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हनुमानगढ़ जिले में 7 दिसंबर को लोकतंत्र के चुनावी महापर्व में मतदाताओं ने पूरे उत्साह सें भाग ले ईवीएम में उम्मीदवारों की किस्मत को बंद कर दिया। इस महा समर के खेवनहारों में नव युवा मतदाताओं से लेकर शतक पार सभी ने बढ-चढक़र हिस्सा लिया। इसमें महिलाओं की भागीदारी उल्लेखनीय रही । महिलाओं ने कई क्षेत्रों विशेषकर शहरी क्षेत्रों में मतदान करने में पुरूषों को पीछे छोड़ दिया। मुस्लिम बाहूल्य बूथों पर भी मुस्लिम महिलाओं का प्रतिशत पुरूषों के मुकाबले अधिक रहा। हनुमानगढ़ जिले का कुल मतदान 82.83 प्रतिशत रहा। इसमें सर्वाधिक मतदान संगरिया में 86.54 प्रतिशत और सबसे कम मतदान भादरा में 80.13 हुआ। संगरिया के बाद पीलीबंगा में 84.17 प्रतिशत, हनुमानगढ़ में 82.60 प्रतिशत और नोहर में 80.91 प्रतिशत मतदान हुआ। खास बात ये रही कि नोहर और भादरा में महिलाओं ने पुरूषों से ज्यादा मतदान किया। भादरा में पुरूषों का मतदान जहां 79.20 प्रतिशत रहा, वहीं 81.17 प्रतिशत महिलाओं ने वोटिंग की। इसी प्रकार नोहर में पुरूषों के मतदान प्रतिशत 80.87 के मुकाबले महिलाओं ने 80.95 प्रतिशत वोटिंग की। शहरी क्षेत्र में पीलीबंगा को छोडक़र बाकि चारों विधानसभा क्षेत्र नोहर, भादरा, संगरिया और हनुमानगढ़ में महिलाओं ने पुरूषों से ज्यादा मतदान किया। भादरा में पुरूषों का मतदान प्रतिशत 72.39 के मुकाबले महिलाओं का मतदान करीब 5 फीसदी ज्यादा 77.10 प्रतिशत रहा। नोहर में पुरूषों के 74.71 प्रतिशत मतदान के मुकाबले महिलाओं ने करीब 2 फीसदी ज्यादा 76.31 प्रतिशत मतदान किया। इसी प्रकार हनुमानगढ़ में पुरूषों के 75.75 प्रतिशत मतदान के मुकाबले महिलाओं ने करीब 1 फीसदी ज्यादा 76.45 प्रतिशत मतदान किया। ग्रामीण क्षेत्र में भादरा की महिलाएं पुरूषों से मतदान में आगे रहीं। भादरा में पुरूष मतदान प्रतिशत 80.10 के मुकाबले महिलाओं का मतदान 81.71 प्रतिशत रहा। शांतिपूर्ण मतदान संपन्न हो जाने के बाद अब कौन जीत रहा है का आंकलन किया जा रहा है। एग्जिट पोल और सट्टे की धूम है। चुनावी समर के नतीजे11 दिसंबर को आएंगे पर जिन उम्मीदवारों की मतदान पूर्व हवा थी, उनके समर्थक एग्जिट पोल और सट्टे के अनुमान को सही मान अभी से सेहरा बांधे घूम रहे हैं। इस बार पिछले चुनावों के मुकाबले करीब 2 फीसदी मतदान कम हुआ है,जबकि महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। मतदाताओं का हवा इसकी है, वोट फलां को दिया है ने अपनी जीत माने बैठी पार्टियों को बेचैन कर दिया है। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि पिछले चुनाव से कम मतदान, हवा इसकी है, वोट फलां को और महिलाओं का शहरी और मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में पुरूषों के मुकाबले अधिक मतदान से चुनावी गणित में उलटफेर की पूरी संभावना है और जिन उम्मीदवारों ने जीत का सेहरा बांध रखा है,अगर वे चुनाव हार जाएं तो आश्चार्य नहीं होगा। पिछले पांच चुनावों में से 4 में मतदान प्रतिशत बढऩे पर सत्ता परिवर्तन हुआ । इस बार हुए कम मतदान से दोनों दल संशय में हैं और यह कांटे की टक्कर की ओर ईशारा कर रहा है। हनुमानगढ़ में11को किसका होगा मंगल,किसका अमंगल हनुमानगढ़ जिले में सबसे रोचक मुकाबला हनुमानगढ़ विधान सभा क्षेत्र में रहा, जहां भाजपा केसरकार में जल संसाधन मंत्री डा. रामप्रताप और कांग्रेस के पूर्वमंत्री चौ.विनोद कुमार के बीच कांटे की टक्कर देखने को मिली। हालांकि हवा पर सवार कांग्रेस अपनी जीत को लेकर निश्चिंत है। सट्टा बाजार मतदान पूर्व से ही कांग्रेस की जीत दिखा रहा है। पर मतदान के बाद जमीनी हकीकत चौंकाने वाली है। पिछले चुनाव की तुलना में कम मतदान, महिलाओं का अधिक जोश और चुनाव में पुरूषों के मुकाबले ज्यादा मतदान किया जाना, कुछ अलग तस्वीर दिखा रहा है। इन सबसे चौंकाने और समीकरण में बदलाव लाते दिख रहा है, हवा कांग्रेस की है पर वोट फूल को डाला है का दावा करते मतदाता। जंक् शन के एक मतदाता के अनुसार उसने पहली मर्तबा अपनी पत्नी के कहने पर कांग्रेस के बजाये फूल का बटन दबाया है। उसकेअनुसार हवा कांग्रेस की है पर वोट फूल को जा रहा है, इस सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता। फूल के प्रति यह केवल एक महिला का झुकाव मात्र नहीं है, यह अधिकांश महिलाओं के दिलों में मोदी के प्रति विश्वास को दर्शाता है। महिलाओं का पुरूषों के मुकाबले अधिक मतदान इसका संकेत है। एक अन्य मतदाता मतदान पूर्व तक भाजपा प्रत्याशी के साथ नाराजगी के चलते कांग्रेस को वोट देने की बात करता रहा,पर मतदान करने के बाद उसने कहा, ईवीएम पर फूल देखते ही वह बटन दबा दिया। यहां चुनाव में एकमात्र मुद्दा भाजपा उम्मीदवार डा.रामप्रताप के खिलाफ रडक़ और उनके द्वारा करवाये गये विकास कार्य का रहा है। हवा रडक़ की पर वोट विकास को गया दिख रहा है। शहरी क्षेत्र में 83621 मतदाताओं ने मतदान किया है जबकि 138437 ग्रामीण मतदाताओं ने उम्मीदवारों की किस्मत को ईवीएम में बंद कर चुनावी समर को कांटे के मुकाबले में बदलने का काम किया है। चुनाव में करीब 41 हजार नये मतदाता इस बार जुड़े हैं। इनमें से लगभग 98 सौ 18 से 19 आयु वर्ग के जबकि करीब 31 हजार 250 मतदाता 20 से 30 आयु वर्ग के हैं। युवा सोच ने रडक़ पर मतदान किया है या विकास को तरजीह दी है, देखना दिलचस्प होगा और असली गेम चेंजर भी इनके मत साबित होंगे। जीत के गणित के लिए पिछले समीकरण को देखें तो इस चुनाव में डा.रामप्रताप को कुल मतदान का 46 फीसदी जबकि विनोदे कुमार को 30 फीसदी मत मिले थे। इस बार माना जा रहा है कि जो 44 फीसदी वोट ले जाएगा, वही सरताज बनेगा। मंगलवार को हनुमान भक्त डा. राम प्रताप का मंगल होगा या अमंगल , ईवीएम खुलने पर ही इसका पता चलेगा। संगरिया में कांग्रेस की इक तरफा होती दिख रही हैजीत जिले की संगरिया विधान सभा सीट पर मिल रहे रूझान कांग्रेस की ओर जाते दिख रहे हैं। इस बार जिले में सर्वाधिक मतदान संगरिया में 86.54 प्रतिशत हुआ है। यहां मुख्य मुकाबला कांग्रेस की शबनम गोदारा और भाजपा के गुरदीप सिंह शाहपीनी के बीच रहा। महिलाओं का अधिक मतदान,उनमें अधिक स्वीकार्यता और भाजपा के नाराज कार्यकर्ताओं का शबनम गोदारा को मिला साथ उनकी जीत को पुख्ता करता दिख रहा है। सट्टा बाजार भी उनकी इक तरफा जीत दिखा रहा है। ऊंठ किस करवट बैठेगा इसका पता 11 दिसंबर को ईवीएम खुलने पर ही चलेगा। भादरा में सट्टा बाजार की विश्वसनीयता दांव पर हरियाणा और चुरू जिले से सटे भादरा विधान सभा क्षेत्र में इस बार जिले में सबसे कम 80.13 फीसदी मतदान हुआ है। ग्रामीण बाहुल्य इस विधान सभा चुनाव क्षेत्र में महिलाओं ने पुरूषों सेज्यादा मतदान किया। भादरा में पुरूषों का मतदान जहां 79.20 प्रतिशत रहा, वहीं 81.17 प्रतिशत महिलाओं ने वोटिंग की। क्षेत्र और सट्टा बाजार में शुरू से ही माकपा के बलवान पूनिया की हवा के चलते इस बार पार्टी अपनी जीत को लेकर आशान्वित है। पर मतदान के बाद इस पर पानी फिरता दिख रहा है। महिलाओं का अधिक मतदान और हवा इसकी और वोट किसी दूसरे को, की चर्चाऐं सामने आने के बाद ऊंठ किस करवट बैठेगा कहना मुश्किल है। त्रिकोणिय संघर्ष में हवा का रूख और सट्टा बाजार का आंकलन सही बैठेगा या फिर कांग्रेस के डा. सुरेश चौधरी के सिर सेहरा बंधेगा अथवा भाजपा के संजीव बेनीवाल वापसी करेंगे इसका पता 11 दिसंबर को ही चलेगा। मदन अरोड़ा, स्वतंत्र पत्रकार
गुड़गांव से आने के बाद आज दिन भर अलग अलग वर्ग के लोगों से मिल हनुमानगढ़ में चुनावी माहौल जानने की कोशिश की।कोर्ट भी गया।एक व्यक्ति को छोड़ सभी का एक ही मत था कि कांग्रेस की हवा जरूर है लेकिन काम बोल रहा है।उनका कहना था कि लोग इस बात को मान रहे हैं कि पिछले 5 साल में हर क्षेत्र में जितना काम हुआ है ,कभी नहीं हुया। इस बात का कट्टर कांग्रेसी भी मान रहे हैं कि डॉक्टर रामप्रताप ने इलाके में खूब काम करवाया है।लोगों ने कहा कि अगर कांग्रेस आती है तो इलाका फिर विकास में पिछड़ जाएगा।चौधरी विनोद कुमार के बस में काम करवा पाना सम्भव नहीं है।लोगों ने कहा कि इलाके के हित में वे भाजपा को ही वोट देंगे।राहुल गांधी की रैली मैंने नहीं देखी, पर लोगों का कहना था कि इस रैली के बाद रडक वाली हवा कमजोर पड़ रही है और कल मोदी की रैली के बाद डॉक्टर को और मजबूती मिलेगी।एक बात और सामने आई कि 2008 और 2013 में भाजपा के पुराने नेता जो डॉक्टर का खुल कर विरोध कर रहे थे, धीरे धीरे फिर डॉक्टर के साथ आ रहे हैं और काफी हद तक साथ आ भी चुके हैं। बात चुनावी गणित की।2008 में इसीतरह कांग्रेस की हवा चल रही थी और इसी तरह से कार्यकर्ताओं में नाराजगी भी थी।इसके बावजूद डॉक्टर राम प्रताप मात्र 386 वोटों से चुनाव हारे थे और हाउसिंग बोर्ड में मतदान केंद्र पर झगड़ा न हुआ होता तो शायद यह हर भी नहीं होती। इस बार फिर नाराजगी की हवा है कई लोग साथ छोड़ गए, पर इन साथ छोड़ने वालों में बड़ी संख्या उन लोगों की है जो भाजपा सरकार आने के बाद भाजपा में आये थे और कांग्रेस की हवा को देख वापस कांग्रेस में चले गए।पर जितने छोड़ गए उससे ज्यादा पुराने नाराज भाजपाई घर वापसी कर चुके हैं।एक और गोर करने योग्य तथ्य यह है कि विनोद कुमार 2008 में मात्र 376 मतों से चुनाव जीते थे पर 2013 में अब तक की सबसे करारी हार हारे थे।उन्हें डॉक्टर ने 30 हजार से अधिक मतों से हराया था।जिसका मतलब यह हुआ कि डॉक्टर को हराने के लिए विनोद कुमार को कम से कम 15 हजार से अधिक अतिरिक्त मत हासिल करने होंगे पिछले चुनाव की तुलना में। ऐसे में जब 15 उम्मीदवार मैदान में हैं और करीब 20 से 25 हजार वोट भाजपा, कांग्रेस से बाहर रहेंगे कांग्रेस को पिछले चुनाव के मुकाबले 15 हजार अतिरिक्त वोट मिलते नहीं दिख रहे।जबकि अब हवा के विपरीत काम बोलता है के वोट मुखर हो बोल रहे हैं और कल की मोदी की रैली के बाद इनमें और इजाफा होता दिख रहा है। मदन अरोड़ा, स्वतंत्र पत्रकार
7 दिसंबर को होने वाले विधानसभा चुनावों में अब मात्र कुछ दिन बचे हैं और हनुमानगढ़ जिले में चुनावी गहमागहमी चरम पर है। राज्य में उप चुनावों में मिली जीत के बाद आने वाले चुनावों में भी हवा पर सवार कांग्रेस अपनी जीत पक्की मान कर चल रही हैऔर इसलिए प्रदेश मेंसरकार बनानेको लेकर निश्चिंत है। भाजपा जहां अपनेकाम और करवायेगयेविकास कार्योंके भरोसे है, तो कांग्रेस इनकमबेंसी के सहारे सरकार बनाने को लेकर सपनेपाले बैठी है। जिले में सबसे दिलचस्प और कांटेका मुकाबला हनुमानगढ़ विधानसभा सीट पर है। यहां14 उम्मीदवार ताल ठोक रहे हैं पर मुख्य मुकाबला सरकार मेंजल संसाधन मंत्री भाजपा केडा.रामप्रताप और कांग्रेस के पूर्व कृषि राज्य मंत्री चौ. विनोद कुमार केबीच है। हनुमानगढ़ की राजनीति इन्हीं दोनों परिवारों केईर्दगिर्द घूमती है। दोनों ही तीन-तीन बार विधायक रह चुके हैं। भाजपा प्रत्याशी डा. रामप्रताप पूरे कार्यकाल के दौरान जनता के बीच रहने, इलाके में करवाये गये विकास कार्यों और सहज उपलब्धता केलिये जाने जाते हैं। जिले मेंउनकी छवि विकास दूत की है। जबकि कांग्रेस प्रत्याशी चौ. विनोद कुमार अपनी सज्जनता केलिये पहचाने जाते हैं। भाजपा और कांग्रेस ने प्रचार मेंअपनी पूरी ताकत झोंक रखी है। दोनों दलों केलिए यह सीट कितनी प्रतिष्ठापूर्ण है, इसका अंदाजा इसी बात सेलगाया जा सकता है कि भाजपा केप्रचार के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 4 दिसंबर को आ रहे हैंजबकि कांग्रेस के प्रचार के लिए राहुल गांधी 1 को हनुमानगढ़और सचिन पायलट रैली कर जा चुके हैं। कांटे की टक्कर केबीच भाजपा और कांग्रेस दोनों ही अपनी जीत को लेकर आशान्वित हैं। यहांकभी चौ. विनोद कुमार की निष्क्रियता सेरूष्ट हो डा. रामप्रताप को उनकेविकासोन्मुखी कामों केलिए सेहरा बांध देते हैं, तो कभी डा. रामप्रताप की उनकी कथित बोली को लेकर रडक़ निकालनेकेलिए विनोद कुमार को विधायकी सौंप दी जाती है। इस बार भी हनुमानगढ़ मेंचुनावी लड़ाईडॉक्टर केबेटेकेसाथ रड़क और विकास के बीच है। ऐसे- ऐसेलोग रड़क की बात कर रहेहैं, जोकभी डॉक्टर रामप्रताप से रूबरू ही नहीं हुए। इस बीच सोशल मीडिया पर दो वीडियो वायरल हो रहे हैं। इनमें सेएक मेंडा.रामप्रताप पांव में फ्रेक्चर केबावजूद जन सुनवाई कर रहे हैंऔर दूसरेमेंचौ. विनोद कुमार विधान सभा मेंसो रहे हैं। जनता केबीच सवाल यह हैकि वोट और समर्थन क्या ऐसेव्यक्ति को दिया जाए, जो चुनाव हारनेकेबाद 5 साल तक अपनी शक्ल ही न दिखाए या उसेजो पूरे5 साल न केवल जनता केबीच रह लोगों के संपर्क में रहे, वरन रिकॉर्ड विकास कार्यभी करवाये। कांग्रेस पूरी तरह से रडक़ को हवा दे उस पर सवार हो चुनावी वैतरणी पार करने में लगी है, तोभाजपा क्षेत्र मेंकरवाये गये विकास कार्यों केनाम पर वोट मांग रही है।1 दिसंबर को राहुल गांधी और सचिन पायलट पग फेरा कर जा चुके हैं। यहां से अगर रड़क जीती तो भाजपा केसाथ विकास हारेगा लेकिन उससे जो सन्देश जायेगा, विकास हमेशा- हमेशा के लिए दफन हो जाएगा फिर कोईजन प्रतिनिधि विकास करवानेकी सोचेगा नहीं और अगर विकास जीत गया तो कांग्रेस और निष्क्रियता हारेगी और हर जन प्रतिनिधि को इलाकेके विकास केलिए काम करना ही पड़ेगा । चुनाव में डॉक्टर रामप्रताप और चौ. विनोद कुमार की हारजीत रडक़ और विकास केमुद्देपर मतदान में छिपी है। भाजपा के डा. रामप्रताप ने 2013 के चुनाव में कांग्रेस के चौ. विनोद कुमार को 30487 मतों केबड़ेअंतर से हराया था। आम चर्चा है कि राहुल गांधी के पग फेरेका कांग्रेस कोकोई फायदा नहीं मिला हैजबकि मोदी की 4 दिसंबर को होने वाली रैली गेमचेंजर साबित होगी । इसका फायदा न केवल हनुमानगढ़ में मिलेगा, बल्कि जिले के साथ साथ गंगानगर जिले की कई सीटों पर इसका असर दिखेगा। सट्टा बाजार मेंभी मोदी की रैली के बाद उलटफेर की पूरी संभावना जताई जा रही है। भाजपा केसामनेजहांअपनी सीट बचानेकी चुनौती है, वहीं कांग्रेस अपना खोया जनाधार वापस हासिल कर जीत की हर मुमकिन कोशिश में है। ऊंठ किस करवट बैठेगा, इसका पता 11 दिसंबर को ईवीएम से चलेगा। वसुंधरा का दौरा भी नहीं बदल पाया संगरिया की फिजा,पर मोदी से भाजपा को मिल सकता है सहारा हरियाणा सीमा सेसटे संगरिया विधान सभा क्षेत्र में एक निर्दलीय को पार्टी में शामिल कर उम्मीदवार बनाने का दांव भाजपा को उलटा पड़ता दिख रहा है। भाजपा उच्च कमान ने मौजूदा विधायक कृष्ण कड़वा की टिकट काट निर्दलीय गुरदीपसिंह को एक दिन पूर्व पार्टी में शामिल कर प्रत्याशी बना मैदान में उतार दिया। पार्टी के इस निर्णय से कार्यकर्ताओं में रोष है। कई कार्यकर्ता खुलकर कर कांग्रेस प्रत्याशी शबनम गोदारा के साथ आ गये हैं तो कुछ पार्टी केउम्मीदवार के साथ आने के बजाये घर बैठ गये हैं। गुरदीप सिंह 2013 के चुनाव मेंकरीब 41 हजार वोट के साथ तीसरे स्थान पर रहे थे,जबकि कांग्रेस प्रत्याशी शबनम गोदारा को 44 हजार वोट मिले थे। यहां भाजपा के कृष्ण कड़वा चुनाव जीते थे। चुनाव हारनेकेबावजूद गुरदीप सिंह और शबनम गोदारा क्षेत्र में लगातार सक्रीय रहेऔर गुरदीप सिंह अपने पक्ष में हवा बनाने में सफल रहे। संभावना जतायी जाने लगी थी कि इस बार वे चुनाव निकाल ले जायेंगे और इसी को देखते हुए भाजपा ने गुरदीप सिंह पर दांव खेल दिया। मौजूदा विधायक की टिकट काटे जाने से उपजी नाराजगी से गुरदीप सिंह की हवा भी कमजोर पड़ गई। इसने कांग्रेस को खाद देने का काम किया। पार्टी को लग रहा था कि मुख्य मंत्री वसुंधरा राजे की संगरिया की सभा से पार्टी को मजबूती मिलेगी, पर राजे भी फिजा बदलने में विफल रही। राहुल गांधी की हनुमानगढ़ में हुई रैली से तो कांग्रेंस कोकोई फायदा होता नहीं दिख रहा , पर माना जा रहा है कि 4 दिसंबर को हनुमानगढ़ में होने वाली प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की रैली से भाजपा के गुरदीप सिंह को संजीवनी मिल सकती है। भादरा की सीट पर कांटे के मुकाबले में क्या इस बार आयेगा माकपा का नंबर ? हनुमानगढ़ जिले की भादरा विधान सभा क्षेत्र में शुरू से ही माकपा के बलवान पूनिया की हवा के चलते इस बार पार्टी अपनी जीत को लेकर आशान्वित है, हालांकि कस्बे के लोगों का मानना है कि भाजपा और कांग्रेस की विलंब सेजारी टिकटोंकी वजह से हवा बनी थी जो अब कमजोर पडऱही है। पूनिया का मुकाबला कांग्रेस के डा. सुरेश चौधरी और भाजपा केमौजूदा विधायक संजीव बेनीवाल से है। पिछले चुनाव में वे 38552 मत ले दूसरे स्थान पर रहे थे। चुनाव हारने के बाद बलवान पूनिया लगातार जन समस्याओं को लेकर संघर्ष करते रहे और अपने पक्ष में माहौल बनाने मेंसफल रहे। इसी के चलते सट्टा बाजार में भी वे पहले नंबर पर चल रहे हैं। उनका मुकाबला मुख्य रूप से कांग्रेस के डा. सुरेश चौधरी केसाथ माना जा रहा है। डा. सुरेश चौधरी पूर्व विधायक हैंऔर जमीन से जुड़े नेता हैं। वे भी पिछलेचार साल से लगातार जनता के बीच रह उनकी समस्याओं के लिए आवाज उठाते आ रहे हैं। चौधरी को कांग्रेस की टिकट मिलनेकेबाद माकपा की हवा भी अब कमजोर पडऩे लगी है। कस्बे मेंमाना जा रहा हैकि माकपा की हवा जरूर है, पर उसके मुताबिक वोट नहीं है। माकपा केसाथ ऐसे युवाओं का जमावड़ा है जो खुद वोट देसकते हैं, पर वोट जोड़ नहीं सकते। भाजपा केमौजूदा विधायक संजीव बेनीवाल को पार्टीनेरिपीट किया है। उनके परिवार की वजह सेलोगोंमेंनाराजगी है। बेनीवाल वोटों की बहुतायत से वे मुकाबले में हैं और धीर-धीरे लोगों को अपने साथ जोडऩे में लगे हैं। उनकी मजबूती से माकपा कमजोर जबकि कांग्रेस को और ताकत मिलेगी। क ुछ लोगों का मानना है कि मोदी की जिले में रैली के बाद हवा बदल सकती हैऔर अंत में मुकाबला दोनों राष्ट्रीय पार्टियों के बीच रह सकता है। पर हवा के सही रूख का पता 6 की रात तक चल जायेगा। जो भी हो कांटे के इस मुकाबले में सेहरा किसी के सर बंध सकता है। पर राज्य में कांग्रेस के पक्ष में बह रही हवा का फायदा कांग्रेस के डा. सुरेश चौधरी को मिल सकता है। मदन अरोड़ा, स्वतंत्र पत्रकार
नवंबर महीने में देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं.जवाहरलाल नेहरू की जयंती के साथ ही अनायास ही देश को शर्मसार कर देने वाले 1962 के उस युद्ध की याद आ जाना स्वाभाविक है, जिसका दंश आज भी देश उतरी सीमाओं पर भुगत रहा है। यह सब उस प्रधानमंत्री नेहरू की गलत रक्षा और विदेश नीति का परिणाम था, जिसे भारत के विकास का जनक कहा जाता है। पं. नेहरू ने दुनिया में अपने को शांति के मसीहा के रूप में स्थापित करने के प्रयासों में देश की सीमाओं को बिसरा दिया। उन्होंने 1948 में पाकिस्तान की ओर से कश्मीर पर किए गये हमले से भी कोई नसीहत नही ली। पं. नेहरू अपनी शांतिदूत की छवि में आत्ममुग्ध रहे और उनका परम मित्र चीन,भारत पर हमले की तैयारी करने में लगा रहा और 20 अक्टूबर 1962 को देश पर हमला कर दिया। सामरिक विशेषज्ञ आर विक्रम सिंह के अनुसार 20 अक्टूबर से 20 नवंबर तक का समय देश के लिये राष्ट्रीय शर्म का कालखंड है। भारत को सबक सिखाने के लिए 20 अक्टूबर 1962 को हमारी सीमाओं पर हुए चीनी हमले ने हमारे स्वाभिमान को धूल-धूसरित करते हुए पूरे विश्व में दया का पात्र बना कर छोड़ दिया था। 20 नवंबर 1962 को चीन की स्वत: युद्ध विराम की घोषणा ने इस शर्म को ही बढ़ाने का काम किया। जिस अमेरिका के भारत के लिए परमाणु बम केप्रस्ताव को जवाहर लाल नेहरू ठुकरा चुके थे, जिस अमेरिका के संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत को स्थायी सदस्य बनाये जाने के प्रस्ताव को भी वह यह कहते हुए मना कर चुके थे, कि इस सीट पर चीन का हक है, उसी अमेरिका से वह सिर्फ हथियार ही नहीं, बल्कि हमारी ओर से चीन से युद्ध करने का निवेदन करने को बाध्य हो गये। आर विक्रम सिंह के अनुसार नेहरू के अमेरिका को लिखे पत्रों को देख कर अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन फास्टर डलेस ने तंज कसते हुए कहा भी कि नेहरू को पता है कि वह क्या कह रहे हैं। हम भारत की ओर से चीन से युद्ध लड़ें। उनकी गुटनिरपेक्षता नीति का क्या होगा। यह नेहरू की लुंजपुंज रक्षा-विदेश नीति का परिणाम था। चीनी सेनाओं ने सेला पास का मोर्चा तोड़ दिया। भगदड़ मची हुई थी,तेजपुर और असम की घाटी का रास्ता चीनी सेनाओं के लिए खुला पड़ा था। हमारी मदद के लिए दुनिया में कोई नहीं आया, गुट निरपेक्षता और पंचशील के नेहरू के करीबी देशों में से भी मदद के लिए किसी ने कदमताल नहीं की। चीन के विरोध में कोई भी देश नेहरू के साथ खड़ा नहीं हुआ। अमेरिकी शर्तें मानते हुए पाकिस्तान के साथ कश्मीर समस्या के समाधान के लिए वार्ता करनी पड़ी। 62 के इस युद्ध ने नेहरू की विदेश और रक्षा नीति के नकलीपन को उघाड़ कर उसे अपना असल चेहरा देखने पर मजबूर कर दिया। नेहरू ने उतरी सीमाओं की सुरक्षा की परवाह नहीं की थी। परिणाम सामने था। आर विक्रम सिंह के अनुसार भारत तो ब्रिटिश उपनिवेश ही था,लेकिन वे किस हद तक अपने साम्राज्य की उतरी सीमाओं के प्रति सजग रहे थे,यह उनके सुरक्षा संबंधी अभिलेखों से स्पष्ट होता है। ब्रिटिश सेनाध्यक्ष ने इसका भी आकलन कर रखा था कि यदि चीनी खतरे के विरूद्ध तिब्बत को बचाने के लिए जरूरत पड़ी तो किस प्रकार सेनाओं को ल्हासा में उतारा जाएगा। परन्तु पं. नेहरू ने सेना को रणनीतिक रूप से मजबूत बनाने में कोई दिलचस्पी नहीं ली और सेना को नजर अंदाज ही किया। फ्रांसीसी मूल के सामरिक विशेषज्ञ लाड आर्पी ने अपनी किताब, 1962 ऐंड द मैकमोहन लाइन सागा में लिखा है कि जब 1946 में नेहरू अंतरिम प्रधानमंत्री बने, तो तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल लोकहार्ट ने भारत की सुरक्षा के संबंध में एक नीतिगत निर्देश पत्र का आलेख उनके सामने रखा। नेहरू ने उसे देख कहा,बकवास,हमें किसी सुरक्षा प्लान की जरूरत नहीं है। अहिंसा हमारी नीति है। हमें कोई सैनिक खतरा नहीं दिखता। सेना को खत्म कर दो, पुलिस ही काफी है, हमारी सुरक्षा के लिए। वह आगे लिखते हैं कि नेहरू की इस अहिंसक नीति का पहला शिकार कश्मीर हुआ और फिर दूसरा शिकार तिब्बत बना। आर विक्रम सिंह केअनुसार तिब्बत 1912 से लेकर 1950 तक एक आजाद देश की हैसियत से रहा था। 1912 में उसने अपने को चीन की गुलामी से मुक्त किया था। हम जो खुद हजार साल की गुलामी के बाद 1947 में आजाद हुए थे, हमारा दायित्व यह तो नहीं था कि हम सहायता करने के बजाय तिब्बत की गुलामी की पटकथा लिखें। अक्टूबर 1950 में तिब्बत पर विस्तारवादी चीन के कब्जे ने हमारी उतरी सीमाओं को पूरी तरह से असुरक्षित कर दिया। चीन काबिज इसलिए हो सका,क्योंकि नेहरू तिब्बत की आजादी के महत्व को समझ ही नहीं सके। इस तरह नेहरू ने तिब्बत की गुलामी पर अपनी मुहर लगा दी और इसे चीन का आंतरिक मामला बता डाला। आर विक्रम सिंह के अनुसार दोकलाम भूटान में पड़ता है, भारत का भाग नहीं है। लेकिन भूटान से हमारी रक्षा संधि के चलते भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने किस प्रकार चीनी सेनाओं, व उनकी कूटनीति का मुकाबला किया उस पर गर्व होता है। इतना होने के बावजूद भी हम संयुक्त राष्ट्र संघ में चीन की स्थायी सदस्यता के लिए चीन की पैरवी करते रहे। प्रश्र उठता है कि क्या 1962 की पराजय से बचा जा सकता था?जवाब है,जी हां, यदि हमनेआजादी के प्रारम्भिक वर्षों में अपनी सेनाओं को उतरी सीमाओं तक पहुंचाने की समझ रही होती। अक्साई चिन कैसा भी निर्जन स्थान हो,इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। समस्या चीन के अक्साई चिन क्षेत्र से होकर सडक़ बना लेने से पैदा हुई है। जब 1957 में उस सडक़ का उद्घघाटन भी हो चुका, तब हम यह तथ्य जान सके कि हमारे इलाके से सडक़ बन गई है। इससे पहले 1954 में चीन के साथ हुआ पंचशील समझौता तिब्बत में राष्ट्रीय हितों का समर्पण ही तो था। नेहरू आजाद तिब्बत के सामरिक महत्व को समझने में विफल रहे। उनका यह नीतिगत विभ्रम ही तिब्बत की गुलामी, कश्मीर के विभाजन और फिर 1962 की शर्मनाक पराजय का सबब बना। कोई भी साम्राज्य उतना ही शक्तिशाली होता है, जितनी कि उसकी सेनायें। उस समय ब्रिटिश प्रधान मंत्री ऐटली ने स्वीकार किया कि अंग्रेजों के भारत से जाने का मुख्य कारण तत्कालीन भारतीय सेना पर बढ़ रहा आजाद हिंद फौज व नेता जी सुभाष चन्द्र बोस का प्रभाव था। जिस सत्य, अहिंसा के सिद्धांतों पर देश आजाद हुआ था, वे अंतरराष्ट्रीय राजनय में अर्थहीन थे। कुल मिला कर एक नीतिगत लक्ष्य विहीनता ही दृष्टिगत होती है, जिसने 1962 की पराजय की इबारत लिखी और पूरी दुनिया में भारत को शर्मसार होना पड़ा। उतरी सीमा पर चीन के साथ विवाद ,कश्मीर समस्या का नासूर और संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थाई सदस्यता का मामला पं. नेहरू की नीतिगत लक्ष्य विहीनता का ही परिणाम है। मदन अरोड़ा, स्वतंत्र पत्रकार
नवंबर महीने में देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं.जवाहरलाल नेहरू की जयंती के साथ ही अनायास ही देश को शर्मसार कर देने वाले 1962 के उस युद्ध की याद आ जाना स्वाभाविक है, जिसका दंश आज भी देश उतरी सीमाओं पर भुगत रहा है। यह सब उस प्रधानमंत्री नेहरू की गलत रक्षा और विदेश नीति का परिणाम था, जिसे भारत के विकास का जनक कहा जाता है। पं. नेहरू ने दुनिया में अपने को शांति के मसीहा के रूप में स्थापित करने के प्रयासों में देश की सीमाओं को बिसरा दिया। उन्होंने 1948 में पाकिस्तान की ओर से कश्मीर पर किए गये हमले से भी कोई नसीहत नही ली। पं. नेहरू अपनी शांतिदूत की छवि में आत्ममुग्ध रहे और उनका परम मित्र चीन,भारत पर हमले की तैयारी करने में लगा रहा और 20 अक्टूबर 1962 को देश पर हमला कर दिया। सामरिक विशेषज्ञ आर विक्रम सिंह के अनुसार 20 अक्टूबर से 20 नवंबर तक का समय देश के लिये राष्ट्रीय शर्म का कालखंड है। भारत को सबक सिखाने के लिए 20 अक्टूबर 1962 को हमारी सीमाओं पर हुए चीनी हमले ने हमारे स्वाभिमान को धूल-धूसरित करते हुए पूरे विश्व में दया का पात्र बना कर छोड़ दिया था। 20 नवंबर 1962 को चीन की स्वत: युद्ध विराम की घोषणा ने इस शर्म को ही बढ़ाने का काम किया। जिस अमेरिका के भारत के लिए परमाणु बम केप्रस्ताव को जवाहर लाल नेहरू ठुकरा चुके थे, जिस अमेरिका के संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत को स्थायी सदस्य बनाये जाने के प्रस्ताव को भी वह यह कहते हुए मना कर चुके थे, कि इस सीट पर चीन का हक है, उसी अमेरिका से वह सिर्फ हथियार ही नहीं, बल्कि हमारी ओर से चीन से युद्ध करने का निवेदन करने को बाध्य हो गये। आर विक्रम सिंह के अनुसार नेहरू के अमेरिका को लिखे पत्रों को देख कर अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन फास्टर डलेस ने तंज कसते हुए कहा भी कि नेहरू को पता है कि वह क्या कह रहे हैं। हम भारत की ओर से चीन से युद्ध लड़ें। उनकी गुटनिरपेक्षता नीति का क्या होगा। यह नेहरू की लुंजपुंज रक्षा-विदेश नीति का परिणाम था। चीनी सेनाओं ने सेला पास का मोर्चा तोड़ दिया। भगदड़ मची हुई थी,तेजपुर और असम की घाटी का रास्ता चीनी सेनाओं के लिए खुला पड़ा था। हमारी मदद के लिए दुनिया में कोई नहीं आया, गुट निरपेक्षता और पंचशील के नेहरू के करीबी देशों में से भी मदद के लिए किसी ने कदमताल नहीं की। चीन के विरोध में कोई भी देश नेहरू के साथ खड़ा नहीं हुआ। अमेरिकी शर्तें मानते हुए पाकिस्तान के साथ कश्मीर समस्या के समाधान के लिए वार्ता करनी पड़ी। 62 के इस युद्ध ने नेहरू की विदेश और रक्षा नीति के नकलीपन को उघाड़ कर उसे अपना असल चेहरा देखने पर मजबूर कर दिया। नेहरू ने उतरी सीमाओं की सुरक्षा की परवाह नहीं की थी। परिणाम सामने था। आर विक्रम सिंह के अनुसार भारत तो ब्रिटिश उपनिवेश ही था,लेकिन वे किस हद तक अपने साम्राज्य की उतरी सीमाओं के प्रति सजग रहे थे,यह उनके सुरक्षा संबंधी अभिलेखों से स्पष्ट होता है। ब्रिटिश सेनाध्यक्ष ने इसका भी आकलन कर रखा था कि यदि चीनी खतरे के विरूद्ध तिब्बत को बचाने के लिए जरूरत पड़ी तो किस प्रकार सेनाओं को ल्हासा में उतारा जाएगा। परन्तु पं. नेहरू ने सेना को रणनीतिक रूप से मजबूत बनाने में कोई दिलचस्पी नहीं ली और सेना को नजर अंदाज ही किया। फ्रांसीसी मूल के सामरिक विशेषज्ञ लाड आर्पी ने अपनी किताब, 1962 ऐंड द मैकमोहन लाइन सागा में लिखा है कि जब 1946 में नेहरू अंतरिम प्रधानमंत्री बने, तो तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल लोकहार्ट ने भारत की सुरक्षा के संबंध में एक नीतिगत निर्देश पत्र का आलेख उनके सामने रखा। नेहरू ने उसे देख कहा,बकवास,हमें किसी सुरक्षा प्लान की जरूरत नहीं है। अहिंसा हमारी नीति है। हमें कोई सैनिक खतरा नहीं दिखता। सेना को खत्म कर दो, पुलिस ही काफी है, हमारी सुरक्षा के लिए। वह आगे लिखते हैं कि नेहरू की इस अहिंसक नीति का पहला शिकार कश्मीर हुआ और फिर दूसरा शिकार तिब्बत बना। आर विक्रम सिंह केअनुसार तिब्बत 1912 से लेकर 1950 तक एक आजाद देश की हैसियत से रहा था। 1912 में उसने अपने को चीन की गुलामी से मुक्त किया था। हम जो खुद हजार साल की गुलामी के बाद 1947 में आजाद हुए थे, हमारा दायित्व यह तो नहीं था कि हम सहायता करने के बजाय तिब्बत की गुलामी की पटकथा लिखें। अक्टूबर 1950 में तिब्बत पर विस्तारवादी चीन के कब्जे ने हमारी उतरी सीमाओं को पूरी तरह से असुरक्षित कर दिया। चीन काबिज इसलिए हो सका,क्योंकि नेहरू तिब्बत की आजादी के महत्व को समझ ही नहीं सके। इस तरह नेहरू ने तिब्बत की गुलामी पर अपनी मुहर लगा दी और इसे चीन का आंतरिक मामला बता डाला। आर विक्रम सिंह के अनुसार दोकलाम भूटान में पड़ता है, भारत का भाग नहीं है। लेकिन भूटान से हमारी रक्षा संधि के चलते भारत के प्रधानमंत्री मोदी ने किस प्रकार चीनी सेनाओं, व उनकी कूटनीति का मुकाबला किया उस पर गर्व होता है। इतना होने के बावजूद भी हम संयुक्त राष्ट्र संघ में चीन की स्थायी सदस्यता के लिए चीन की पैरवी करते रहे। प्रश्र उठता है कि क्या 1962 की पराजय से बचा जा सकता था?जवाब है,जी हां, यदि हमनेआजादी के प्रारम्भिक वर्षों में अपनी सेनाओं को उतरी सीमाओं तक पहुंचाने की समझ रही होती। अक्साई चिन कैसा भी निर्जन स्थान हो,इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। समस्या चीन के अक्साई चिन क्षेत्र से होकर सडक़ बना लेने से पैदा हुई है। जब 1957 में उस सडक़ का उद्घघाटन भी हो चुका, तब हम यह तथ्य जान सके कि हमारे इलाके से सडक़ बन गई है। इससे पहले 1954 में चीन के साथ हुआ पंचशील समझौता तिब्बत में राष्ट्रीय हितों का समर्पण ही तो था। नेहरू आजाद तिब्बत के सामरिक महत्व को समझने में विफल रहे। उनका यह नीतिगत विभ्रम ही तिब्बत की गुलामी, कश्मीर के विभाजन और फिर 1962 की शर्मनाक पराजय का सबब बना। कोई भी साम्राज्य उतना ही शक्तिशाली होता है, जितनी कि उसकी सेनायें। उस समय ब्रिटिश प्रधान मंत्री ऐटली ने स्वीकार किया कि अंग्रेजों के भारत से जाने का मुख्य कारण तत्कालीन भारतीय सेना पर बढ़ रहा आजाद हिंद फौज व नेता जी सुभाष चन्द्र बोस का प्रभाव था। जिस सत्य, अहिंसा के सिद्धांतों पर देश आजाद हुआ था, वे अंतरराष्ट्रीय राजनय में अर्थहीन थे। कुल मिला कर एक नीतिगत लक्ष्य विहीनता ही दृष्टिगत होती है, जिसने 1962 की पराजय की इबारत लिखी और पूरी दुनिया में भारत को शर्मसार होना पड़ा। उतरी सीमा पर चीन के साथ विवाद ,कश्मीर समस्या का नासूर और संयुक्त राष्ट्र में भारत की स्थाई सदस्यता का मामला पं. नेहरू की नीतिगत लक्ष्य विहीनता का ही परिणाम है। मदन अरोड़ा, स्वतंत्र पत्रकार
दसॉ के सीईओ एरिक ट्रे पियर ने राहुल गांधी के राफेल डील को लेकर लगाय जा रहे सभी आरोपों को बेबुनियाद बताया है।न्यूज़ एजेंसी ani को दिए एक इंटरव्यू में एरिक ने कहा कि पूर्व राष्ट्रपति ने रिलायंस को लेकर झूठ बोला था।मैं झूठ नहीं बोलता, जो पहले बोला, वही अब कह रहा हूं।एरिक से जब पूछा गया कि राहुल गांधी ने कहा था कि ऑफसेट पार्टनर चुनने को लेकर सीईओ झूठ बोल रहे हैं तो उन्होंने कहा कि मेरी छवि झूठ बोलने वाले व्यक्ति की नहीं है।मेरी पोजीशन पर आकर कोई झूठ बोलने का रिस्क नहीं ले सकता।सीईओ ने कहा कि कांग्रेस के साथ डील करने का उनका लम्बा अनुभव है।इन आरोपों से वे दुखी हैं।हम 1953 से नेहरू के समय से भारत के साथ डील करते आ रहे हैं।हम किसी पार्टी के लिए काम नहीं करते हैं।हम वायुसेना और सरकार के साथ काम करते हैं।जब उनसे अंबानी को ऑफसेट पार्टनर चुनने के पीछे के कारणों को लेकर पूछा गया और पूछा कि रिलायंस को जेट बनाने का कोई अनुभव नहीं है तो उन्होंने कहा कि इसमें निवेश किया गया पैसा सीधे तौर पर रिलायंस को नहीं जाएगा, बल्कि यह एक जॉइंट वेंचर को जाएगा, दसॉ भी इसका हिस्सा है।उन्होंने कहा कि हम रिलायंस में पैसा नहीं लगा रहे हैं।यह जॉइंट वेंचर में लगाया जाएगा।जहाँ तक डील की बात है, मेरे पास इंजीनियर और वर्कर्स हैं।दूसरी ओर रिलायंस जैसी कंपनी है जो जॉइंट वेंचर में पैसा लगा रही है।इस डील में रिलायंस 51 फीसदी और दसॉ 49 फीसदी पैसा लगाना है।एरिक ने कहा कि ऑफसेट के लिए हमारे पास 7 साल हैं।हमने 30 और कंपनीज के साथ जॉइंट वेंचर अब तक कर चुके हैं।कांट्रेक्ट के मुताबिक 40 फीसदी ऑफसेट हिस्सा है इसमें 10 फीसदी रिलायंस का है।एरिक ने कीमतों को लेकर मोदी सरकार के दावों की पुष्टि करते हुए कहा कि यह upa के मुकाबले 9 फीसदी सस्ता है।यह सरकार to सरकार डील है।इसलिए मोलभाव हुआ और मुझे 9 फीसदी कीमत कम करना पड़ा।मदन अरोड़ा, स्वतंत्र पत्रकार
सीधा संदेश हरहाल 2019 तक मचाएंगे राफेल राफेल, चोर चोर का शोर। मंगलवार को दसॉ के सीईओ एरिक का ani की एडिटर द्वारा लिए गए इंटरव्यू के सामने आने और सुप्रीम कोर्ट में सरकार की ओर से राफेल की कीमत, ऑफसेटऔर डील की प्रक्रिया, संबंधी रिपोर्ट पेश कर दिए जाने के बाद राहुल गांधी और कांग्रेस की तरफ से जैसी अपेक्षा की जा रही थी, वैसी ही मैं नहीं मानूँगा वाली प्रतिक्रिया सामने आई।दसॉ ऐविएशन के सीईओ एरिक ने राहुल गांधी की ओर से लगाये जा रहे सभी आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए दावा किया कि डील में किसी भी स्तर पर कुछ भी गलत नहीं हुआ है।रिलायंस के साथ बिना अनुभव के डील पर सीईओ एरिक ने कहा कि दसॉ रिलायंस में सीधा पैसा नहीं लगा रही है ,उसके साथ जॉइंट वेंचर में 51 और 49 फीसदी के हिसाब से पैसा लगाया जा रहा है।उन्होंने कहा कि ऑफसेट कुल डील का मात्र 40 फीसदी है और इसमें 10 फीसदी रिलायंस के साथ किया गया है।सीईओ एरिक ने ये कहते हुए कि उनका कांग्रेस के साथ काम करने का लंबा अनुभव है बताया कि मोदी सरकार के साथ सरकार to सरकार डील की वजह से मोलभाव किये जाने के कारण उन्हें राफेल की कीमत 9 फीसदी कम करनी पड़ी। सोमवार को सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में भी राफेल की कीमत सहित डील से जुड़े तमाम दस्तावेज पेश किए।इन पर जैसा अपेक्षित था राहुल गांधी और कांग्रेस ने नकारते हुए कहा कि सीईओ मोदी के दबाव में ऐसा बयान दे सच्चाई को छिपा रहे हैं।कोर्ट में पेश रिपोर्ट पर भी कांग्रेस ने कहा कि साबित हो गया है कि मोदी सरकार ने गड़बड़ की है।साफ है कि राहुल गांधी और कांग्रेस इस मुद्दे को 2019 तक छोड़ना नहीं चाहते और कांग्रेस की घोटालों वाली छवि को काउंटर करने के लिए चोर चोर का शोर मचाते रहेंगे पर उन्हें ध्यान रखना होगा कि कहीं उल्टा न हो जाये, लोग यह नहीं कहने लगें चोर मचाए शोर।सीईओ एरिक के इस बयान से की कांग्रेस सरकार के साथ उनके लम्बा अनुभव है, मोदी के सरकार to सरकार डील करने की वजह से मोलभाव में उन्हें upa के मुकाबले 9 फीसदी कीमत कम करनी पड़ी से कहीं यह बात न खुल जाए कि कांग्रेस सरकार दलालों के माध्यम से 9 फीसदी अपनी जेब में डाल रही थी, अगर लोगों के दिमाग में यह बात आ गई तो राहुल गांधी मोदी को चोर बता रहे हैं और लोग उन्हें ही निशाने पर ले चोर मचाये शोर के साथ जवाब देने लग जाएंगे मदन अरोड़ा, स्वतंत्र पत्रकार
न्यायपालिका की साख एक बार फिर दांव पर है। सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या मामले की सुनवाई टालते हुए कहा है कि जनवरी 2019 में उचित पीठ सुनवाई की तारीख तय करेगी। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोइ, संजय किशन कौल और केएम जोसफ की पीठ के समक्ष यूपी सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और रामलला के वकील सीएस वैद्यनाथन ने दिवाली के बाद सुनवाई की तारीख तय करने की गुहार लगाई, पर पीठ ने ठुकरा दिया। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा , हमारी अपनी प्राथमिकताएं हैं। हमे नहीं पता तारीख क्या होगी। यह जनवरी, मार्च या अप्रैल में भी हो सकती है। इसके साथ ही आम चुनाव से पहले इस पर फैसला आने की उम्मीद कम हो गई है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 2010 में विवादित जमीन को निर्मोही अखाड़ा, रामलला और सुन्नी वक्फ बोर्ड के बीच बराबर बांटने का आदेश दिया था। इस फैसले को पक्षकारों ने चुनौती दी। मई, 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालय के फैसले पर रोक लगाते हुए यथास्थिति को कहा । सात साल तक यह मामला ठंडे बस्ते में रहा। 28 सितंबर, 2018 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के नेतृत्व में पीठ ने क कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल की 2019 चुनाव के बाद मामले की सुनवाई किये जाने की अपील को खारिज करते हुए 29 अक्टूबर 2018 से नियमित रूप से प्रतिदिन सुनवाई के आदेश दिए तो उम्मीद जगी , कि मामले का जल्द निपटारा हो जाएगा। इससे राजनीतिक दलों में इस बात को लेकर बेचैनी साफ देखी गई कि यदि चुनाव पूर्व फैसला आ गया तो इसका लाभ चुनाव में भाजपा ले जाएगी। सभी पक्षकारों और देश के करोड़ों लोगों को विश्वास था कि 29 अक्टूबर को नई बैंच का गठन कर मामले की नियमित सुनवाई शुरू हो जायेगी, पर मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के नेतृत्व में बनी पीठ के तीन मिनट में ही तीन महीने के लिए सुनवाई टाल दिये जाने से बेहद निराशा हुई है। सबसे ज्यादा हैरानी मुख्य न्यायाधीश के मामले को प्राथमिकता में नहीं होने को लेकर जतायी जा रही है और सवाल किया जा रहा है, कि जिस मामले में देश के करोड़ों लोगों की भावना और आस्था जुड़ी हुई है ,अगर वह न्यायालय की प्राथमिकता नहीं, तो अर्बन नक्सल का मामला जो कुछ लोगों के देश द्रोह से जुड़ा है, वह न्यायालय की प्राथमिकता कैसे हो गया, जिसके लिए न केवल कोर्ट रात को सुनवाई करती है, आरोपितों को पुलिस कस्टडी में दिये जाने के बजाय घर में नजरबंद कर दिया गया। तीन मिनट में ही सुनवाई को कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल की भावना के अनुरूप तीन महीनों के लिए टाल देने और पीठ में कनिष्ठ और ऐसे जज , जिसकी न्यायालय में नियुक्ति को लेकर सरकार के साथ लम्बा विवाद चला , को शामिल किये जाने से खुद मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की विश्वसनीयता और निष्पक्षता पर सवाल उठाये जा रहे हैं और पूछा जा रहा है, कि क्या अब फैसले विचार धारा के आधार पर होंगे? मुख्य न्यायाधीश गोगोई के हमें नहीं पता तारीख क्या होगी। यह जनवरी,मार्च अथवा अप्रैल के बयान ने आग में घी डालने का ही काम किया है। हिंदुओं के एक बड़े वर्ग में यह बात पहले ही घर कर चुकी है, कि न्यायपालिका हिंदू धर्म से जुड़े मामलों में आस्थाओं पर हमले कर रही है । अयोध्या मामले पर हुई सुनवाई ने इसे और पुख्ता कर दिया है । सवाल यह भी पूछा जा रहा है कि इसी साल 28 सितंबर में हुई सुनवाई के दौरान तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा जिस मामले को प्राथमिकता के आधार पर नियमित सुनवाई के आदेश देते हैं, एक महीने बाद ऐसा क्या हो गया कि वह न्यायालय की प्राथमिकता से बाहर हो गया? क्या इसके पीछे किसी सियासी दल , जिसकी पृष्ठभूमि से खुद मुख्य न्यायाधीश आते हैं, को चुनाव में किसी परेशानी से बचाने के लिए सुनवाई को लम्बा टाला गया है? हैरानी इस बात पर भी जताईजा रही है, कि जजों की कनिष्ठता के जिस मुद्दे को लेकर मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कुछ महीनों पहले ही तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ अपने तीन अन्य साथी न्यायाधीशों के साथ मोर्चा खोला था, उनकी पीठ में एक कनिष्ठ जज को क्योंकर शामिल कर लिया गया? सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से यह तो तय हो गया है, कि मामले की नियमित सुनवाई कम से कम 2019 के चुनाव से पूर्व नहीं होने जा रही है। सुनवाई के टाले जाने से कुछ लोग भले ही खुश हो राहत महसूस कर रहे हों और इससे भाजपा को नुकसान होने का काल्पनिक सपना देख रहे हों, लेकिन हकीकत में ऐसा होता दिख नहीं रहा है। इससे संदेश यही जा रहा है, कि इस सबके पीछे कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल की ही भूमिका है। यह सही है कि मंदिर समर्थकों और भाजपा के अन्दर ही मोदी सरकार पर अध्यादेश लाकर मंदिर बनाने का मार्ग प्रशस्त किये जाने का दबाव बढ़ा है, लेकिन लोगों के बीच बड़ा संदेश यह जा रहा है कि राम मंदिर बनाने में कांग्रेस ही सबसे बड़ी रूकावट पैदा कर रही है। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई का कांग्रेस पृष्ठभूमि से होना और कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल का मामले की जुलाई 2019 के बाद सुनवाई किये जाने की मांग और मात्र तीन मिनट में ही सुनवाई को तीन महीने के लिए टाल देना लोगों के जेहन में खटक रहा है और यह राहुल गांधी के मंदिरों की खाक छानने पर भारी पड़ता दिखने लगा है, जिसकी बड़ी कीमत कांग्रेस को चुनाव में चुकानी पड़ सकती है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से लोगों के बीच गया संदेश न्यायपालिका की सेहत और साख केलिए सही नहीं है। मदन अरोड़ा, स्वतंत्र पत्रकार
राफेल डील पर जारी विवाद के बीच सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से खरीद प्रक्रिया की पूरी जानकारी मांगी है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से सीलबंद लिफाफे में उस फैसले की प्रक्रिया की डीटेल देने को कहा है, जिसके बाद राफेल जेट की खरीद को लेकर फ्रांस की कंपनी दैसॉ एविएशन से डील हुई। कोर्ट ने कहा कि केंद्र 29 अक्टूबर तक सूचनाएं सौंपे। मामले की अगली सुनवाई 31 अक्टूबर को होगी। आपको बता दें कि विपक्ष राफेल जेट की कीमतों को लेकर सरकार पर गंभीर आरोप लगा रहा है और इसी के तहत मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। हालांकि बेंच ने स्पष्ट किया है कि वह याचिकाओं में लगाए गए आरोपों को ध्यान में नहीं रख रहा है। वहीं, केंद्र सरकार ने राफेल डील पर दायर की गई याचिकाओं को रद्द करने की मांग की। केंद्र ने दलील दी कि राजनीतिक फायदे के लिए राफेल पर PILs दायर की गई हैं। अटर्नी जनरल ने कोर्ट से कहा कि राफेल सौदा राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है और ऐसे मुद्दों की न्यायिक समीक्षा नहीं की जा सकती है। मुख्य न्यायाधीश ने अटॉर्नी जनरल से कहा कि सरकार से कहिए कि इस बारे में कोर्ट सूचित किया जाए कि राफेल डील कैसे हुई. हम यह साफ कर दें कि हमने याचिका में लगाए गए आरोपों का संज्ञान नहीं लिया है. यह आदेश केवल यह सुनिश्चित करने के लिए है कि फैसला लेने में समुचित प्रक्रिया का पालन किया गया. हम राफेल विमान की कीमत या एयरफोर्स के लिए इसकी उपयोगिता के बारे में नहीं पूछ रहे हैं. इस पर मुख्य न्यायाधीश ने पूछा कि अगर हम डील की जानकारी को छोड़कर इसमें फैसले लेने की प्रक्रिया की जानकारी मांगें तो क्या आप यह उपलब्ध करा सकते हैं? इस पर अटॉर्नी जनरल ने कहा कि रक्षा सौदों में प्रोटोकॉल होता है. यह बताया जा सकता है. वहीं, कांग्रेस नेता और आरटीआई कार्यकर्ता तहसीन पूनावाला ने राफेल सौदे के संबंध में दायर अपनी जनहित याचिका वापस ले ली है। आपको बता दें कि पीठ राफेल सौदे को लेकर दायर कई याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। बता दें कि कोर्ट ने सरकार से राफेल विमान की कीमतों का खुलासा या तकनीकी जानकारी उपलब्ध कराने को नहीं कहा है. कोर्ट की ओर से डील की प्रक्रिया की जानकारी मांगी गई है. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को औपचारिक आदेश नहीं दिया है, बल्कि अटॉर्नी जनरल को सीलबंद लिफाफे में जानकारी उपलब्ध कराने को कहा है. बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेरिस में 10 अप्रैल 2015 को तत्कालीन फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के साथ बातचीत के बाद 36 राफेल जेट विमानों की खरीद की घोषणा की थी। 23 सितंबर 2016 को अंतिम रूप से यह सौदा पक्का हुआ। कांग्रेस का आरोप कांग्रेस इस सौदे में बड़ी अनियमितता का आरोप लगा रही है। मुख्य विपक्षी पार्टी का आरोप है कि सरकार 1670 करोड़ रुपये प्रति राफेल की दर से यह विमान खरीद रही है जबकि UPA की पिछली सरकार के दौरान इसका दाम 526 करोड़ रुपये तय किया गया था। बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेरिस में 10 अप्रैल 2015 को तत्कालीन फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के साथ बातचीत के बाद 36 राफेल जेट विमानों की खरीद की घोषणा की थी। 23 सितंबर 2016 को अंतिम रूप से यह सौदा पक्का हुआ। कांग्रेस का गंभीर आरोप कांग्रेस इस सौदे में बड़ी अनियमितता का आरोप लगा रही है। मुख्य विपक्षी पार्टी का आरोप है कि सरकार 1670 करोड़ रुपये प्रति राफेल की दर से यह विमान खरीद रही है जबकि UPA की पिछली सरकार के दौरान इसका दाम 526 करोड़ रुपये तय किया गया था। बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेरिस में 10 अप्रैल 2015 को तत्कालीन फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद के साथ बातचीत के बाद 36 राफेल जेट विमानों की खरीद की घोषणा की थी। 23 सितंबर 2016 को अंतिम रूप से यह सौदा पक्का हुआ। कांग्रेस का गंभीर आरोप कांग्रेस इस सौदे में बड़ी अनियमितता का आरोप लगा रही है। मुख्य विपक्षी पार्टी का आरोप है कि सरकार 1670 करोड़ रुपये प्रति राफेल की दर से यह विमान खरीद रही है जबकि UPA की पिछली सरकार के दौरान इसका दाम 526 करोड़ रुपये तय किया गया था। मदन अरोड़ा, स्वतंत्र पत्रकार
अमेरिका के दबाव को दरकिनार करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस के साथ जिस s 400 वायु रक्षा प्रणाली का 39000 करोड़ रुपये का सौदा किया है ,उसमें भी राहुल गांधी को घोटाला मुद्दा मिल सकता है।आज की तारीख में 5 अरब डॉलर केहुए इस सौदे में रिलाएंस भी भारत में s400 बनाने वाली कंपनी आत्माज ऐंटी के साथ साझेदार है। रिलाएंस ने 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मास्को यात्रा के दौरान यह साझेदारी की थी।24 दिसम्बर 2015 को रिलाएंस इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड ने अपनी एक प्रेस रिलीज में इसका जिक्र किया था।इसमें लिखा था कि डीएसी ने s400 वायु रक्षा मिसाइल सिस्टम के अधिग्रहण को मंजूरी देकर 6 अरब डॉलर के व्यापार का मौका दिया है। भारत की रिलाएंस डिफेंस लिमिटेड और रूस की वायु रक्षा मिसाइल सिस्टम की प्रमुख निर्माता कंपनी आत्माज एंटी ने भारत के साथ संयुक्त रूप से काम करने का फैसला किया है।आत्माज एंटी के उपाध्यक्ष ने इस अवसर पर कहा था कि रिलाएंस डिफेंस।के साथ काम करने से भविष्य में भारत की सुरक्षा बलों की जरूरतों को पूरा करने के लिए दोनों कंपनियों को नई दिशा मिलेगी। अब इस डील में भी रिलायंस का नाम आने से राहुल गांधी और कांग्रेस को घोटाले का आरोप लगाने का सुनहरी मौका मिल सकता है और आरोप लगाया जा सकता है कि अंबानी को 6 अरब डॉलर का फायदा पहुंचाया गया।हालांकि डील 5 अरब डॉलर की है। पर इसमें एक पेंच है कि रिलाएंस ने डील के तुरंत बाद ही भारत में प्रेस रिलीज कर इसकी जानकारी दे दी थी इसलिये आरोप लगाने वालों से ये तो पूछा ही जायेगा कि उस वक्त इस पर सवाल खड़े क्यों नहीं किये गए। मदन अरोड़ा, स्वतंत्र पत्रकार

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