यूरोफाइटर टाइकून को छांटा गया। 2012 मेंराफेल को एल1बिडर घोषित किया गया,जिसका मतलब था कि इसकी कीमत सबसे कम थी। यूरोफाइटर नेइसकेबाद डिस्काउंट की पेशकश की,मगर अब उसका कोई मतलब नहीं था। 2012- 2014के दौरान जब यूपीए शासन था,ठेके से संबंधित बातचीत अधूरी रही, इसके पीछे सबसे बड़ा कारण था कि प्रस्ताव की शर्तों और कीमत पर सहमति नहींबन पा रही थी। इससेऐसा लगा कि यूपीए सरकार इस सौदे के प्रति गंभीर नहीं है। जनरल कक्कड़ के अनुसार विमान की कीमत कभी भी बुनयादी कीमत नहीं होती,जैसा कि कांग्रेस कह रही है। कीमत वैमानिकी,अस्त्र-शस्त्र,रखरखाव और साजो-सामान पर निर्भर करती हैऔर इन्हें तय करने का एकमात्र अधिकार वायुसेना के पास होता है। ये सारे पहलू गोपनीय होते हैंऔर इन्हें सार्वजनिक किए जाने का असर देश की सुरक्षा पर पड़ सकता है। इसलिए इन्हें दोनों देशों के हस्ताक्षर से नॉन डिस्क्लोजर क्लास यानी सार्वजनिक नहीं किए जाने के प्रावधान के तहत रखा जाता है। जनरल कक्कड़ के अनुसार जो दूसरा मुद्दा उठाया जा रहा है, वह हैप्रौद्योगिकी का स्थानांतरण टीओटी। इसका आशय प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण से है, ताकि भारत में उत्पादन की क्षमता तैयार हो सके। यूपीए शासन काल के दौरान दोंनो देशों के बीच शुरूआती बातचीत में टीओटी प्रमुख बाधा बना हुआ था। राफेल का निर्माण करने वाली कम्पनी डसॉल्ट एविएशन कंपनी ने एचएएल हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड का निरीक्षण किया था,जहां 108 विमानों का निर्माण होना था लेकिन वह कार्यशैली और गुणवता से संतुष्ट नहीं थी और उसने गुणवता नियंत्रण की जिम्मेदारी लेनेमें असमर्थता जताई। इसके अलावा डसॉल्ट ने भारत में 108 विमानों की एसेंबलिंग के लिए तीन करोड़ मानव घंटे को पर्याप्त बताया,जबकि एचएएल ने इसका दोगुना वक्त चाहा था,जिससे विमान की लागत बढ़ गई। टीओटी पर कभी बात ही नहीं हुई,सिर्फ भारत में एसेंबलिंग की बात हुई थी। मोदी की सरकार बनने के बाद तय किया गया कि विमान खरीद के मामले में सरकारों के बीच समझौता हो। सरकार ने भारत में टीओटी के तहत विमानों का निर्माण किए जाने के बजाय वायुसेना की जरूरत को ध्यान में रखते हुए पूरी तरह से तैयार 36 विमान खरीदने का निर्णय लिया। इस तरह डसॉल्ट कंपनी बातचीत के दौर से बाहर हो गईऔर यह सौदा सरकारों के बीच हुआ और किसी भी तरह की घूसखोरी को खत्म कर दिया गया। समझौते में यह शामिल था कि विमान की आपूर्ति समय पर होगी और उसमें विमानिकी के साथ ही वायुसेना की जरूरतों के अनुरूप हथियार प्रणाली लगी होगी। इसके बाद प्रस्ताव को रक्षा अर्जन परिषद के पास एक से अधिक बार भेजा गया और उसकी सलाह को इसमें शामिल किया गया। सरकार के स्तर पर अंतिम समझौतेको 2016 में मंजूर किया गया,न कि 2014 में,जैसा कि कांग्रेस दावा कर रही है। इसी तरह से अधिक कीमत की बात भी इस सौदेके बारे में गलत तस्वीर पेश किये जाने के लिए की जा रही है। वैचारणिय प्रश्र यह है कि जब यूपीए सरकार के दौरान डील हुई ही नहीं तो किस आधार पर घोटाले के आरोप लगाए जा रहे हैं। उस समय सरकार बोफोर्स की तरह सीधे कम्पनी से डील का प्रयास कर रही थी ,जिसमें घोटाले की पूरी पूरी संभावनाएं हो सकती थी ,जबकि मोदी सरकार ने सीधे सरकार से डील कर रिश्वतखोरी और घोटाले की संभावनाओंको ही खत्म करनेका बड़ा काम किया। गौरतलब है कि कांग्रेस के आरोपों के बाद खुद फ्रांस सरकार ने आगे आ डील में किसी भी तरह की एक पैसे के घोटाले को खारिज कर दिया था। रक्षामंत्री ने भी खरीदे जा रहे विमानों की खासयित बताते हुए स्पष्ट किया था कि सौदा कांग्रेस के मुकाबले सस्ते में किया गया हैशर्तों से बंधे होने के कारण सही कीमत जाहिर नहीं की जा सकती और राहुल गांधी इसी शर्त की आड़ में आरोप लगा प्रधानमंत्री की छवि पर कीचड़ उछालने में लगे हैं। शायद घोटालों से काली हुई कांग्रेस की चादर के मद्देनजर राहुल भाजपा की चादर दागदार साबित करने की नाकामयाब कोशिश में लगे हैं। राहुल गांधी को ध्यान रखना होगा कि कहीं ऐसी कोशिशों से उनकी छवि पर सवाल उठने शुरू न हो जाऐं। मदन अरोड़ा, स्वतंत्र पत्रकार

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